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गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताएं रचनाएं : Gajanan Madhav Muktibodh Hindi Poems

परिचय

गजानन माधव मुक्तिबोध (1917–1964) हिंदी के प्रमुख आधुनिक कवि, लेखक और आलोचक थे। वे नई कविता आंदोलन के महत्वपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं। उनकी रचनाओं में सामाजिक विषमता, राजनीतिक व्यवस्था, मध्यवर्गीय जीवन, आत्मसंघर्ष और मानवीय संवेदना जैसे विषय प्रमुखता से उभरते हैं। मुक्तिबोध की कविता में गहरी वैचारिकता के साथ-साथ जटिल बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग मिलता है। ‘अँधेरे में’, ‘ब्रह्मराक्षस’ और ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ उनकी चर्चित रचनाओं में शामिल हैं। हिंदी की आधुनिक कविता को नई दिशा देने वाले कवियों में मुक्तिबोध का विशेष स्थान है।

Gajanan Madhav Muktibodh
Gajanan Madhav Muktibodh


मैं तुम लोगों से दूर हूँ

गजानन माधव मुक्तिबोध

मैं तुम लोगों से इतना दूर हूँ
तुम्हारी प्रेरणाओं से मेरी प्रेरणा इतनी भिन्न है
कि जो तुम्हारे लिए विष है, मेरे लिए अन्न है।
मेरी असंग स्थिति में चलता-फिरता साथ है,
अकेले में साहचर्य का हाथ है,
उनका जो तुम्हारे द्वारा गर्हित हैं
किन्तु वे मेरी व्याकुल आत्मा में बिंबित हैं, पुरस्कृत हैं
इसीलिए, तुम्हारा मुझ पर सतत आघात है!!
सबके सामने और अकेले में।
( मेरे रक्त-भरे महाकाव्यों के पन्ने उड़ते हैं
तुम्हारे-हमारे इस सारे झमेले में )
असफलता का धूल-कचरा ओढ़े हूँ
इसलिए कि वह चक्करदार ज़ीनों पर मिलती है
छल-छद्म धन की
किन्तु मैं सीधी-सादी पटरी-पटरी दौड़ा हूँ
जीवन की।
फिर भी मैं अपनी सार्थकता से खिन्न हूँ
विष से अप्रसन्न हूँ
इसलिए कि जो है उससे बेहतर चाहिए
पूरी दुनिया साफ़ करने के लिए मेहतर चाहिए
वह मेहतर मैं हो नहीं पाता
पर, रोज़ कोई भीतर चिल्लाता है
कि कोई काम बुरा नहीं
बशर्ते कि आदमी खरा हो
फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता।
रेफ़्रीजरेटरों, विटैमिनों, रेडियोग्रेमों के बाहर की
गतियों की दुनिया में
मेरी वह भूखी बच्ची मुनिया है शून्यों में
पेटों की आँतों में न्यूनों की पीड़ा है
छाती के कोषों में रहितों की व्रीड़ा है
शून्यों से घिरी हुई पीड़ा ही सत्य है
शेष सब अवास्तव अयथार्थ मिथ्या है भ्रम है
सत्य केवल एक जो कि
दुःखों का क्रम है।
मैं कनफटा हूँ हेठा हूँ
शेव्रलेट-डॉज के नीचे मैं लेटा हूँ
तेलिया लिबास में पुरज़े सुधारता हूँ
तुम्हारी आज्ञाएँ ढोता हूँ।

अँधेरे में

गजानन माधव मुक्तिबोध

 

एक

ज़िंदगी के...
कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;
आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार... बार-बार,
वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता,
किंतु, वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में गिरफ़्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा
अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,
और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती है—वह कौन
सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई!
इतने में अकस्मात् गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलिस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह—
ख़ुद-ब-ख़ुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट,
दृढ़ हनु,
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देता, पर
नहीं जाना जाता है!
कौन मनु?

बाहर शहर के, पहाड़ी के उस पार, तालाब...
अँधेरा सब ओर,
निस्तब्ध जल,
पर, भीतर से उभरती है सहसा
सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है
और मुस्काता है,
पहचान बताता है,
किंतु, मैं हतप्रभ,
नहीं वह समझ में आता।

अरे! अरे!!
तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष
चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक
वृक्षों के शीश पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ,
शाखाएँ, डालियाँ झूमकर झपटकर
चीख़, एक दूसरे पर पटकती हैं सिर के अकस्मात्—
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक
तिलस्मी खोह का शिला-द्वार
खुलता है धड् से
...
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी,
अंतराल-विवर के तम में
लाल-लाल कुहरा,
कुहरे में, सामने, रक्तालोक-स्नात पुरुष एक,
रहस्य साक्षात्!

तेजो प्रभावमय उसका ललाट देख
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर
गौरवर्ण, दीप्त-दृग, सौम्य-मुख
संभावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर
विलक्षण शंका,
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्
गहन एक संदेह।

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है,
पूर्ण अवस्था वह
निज-संभावनाओं, निहित प्रभावों, प्रतिभाओं की,
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिभा।

प्रश्न थे गंभीर, शायद ख़तरनाक भी,
इसीलिए बाहर के गुंजान
जंगलों से आती हुई हवा ने
फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी—
कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर
मौत की सज़ा दी!

किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही
आँखों पै बँध गई,
किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया,
किसी शून्य बिंदु के अँधियारे खड्डे में
गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में!

