परिचय
राजकमल चौधरी (1929–1967) हिंदी और मैथिली के चर्चित कवि, कथाकार एवं उपन्यासकार थे। वे नई कविता और आधुनिकतावादी साहित्य की प्रमुख आवाज़ों में माने जाते हैं।
उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘मुक्तिप्रसंग’, ‘कंकावती’ और ‘मछली मरी हुई’ विशेष रूप से चर्चित हैं। उनकी रचनाओं की विशिष्टता यथार्थवादी दृष्टि, विद्रोही तेवर, नगरीय जीवन की विडंबनाओं और मानवीय संबंधों के जटिल चित्रण में दिखाई देती है।
कम आयु में निधन के बावजूद उन्होंने हिंदी और मैथिली साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई और उनकी रचनाएँ आज भी आधुनिक भारतीय साहित्य के संदर्भ में पढ़ी जाती हैं।
शव-यात्रा का मृत संगीत
राजकमल चौधरी
वेश्याएँ
राजकमल चौधरी
सड़कें ख़ाली हैं। वे करती हैं इंतज़ार...सड़कें, गलियाँ, बरामदे भर गए हैं, फिर भी,
वे करती रहती हैं इंतज़ार!
आवाज़ पहचानती हैं। दर्द, वहशत, बीमारियाँ और
हविस उसकी—वे जानती हैं।
सिर्फ़ नहीं उसका नाम...
उसका कोई नाम नहीं है, शायद!
ऋतु शृंगार में खंडित नायिकाएँ
राजकमल चौधरी
नींद में भटकता हुआ आदमी
राजकमल चौधरी
नींद की एकांत सड़कों पर भागते हुए आवारा सपने।सेकेंड-शो से लौटती हुई बीमार टैक्सियाँ,
भोथरी छुरी जैसी चीख़ें
बेहोश औरत की ठहरी हुई आँखों की तरह रात।
बिजली के लगातार खंभे पीछा करते हैं;
साए बहुत दूर छूट जाते हैं
साए टूट जाते हैं।
मैं अकेला हूँ।
मैं टैक्सियों में अकारण खिलखिलाता हूँ,
मैं चुपचाप फुटपाथ पर अँधेरे में अकारण खड़ा हूँ।
भोथरी छुरी जैसी चीख़ें
और आँधी में टूटते हुए खुले दरवाज़ों की तरह ठहाके
एक साथ
मेरे कलेजे से उभरते हैं
मैं अँधेरे में हूँ और चुपचाप हूँ।
सतमी के चाँद की नोक मेरी पीठ में धँस जाती है।
मेरे लहू से भीग जाते हैं टैक्सियों के आरामदेह गद्दे
फुटपाथ पर रेंगते रहते हैं सुर्ख़-सुर्ख़ दाग़।
किसी भी ऊँचे मकान की खिड़की से
नींद में बोझिल-बोझिल पलकें
नहीं झाँकती हैं।
किसी हरे पौधे की कोमल, नन्हीं शाखें,
शाखें और फूल,
फूल और सुगंधियाँ
मेरी आत्मा में नहीं फैलती हैं।
टैक्सी में भी हूँ और फुटपाथ पर खड़ा भी हूँ।
मैं
सोए हुए शहर की नस-नस में
किसी मासूम बच्चे की तरह, जिसकी माँ खो गई है,
भटकता रहता हूँ;
(मेरी नई आज़ादी और मेरी नई मुसीबतें... उफ़!)
