प्रतापबाला (1834) जोधपुर की महारानी और कृष्णभक्त कवयित्री थीं। परिजनों की अकालमृत्यु के कारण उनके मन में संसार की नश्वरता के प्रति वैराग्य उत्पन्न हुआ और वे कृष्ण-भक्ति में लीन हो गईं। उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा, प्रेम और समर्पण को सरस पदों के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी रचनाओं में भक्ति के साथ विरह और वैराग्य के भाव भी दिखाई देते हैं। राजस्थान की कृष्णभक्ति काव्य-परंपरा में प्रतापबाला का नाम उल्लेखनीय है।
मो मन परी है यह बान
प्रतापबाला
मो मन परी है यह बान।चतुरभुज को चरण पठिहरि ना चाहूँ कछु आन।
कमल नैन विसाल सुंदर मंद मुख मुसकान॥
सुभग मुकुट सुहावनो सिर लसे कुंडल कान।
प्रगट भाल विशाल राजत भौंह मनहुँ कमान॥
अंग-अंग अनंग को छबि पीत पट पहिरान।
कृष्णरूप अनूप को मैं धरूँ निसि दिन ध्यान॥
सदा सुमिरूँ रूप पल-पल कला कोटि निधान।
जामसुता परताप के भुज चार जीवन-प्रान॥
भजु मन नंदनंदन गिरिधारी
प्रतापबाला
भजु मन नंदनंदन गिरिधारी।सुख-सागर करुणा को आगर भक्तवछल बनवारी॥
मीरा करमा कुबरी सबरी तारी गौतमनारी।
वेद पुरानन में जस गायो ध्याये होवत प्यारी॥
जामसुता को स्याम चतुरभुज लेजा ख़बरि हमारी॥
प्रीतम हमारो प्यारो श्याम गिरिधारी है
प्रतापबाला
प्रीतम हमारो प्यारो श्याम गिरिधारी है।मोहन अनाथनाथ संतन के डोलै साथ,
वेद गुन गावैं गाथ गोकुल बिहारी हैं।
कमल विशाल नैन निपट रसीले बैन,
दीनन को सुख दैन चारिभुजा धारी हैं।
केशव कृपानिधान वाही सो हमारो ध्यान,
तन मन बारूँ प्रान जीवन मुरारी हैं।
सुमिरूँ मैं साँझ-भोर बार-बार हाथ जोर,
कहत प्रताप भौंर जाम की दुलारी हैं।
चतुरभुज झुलत श्याम हिंडोरे
प्रतापबाला
चतुरभुज झुलत श्याम हिंडोरे।कंचन खंभ लगे मणिमानिक रेसम की रंग डोरें॥
उमड़ि घुमड़ि घन बरसत चहुँदिसि नदियाँ लेत हिलोरें।
हरी-हरी भूमि लता लपटाई बोलत कोकिल मोरें॥
बाजत बीन पखावज बंशी गान होते चहुँ ओरें।
जामसुता छबि निरखि अनोखी वारूँ काम किरोरें॥
वारी थारा मुखड़ा की श्याम सुजान
प्रतापबाला
वारी थारा मुखड़ा की श्याम सुजान।मंद-मंद मुख हास बिराजै कोटिक काम लजान।
अनियारी अँखिया रसभीनी बाँकी भौंह कमान॥
दाड़िम दसन अधर अरुणारे बचन सुधा सुखखान।
जामसुता प्रभुसों कर जोरे मेरे जीवन प्रान॥
लगन थारी लागी चतुरभुज राम
प्रतापबाला
लगन थारी लागी चतुरभुज राम।श्याम सनेही जीवन ये ही औरन से क्या काम।
नैन निहारूँ पल न बिसारूँ सुमिरूँ निसिदिन श्याम॥
हरि सुमिरन तें सब दुख जावे मन पावे बिसराम।
तन-मन-धन न्योछावर कीजै कहत दुलारी जाम॥
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