सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

राजकमल चौधरी की कविताएँ : Rajkamal Choudhary Ki Kavita

परिचय

राजकमल चौधरी (1929–1967) हिंदी और मैथिली के चर्चित कवि, कथाकार एवं उपन्यासकार थे। वे नई कविता और आधुनिकतावादी साहित्य की प्रमुख आवाज़ों में माने जाते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘मुक्तिप्रसंग’, ‘कंकावती’ और ‘मछली मरी हुई’ विशेष रूप से चर्चित हैं। उनकी रचनाओं की विशिष्टता यथार्थवादी दृष्टि, विद्रोही तेवर, नगरीय जीवन की विडंबनाओं और मानवीय संबंधों के जटिल चित्रण में दिखाई देती है।
कम आयु में निधन के बावजूद उन्होंने हिंदी और मैथिली साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और उनकी रचनाएँ आज भी आधुनिक भारतीय साहित्य के संदर्भ में पढ़ी जाती हैं।

शव-यात्रा का मृत संगीत

राजकमल चौधरी

स्मृति में महाप्राण निराला को समर्पित

समूचा नगर पेट्रोल की गंध में डूबा हुआ...
आग लगती है। धड़ाके से ग्लोब फट जाता है,
आग लगती है।
कहीं कोई सायरन नहीं बजता...
मैं पेट्रोल में
आग में
ग्लोब में 
अपने अकेलपन में
तुम्हारी मृत्यु के अपराध में, क़ैद हूँ। क़ैदख़ाने में
दरवाज़ा नहीं है;
दरवाज़ा इस ग्लोब में कभी नहीं था।
आओ, पहले हम बहस करें कि क्यों नहीं था दरवाज़ा
पहले हम तय करें कि यह क़ैदख़ाना किसने बनाया
फ़ैसला करें कि दरवाज़े क्या होते हैं
इतनी ईंटें कहाँ से आईं
लोहे की सलाख़ें कौन ले आया
दीवारें धीरे-धीरे ऊपर उठती गई किस तरह?
आवश्यक है तर्क-वितर्क
फिर, यह कि वाक्य-व्यवस्था हो, विषय हो
सिद्धांत बनें, अपवाद गढ़े जाएँ, व्याख्याएँ, भाष्य,
फिर, निर्णय हो
कि पहले क्यों नहीं थे दरवाज़े
और, अब क्यों नहीं हैं?

जीवन, और जीवन में लगातार पराजय
पराजय, और उपहास के बाद भी हम जीवित हैं।
तुम अपराजेय थे, इसीलिए तो जीवित नहीं थे, मृत थे
मृत थे, किंतु अमृत थे
हम तुम्हारे उत्तराधिकारी विष भी नहीं हैं।

ज्ञान अपनी संपूर्णता में प्रकृतिगत छल है
संबल है, हम सबका एक मात्र अज्ञान।
वह भी संभव नहीं है;
अबोधत्व टूट-बिखर जाता है...
आदमी हो जाता है कृतवीर्य
क्षुधा-ज्वाला में अपना ही तन खाता है।
और, अबोधत्व संभव नहीं है।
अपनी कुरूपता का
विकलांगता का
विषदाह का हर आदमी है जानकार।
हर आदमी के सामने है आदमक़द आईना,
अपने सामने वह ख़ुद है!
और, दुखी है।
मृत है!
तुम इसीलिए अमृत थे कि तुम्हारे सम्मुख
शीशा नहीं था
अखंडिता (अथवा सहस्रखंडिता!) प्रकृति थी
जलवाहक मेघ थे
गंगा थी 
फूल, वृक्ष, इंद्रधनु, धूप, रूपसी संध्या, वसंत,
जूही की कलिकाएँ...
तुम्हारे सम्मुख शीशा नहीं था
स्वप्न था!

हमारी पराजय का प्रथम कारण है नैतिकता
धर्म हमारे सामूहिक अपराध की प्रथम स्वीकृति
अन्न-वस्त्र हमारे लिए प्रथम दंड
ज्ञान हमारा प्रथम अभाव...
और ईश्वर?
हमारी असहायता के सिवा और क्या?
हम पराजित हैं
अपराधी हैं
दंडित हैं—
और, हमारे कंधों पर तुम्हारा शव है।
नींद में या अनिद्रा में स्तब्ध है समूचा नगर
चौराहों पर बुझे हुए लैंप-पोस्ट
पार्कों में बिछी हुई घास पर अनगिनत लाशें
पत्थर के स्तंभों पर ब्रोंज की मूर्तियाँ
किताब घरों पर ताले पड़ गए हैं
अदालतों की कुर्सियों पर बैठे हैं लोहे के बुत!
लोहे की लगातार बंदिशें, लोहे की दीवारें
हर घर किसी न किसी क़ब्र का दरवाज़ा है
जो अंदर जाने के लिए खुलता है
बाहर जाने के लिए नहीं
कभी नहीं

अब सभी लोग हमें पागल कहते हैं
कि हम कंधों पर हो रहे हैं इतिहास
कि हम दिमाग़ में लादे हुए हैं
एक अर्थहीन परंपरा 
भाव का उपयोग विहीन विस्तार
शब्द का व्यवसाय विहीन, लाभ विहीन व्यापार!
कविता का क्या होगा?
गगन में इतने स्वर्ण-तारक तो जड़े ही हैं
वैसे भी तो उपयोगी है अंधकार 
ज्योतिपिता सविता का क्या होगा?
रात काटने के लिए चाहिए कहीं एक पड़ाव
मांसपिंडों का जलता हुआ अलाव
चावल के चंद दाने
क़तरा भर मक्खन
कहवे का गर्म प्याला
कभी-कभी शराब
बीमे की पॉलिसी
दो-एक अदद बच्चे
एक बिस्तरा और नींद!
कविता का क्या होगा?
ज्योतिपिता सविता का क्या होगा?
क्या होगा आँखों में यदि नहीं सपने,
हम आदमी हैं यों ही उम्र काट लेते हैं
तेज़ मशीनों की तेज़ धड़धड़ाहट में