चीख़ और ठहाके
एक साथ मेरे कलेजे से उभरते हैं।
रात्रिदग्ध एकालाप
राजकमल चौधरी
चाय के प्याले में
राजकमल चौधरी
दुख करने का असली कारण है : पैसा—पहले से कम चीजें ख़रीदता है।
कश्मीरी सेव दिल के मरीज़ को चाहिए
तो क्या हुआ? परिश्रम अब पहले से कम
पैसे ख़रीदता है। हम सबके लिए काम
इतना ही बचा है कि सुबह वक़्त पर शेव
कर सकें। शाम को घर में चाय, और
पड़ोसिनों के बारे में घरेलू कहानियाँ,
हज़ार छोटे दंगे-फ़साद होते हैं, इतिहास
और आर्थिक सभ्यता को उजागर करने
के लिए—एक बड़ी लड़ाई नहीं होती।
आदमी केले ख़रीदने में व्यस्त रहता है,
(और) बीते हुए, और नहीं बीते हुए
के बीच कड़ी बनकर एक छोटी-सी
मक्खी पड़ी रहती है, चाय के अधख़ाली
प्याले में!
कवि-कर्म
राजकमल चौधरी
वेश्याओं के ऊँचे पलंग हैं, या जली हुईलकड़ियाँ। कहीं जगह ख़ाली नहीं है गज़
भर, जहाँ बैठ कर लिखी जा सके गीता,
या गीतांजलि। ऊँचे पलंग हैं, या रसोई
घर की जली हुई लकड़ियाँ हैं।
पितृ-ऋण
राजकमल चौधरी
मेरे पिता थे एक सार्थक शब्दमैं शब्दों की सार्थकता को
अविश्वसनीय कहता हूँ
मेरे पिता रहते थे मूल्य में
अभिव्यक्ति में, नीति में
अर्थवत्ता में
मैं व्यक्तित्व की मात्र निरर्थकता में
जीवित रहता हूँ
पितृ-ऋण से मुक्त होने का
दूसरा कोई उपाय
मेरे पास नहीं है
कभी नहीं होगा
कभी नहीं होगा।
ऑडिट रिपोर्ट
राजकमल चौधरी
सात हज़ार बरसों में एक आदमी ने बनाएहैं साढ़े तीन सौ करोड़ परिवार। परिवारों
की रक्षा के लिए मकान। मकानों
की रक्षा के लिए दीवारें। सात हज़ार
बरसों में एक आदमी ने बनाई हैं साढ़े
तीन सौ करोड़ दीवारें।
वापसी
राजकमल चौधरी
अब तो सागर-तल में होगा खंड-खंड जलयान।मत जिज्ञासा करो
कि मेरी यात्राएँ क्यों रह जाती हैं असंपूर्ण
न अमृत-घट
ऐरावत नहीं, नहीं उर्वशी, न लक्ष्मी
ख़ाली हाथ सही
मैं ही तो एकमात्र दुस्साहस हूँ, जो तट तक वापस आया
ख़ाली हाथ नहीं
मैं धारयिका पृथ्वी को बाँहों में बाँधे ऊपर ले आया।
सच कहता हूँ,
उस पागल भाटे में वापस आना, वापस लाना
उस पार चले जाने से।
दुष्कर था...