दो 

सूनापन सिहरा,
अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले उभरे,
शून्य के मुख पर सलवटें स्वर की,
मेरे ही उर पर, धँसती हुई सिर,
छटपटा रही हैं शब्दों की लहरें
मीठी है दुःसह!!
अरे, हाँ, साँकल ही रह-रह
बजती है द्वार पर।
कोई मेरी बात मुझे बताने के लिए ही
बुलाता है—बुलाता है
हृदय को सहला मानो किसी जटिल
प्रसंग में सहसा होंठों पर
होंठ रख, कोई सच-सच बात
सीधे-सीधे कहने को तड़प जाए, और फिर
वही बात सुनकर धँस जाए मेरा जी—
इस तरह, साँकल ही रह-रह बजती है द्वार पर
आधी रात, इतने अँधेरे में, कौन आया मिलने?
विमन प्रतीक्षापुर, कुहरे में घिरा हुआ
द्युतिमय मुख—वह प्रेम-भरा चेहरा—
भोला-भाला भाव—
पहचानता हूँ बाहर जो खड़ा है
यह वही व्यक्ति है, जी हाँ!
जो मुझे तिलिस्मी खोह में दिखा था।
अवसर-अनवसर
प्रकट जो होता ही रहता
मेरी सुविधाओं का न तनिक ख़्याल कर।
चाहे जहाँ, चाहे जिस समय उपस्थित,
चाहे जिस रूप में
चाहे जिन प्रतीकों में प्रस्तुत,
इशारे से बनाता है, समझाता रहता,
हृदय को देता है बिजली के झटके
अरे, उसके चेहरे पर खिलती हैं सुबहें,
गालों पर चट्टानी चमक पठार की
आँखों में किरणीली शांति की लहरें,
उसे देख, प्यार उमड़ता है अनायास! 
लगता है—दरवाज़ा खोलकर
बाँहों में कस लूँ
हृदय में रख लूँ
घुल जाऊँ, मिल जाऊँ लिपटकर उससे
परंतु, भयानक खड्डे के अँधेरे में आहत
और क्षत-विक्षत, मैं पड़ा हुआ हूँ,
शक्ति ही नहीं है कि उठ सकूँ ज़रा भी
(यह भी तो सही है कि
कमज़ोरियों से ही लगाव है मुझको)
इसीलिए टालता हूँ उस मेरे प्रिय को
कतराता रहता,
डरता हूँ उससे।
वह बिठा देता है तुंग शिखर के
ख़तरनाक, खुरदरे कगार-तट पर
शोचनीय स्थिति में ही छोड़ देता मुझको।
कहता है—“पार करो, पर्वत-संधि के गह्वर,
रस्सी के पुल पर चलकर
दूर उस शिखर-कगार पर स्वयं ही पहुँचो!” 
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा
मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से
बजने दो साँकल
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले,
वह जन—वैसे ही
आप चला जाएगा आया था जैसा।
खड्डे के अँधेरे में मैं पड़ा रहूँगा
पीड़ाएँ समेटे!
क्या करूँ, क्या नहीं करूँ मुझे बताओ,
इस तम-शून्य में तैरती है जगत्-समीक्षा
की हुई उसकी
(सह नहीं सकता)
विवेक-विक्षोभ महान् उसका
तम-अंतराल में (सह नहीं सकता)
अँधियारे मुझमें द्युति-आकृति-सा
भविष्य का नक्षा दिया हुआ उसका
सह नहीं सकता!!
नहीं, नहीं, उसको मैं छोड़ नहीं सकूँगा,
सहना पड़े—मुझे चाहे जो भले ही।

कमज़ोर घुटनों को बार-बार मसल,
लड़खड़ाता हुआ मैं
उठता हूँ दरवाज़ा खोलने,
चेहरे के रक्त-हीन विचित्र शून्य को गहरे
पोंछता हूँ हाथ से,
अँधेरे के ओर-छोर टटोल-टटोलकर
बढ़ता हूँ आगे,
पैरों से महसूस करता हूँ धरती का फैलाव,
हाथों से महसूस करता हूँ दुनिया,
मस्तक अनुभव करता है, आकाश,
दिल में तड़पता है अँधेरे का अंदाज़,
आँखें ये तथ्य को सूँघती-सी लगतीं,
केवल शक्ति है स्पर्श की गहरी।
आत्मा में, भीषण
सत्-चित्-वेदना जल उठी, दहकी।
विचार हो गए विचरण-सहचर।
बढ़ता हूँ आगे,
चलता हूँ सँभल-सँभलकर,
द्वार टटोलता,
ज़ंग-खाई, जमी हुई, जबरन
सिटकनी हिलाकर
ज़ोर लगा, दरवाज़ा खोलता
झाँकता हूँ बाहर...

सूनी है राह, अजीब है फैलाव,
सर्द अँधेरा।
ढीली आँखों से देखते हैं विश्व
उदास तारे।
हर बार सोच और हर बार अफ़सोस
हर बार फ़िक्र
के कारण बढ़े हुए दर्द का मानो कि दूर वहाँ, दूर वहाँ
अँधियारा पीपल देता है पहरा।
हवाओं की निःसंग लहरों में काँपती
कुत्तों की दूर-दूर अलग-अलग आवाज़,
टकराती रहती सियारों की ध्वनि से।
काँपती हैं दूरियाँ, गूँजते हैं फ़ासले
(बाहर कोई नहीं, कोई नहीं बाहर)

इतने में अँधियारे सूने में कोई चीख़ गया है
रात का पक्षी
कहता है—
“वह चला गया है,
वह नहीं आएगा, आएगा ही नहीं
अब तेरे द्वार पर।
वह निकल गया है गाँव में शहर में!
उसको तू खोज अब
उसका तू शोध कर!
वह तेरी पूर्णतम परम अभिव्यक्ति,
उसका तू शिष्य है (यद्यपि पलातक...)
वह तेरी गुरु है,
गुरु है...

तीन

समझ न पाया कि चल रहा स्वप्न या
जागृति शुरू है।
दिया जल रहा है,
पीतालोक-प्रसार में काल चल रहा है
आस-पास फैली हुई जग-आकृतियाँ
लगती हैं छपी हुई जड़ चित्राकृतियों-सी
अलग व दूर-दूर
निर्जीव!!
यह सिविल लाइंस है। मैं अपने कमरे में
यहाँ पड़ा हुआ हूँ।
आँखें खुली हुई हैं,
पीटे गए बालक-सा मार खाया चेहरा
उदास इकहरा,
स्लेट-पट्टी पर खींची गई तस्वीर
भूत जैसी आकृति—
क्या वह मैं हूँ?
मैं हूँ?