हम आदमी हैं यों ही उम्र काट लेते हैं।
बीमार बच्चों की कमज़ोर, बेमतलब तुतलाहट में
हम आदमी हैं
दूसरों की दौलत का हिसाब लिखते हैं
और डूबे रहते हैं
अपने क़र्ज़ के समुंदर में!
दफ़्तर की टाइपिस्ट लड़कियाँ अकारण खिलखिलाती हैं
बंद केबिन में बैठा मालिक अकारण ग़ुस्सा हो जाता है
अकारण नौकरी छोड़ देता है टेलीफ़ोन-ऑपरेटर
कारख़ाने के मज़दूर अकारण करते हैं हड़ताल
अकारण बोनस नहीं मिलता है
अकारण ट्राम उलट जाती है
अकारण जमा हो जाती है चौरस्तों पर भीड़
अकारण मैदानों में भाषण दिए जाते हैं
अकारण छपते हैं अख़बार
सेक्रेटेरियट-बिल्डिंग की छत से कूदकर
अकारण कई आदमी आत्महत्या कर लेते हैं...
कारण की खोज में हम क्यों छटपटाएँ
क्यों नहीं किसी चायख़ाने में
या सिनेमाघर में
घुसकर 
गर्म चाय पीते रहें 
देखते रहें गर्म औरतें?
...रात काटने के लिए चाहिए कहीं भी पड़ाव
मांसपेशियों का हल्का-सा तनाव!
क्या चाहता था ‘गोएथे' का ‘डॉक्टर फाउस्ट'
टालस्टाय की ‘अन्ना' क्यों ट्रेन से कट गई
क्यों शेली सागर में डूब गया
क्यों स्टीफ़ेन ज्विग ने
मायकोवस्की ने 
ख़ुदकुशी कर ली
क्यों पागल हो गया वान गॉख
या नज़रुल इस्लाम
या निराला?
—हमें जानने की फ़ुर्सत नहीं है
कि हम आदमी नहीं हैं हुजूम हैं
जुलूस हैं!

और, अब पुनः वसंत आ गया है अनजाने :
वसंत की नदी में जल-प्लावन
ज्वार में बहता हुआ स्मरण का निर्माल्य
त्यक्त फूलों में असंभव सुगंधि...
और, हम इस सुगंधि के उत्तराधिकारी हैं
वंशधर हैं
और, हमारे कंधों पर तुम्हारा अ-मृत शव है
और, पेट्रोल की गंध में डूबा हुआ है समूचा नगर
और, आग लगती है
और, धड़ाके से फट जाता है ग्लोब
कविताएँ
शब्द
अर्थ
ध्वनियाँ, शीशे के टुकड़ों की तरह
बिखर जाती हैं...
मगर कहीं कोई सायरन नहीं बजता है।
कहीं कोई अरथी नहीं सजती है
कहीं कोई शोक-गीत गूँजता नहीं है
कहीं कुछ नहीं होता!
हम कंधों पर तुम्हारी लाश लिए चलते रहते हैं।
चलते रहते हैं।
और हमारे पीछे भीड़ चलती रहती है।

भीड़ और कहकहे, और फ़िल्मी गाने, और फ़ोहश मज़ाक़
और पराजय, और अपराध, और दंड
और ईश्वर! 
तुम्हारा प्रथम अपराध यही था कि तुम स्रष्टा थे
हमारा प्रथम अपराध यही है
कि हम तुम्हारी सृष्टि को समर्पित हैं
कि हम गर्वित हैं
कि चींटियों की क़तारें
कल्प-पुरुष की सुगंधि नहीं पहचानती हैं
और तुम्हें कल्पतरु नहीं मानती हैं।

वेश्याएँ

राजकमल चौधरी

सड़कें ख़ाली हैं। वे करती हैं इंतज़ार...
सड़कें, गलियाँ, बरामदे भर गए हैं, फिर भी,
वे करती रहती हैं इंतज़ार!
आवाज़ पहचानती हैं। दर्द, वहशत, बीमारियाँ और
हविस उसकी—वे जानती हैं।
सिर्फ़ नहीं उसका नाम...
उसका कोई नाम नहीं है, शायद!

ऋतु शृंगार में खंडित नायिकाएँ

राजकमल चौधरी

एक

जिनके पास अपने व्यक्ति अथवा अपनी इच्छाओं का कोई अतीत नहीं होता,
वे ही लोग किसी न किसी भविष्य के चमत्कार, एवं कर्म-फल के नियतिवादी
सिद्धांत में आस्था रखते हैं। आस्था रखने के लिए अलकनंदा, मेरे पास
और कोई भविष्य नहीं है। केवल वर्तमान है। अतीत से भी अधिक प्रामाणिक
और विवेक-निर्देशित है मेरा यह वर्तमान। स्वस्थ किंवा अस्वस्थ किन्हीं भी
कारणों से तुम हमलोगों का भविष्य बनना चाहती हो—किंतु, यह संभव नहीं
है इच्छा-अनिच्छा से, कारण-अकारण से तुम्हें वर्तमान ही बने रहना होगा,
अगर तुम अतीत बनने से असहमति देना चाहोगी।

स्थान, काल और पात्र की नियति नहीं होकर भी, इनकी संगति यही है।
तुम्हारी सुंदरता और वासनाएँ, मेरी वासनाएँ और कविता, हम लोगों की
कविता और व्यवहार-पद्धतियाँ इसी एक वर्तमान संगति के नियम से चलती
है। हेनरी मिलर ने इसी को समुद्र के अनंत अंधकार में तैरते हुए मृत शरीर
का संगीत कहा है। यह मृत अमरत्व वर्तमान में, सामुद्रिक अंधकार में तैरते
हुए ही प्राप्त किया जा सकता है, किसी भी भविष्य-तिथि की काल्पनिक
संहति में नहीं।

मेरी कविता और मेरी वासनाएँ मेरे लिए क्रमशः प्रथम और अंतिम वर्तमान
हैं। तुम इनमें, अर्थात् इनमें किसी एक में शामिल हो सकती हो हम लोगों
के साथ-इन्हें अपने और—अथवा हम लोगों के भविष्य में शामिल नहीं कर
सकतीं। ऐसा करना वर्तमान को ग़लत करना होगा।