पहली कविता की आख़िरी शाम
राजकमल चौधरी
पहली कविता की आख़िरी शामनीले दरख़्तों के साए में तुम्हारे
बेचैन हाथ
पीले पड़ते हुए।
क्राटन के लंबे पत्तों की तरह हिलते हैं
यों दरख़्त भव्य काले हैं
घनी और जड़ चाँदी की हल्की पर्त
चाँदनी में गूँज और गंध-वसंत की वापिसी की
लगातार आहटें
और, नीले सायों का बेतरतीब
जाल
ओस भीगी धरती पर (रौंदी हुई फिर भी
हरी घास)
बुनती हैं झुकी डालें
—बेचैन हाथों की ज़र्द उँगलियाँ
अचानक चुप हो जाती हैं
अनदिखे सितार का एक भी तार नहीं सिहरता
शतरंज के खेल में खोई हुई किश्ती
ढूँढ़ता हुआ हर शाम यहाँ इस चंपक-वन
तक मैं बेकार चला आता था जबकि आज
की शाम (या ऐसी हर शाम)
अनकहे-अधबने शब्दों की शाम है
सामने झील है सोई हुई
जिसका जल
भविष्य की तरह स्याह परछाइयों में
ठहरा हुआ है
अव्यक्त। इसे कभी कोई शब्द
नहीं देगा
प्रत्येक शब्द में बीते हुए किसी
क्षण का स्वाद
किसी अनुभव की आसक्ति होती है
खंडित शब्द—
जीवन दिया करता है
तुम व्यतीत के लौट आने के लिए की गई
निरर्थक निरीह प्रार्थना जैसी लगती हो
तुम स्वयं को अब और मेरे
सहमे हुए होंठों पर
नहीं चाहती हो दुहराना—
खोई हुई किश्ती के लिए
इस नीली झील के पास बार-बार आना
नहीं चाहता और वक़्त के पहरेदार इन
नीले दरख़्तों का गिरोह
तुम्हारी प्रार्थना बनी हुई मेरी
आदिम बनवासी पुकार—
मेरी पुकार के अंधे अजगर को
अपने अँधेरे में गिरफ़्तार कर
लेता है।
अब हम किसी कविता में नहीं
खुलना चाहते
बंद हैं प्रतीकों के द्वार
यह वसंत नहीं है दूर तक चली
जाती हुई पहाड़ी गुफा के
अंत में पड़ी हुई लाल-पत्थर की
भारी चट्टान
इसे तोड़ना नहीं चाहता है इतिहास
वह स्वयं टूटना नहीं चाहता है।
इतनी मंज़िलों के पार आकर इस समय
इस क्षण
(जहाँ नीलापन शून्य में अब तक रुका हुआ है)
यह जल है
इसकी गति ही है बह निकलना
हमें इतना नहीं है विश्वास
सूरज डूबने की अविरत प्रतीक्षा में
ही यह शाम
यह झील, यह मौसम, ये नीले दरख़्त
हम-तुम
रुके हुए हैं। हम तुम रुके हुए हैं।
दूर के बंद कारख़ानों की चिमनियों
की तरह
—हम में धुआँ भी नहीं है
नहीं है अनुभव की वह जादूगर चिनगारी
जो शब्द को एक अर्थ बना देती है
जैसे यह शाम
जैसे तुम्हारे बेचैन हाथ
ज़र्द पड़ते हुए
सिहरते हुए। मगर
उस अनदिखे सितार का एक भी तार
नहीं सिहरता है।
किधर से चढ़ेंगे आप?
राजकमल चौधरी
हम लोगों में सबसे समझदार था नरेंद्र धीररामनगर की उस दुकान में सबसे बाद तक
वह रह सकता था। कभी अकेले
या कभी हरवंश कश्यप के साथ हम चले आते थे
अजमेरी गेट। एक शहज़ादी होती थी,
एक सुलोचना, एक नीलम। एक रात में
सत्रह बार उनका ब्याह होता था
नीचे ‘मोरल री-आर्मामेंट', ऊपर
एक रात में सत्रह बार यह पूछना,—
किधर से चढ़ेंगे आप? सीढ़ियों पर,
जब भीड़ बढ़ने लगेगी। दमे के मरीज़ ग़ज़लों में
जब पूछेगे अपनी बीवियों की दास्तान।
जब आदमी बेशर्म होकर