रात के दो बजे हैं,
दूर-दूर जंगल में सियारों का हो-हो,
पास-पास आती हुई घहराती गूँजती
किसी रेल-गाड़ी के पहियों की आवाज़!!
किसी अनपेक्षित
असंभव घटना का भयानक संदेह,
अचेतन प्रतीक्षा,
कहीं कोई रेल-एक्सीडेंट न हो जाए।
चिंता के गणित अंक
आसमानी-स्लेट-पट्टी पर चमकते
खिड़की से दीखते। 
...
हाय! हाय! तॉल्स्तॉय
कैसे मुझे दीख गए
सितारों के बीच-बीच
घूमते व रुकते
पृथ्वी को देखते।

शायद तॉल्स्तॉय-नुमा
कोई वह आदमी
और है,
मेरे किसी भीतरी धागे की आख़िरी छोर वह,
अनलिखे मेरे उपन्यास का
केंद्रीय संवेदन
दबी हाय-हाय-नुमा।
शायद तॉल्स्तॉय-नुमा।

प्रोसेशन?
निस्तब्ध नगर के मध्य-रात्रि-अँधेरे में सुनसान
किसी दूर बैंड की दबी हुई क्रमागत तान-धुन,
मंद-तार उच्च-निम्न स्वर-स्वप्न,
उदास-उदास ध्वनि-तरंगें हैं गंभीर,
दीर्घ लहरियाँ!!
गैलरी में जाता हूँ, देखता हूँ रास्ता
वह कोलतार-पथ अथवा
मरी हुई खिंची हुई कोई काली जिह्वा
बिजली के द्युतिमान् दिए या
मरे हुए दाँतों का चमकदार नमूना!

किंतु, दूर सड़क के उस छोर
शीत-भरे थर्राते तारों के अँधियारे तल में
नील तेज-उद्भास
पास-पास पास-पास
आ रहा इस ओर!
दबी हुई गंभीर स्वर-स्वप्न-तरंगें,
शत-ध्वनि-संगम-संगीत
उदास तान-धुन
समीप आ रहा!!

और, अब
गैस-लाइट-पाँतों की बिंदुएँ छिटकीं,
बीचो-बीच उनके
साँवले जुलूस-सा क्या-कुछ दीखता!!
और अब 
गैस-लाइट-निलाई में रँगे हुए अपार्थिव चेहरे,
बैंड-दल,
उनके पीछे काले-काले बलवान् घोड़ों का जत्था
दीखता,
घना व डरावना अवचेतन ही
जुलूस में चलता।
क्या शोभा-यात्रा
किसी मृत्यु-दल की?

अजीब!!
दोनों ओर, नीली गैस-लाइट-पाँत
रही जल, रही जल।
नींद में खोए हुए शहर की गहन अवचेतना में
हलचल, पाताली तल में
चमकदार साँपों की उड़ती हुई लगातार
लकीरों की वारदात!!
सब सोए हुए हैं।
लेकिन, मैं जाग रहा, देख रहा
रोमांचकारी वह जादुई करामात!!

विचित्र प्रोसेशन,
गंभीर क्विक मार्च...
कलाबत्तूवाला काला ज़रीदार ड्रेस पहने
चमकदार बैंड-दल—
अस्थि-रूप, यकृत-स्वरूप, उदर-आकृति
आँतों के जालों से, बाजे वे दमकते हैं भयंकर
गंभीर गीत-स्वप्न-तरंगें
उभारते रहते,
ध्वनियों के आवर्त मँडराते पथ पर।
बैंड के लोगों के चेहरे
मिलते हैं मेरे देखे हुओं-से,
लगता है उनमें कई प्रतिष्ठित पत्रकार
इसी नगर के!!
बड़े-बड़े नाम अरे कैसे शामिल हो गए इस बैंड-दल में!
उनके पीछे चल रहा
संगीन नोकों का चमकता जंगल,
चल रही पदचाप, ताल-बद्ध दीर्घ पाँत
टैंक-दल, मोर्टार, ऑर्टिलरी, सन्नद्ध,
धीरे-धीरे बढ़ रहा जुलूस भयावना,
सैनिकों के पथराए चेहरे
चिढ़े हुए, झुलसे हुए, बिगड़े हुए, गहरे!
शायद, मैंने उन्हें पहले भी तो कहीं देखा था।
शायद, उनमें मेरे कई परिचित!!
उनके पीछे यह क्या!!
कैवेलरी!
काले-काले घोड़ों पर ख़ाकी मिलिट्री ड्रेस,
चेहरे का आधा भाग सिंदूरी-गेरुआ
आधा भाग कोलतारी भैरव,
आबदार!!
कंधे से कमर तक कारतूसी बेल्ट है तिरछा।
कमर में, चमड़े के कवर में पिस्तौल,
रोष-भरी एकाग्रदृष्टि में धार है,
कर्नल, ब्रिगेडियर, जनरल, मॉर्शल
कई और सेनापति सेनाध्यक्ष
चेहरे वे मेरे जाने-बूझे-से लगते,
उनके चित्र समाचारपत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे,
यहाँ तक कि कविताएँ पढ़ी थीं
भई वाह!
उनमें कई प्रकांड आलोचक, विचारक, जगमगाते कवि-गण
मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान्
यहाँ तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमी जी उस्ताद
बनता है बलबन
हाय, हाय!!
यहाँ ये दीखते हैं भूत-पिशाच-काय।
भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ़ उभर आया है,
छिपे हुए उद्देश्य
यहाँ निखर आए हैं,
यह शोभा-यात्रा है किसी मृत-दल की।
विचारों की फिरकी सिर में घूमती है।

इतने में प्रोसेशन में से कुछ मेरी ओर
आँखें उठीं मेरी ओर-भर,
हृदय में मानो की संगीन नोकें ही घुस पड़ीं बर्बर,
सड़क पर उठ खड़ा हो गया कोई शोर—
“मारो गोली, दाग़ो स्साले को एकदम
दुनिया की नज़रों से हटकर
छिपे तरीक़े से
हम जा रहे थे कि
आधी रात—अँधेरे में उसने
देख लिया हमको
व जान गया वह सब
मार डालो, उसको ख़त्म करो एकदम”
रास्ते पर भाग-दौड़ धका-पेल!!
गैलरी से भागा मैं पसीने से शराबोर!!