दो

ऋतु-शृंगार में नायिकाएँ तिलक-कामोद वसन नहीं पहनें केवल पहनें
अपनी पारदर्शी त्वचा 
उपगुप्त कुमारगिरि अजातशत्रु के आगमन-उपरांत
उतारकर त्वचा-कवच अस्थि-आयुध
कामप्रद निर्मोक—नृत्य में फलवती हों नायिकाएँ
देह-चक्रव्यूह से बाहर आएँ मोह-स्खलित
खंडित हों—

दशाश्वमेध के एकांत में अधडूबी सीढ़ियों से नीचे गंगाजल में पाँव
फैलाए हुए हम लोगों ने यही निर्णय लिया था
तीसरे ब्रह्मांड में बंद
चंद्रमा वीनस और मंगल नक्षत्रों की भविष्य-गणना करके
एक साक्षर ऋतु के गर्भपिंड से दूसरी
ध्वनि मुक्त ऋतु की गर्भशिला पर स्थापित करने के लिए
इच्छाएँ
सप्त शून्यों की नीली गोलाइयों में
आरोपित करने के लिए समत्रिबाहु त्रिकोण प्रत्येक कोण में डूबी हुई
एक सर्पजिह्वा एक सर्पमुख
प्रत्येक कोण में ऋतु-चक्रित एक अष्टधातु सर्पविवर
और यह समस्त ज्यामिति-चेष्टाएँ
प्रजापति-यज्ञ में स्वेच्छा भस्मित सती-वर्तमान का शव-शरीर
84 टुकड़ों में
वैष्णवी आदि शस्त्र से खंडित करने के लिए

...यहाँ काटकर गिरे थे ग्लोब के अर्द्ध-स्तन गोलार्द्ध
यहाँ गिरा था सती का स्कंध-ग्रीव
वर्तमान यहीं गिरा था।
योनि-कामाख्या

तीन

अलका कंचन मौलश्री जगमोहन कल्याणी राजकमल कितने सुंदर थे।
काल्पनिक संज्ञावाचक ये नाम
प्रथम-पुरुष में अथवा प्रथम-स्त्री में संबोधन के लिए
हम लोगों ने
इन्हीं नामों से कर लेना चाहा था ऋतु-शृंगार
मार्क्विस साद के वीनस-मंदिर में
अष्टधातु सर्प विवरों की स्वप्न-संभव स्थापना एक ऋतु से
दूसरी ऋतु 
एक त्रिकोण से दूसरे त्रिकोण में जाते हुए
गंगाजल ने काट डाले किंतु हम लोगों के पाँव नीली गोलाइयों की
घाटी में डूब गए
हमारे नक्षत्र हमारे इंद्रधनुषी गाँव
अब काल-परिधि से टूट कर बाहर आ गया है संपूर्ण वर्तमान
ग्लोब के अर्द्ध-स्तनों में अंधकार है
ब्रह्म-कुंडलिनी से
बुद्धि-सहस्रार की ओर धावित शत-सहस्र शिरासर्प मूर्च्छित हैं
समर्पित हो चुकी हैं सुविधा तंत्रों के प्रति
रहस्य सिद्धियाँ
तीसरे मस्तिष्क में कहीं नहीं जाज्वल्य है कौस्तुभ-मणि
मात्र शारीरिक व्यवसाय रह गया है
ऋतु-शृंगार
खंडित नायिकाएँ धारण करती हैं नील वसन चंदन अनुलेपन
रक्तकुसुम मालाएँ मात्र आत्म-रक्षा के लिए

चार

शारीरिक अस्तित्व-रक्षा के असत्य से तीसरे ब्रह्मांड तीसरे मस्तिष्क का
असंभव
कितना अधिक आवश्यक है
मेरे लिए क्यों स्वीकार करेंगे नाटक ओथेलो-विक्रमोर्वशीय
वेणी संहार के पात्र-उपपात्र 
जब तुम अलकनंदा तुम भी जब यह ऋतु-संहार अपने दैहिक
सत्यों के विलयन में नहीं उपनयन में
स्वीकारती हो सहज सहर्ष
ऋतु-शृंगार
अस्थियान पर आरूढ़ अस्थि शास्त्रों से आक्रमणकारी उस
महाइंद्र के स्वार्थ स्वागत के लिए
ऋतु-शृंगार

पाँच

हम लोगों के पितामह ने समय यापन के लिए सुविधाप्रद गढ़े थे
कई शब्द मूल्यों के आस्था के कर्मों के
व्यवस्था के
भीष्म जनमेजय नहीं शांतनु पंच-पांडव धृतराष्ट्र ये हमारे पितामह
हमारे पिता थे अभिमन्यु पितामह परीक्षित
किंतु
हम लोगों ने अपने पाँवों के नीचे मृत गंगाजल बने हुए
मूल्यों की आस्था और कर्मों की
व्यवस्था
शब्दों को अस्वीकार किया
अपनी कविता और अपनी वासनाओं के कारण हम लोगों ने तुम से
कहा अंततः शब्दों स्थितियों घटनाओं वस्तुओं और
स्थानिक स्वथविर काल पात्रों से नहीं 
इनकी अंतःसलिला
रहस्यवती योनि-कामाख्या सती वर्तमान ब्रह्म-कुंडलिनी से
हम लोगों का शक्ति-शव साधकों का अवतार
लेता है—
शब्द
सर्वप्रथम और सर्वांतक वह
शब्दलिंग
हमारे अस्तित्व का कारण और हमारे जीवन की धारणा
वही है वही होता है
प्रत्येक सृष्टि के मन्वंतर में
शून्य के स्वर में
हम लोग अतएव शब्द नहीं गढ़ते हैं इसके विपरीत शब्दों को
उस एक महाशब्द में करते हैं समाहित
अतीत और भविष्य के 
स्थान काल पात्रों को सती की योनि-कामाख्या में
तिरोहित करना है
हम लोगों का एक मात्र धर्म 
पितामह पिता क्षमा करें महाभारत-विजय का अनासक्ति योग
हमारे लिए निरर्थक है
निरर्थक है हमारे लिए आत्मरक्षात्मक
ऋतु-शृंगार की खंडित 84 टुकड़ों में विभाजित 
नायिकाएँ...