‘पब्लिक बाथरूम’ बन जाएगा चौराहों पर। तो,
किधर से चढ़ेंगे आप? रमेश गौड़
छह रुपए उधार लेकर उतार लेगा अपना पानी।
जगदीश चतुर्वेदी समाधिस्थ योगी बनकर
अपने कमरे में पड़ोस की अनारकली।
सँभालता रहेगा। मुद्राराक्षस सिर्फ़ पान खाएगा,
और थूकेगा ‘टी हाउस' की फ़र्श पर सिर्फ़
बट्रेंड रसेल।
हम लोगों में सबसे समझदार था नरेंद्र धीर
ख़ुदकुशी करने से पहले उसने
दिल्ली से फ़ुर्सत पा ली। अब अजमेरी गेट से
दिल्ली गेट तक
कमलेश्वर नई कहानियाँ बिछाते रह जाएँ दिन-रात,
सत्रह बार एक ही सवाल पूछते रहें।
राजीव सक्सेना की स्कूटर, धर्मेंद्र गुप्त की साइकिल,
श्रीकांत वर्मा की मोटरकार कहानियाँ कविताएँ
राजपथ से जनपथ तक झंडे उड़ाती रहें।
हम सभी अचेतन हो जाएँ
‘मोरल री-आर्मामेंट' की बेशर्मी के बाद। क्योंकि,
इससे ज़्यादा करने या होने का उत्पात
हम लोगों के पास नहीं है। हो सकता है जैनेंद्र जी के
पास कोई उपाय हो।
आधी नींद में पूरी बातचीत
राजकमल चौधरी
आप कह दीजिए बीती हुई किताबों को अबफिर दुहराएँगे नहीं।
(स्वास्थ्य एक पतित शब्द है)
अपनी नींद में भी
शरीर तो अपना ही शरीर होगा
मारिजुआना... मर्जिना... मरजाना... मरजाना
स्त्रियाँ पुल हैं
एक बार एक जंगल में एक अदद
आदमी रहता था
मैंने एक पुल बना दिया यहाँ-वहाँ यहाँ-वहाँ
बीती हुई किताबों को
मत दुहराइए
आदमी ग़ायब हो गया...
जंगल रहता था
जंगल रहता है
जंगल में सिर्फ़ एक औरत अब रहती है
अपनी नींद में भी
आप कह दीजिए
मैं चुप हूँ!
वासना
राजकमल चौधरी
सबके बाद मरता है पीला साँप।पालतू बिल्लियाँ राख का ढेर तोड़ती रहती है...
एक टुकड़ा रोटी
एक अदद सड़ा हुआ सेव, और
लहूलुहान पंजे।
शीशों पर जमी रह जाती है धूल वक़्त
रुका रह जाता है।
खड्ड में गिरे कोयले से लदे ट्रक
टैंक में मरे हुए बच्चे
लैंपपोस्ट के नीचे मैथुनरत कुत्ते...
आदमी। काली सफ़ेद बिल्लियाँ।
और, सबके बाद मरता है पीला साँप
सबसे पहले जन्म लिया करता है
अक्सर।
समाजशास्त्र
राजकमल चौधरी
पचास नंबर की तीसरी बोतल ने सिजदाकरते हुए कहा—चलो, डॉक्टर एन.
से समाजशास्त्र पढ़ने चलते हैं।
आधी रात के उपरांत एक रसिक स्त्री
राजकमल चौधरी
आधी रात के उपरांत रेशमी कोहरे मेंएक रसिक स्त्री
टूटे हुए समय-स्तूपों में
अपना भविष्य और अपना निर्वासन-कुंज
ढूँढ़ती हुई
नग्न और एकस्वर होकर
केवल
इतना निर्णय कर पाती है
कभी यहाँ एक देव-मंदिर था
विग्रहविहीन
आधी रात के उपरांत रेशमी कोहरे में
एक रसिक स्त्री
भग्न खंड-प्रस्तर होकर
केवल
देव-विग्रह बन जाती है
किंतु
टूटे हुए समय-स्तूपों से
अब भी निर्मित नहीं होता है
देव-मंदिर!
रिक्शे पर एक सौ रातें
राजकमल चौधरी
गरदन के नीचे से खींच लिया हाथ।बोली—अंधकार हयनि (नहीं हुआ
है)! सड़कों पर अब तक घर-वापसी
का जुलूस। दफ़्तर, दुकानें, अख़बार
अब तक सड़कों पर। किसी
मंदिर के खंडहर में हम रुकें? बह
जाने दें चुपचाप इर्द-गिर्द से समय?