एकाएक टूट गया स्वप्न व छिन्न-भिन्न हो गए
सब चित्र
जागते में फिर से याद आने लगा वह स्वप्न,
फिर से याद आने लगे अँधेरे में चेहरे,
और, तब मुझे प्रतीत हुआ भयानक
गहन मृतात्माएँ इसी नगर की
हर रात जुलूस में चलतीं,
परंतु, दिन में
बैठती हैं मिलकर करती हुई षड्यंत्र
विभिन्न दफ़्तरों-कार्यालयों, केंद्रों में, घरों में।
हाय, हाय! मैंने उन्हें देख लिया नंगा,
इसकी मुझे और सज़ा मिलेगी।

चार

अकस्मात्
चार का ग़जर कहीं खड़का,
मेरा दिल धड़का,
उदास मटमैला मनरूपी वल्मीक
चल-बिचल हुआ सहसा।
अगिनत काली-काली हायफ़न-डैशों की लीकें
बाहर निकल पड़ीं, अंदर घुस पड़ीं भयभीत,
सब ओर बिखराव।
मैं अपने कमरे में यहाँ लेटा हुआ हूँ।
काले-काले शहतीर छत के
हृदय दबोचते।
यद्यपि आँगन में नल जोर मारता,
जल खखारता।
किंतु, न शरीर में बल है
अँधेरे में गल रहा दिल यह।

एकाएक मुझे भान होता है जग का,
अख़बारी दुनिया का फैलाव,
फँसाव, घिराव, तनाव है सब ओर,
पत्ते न खड़के,
सेना ने घेर ली हैं सड़कें।
बुद्धि की मेरी रग
गिनती है समय की धक्-धक्।
यह सब क्या है?
किसी जन-क्रांति के दमन-निमित्त यह
मॉर्शल-लॉ है!
दम छोड़ रहे हैं भाग गलियों में मरे पैर,
साँस लगी हुई है,
ज़माने की जीभ निकल पड़ी है,
कोई मेरा पीछा कर रहा है लगातार।
भागता मैं दम छोड़,
घूम गया कोई मोड़,
चौराहा दूर से ही दीखता,
वहाँ शायद कोई सैनिक पहरेदार
नहीं होगा फ़िलहाल।
दीखता है सामने ही अंधकार-स्तूप-सा
भयंकर बरगद—
सभी उपेक्षितों, समस्त वंचितों,
ग़रीबों का वही घर, वही छत,
उसके ही तल-खोह-अँधेरे में सो रहे
गृह-हीन कई प्राण।
अँधेरे में डूब गए
डालों में लटके जो मटमैले चिथड़े
किसी एक अति दीन
पागल के धन वे।
हाँ, वहाँ रहता है, सिर-फिरा एक जन।

किंतु, आज इस रात बात अजीब है।
वही जो सिर-फिरा पागल क़तई था
आज एकाएक वह
जागरित बुद्धि है, प्रज्वलत् धी है।
छोड़ सिर-फिरा पवन,
बहुत ऊँचे गले से,
गा रहा कोई पद, कोई गान
आत्मोद्बोधमय!!
ख़ूब भई, ख़ूब भई,
जानता क्या वह भी कि
सैनिक प्रशासन है नगर में वाक़ई!
क्या उसकी बुद्धि भी जग गई!

(करुण रसाल वे हृदय के स्वर हैं
गद्यानुवाद यहाँ उनका दिया जा रहा)

ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धांतवादी मन,
अब तक क्या किया?
जीवन क्या जिया!!

उदरंभरि बन अनात्म बन गए,
भूतों की शादी में क़नात-से तन गए,
किसी व्यभिचारी के बन गए बिस्तर,

दुःखों के दाग़ों को तमग़ों-सा पहना,
अपने ही ख़्यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िंदगी निष्क्रिय बन गई तलघर,

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया!!

बताओ तो किस-किसके लिए तुम दौड़ गए,
करुणा के दृश्यों से हाय! मुँह मोड़ गए,
बन गए पत्थर,
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,
दिया बहुत-बहुत कम,
मर गया देश, अरे, जीवित रह गए तुम!!
लो-हित-पिता को घर से निकाल दिया,
जन-मन-करुणा-सी माँ को हंकाल दिया,
स्वार्थों के टेरियार कुत्तों को पाल लिया,
भावना के कर्तव्य-त्याग दिए,
हृदय के मंतव्य—मार डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ उखाड़ दिए,
जम गए, जाम हुए, फँस गए,
अपने ही कीचड़ में धँस गए!!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में
आदर्श खा गए!

अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया,
ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रहे गए तुम...

मेरा सिर गरम है,
इसीलिए भरम है।
सपनों में चलता है आलोचन,
विचारों के चित्रों की अवलि में चिंतन।
निजत्व-माफ़ है बेचैन,
क्या करूँ, किससे कहूँ,
कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन?
वैदिक ऋषि शुनःशेप के
शापभ्रष्ट पिता अजीगर्त के समान ही 
व्यक्तित्व अपना ही, अपने से खोया हुआ
वही उसे अकस्मात् मिलता था रात में
पागल था दिन में
सिर-फिरा विक्षिप्त मस्तिष्क।

हाय, हाय!
उसने भी यह क्या गा दिया,
यह उसने क्या नया ला दिया,
प्रत्यक्ष,
मैं खड़ा हो गया
किसी छाया मूर्ति-सा समक्ष स्वयं के
होने लगी बहस और
लगने लगे परस्पर तमाचे।
छिः पागलपन है,
वृथा आलोचन है।
गलियों में अंधकार भयावह—
मानो मेरे कारण ही लग गया
मॉर्शल-लॉ वह,
मानो मेरी निष्क्रिय संज्ञा ने संकट बुलाया,
मानो मेरे कारण ही दुर्घट
हुई यह घटना।
चक्र से चक्र लगा हुआ है...
जितना ही तीव्र है द्वंद्व क्रियाओं घटनाओं का
बाहरी दुनिया में,
उतनी ही तेज़ी से भीतरी दुनिया में,
चलता है द्वंद्व कि
फ़िक्र से फ़िक्र लगी हुई है।
आज उस पागल ने मेरी चैन भुला दी,
मेरी नींद गँवा दी।