नींद में भटकता हुआ आदमी

राजकमल चौधरी

नींद की एकांत सड़कों पर भागते हुए आवारा सपने।
सेकेंड-शो से लौटती हुई बीमार टैक्सियाँ,
भोथरी छुरी जैसी चीख़ें
बेहोश औरत की ठहरी हुई आँखों की तरह रात।
बिजली के लगातार खंभे पीछा करते हैं;
साए बहुत दूर छूट जाते हैं
साए टूट जाते हैं।
मैं अकेला हूँ।
मैं टैक्सियों में अकारण खिलखिलाता हूँ,
मैं चुपचाप फुटपाथ पर अँधेरे में अकारण खड़ा हूँ।
भोथरी छुरी जैसी चीख़ें
और आँधी में टूटते हुए खुले दरवाज़ों की तरह ठहाके
एक साथ
मेरे कलेजे से उभरते हैं
मैं अँधेरे में हूँ और चुपचाप हूँ।
सतमी के चाँद की नोक मेरी पीठ में धँस जाती है।
मेरे लहू से भीग जाते हैं टैक्सियों के आरामदेह गद्दे
फुटपाथ पर रेंगते रहते हैं सुर्ख़-सुर्ख़ दाग़।
किसी भी ऊँचे मकान की खिड़की से
नींद में बोझिल-बोझिल पलकें
नहीं झाँकती हैं।
किसी हरे पौधे की कोमल, नन्हीं शाखें,
शाखें और फूल,
फूल और सुगंधियाँ
मेरी आत्मा में नहीं फैलती हैं।
टैक्सी में भी हूँ और फुटपाथ पर खड़ा भी हूँ।
मैं
सोए हुए शहर की नस-नस में
किसी मासूम बच्चे की तरह, जिसकी माँ खो गई है,
भटकता रहता हूँ;
(मेरी नई आज़ादी और मेरी नई मुसीबतें... उफ़!)
चीख़ और ठहाके
एक साथ मेरे कलेजे से उभरते हैं।

रात्रिदग्ध एकालाप

राजकमल चौधरी


रात्रिदग्ध एकालाप

एक

बारूद के कोहरे में डूब गए हैं पहाड़, 
नदी, मकान, शहर के शहर।
बीवी से छिपा कर बैंक में पैसे डालने 
का मतलब नहीं रह गया है
अब।

दो

मुझे चुप रह कर इंतज़ार करना
चाहिए। मुझे इंतज़ार करते हुए चुप 
रहना चाहिए। मुझे चुप रहते हुए, 
इंतज़ार करते हुए, रहना चाहिए। (किसलिए?) 

तीन

तुम लोगों से छुटकारा नहीं चाहता
हूँ। ग़ुलामी में भी इतनी स्वाधीनता
तो मैंने प्राप्त कर ली है, कि किसी
को ग़ुलाम कह सकता हूँ।

चार

उसके लंबे पत्र में ईमानदारी का
सवाल हर तीसरे शब्द के बाद। हर 
तीसरे शब्द के बाद ईमानदारी
का सवाल अठारह पुराणों में।

पाँच

मैं टेबुल पर घूमते हुए ग्लोब में उस
शहर को ढूँढ़ने लगा, जहाँ कोई
पुरुष और कोई स्त्री एक-दूसरे की पीठ
से लगकर रोए नहीं हों।

छह

मेरी क़मीज़ के अंदर अपना बायाँ
हाथ डालकर, वह बूढ़ी औरत एक
अरसे से अपनी लिपिस्टिक की खोई 
हुई डिबिया तलाश रही है।

चाय के प्याले में

राजकमल चौधरी

दुख करने का असली कारण है : पैसा
—पहले से कम चीजें ख़रीदता है।
कश्मीरी सेव दिल के मरीज़ को चाहिए
तो क्या हुआ? परिश्रम अब पहले से कम
पैसे ख़रीदता है। हम सबके लिए काम
इतना ही बचा है कि सुबह वक़्त पर शेव
कर सकें। शाम को घर में चाय, और
पड़ोसिनों के बारे में घरेलू कहानियाँ,
हज़ार छोटे दंगे-फ़साद होते हैं, इतिहास
और आर्थिक सभ्यता को उजागर करने
के लिए—एक बड़ी लड़ाई नहीं होती।
आदमी केले ख़रीदने में व्यस्त रहता है,
(और) बीते हुए, और नहीं बीते हुए
के बीच कड़ी बनकर एक छोटी-सी
मक्खी पड़ी रहती है, चाय के अधख़ाली
प्याले में!

कवि-कर्म

राजकमल चौधरी

वेश्याओं के ऊँचे पलंग हैं, या जली हुई
लकड़ियाँ। कहीं जगह ख़ाली नहीं है गज़
भर, जहाँ बैठ कर लिखी जा सके गीता,
या गीतांजलि। ऊँचे पलंग हैं, या रसोई
घर की जली हुई लकड़ियाँ हैं।

पितृ-ऋण

राजकमल चौधरी

मेरे पिता थे एक सार्थक शब्द
मैं शब्दों की सार्थकता को
अविश्वसनीय कहता हूँ
मेरे पिता रहते थे मूल्य में
अभिव्यक्ति में, नीति में
अर्थवत्ता में
मैं व्यक्तित्व की मात्र निरर्थकता में
जीवित रहता हूँ
पितृ-ऋण से मुक्त होने का
दूसरा कोई उपाय
मेरे पास नहीं है
कभी नहीं होगा
कभी नहीं होगा।

ऑडिट रिपोर्ट

राजकमल चौधरी

सात हज़ार बरसों में एक आदमी ने बनाए
हैं साढ़े तीन सौ करोड़ परिवार। परिवारों
की रक्षा के लिए मकान। मकानों
की रक्षा के लिए दीवारें। सात हज़ार
बरसों में एक आदमी ने बनाई हैं साढ़े
तीन सौ करोड़ दीवारें।

वापसी

राजकमल चौधरी

अब तो सागर-तल में होगा खंड-खंड जलयान।
मत जिज्ञासा करो
कि मेरी यात्राएँ क्यों रह जाती हैं असंपूर्ण
न अमृत-घट
ऐरावत नहीं, नहीं उर्वशी, न लक्ष्मी
ख़ाली हाथ सही
मैं ही तो एकमात्र दुस्साहस हूँ, जो तट तक वापस आया
ख़ाली हाथ नहीं
मैं धारयिका पृथ्वी को बाँहों में बाँधे ऊपर ले आया।
सच कहता हूँ,
उस पागल भाटे में वापस आना, वापस लाना
उस पार चले जाने से।
दुष्कर था...