गरदन के नीचे से उसने खींच ली
तलवार! कोई पागल घोड़े की तेज़
टाप बनकर आता है। प्रश्नवाचक
वृक्ष बाँहों में। डालों पर लगातार
लटके हुए चमगादड़। रिक्शे वाला
हँसता है चार बजे सुबह-अंधकार
हयनि (नहीं हुआ है)। सिर्फ़,
एक सौ रातों ने हमें बताया, कि
शाम को बंद किए गए दरवाज़े
सुबह नहीं खुलते हैं।
दिल्ली शहर में आइसक्रीम ख़रीदते हुए
राजकमल चौधरी
श्री. होटल के जिस कमरे में रहते हैं हम लोग उसकी तिकोनीखिड़कियाँ फ़र्श से शुरू होती है नंगे टखने
नंगी पिंडलियाँ देखने के लिए।
एक औरत अपने ख़ाली पर्स का मुँह खोलकर किसी दुकान के
पिछले दरवाज़े में घुसती है हम लोग देर तक
शेव करते रहते हैं।
दूतावासों की ओर चले जाने के लिए अजमल ख़ाँ रोड की
लंबाई हमारे घुटनों से शुरू होकर उसके
ख़ाली पर्स में फिसल जाती है
पिघले हुए आइसक्रीम की तरह (शाम के वक़्त) चौराहों पर
खड़े होते ही
हम लोगों को अपने बचपन की गलियों में सोए हुए
लावारिस कुत्ते की आवाज़ पुकारती है
वापस चले आओ
अभी साइरन बजेगा वापस चले आओ अभी प्रधानमंत्री का
भाषण होगा वापस चले आओ अभी
वितरण होगा राजभक्तों को पुरस्कार अब तुम लोग
वापस चले आओ
लेकिन जो लोग भूल चुके हैं अपना नाम अब कहाँ
वापस जाएँगे तिकोनी खिड़कियों के अंदर
झाँकने का तमाशा छोड़कर
क्यों वापस चले जाएँगे अकाल-ग्रस्त इलाक़ों में रिलीफ़
अन्न का हिस्सा माँगने के लिए?
विघटन
राजकमल चौधरी
नीले झाग में लिपटा हुआ। और कोई वस्त्र नहीं।शहर। दो आँखें।
काली खिड़की से मैं पूरी तस्वीर।
देखता हूँ। दो आँखें काली खिड़की से तस्वीर।
लौट आए हैं
पानी के जहाज़। अर्थात्,
वह मेरी ही प्रेयसी है, निस्तब्धता में
यात्रा।
जहाँ से शुरू हुई थी यात्रा।
अब भी हैं रहस्य मेरे लिए। रात के
बंदरगाह।
बंद कमरे में। मेरा मौन। मेरी मृत्यु। अपरिचित
सागर के किनारे अपरिचित।
रहस्यमय मेरे लिए—
शहर।
दो आँखें।
काली खिड़की से पूरी तस्वीर।
यात्रा।
वह मेरी ही प्रेयसी।
बंदरगाह।
निस्तब्धता में टूटने लगा है समुद्र।
अपने पितृ वृक्ष के नीचे
माधवी लता।
वह चुपचाप रहस्य में खड़ी है, चुपचाप।
समय : घायल पक्षी।
अपने पिंजरे में छटपटाहट।
आदिम हवा क्यों अपने पंख फड़फड़ाती है।
समय : केवल अंग-संकेत
अपने पिंजरे में
भाषा मृत्युमुखी हो गई है,
किसके लिए?
समय : जलते हुए मरुखंड पर अपरिचित
ध्वनियों की वर्षा...