मैं इस बरगद के पास खड़ा हूँ।
मेरा यह चेहरा
घुलता है जाने किस अथाह गंभीर, साँवले जल से,
झुके हुए गुमसुम टूटे हुए घरों के
तिमिर अतल से
घुलता है मन यह।
रात्रि के श्यामल ओस से क्षालित 
कोई गुरु-गंभीर महान् अस्तित्व
महकता है लगातार
मानो खंडहर-प्रसारों में उद्यान
गुलाब-चमेली के, रात्रि-तिमिर में,
महकते हों, महकते ही रहते हों हर पल।
किंतु वे उद्यान कहाँ हैं,
अँधेरे में पता नहीं चलता।
मात्र सुगंध है सब ओर,
पर, उस महक—लहर में
कोई छिपी वेदना, कोई गुप्त चिंता
छटपटा रही है।

पाँच

एकाएक मुझे भान!!
पीछे से किसी अजनबी ने
कंधे पर हाथ रखा
चौंकता मैं भयानक
एकाएक थरथर रेंग गई सिर तक,
नहीं, नहीं। ऊपर से गिरकर
कंधे पर बैठ गया बरगद-पात एक,
क्या वह संकेत, क्या वह इशारा?
क्या वह चिट्ठी है किसी की?
कौन-सा इंगित?
भागता मैं दम छोड़,
घूम गया कई मोड़!!
बंदूक़ धाँय-धाँय
मकानों के ऊपर प्रकाश-सा छा गया गेरुआ।
भागता मैं दम छोड़
घूम गया कई मोड़।
घूम गई पृथ्वी, घूम गया आकाश,
और फिर, किसी एक मुँदे हुए घर की
पत्थर, सीढ़ी दिख गई, उस पार
चुपचाप बैठ गया सिर पकड़कर!!
दिमाग़ में चक्कर,
चक्कर... भँवरें
भँवरों के गोल-गोल केंद्र में दीखा
स्वप्न सरीखा—
भूमि की सतहों के बहुत-बहुत नीचे
अँधियारी एकांत
प्राकृत गुहा एक।
विस्तृत खोह के साँवले तल में
तिमिर को भेदकर चमकते हैं पत्थर
मणि तेजस्क्रिय रेडियो-ऐक्टिव रत्न भी बिखरे,
झरता है जिन पर प्रबल प्रपात एक।
प्राकृत जल वह आवेग-भरा है,
द्युतिमान् मणियों की अग्नियों पर से
फिसल-फिसलकर बहती लहरें,
लहरों के तल में से फूटती हैं किरनें
रत्नों की रंगीन रूपों की आभा
फूट निकलती
खोह की बेडौल भीतें हैं झिलमिल!
पाता हूँ निज को खोह के भीतर,
विलुब्ध नेत्रों से देखता हूँ द्युतियाँ,
मणि तेजस्क्रिय हाथों में लेकर
विभोर आँखों से देखता हूँ उनको—
पाता हूँ अकस्मात्
दीप्ति में वलयित रत्न वे नहीं हैं
अनुभव, वेदना, विवेक-निष्कर्ष,
मेरे ही अपने यहाँ पड़े हुए हैं
विचारों की रक्तिम अग्नि के मणि वे
प्राण-जल-प्रपात में घुलते हैं प्रतिपल
अकेले में किरणों की गीली है हलचल
गीली है हलचल!!

छह

हाय, हाय! मैंने उन्हें गुहा-वास दे दिया
लोक-हित क्षेत्र से कर दिया वंचित
जनोपयोग से वर्जित किया और
निषिद्ध कर दिया
खोह में डाल दिया!!
वे ख़तरनाक थे,
(बच्चे भीख माँगते) ख़ैर...
यह न समय है,
जूझना ही तै है।
सीन बदलता है,
सुनसान चौराहा साँवला फैला,
बीच में वीरान गेरुआ घंटाघर,
ऊपर कत्थई बुज़ुर्ग गुंबद,
साँवली हवाओं में काल टहलता है।
रात में पीले हैं चार घड़ी-चेहरे,
मिनिट के काँटों की चार अलग गतियाँ,
चार अलग कोण,
कि चार अलग संकेत,
(मनस् में गतिमान् चार अलग मतियाँ)
खंभों पर बिजली की गरदनें लटकीं,
शर्म से जलते हुए बल्बों के आस-पास
बेचैन ख़्यालों के पंखों के कीड़े
उड़ते हैं गोल-गोल
मचल-मचलकर।
घंटाघर तले ही
पंखों के टुकड़े बीट व तिनके।
गुंबद-विवर में बैठे हुए बूढ़े
असंभव पक्षी
बहुत तेज़ नज़रों से देखते हैं सब ओर,
मानो कि इरादे
भयानक चमकते।
सुनसान चौराहा,
बिखरी हैं गतियाँ, बिखरी है रफ़्तार,
गश्त में घूमती है कोई दुष्ट इच्छा।
भयानक सिपाही जाने किस थकी हुई झोंक में
अँधेरे में सुलगाता सिगरेट अचानक
ताँबे से चेहरे की ऐंठ झलकती।
पथरीली सलवट
दियासलाई की पल-भर लौ में
साँप-सी लगती।
पर, उसके चेहरे का रंग बदलता है हर बार,
मानो अनपेक्षित कहीं न कुछ हो...
वह ताक रहा है—
संगीन नोकों पर टिका हुआ
साँवला बंदूक़-जत्था
गोल त्रिकोण एक बनाए खड़ा जो
चौक के बीच में!!
एक ओर
टैंकों का दस्ता भी खड़े-खड़े ऊँघता,
परंतु अड़ा है!!