पहली कविता की आख़िरी शाम

राजकमल चौधरी

पहली कविता की आख़िरी शाम
नीले दरख़्तों के साए में तुम्हारे
बेचैन हाथ
पीले पड़ते हुए।
क्राटन के लंबे पत्तों की तरह हिलते हैं
यों दरख़्त भव्य काले हैं
घनी और जड़ चाँदी की हल्की पर्त
चाँदनी में गूँज और गंध-वसंत की वापिसी की
लगातार आहटें
और, नीले सायों का बेतरतीब
जाल
ओस भीगी धरती पर (रौंदी हुई फिर भी
हरी घास)
बुनती हैं झुकी डालें
—बेचैन हाथों की ज़र्द उँगलियाँ
अचानक चुप हो जाती हैं
अनदिखे सितार का एक भी तार नहीं सिहरता
शतरंज के खेल में खोई हुई किश्ती
ढूँढ़ता हुआ हर शाम यहाँ इस चंपक-वन
तक मैं बेकार चला आता था जबकि आज
की शाम (या ऐसी हर शाम)
अनकहे-अधबने शब्दों की शाम है
सामने झील है सोई हुई
जिसका जल
भविष्य की तरह स्याह परछाइयों में
ठहरा हुआ है
अव्यक्त। इसे कभी कोई शब्द
नहीं देगा
प्रत्येक शब्द में बीते हुए किसी
क्षण का स्वाद
किसी अनुभव की आसक्ति होती है
खंडित शब्द—
जीवन दिया करता है
तुम व्यतीत के लौट आने के लिए की गई
निरर्थक निरीह प्रार्थना जैसी लगती हो
तुम स्वयं को अब और मेरे
सहमे हुए होंठों पर
नहीं चाहती हो दुहराना—
खोई हुई किश्ती के लिए
इस नीली झील के पास बार-बार आना
नहीं चाहता और वक़्त के पहरेदार इन
नीले दरख़्तों का गिरोह
तुम्हारी प्रार्थना बनी हुई मेरी
आदिम बनवासी पुकार—
मेरी पुकार के अंधे अजगर को
अपने अँधेरे में गिरफ़्तार कर
लेता है।
अब हम किसी कविता में नहीं
खुलना चाहते
बंद हैं प्रतीकों के द्वार
यह वसंत नहीं है दूर तक चली
जाती हुई पहाड़ी गुफा के
अंत में पड़ी हुई लाल-पत्थर की
भारी चट्टान
इसे तोड़ना नहीं चाहता है इतिहास
वह स्वयं टूटना नहीं चाहता है।
इतनी मंज़िलों के पार आकर इस समय
इस क्षण
(जहाँ नीलापन शून्य में अब तक रुका हुआ है)
यह जल है
इसकी गति ही है बह निकलना
हमें इतना नहीं है विश्वास
सूरज डूबने की अविरत प्रतीक्षा में
ही यह शाम
यह झील, यह मौसम, ये नीले दरख़्त
हम-तुम
रुके हुए हैं। हम तुम रुके हुए हैं।
दूर के बंद कारख़ानों की चिमनियों
की तरह
—हम में धुआँ भी नहीं है
नहीं है अनुभव की वह जादूगर चिनगारी
जो शब्द को एक अर्थ बना देती है
जैसे यह शाम
जैसे तुम्हारे बेचैन हाथ
ज़र्द पड़ते हुए
सिहरते हुए। मगर
उस अनदिखे सितार का एक भी तार
नहीं सिहरता है।

किधर से चढ़ेंगे आप?

राजकमल चौधरी

हम लोगों में सबसे समझदार था नरेंद्र धीर
रामनगर की उस दुकान में सबसे बाद तक
वह रह सकता था। कभी अकेले
या कभी हरवंश कश्यप के साथ हम चले आते थे
अजमेरी गेट। एक शहज़ादी होती थी,
एक सुलोचना, एक नीलम। एक रात में
सत्रह बार उनका ब्याह होता था
नीचे ‘मोरल री-आर्मामेंट', ऊपर
एक रात में सत्रह बार यह पूछना,—
किधर से चढ़ेंगे आप? सीढ़ियों पर,
जब भीड़ बढ़ने लगेगी। दमे के मरीज़ ग़ज़लों में
जब पूछेगे अपनी बीवियों की दास्तान।
जब आदमी बेशर्म होकर
‘पब्लिक बाथरूम’ बन जाएगा चौराहों पर। तो,
किधर से चढ़ेंगे आप? रमेश गौड़
छह रुपए उधार लेकर उतार लेगा अपना पानी।
जगदीश चतुर्वेदी समाधिस्थ योगी बनकर
अपने कमरे में पड़ोस की अनारकली।
सँभालता रहेगा। मुद्राराक्षस सिर्फ़ पान खाएगा,
और थूकेगा ‘टी हाउस' की फ़र्श पर सिर्फ़
बट्रेंड रसेल।
हम लोगों में सबसे समझदार था नरेंद्र धीर
ख़ुदकुशी करने से पहले उसने
दिल्ली से फ़ुर्सत पा ली। अब अजमेरी गेट से
दिल्ली गेट तक
कमलेश्वर नई कहानियाँ बिछाते रह जाएँ दिन-रात,
सत्रह बार एक ही सवाल पूछते रहें।
राजीव सक्सेना की स्कूटर, धर्मेंद्र गुप्त की साइकिल,
श्रीकांत वर्मा की मोटरकार कहानियाँ कविताएँ
राजपथ से जनपथ तक झंडे उड़ाती रहें।
हम सभी अचेतन हो जाएँ
‘मोरल री-आर्मामेंट' की बेशर्मी के बाद। क्योंकि,
इससे ज़्यादा करने या होने का उत्पात
हम लोगों के पास नहीं है। हो सकता है जैनेंद्र जी के
पास कोई उपाय हो।