लौट आए हुए जहाज़
समुद्र
नीले दर्पण में मुखड़ा देखती हुई, आलस में
नदी
नंगी होकर नहाती हुई
किरने
सात रंगों से बुना गया महाजाल
सुबह
प्रकृति अपने ही प्रारूप के विघटन से
ऋतु-चक्र।
आदिम हवा फिर पंख फैलाती है। फिर
पंख फैलाती है।
आदिम हवा...
लज्जावती
राजकमल चौधरी
कद्रू ने दिशाओं के उस पार जाकर देखा,उसकी नाभि से निकले हुए सहस्र-कोटि
सर्पों ने सूर्य-रथ ढँक लिया है। अदिति
मुस्कुराई अवस्त्र, समुद्र-स्नान करने चली
गई।
अकाल का पहला दिन
राजकमल चौधरी
राजेंद्र प्रसाद सिंह के लिएजब पूरा का पूरा यह शहरमुज़फ़्फरपुरखारे पानी में डूब गयाऔरत वह बेमिसालमीराजी की ग़ज़ल में शीशे के बिखरे हुए—टुकड़ों पर छूटती-बिखरती रह गईबेनहाई हुई, बग़ैर सँवारे बाल...उसके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं,हरे, पीले, नीले, सफ़ेद साँप रेंगते हैंउसके होंठों में शब्द नहींशब्द नहींमुड़े हुए घुटनों के ऊपरअँधेरी झाड़ियों मेंसिर्फ़ एक अक्षरहोता है बीज-मंत्रस्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं स्त्रीं औरकुछ नहीं होता है अकाल... केवल यही... कि...पूरा का पूरा यह शहर खारे पानी में डूब जाता हैउस एक बेनज़ीर औरत के मातम में,हम एक नया मर्सिया क्यों नहीं लिखे?चिंता अर्थहीन बेबसी
राजकमल चौधरी
आकाश के अस्थिर चित्र नीचे झुकेंगे औरझुकेंगे, झूलेंगे मेघ
ऊँचे वृक्षों के माध्यम से, साधन से धरती
(कुँवारी है अब तक जिसकी पिपासा...)
ऊपर उठेगी
उठती, उभरती, उजागर होती चली जाएगी!
और,
अनेकों निरुद्देश्य, निरीह लोग यों ही जग जाएँगे,
एक धुआँ उठेगा उबलता हुआ
चाहे यह धुआँ ‘टियरगैस' ही क्यों न हो?
एक अलाव जलेगा चटकता हुआ।
चाहे इसमें हमारे पाँव ही क्यों न जल जाएँ?
मगर, निरीह लोग यों ही जग जाएँगे
वायु के अकस्मात पिघले हुए झोंकों से चौंककर
टूट जाएगा उनकी विवशताओं का ख़ुमार,
टूट जाएगा ज़ेहन पर नया गर्दोगुबार
(आदमी है; आख़िर, साफ़-सुथरा रहना ही चाहिए
मोटी-मोटी फ़ाइलों का कूड़ा बुहारने लग जाएँगे)
ऑफ़िसों के टेबुल पर ऊँघते हुए लोग,
काग़ज़ के महल, बाग़-बग़ीचे, घर-परिवार बनाने लगेंगे
रेसकोर्स के टिकट-घर की क्यू में खड़े आदमी!
और, जीवन की पांडुग्रस्त रोशनी का बौना स्तंभ
ऊदी भनभनाहटों से घिर-घर जाएगा व्यर्थ!
हर ओर से टूटे हुए पालों की नौकाएँ आएँगी
टकराएँगी अँधेरे में, अनर्थ!
डूबी हुई नावों में डूबे हुए लोग
उतार फेंकेंगे शील का रेशमी वस्त्र-खंड
उतार फेंकेंगे चेहरे संस्कृतियों की नक़ाब,
जल के तल पर कौन किसे जानेगा पहचानेगा?
अनस्तित्व की परिधि में कौन किसे मानेगा, सँभालेगा?