भागता मैं दम छोड़,
घूम गया कई मोड़।
भागती है चप्पल, चटपट आवाज़
चाँटों-सी पड़ती।
पैरों के नीचे का कीच उछलकर
चेहरे पर, छाती पर पड़ता है सहसा,
ग्लानि की मितली।
गलियों का गोल-गोल खोह-अँधेरा
चेहरे पर, आँखों पर करता है हमला।
अजीब उमस-बास
गलियों का रुँधा हुआ उच्छ्वास
भागता हूँ दम छोड़,
घूम गया कई मोड़।
धुँधले से आकार कहीं-कहीं दीखते,
भय के? या घर के? कह नहीं सकता
आता है अकस्मात् कोलतार-रास्ता
लंबा व चौड़ा व स्याह व ठंडा,
बेचैन आँखें ये देखती हैं सब ओर।
कहीं कोई नहीं है,
नहीं कहीं कोई भी।
श्याम आकाश में, संकेत-भाषा-सी तारों की आँखें
चमचमा रही हैं।
मेरा दिल ढिबरी-सा टिमटिमा रहा है।
कोई मुझे खींचता है रास्ते के बीच ही।
जादू से बँधा हुआ चल पड़ा उस ओर।
सपाट सूने में ऊँची-सी खड़ी जो
तिलक की पाषाण-मूर्ति है निःसंग
स्तब्ध जड़ीभूत...
देखता हूँ उसको परंतु, ज्यों ही मैं पास पहुँचता
पाषाण-पीठिका हिलती-सी लगती
अरे, अरे, यह क्या!!
कण-कण काँप रहे जिनमें से झरते
नीले इलेक्ट्रॉन
सब ओर गिर रही हैं चिनगियाँ नीली
मूर्ति के तन से झरते हैं अंगार।
मुस्कान पत्थरी होंठों पर काँपी,
आँखों में बिजली के फूल सुलगते।
इतने में यह क्या!!
भव्य ललाट की नासिका में से
बह रहा ख़ून न जाने कब से
लाल-लाल गरमीला रक्त टपकता
(ख़ून के धब्बों से भरा अँगरखा)
मानो कि अतिशय चिंता के कारण
मस्तक-कोष ही फूट पड़े सहसा
मस्तक-रक्त ही बह उठा नासिका में से।
हाय, हाय, पितः पितः ओ,
चिंता में इतने न उलझो
हम अभी ज़िंदा हैं ज़िंदा,
चिंता क्या है!!
मैं उस पाषाण-मूर्ति के ठंडे
पैरों की छाती से बरबस चिपका
रुआँसा-सा होता
देह में तन गए करुणा के काँटे
छाती पर, सिर पर, बाँहों पर मेरे
गिरती हैं नीली
बिजली की चिनगियाँ
रक्त टपकता है हृदय में मेरे
आत्मा में बहता-सा लगता
ख़ून का तालाब।
इतने में छाती में भीतर ठक्-ठक्
सिर में है धड़-धड़!! कट रही हड्डी!!
फ़िक्र ज़बरदस्त!!
विवेक चलाता तीखा-सा रंदा
चल रहा बसूला
छीले जा रहा मेरा यह निजत्व ही कोई
भयानक ज़िद कोई जाग उठी मेरे भी अंदर
हठ कोई बड़ा भारी उठ खड़ा हुआ है।
इतने में आसमान काँपा व धाँय-धाँय
बंदूक़-धड़ाका
बिजली की रफ़्तार पैरों में घूम गई।
खोहों-सी गलियों के अँधेरे में एक ओर
मैं थक बैठ गया,
सोचने-विचारने।
अँधेरे में डूबे मकानों के छप्परों पार से
रोने की पतली-सी आवाज़
सूने में काँप रही काँप रही दूर तक
कराहों की लहरों में पाशव प्राकृत
वेदना भयानक थरथरा रही है।
मैं उसे सुनने का करता हूँ यत्न
कि देखता क्या हूँ—
सामने मेरे
सर्दी में बोरे को ओढ़कर
कोई एक अपने
हाथ-पैर समेटे
काँप रहा, हिल रहा—वह मर जाएगा।
इतने में वह सिर खोलता है सहसा
बाल बिखरते,
दीखते हैं कान कि
फिर मुँह खोलता है, वह कुछ
बुदबुदा रहा है,
किंतु, मैं सुनता ही नहीं हूँ।
ध्यान से देखता हूँ—वह कोई परिचित
जिसे ख़ूब देखा था, निरखा था कई बार
पर, पाया नहीं था।
अरे हाँ, वह तो...
विचार उठते ही दब गए,
सोचने का साहस सब चला गया है।
वह मुख—अरे, वह मुख, वे गाँधी जी!!
इस तरह पंगु!!
आश्चर्य!!
नहीं, नहीं वे जाँच-पड़ताल
रूप बदलकर करते हैं चुपचाप।
सुराग़ रसी-सी कुछ।

अँधेरे की स्याही में डूबे हुए देव को सम्मुख पाकर
मैं अति दीन हो जाता हूँ पास कि
बिजली का झटका
कहता है—“भाग जा, हट जा
हम हैं गुज़र गए ज़माने के चेहरे
आगे तू बढ़ जा।”
किंतु, मैं देखा किया उस मुख को।
गंभीर दृढ़ता की सलवटें वैसी ही,
शब्दों में गुरुता।
वे कह रहे हैं—
“दुनिया न कचरे का ढेर कि जिस पर
दानों को चुगने चढ़ा हुआ कोई भी कुक्कुट
कोई भी मुरग़ा
यदि बाँग दे उठे ज़ोरदार
बन जाए मसीहा” 
वे कह रहे हैं—
“मिट्टी के लोंदे में किरगीले कण-कण
गुण हैं,
जनता के गुणों से ही संभव
भावी का उद्भव...”
गंभीर शब्द वे और आगे बढ़ गए,
जाने क्या कह गए!!
मैं अति उद्विग्न!