आधी नींद में पूरी बातचीत

राजकमल चौधरी

आप कह दीजिए बीती हुई किताबों को अब
फिर दुहराएँगे नहीं।
(स्वास्थ्य एक पतित शब्द है)
अपनी नींद में भी
शरीर तो अपना ही शरीर होगा
मारिजुआना... मर्जिना... मरजाना... मरजाना
स्त्रियाँ पुल हैं
एक बार एक जंगल में एक अदद
आदमी रहता था
मैंने एक पुल बना दिया यहाँ-वहाँ यहाँ-वहाँ
बीती हुई किताबों को
मत दुहराइए
आदमी ग़ायब हो गया...
जंगल रहता था
जंगल रहता है
जंगल में सिर्फ़ एक औरत अब रहती है
अपनी नींद में भी
आप कह दीजिए
मैं चुप हूँ!

वासना

राजकमल चौधरी

सबके बाद मरता है पीला साँप।
पालतू बिल्लियाँ राख का ढेर तोड़ती रहती है...
एक टुकड़ा रोटी
एक अदद सड़ा हुआ सेव, और
लहूलुहान पंजे।
शीशों पर जमी रह जाती है धूल वक़्त
रुका रह जाता है।
खड्ड में गिरे कोयले से लदे ट्रक
टैंक में मरे हुए बच्चे
लैंपपोस्ट के नीचे मैथुनरत कुत्ते...
आदमी। काली सफ़ेद बिल्लियाँ।
और, सबके बाद मरता है पीला साँप
सबसे पहले जन्म लिया करता है
अक्सर।

समाजशास्त्र

राजकमल चौधरी

पचास नंबर की तीसरी बोतल ने सिजदा
करते हुए कहा—चलो, डॉक्टर एन.
से समाजशास्त्र पढ़ने चलते हैं।

आधी रात के उपरांत एक रसिक स्त्री

राजकमल चौधरी

आधी रात के उपरांत रेशमी कोहरे में
एक रसिक स्त्री
टूटे हुए समय-स्तूपों में
अपना भविष्य और अपना निर्वासन-कुंज
ढूँढ़ती हुई
नग्न और एकस्वर होकर
केवल
इतना निर्णय कर पाती है
कभी यहाँ एक देव-मंदिर था
विग्रहविहीन
आधी रात के उपरांत रेशमी कोहरे में
एक रसिक स्त्री
भग्न खंड-प्रस्तर होकर
केवल
देव-विग्रह बन जाती है
किंतु
टूटे हुए समय-स्तूपों से
अब भी निर्मित नहीं होता है
देव-मंदिर!

रिक्शे पर एक सौ रातें

राजकमल चौधरी

गरदन के नीचे से खींच लिया हाथ।
बोली—अंधकार हयनि (नहीं हुआ
है)! सड़कों पर अब तक घर-वापसी
का जुलूस। दफ़्तर, दुकानें, अख़बार
अब तक सड़कों पर। किसी
मंदिर के खंडहर में हम रुकें? बह
जाने दें चुपचाप इर्द-गिर्द से समय?
गरदन के नीचे से उसने खींच ली
तलवार! कोई पागल घोड़े की तेज़
टाप बनकर आता है। प्रश्नवाचक
वृक्ष बाँहों में। डालों पर लगातार
लटके हुए चमगादड़। रिक्शे वाला
हँसता है चार बजे सुबह-अंधकार
हयनि (नहीं हुआ है)। सिर्फ़,
एक सौ रातों ने हमें बताया, कि
शाम को बंद किए गए दरवाज़े
सुबह नहीं खुलते हैं।

दिल्ली शहर में आइसक्रीम ख़रीदते हुए

राजकमल चौधरी

श्री. होटल के जिस कमरे में रहते हैं हम लोग उसकी तिकोनी
खिड़कियाँ फ़र्श से शुरू होती है नंगे टखने
नंगी पिंडलियाँ देखने के लिए।
एक औरत अपने ख़ाली पर्स का मुँह खोलकर किसी दुकान के
पिछले दरवाज़े में घुसती है हम लोग देर तक
शेव करते रहते हैं।
दूतावासों की ओर चले जाने के लिए अजमल ख़ाँ रोड की
लंबाई हमारे घुटनों से शुरू होकर उसके
ख़ाली पर्स में फिसल जाती है
पिघले हुए आइसक्रीम की तरह (शाम के वक़्त) चौराहों पर
खड़े होते ही
हम लोगों को अपने बचपन की गलियों में सोए हुए
लावारिस कुत्ते की आवाज़ पुकारती है
वापस चले आओ
अभी साइरन बजेगा वापस चले आओ अभी प्रधानमंत्री का
भाषण होगा वापस चले आओ अभी
वितरण होगा राजभक्तों को पुरस्कार अब तुम लोग
वापस चले आओ
लेकिन जो लोग भूल चुके हैं अपना नाम अब कहाँ
वापस जाएँगे तिकोनी खिड़कियों के अंदर
झाँकने का तमाशा छोड़कर
क्यों वापस चले जाएँगे अकाल-ग्रस्त इलाक़ों में रिलीफ़
अन्न का हिस्सा माँगने के लिए?