नंगे हो जाएँगे
भिखमंगे हो जाएँगे
मगर, किसके लिए-किसके लिए?—किसके लिए?
क्योंकि,
अहल्याएँ तो अभी तक पत्थर बनी सोई हैं,
(तुमने ही दिया था शाप—हे गौतम!
तम से उन्हें उबारे कौन?)
अनागत के आने की दुविधा में खोई है,
क्योंकि,
सभी व्यक्ति तुम जैसे ही, मुझ ऐसे ही
टूटे हुए
टूटे हुए
डूबे हुए
चौराहों के बुझे-बुझे लैंप-पोस्ट,
खेतों के उजड़े हुए मचानों के बाँस-खंभे,
फूल पात फल डाल रहित वृक्ष
ऊँचे शो-केसों के पारदर्शी शीशे,
(जिनमें खड़ी हैं प्लास्टिक की प्रकृत-वस्त्रा महिलाएँ)
गुलदस्तों में जमाए गए काग़ज़ के गुलाब खड़े हैं
थकी-थकी हारी हुई, भारी हुई मुद्राओं में
उफ! कहीं कोई शब्द नहीं
शब्द नहीं, वाक्य, ध्वनि, लय, छंद, गीत नहीं
उठता उभरता है उनके अंदर!
मगर, वे नहीं गाएँगे,
वे नहीं सोई हुई अहल्या को जगाएँगे
तो क्या अनागत नहीं आएगा?
तो, क्या कोई नहीं आएगा?
गूँगा ही रह जाएगा सारा संसार?
खुलेगा नहीं गीतों का द्वार?
अनायास
राजकमल चौधरी
फिर भी कभी चला जाऊँगा उसी दरवाज़े तक अनायास जैसे,उस अँधियारे गलियारे में कोई अब तक रहता हो।
फिर भी, दीवार की कील पर अटका दूँगा नया कैलेंडर,
किसी को यों ही पत्र लिख दूँगा—मैं बीमार हूँ
सीने पर अधखुली किताब रखकर सो जाऊँगा;
चाय बर्फ़ हो रही है कहकर, कोई मुझे जगाए नहीं
नन्हा-सा कोई बच्चा मेरे बिस्तर पर आए नहीं,
मैं बहुत बीमार हो गया हूँ!
धीमी चलती हुई किसी ट्राम पर चढ़ जाता हूँ,
पढ़ता चलता हूँ दुकानों के साइनबोर्ड,
फ़िल्मों के पोस्टर, नियॉन-अक्षरों में बाँधे गए गीत,
किसी की आँखों में क्या-क्या देखता रहता हूँ,
किसी को अनदेखे ही मुस्कुराता हूँ;
कोई अनलिखी कविता दुहराता हूँ। शाम की रोशनियाँ
दसमंजिले मकानों से उतरती हुई
मेरी बीमार बाँहों से लिपट जाती हैं।
फ़ुटपाथों पर रुके हुए लोगों की लगातार भीड़
मुझसे शहराह पूछती है। मैं—
सबको ग़लत गलियों में ले जाता हूँ
(यही मेरी क़िस्मत है!) नहीं शरमाता हूँ!
फिर किसी बस-स्टॉप के पास रुका रहता हूँ;
रुका हुआ हूँ
नींद में हूँ। फिर भी अनायास कोई मुझे पुकारेगा,
नक़ाब कितने भी लगाए फिरूँगा, लेकिन,
वह मुझे पहचानेगा। मुझे वापस बुलाने के सिवा
उसने कोई काम नहीं सीखा है।
अगस्त '65 की आख़िरी कविता
राजकमल चौधरी
बुख़ार में घर लौटकर
राजकमल चौधरी
रात की बीमार बीवी अँधेरे में खाँसतीहै। हमारे अंधे बच्चे और बेहद पालतू
कुत्ते प्यार में नहीं, नींद में यक़ीन करें।
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