एकाएक उठ पड़ा आत्मा का पिंजर
मूर्ति की ठठरी।
नाक पर चश्मा, हाथ में डंडा,
कंधे पर बोरा, बाँह में बच्चा।
आश्चर्य! अद्भुत! यह शिशु कैसे!!
मुस्कुरा उस द्युति-पुरुष ने कहा तब—
“मेरे पास चुपचाप सोया हुआ यह था।
सँभालना इसको, सुरक्षित रखना”

मैं कुछ कहने को होता हूँ इतने में वहाँ पर
कहीं कोई नहीं है, कहीं कोई नहीं है :
और ज़्यादा गहरा व और ज़्यादा अकेला
अँधेरे का फैलाव!
बालक लिपटा है मेरे इस गले से चुपचाप,
छाती से कंधे से चिपका है नन्हा-सा आकाश
स्पर्श है सुकुमार प्यार-भरा कोमल,
किंतु है भार का गंभीर अनुभव।
भावी की गंध और दूरियाँ अँधेरी
आकाशी तारों के साथ लिए हुए मैं
चला जा रहा हूँ
घुसता ही जाता हूँ फ़ासलों की खोहों की तहों में।

सहसा रो उठा कंधे पर वह शिशु
अरे, अरे वह स्वर अतिशय परिचित!!
पहले भी कई बार कहीं तो भी सुना था,
उसमें तो स्फोटक क्षोभ का आएगा,
गहरी है शिकायत,
क्रोध भयंकर।
मुझे डर यदि कोई वह स्वर सुन ले
हम दोनों फिर कहीं नहीं रह सकेंगे।
मैं पुचकारता हूँ, बहुत दुलारता,
समझाने के लिए तब गाता हूँ गाने,
अधभूली लोरी ही होंठों से फूटती!
मैं चुप करने की जितनी भी करता हूँ कोशिश,
और-और चीख़ता है क्रोध से लगातार!!
गरम-गरम अश्रु टपकते हैं मुझ पर।

किंतु, न जाने क्यों ख़ुश बहुत हूँ।
जिसको न मैं इस जीवन में कर पाया,
वह कर रहा है।
मैं शिशु-पीठ को थपथपा रहा हूँ।
आत्मा है गीली।
पैर आगे बढ़ रहे, मन आगे जा रहा।
डूबता हूँ मैं किसी भीतरी सोच में—
हृदय के थाले में रक्त का तालाब,
रक्त में डूबी हैं द्युतिमान् मणियाँ,
रुधिर से फूट रहीं लाल-लाल किरणें,
अनुभव-रक्त में डूबे हैं संकल्प,
और ये संकल्प
चलते हैं साथ-साथ।
अँधियारी गलियों में चला जा रहा हूँ।

इतने में पाता हूँ अँधेरे में सहसा
कंधे पर कुछ नहीं!!
वह शिशु
चला गया जाने कहाँ,
और अब उसके ही स्थान पर
मात्र हैं सूरज-मुखी-फूल-गुच्छे।
उन स्वर्ण-पुष्पों से प्रकाश-विकीरण
कंधों पर, सिर पर, गालों पर, तन पर,
रास्ते पर, फैले हैं किरणों के कण-कण।
भई वाह, यह ख़ूब!!

इतने में गली एक आ गई और मैं
दरवाज़ा खुला हुआ देखता।
ज़ीना है अँधेरा।
कहीं कोई ढिबरी-सी टिमटिमा रही है!
मैं बढ़ रहा हूँ
कंधों पर फूलों के लंबे वे गुच्छे
क्या हुए, कहाँ गए?
कंधे क्यों वज़न से दुख रहे सहसा।
ओ हो,
बंदूक़ आ गई
वाह वा...!!
वज़नदार रॉयफ़ल,
भई ख़ूब!!
खुला हुआ कमरा है साँवली हवा है,
झाँकते हैं खिड़कियों में से दूर अँधेरे में टँके हुए सितारे
फैली है बर्फ़ीली साँस-सी वीरान,
तितर-बितर सब फैला है सामान।
बीच में कोई ज़मीन पर पसरा,
फैलाए बाँहें, ढह पड़ा, आख़िर।
मैं उस जन पर फैलाता टॉर्च कि यह क्या—
ख़ून-भरे बाल में उलझा है चेहरा,
भौंहों के बीच में गोली का सूराख़,
ख़ून का परदा गालों पर फैला,
होंठों पर सूखी है कत्थई धारा,
फूटा है चश्मा, नाक है सीधी,
ओफ़्फ़ो!! एकांत-प्रिय यह मेरा
परिचित व्यक्ति है, वहीं, हाँ,
सचाई थी सिर्फ़ एक अहसास
वह कलाकार था
गलियों के अँधेरे का, हृदय में, भार था
पर, कार्य क्षमता से वंचित व्यक्ति,
चलाता था अपना असंग अस्तित्व।
सुकुमार मानवीय हृदयों के अपने
शुचितर विश्व के मात्र थे सपने।
स्वप्न व ज्ञान व जीवनानुभव जो—
हलचल करता था रह-रह दिल में
किसी को भी दे नहीं पाया था वह तो।
शून्य के जल में डूब गया नीरव
हो नहीं पाया उपयोग उसका।
किंतु, अचानक झोंक में आकर क्या कर गुज़रा कि
संदेहास्पद समझा गया और
मारा गया वह बधिकों के हाथों।
मुक्ति का इच्छुक तृषार्त अंतर
मुक्ति के यत्नों के साथ निरंतर
सबका था प्यारा।
अपने में द्युतिमान्।
उनका यों वध हुआ,
मर गया एक युग,
मर गया एक जीवनादर्श!!
इतने में मुझको ही चिढ़ाता है कोई।
सवाल है—मैं क्या करता था अब तक,
भागता फिरता था सब ओर।
(फ़िज़ूल है इस वक़्त कोसना ख़ुद को)
एकदम ज़रूरी-दोस्तों को खोजूँ
पाऊँ मैं नए-नए सहचर
सकर्मक सत्-चित् वेदना-भास्कर!!