विघटन

राजकमल चौधरी

नीले झाग में लिपटा हुआ। और कोई वस्त्र नहीं।
शहर। दो आँखें।
काली खिड़की से मैं पूरी तस्वीर।
देखता हूँ। दो आँखें काली खिड़की से तस्वीर।
लौट आए हैं
पानी के जहाज़। अर्थात्,
वह मेरी ही प्रेयसी है, निस्तब्धता में
यात्रा।
जहाँ से शुरू हुई थी यात्रा।
अब भी हैं रहस्य मेरे लिए। रात के
बंदरगाह।
बंद कमरे में। मेरा मौन। मेरी मृत्यु। अपरिचित
सागर के किनारे अपरिचित।
रहस्यमय मेरे लिए—
शहर।
दो आँखें।
काली खिड़की से पूरी तस्वीर।
यात्रा।
वह मेरी ही प्रेयसी।
बंदरगाह।
निस्तब्धता में टूटने लगा है समुद्र।
अपने पितृ वृक्ष के नीचे
माधवी लता।
वह चुपचाप रहस्य में खड़ी है, चुपचाप।
समय : घायल पक्षी।
अपने पिंजरे में छटपटाहट।
आदिम हवा क्यों अपने पंख फड़फड़ाती है।
समय : केवल अंग-संकेत
अपने पिंजरे में
भाषा मृत्युमुखी हो गई है,
किसके लिए?
समय : जलते हुए मरुखंड पर अपरिचित
ध्वनियों की वर्षा...
लौट आए हुए जहाज़
समुद्र
नीले दर्पण में मुखड़ा देखती हुई, आलस में
नदी
नंगी होकर नहाती हुई
किरने
सात रंगों से बुना गया महाजाल
सुबह
प्रकृति अपने ही प्रारूप के विघटन से
ऋतु-चक्र।
आदिम हवा फिर पंख फैलाती है। फिर
पंख फैलाती है।
आदिम हवा...

लज्जावती

राजकमल चौधरी

कद्रू ने दिशाओं के उस पार जाकर देखा,
उसकी नाभि से निकले हुए सहस्र-कोटि
सर्पों ने सूर्य-रथ ढँक लिया है। अदिति
मुस्कुराई अवस्त्र, समुद्र-स्नान करने चली
गई।

अकाल का पहला दिन

राजकमल चौधरी

राजेंद्र प्रसाद सिंह के लिएजब पूरा का पूरा यह शहरमुज़फ़्फरपुरखारे पानी में डूब गयाऔरत वह बेमिसालमीराजी की ग़ज़ल में शीशे के बिखरे हुए—टुकड़ों पर छूटती-बिखरती रह गईबेनहाई हुई, बग़ैर सँवारे बाल...उसके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं,हरे, पीले, नीले, सफ़ेद साँप रेंगते हैंउसके होंठों में शब्द नहींशब्द नहींमुड़े हुए घुटनों के ऊपरअँधेरी झाड़ियों मेंसिर्फ़ एक अक्षरहोता है बीज-मंत्रस्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं औरकुछ नहीं होता है अकाल... केवल यही... कि...पूरा का पूरा यह शहर खारे पानी में डूब जाता हैउस एक बेनज़ीर औरत के मातम में,हम एक नया मर्सिया क्यों नहीं लिखे?

चिंता अर्थहीन बेबसी

राजकमल चौधरी

आकाश के अस्थिर चित्र नीचे झुकेंगे और
झुकेंगे, झूलेंगे मेघ
ऊँचे वृक्षों के माध्यम से, साधन से धरती
(कुँवारी है अब तक जिसकी पिपासा...)
ऊपर उठेगी
उठती, उभरती, उजागर होती चली जाएगी!
और,
अनेकों निरुद्देश्य, निरीह लोग यों ही जग जाएँगे,
एक धुआँ उठेगा उबलता हुआ
चाहे यह धुआँ ‘टियरगैस' ही क्यों न हो?
एक अलाव जलेगा चटकता हुआ।
चाहे इसमें हमारे पाँव ही क्यों न जल जाएँ?
मगर, निरीह लोग यों ही जग जाएँगे
वायु के अकस्मात पिघले हुए झोंकों से चौंककर
टूट जाएगा उनकी विवशताओं का ख़ुमार,
टूट जाएगा ज़ेहन पर नया गर्दोगुबार
(आदमी है; आख़िर, साफ़-सुथरा रहना ही चाहिए
मोटी-मोटी फ़ाइलों का कूड़ा बुहारने लग जाएँगे)
ऑफ़िसों के टेबुल पर ऊँघते हुए लोग,
काग़ज़ के महल, बाग़-बग़ीचे, घर-परिवार बनाने लगेंगे
रेसकोर्स के टिकट-घर की क्यू में खड़े आदमी!
और, जीवन की पांडुग्रस्त रोशनी का बौना स्तंभ
ऊदी भनभनाहटों से घिर-घर जाएगा व्यर्थ!
हर ओर से टूटे हुए पालों की नौकाएँ आएँगी
टकराएँगी अँधेरे में, अनर्थ!
डूबी हुई नावों में डूबे हुए लोग
उतार फेंकेंगे शील का रेशमी वस्त्र-खंड
उतार फेंकेंगे चेहरे संस्कृतियों की नक़ाब,
जल के तल पर कौन किसे जानेगा पहचानेगा?
अनस्तित्व की परिधि में कौन किसे मानेगा, सँभालेगा?
नंगे हो जाएँगे
भिखमंगे हो जाएँगे
मगर, किसके लिए-किसके लिए?—किसके लिए?
क्योंकि,
अहल्याएँ तो अभी तक पत्थर बनी सोई हैं,
(तुमने ही दिया था शाप—हे गौतम!
तम से उन्हें उबारे कौन?)
अनागत के आने की दुविधा में खोई है,
क्योंकि,
सभी व्यक्ति तुम जैसे ही, मुझ ऐसे ही
टूटे हुए
टूटे हुए
डूबे हुए
चौराहों के बुझे-बुझे लैंप-पोस्ट,
खेतों के उजड़े हुए मचानों के बाँस-खंभे,
फूल पात फल डाल रहित वृक्ष
ऊँचे शो-केसों के पारदर्शी शीशे,
(जिनमें खड़ी हैं प्लास्टिक की प्रकृत-वस्त्रा महिलाएँ)
गुलदस्तों में जमाए गए काग़ज़ के गुलाब खड़े हैं
थकी-थकी हारी हुई, भारी हुई मुद्राओं में
उफ! कहीं कोई शब्द नहीं
शब्द नहीं, वाक्य, ध्वनि, लय, छंद, गीत नहीं
उठता उभरता है उनके अंदर!
मगर, वे नहीं गाएँगे,
वे नहीं सोई हुई अहल्या को जगाएँगे
तो क्या अनागत नहीं आएगा?
तो, क्या कोई नहीं आएगा?
गूँगा ही रह जाएगा सारा संसार?
खुलेगा नहीं गीतों का द्वार?

अनायास

राजकमल चौधरी

फिर भी कभी चला जाऊँगा उसी दरवाज़े तक अनायास जैसे,
उस अँधियारे गलियारे में कोई अब तक रहता हो।
फिर भी, दीवार की कील पर अटका दूँगा नया कैलेंडर,
किसी को यों ही पत्र लिख दूँगा—मैं बीमार हूँ
सीने पर अधखुली किताब रखकर सो जाऊँगा;
चाय बर्फ़ हो रही है कहकर, कोई मुझे जगाए नहीं
नन्हा-सा कोई बच्चा मेरे बिस्तर पर आए नहीं,
मैं बहुत बीमार हो गया हूँ!
धीमी चलती हुई किसी ट्राम पर चढ़ जाता हूँ,
पढ़ता चलता हूँ दुकानों के साइनबोर्ड,
फ़िल्मों के पोस्टर, नियॉन-अक्षरों में बाँधे गए गीत,
किसी की आँखों में क्या-क्या देखता रहता हूँ,
किसी को अनदेखे ही मुस्कुराता हूँ;
कोई अनलिखी कविता दुहराता हूँ। शाम की रोशनियाँ
दसमंजिले मकानों से उतरती हुई
मेरी बीमार बाँहों से लिपट जाती हैं।
फ़ुटपाथों पर रुके हुए लोगों की लगातार भीड़
मुझसे शहराह पूछती है। मैं—
सबको ग़लत गलियों में ले जाता हूँ
(यही मेरी क़िस्मत है!) नहीं शरमाता हूँ!
फिर किसी बस-स्टॉप के पास रुका रहता हूँ;
रुका हुआ हूँ
नींद में हूँ। फिर भी अनायास कोई मुझे पुकारेगा,
नक़ाब कितने भी लगाए फिरूँगा, लेकिन,
वह मुझे पहचानेगा। मुझे वापस बुलाने के सिवा
उसने कोई काम नहीं सीखा है।

अगस्त '65 की आख़िरी कविता

राजकमल चौधरी

एक

किराए पर लाए गए लाउडस्पीकर के अलावा (जो अब
तेज़ आवाज़ में ‘रामधुन’ बजा रहा था),
जुलूस के सारे लोग बेहोश हो गए, अचानक,
टियर-गैस और अफ़वाहें
हमारी बुद्धि, और हमारे सार्वजनिक परिताप को
व्यर्थ करने लगीं।
ज़्यादा मोटे और कम लंबे व्यक्तियों ने कहा,
चुप रह जाओ, मौसम
चुप रहने से ही बदलता है।
यों भी, आजकल,
बेवफ़ाई है शोर-गुल करना;
चुप रहो, हे प्रजा-जन 
जो कुछ भी कहना है अपने प्रभु से 
चुप रह कर ही कहो!

लेकिन उनकी बात पर अमल करने के पहले ही,
जुलूस के सारे लोग बेहोश हो गए।
अचानक, हमारी उपलब्धियाँ,
हमारे कीर्तिमान
किरानियों और नर्सों के इस शहर के साथ;
सिनेमाघरों और अस्पतालों में
ग़ायब होने लगे
इस सड़क पर सिर्फ़ एक मैं चलता रहा,
टूटी हुई झंडियाँ उठाए हुए,
बेच डाले गए नारों को समेटने के लिए।

—एक मैं चलता रहा
चरैवेति, चरैवेति, अब भी कोई मेरे अंदर
गूँजता रहता है।

सतरह साल हो गए, पूरे सतरह
साल! चौथी योजना भी 
अब पूरी होने को आई,
लेकिन,
क्या हुआ? किसके लिए?
उत्तर कोई नहीं देगा,
उत्तर नहीं है।

शतरंज का घोड़ा घेरता है एक साथ
आठों घर!
जब चाहे वह जिस मकान में
सो जाएगा, अनायास!

दो

मेरी आँखों में छटपटाती हैं तालाब की सारी मछलियाँ,
पानी कम है, लेकिन
मेरी आँखों में सफ़ेद दरपन है।

एक बार उसको भी (कितने दिन हो गए?)
मैंने बे-पहचाने देखा था
किसी किताब में,
शायद वह डूबी थी।
अकेली।

मैंने उसको इन्हीं मछलियों की तरह, किताब में
छटपटाते हुए देखा था।
मैंने कहा भी था उसे—नीलमणि, उठो अब
रोशनी चली आएगी, इसी छन
अँधेरा झलमलाने लगेगा।
चलो, मौसम को बदलने के लिए हम-तुम
प्रार्थना करें,
हम चुप नहीं रह जाएँ, केवल
जिसे नहीं जानते हैं,
उससे कहें, कि ऐ मेहरबान,
रोशनी का मौसम
हमारे लिए भी ज़रूरी है,
आग की तरह!

नीलमणि मेरी आँखों में अब तक झिलमिलाती है
नीलम हो जाता है मेरा आकाश 
बादल नहीं हैं, सिर्फ़
एक दरपन है—टूटा हुआ।

तीन

यह अगस्त भी आज की ही रात, बारह बजे
बीत जाएगा। मैं सतरह साल
और, चार योजनाओं के दुख स्वप्न
भूलकर, इस बार भी कहूँगा
तुमसे, कि सुनो, 

बादल खुल गए हैं, आकाश में
चाँदनी के पेड़
उग आए हैं।

बुख़ार में घर लौटकर

राजकमल चौधरी

रात की बीमार बीवी अँधेरे में खाँसती
है। हमारे अंधे बच्चे और बेहद पालतू
कुत्ते प्यार में नहीं, नींद में यक़ीन करें।

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...