ज़ीने से उतरा,
एकाएक विद्रूप रूपों से घिर गया सहसा
पकड़ मशीन-सी,
भयानक आकार घेरते हैं मुझको,
मैं आततायी-सत्ता के सम्मुख।

एकाएक हृदय धड़ककर रुक गया, क्या हुआ!!
भयानक सनसनी।
पकड़कर कॉलर गला दबाया गया।
चाँटे से कनपटी टूटी कि अचानक
त्वचा उखड़ गई गाल की पूरी।
कान में भर गई
भयानक अनहद-नाद की भनभन।
आँखों में तैरीं
रक्तिम तितलियाँ, चिनगियाँ नीली।
सामने उगते-डूबते धुँधले
कुहरिल वर्तुल,
जिनका कि चक्रिल केंद्र ही फैलता जाता
उस फैलाव में दीखते मुझको
धँस रहे, गिर रहे बड़े-बड़े टॉवर
घुँघराला धुआँ, गेरुआ ज्वाला।
हृदय में भगदड़—
सम्मुख दीखा
उजाड़ बंजर टीले पर सहसा
रो उठा कोई, रो रहा कोई
भागता कोई सहायता देने।
अंतर्तत्त्वों का पुनःप्रबंध और पुनर्व्यवस्था
पुनर्गठन-सा होता जा रहा।

दृश्य ही बदला, चित्र बदल गया
जबरन ले जाया गया मैं गहरे
अँधियारे कमरे के स्याह सिफ़र में।
टूटे-से स्टूल पर बिठाया गया हूँ।
शीश की हड्डी जा रही तोड़ी।
लोहे की कील पर बड़े हथौड़े
पड़ रहे लगातार।
शीश का मोटा अस्थि-कवच ही निकाल डाला
देखा जा रहा—
मस्तक-यंत्र में कौन विचारों की कौन-सी ऊर्जा,
कौन-सी शिरा में कौन-सी धक्-धक्,
कौन-सी रग में कौन-सी फुरफुरी,
कहाँ है पश्यत् कैमरा जिसमें
तथ्यों के जीवन-दृश्य उतरते,
कहाँ-कहाँ सच्चे सपनों के आशय
कहाँ-कहाँ क्षोभक-स्फोटक सामान!
भीतर कहीं पर गड़े हुए गहरे
तलघर अंदर
छिपे हुए प्रिंटिंग प्रेस को खोजो
जहाँ कि चुपचाप ख़्यालों के परचे
छपते रहते हैं, बाँटे जाते।
इस संस्था के सेक्रेटरी को खोज निकालो,
शायद, उसका ही नाम हो आस्था,
कहाँ है सरगना इस टुकड़ी का
कहाँ है आत्मा?
(और, मैं सुनता हूँ चिढ़ी हुई ऊँची
खिझलाई आवाज़)
स्क्रीनिंग करो—मिस्टर गुप्ता,
क्रॉस एक्ज़ामिन हिम थॉरोली!!

चाबुक-चमकार
पीठ पर यद्यपि
उखड़े चर्म की कत्थई-रक्तिम रेखाएँ उभरीं
पर, यह आत्मा कुशल बहुत है,
देह में रेंग रही संवेदना की गरमीली कड़ुई धारा को गहरी
झनझन थरथर तारों को उसके,
समेटकर वह सब
वेदना-विस्तार करके इकट्ठा
मेरा मन यह
ज़बरन उनकी छोटी-सी कड्ढी
गठान बाँधता सख़्त व मज़बूत
मानो कि पत्थर।
ज़ोर लगाकर,
उसी गठन को हथेलियों से
करता है चूर-चूर,
धूल में बिखरा देता है उसको।
मन यह हटता है देह की हद से
जाता है कहीं पर अलग जगत् में।
विचित्र क्षण है,
सिर्फ़ है जादू,
मात्र मैं बिजली
यद्यपि खोह में खूँटे बँधा हूँ,
दैत्य है आस-पास
फिर भी बहुत दूर मीलों के पार वहाँ
गिरता हूँ चुपचाप पत्र के रूप में
किसी एक जेब में
वह जेब...
किसी एक फटे हुए मन की।

समस्वर, समताल,
सहानुभूति की सनसनी कोमल!!
हम कहाँ नहीं हैं
सभी जगह हम।
निजता हमारी?
भीतर-भीतर बिजली के जीवित
तारों के जाले,
ज्वलंत तारों की भीषण गुत्थी,
बाहर-बाहर धूल-सी भूरी
ज़मीन की पपड़ी।
अग्नि को लेकर, मस्तक हिमवत्,
उग्र प्रभंजन लेकर, उर यह
बिल्कुल निश्चल।
भीषण शक्ति को धारण करके
आत्मा का पोशाक दीन व मैला।
विचित्र रूपों को धारण करके
चलता है जीवन, लक्ष्यों के पथ पर।

सात

रिहा!!
छोड़ दिया गया मैं,
कई छाया-मुख अब करते हैं पीछा,
छायाकृतियाँ न छोड़ती हैं मुझको,
जहाँ-जहाँ गया वहाँ
भौंहों के नीचे के रहस्यमय छेद
मारते हैं संगीन—
दृष्टि की पत्थरी चमक है पैनी।
मुझे अब खोजने होंगे साथी—
काले गुलाब व स्याह सिवंती,
श्याम चमेली,
सँवलाए कमल जो खोहों के जल में
भूमि के भीतर पाताल-तल में
खिले हुए कब से भेजते हैं संकेत
सुझाव-संदेश भेजते रहते!!
इतने में सहसा दूर क्षितिज पर
दीखते हैं मुझको
बिजली की नंगी लताओं से भर रहे
सफ़ेद नीले मोतिया चंपई फूल गुलाबी
उठते हैं वहीं पर हाथ अकस्मात्
अग्नि के फूलों को समेटने लगते।
मैं उन्हें देखने लगता हूँ एकटक,
अचानक विचित्र स्फूर्ति से मैं भी
ज़मीन पर पड़े हुए चमकीले पत्थर
लगातार चुनकर
बिजली के फूल बनाने की कोशिश
करता हूँ। रश्मि-विकीरण—
मेरे भी प्रस्तर करते हैं प्रतिक्षण।
रेड़ियो-ऐक्टिव रत्न हैं वे भी।
बिजली के फूलों की भाँति ही
यत्न हैं वे भी,
किंतु, असंतोष मुझको है गहरा,
शब्दाभिव्यक्ति-अभाव का संकेत।
काव्य-चमत्कार उतना ही रंगीन
परंतु, ठंडा।
मेरे भी फूल हैं तेजस्क्रिय, पर
अतिशय शीतल।
मुझको तो बेचैन बिजली की नीली
ज्वलंत बाँहों में बाँहों को उलझा
करनी है उतनी ही प्रदीप्त लीला
आकाश-भर में साथ-साथ उसके घूमना है मुझको
मेरे पास न रंग है बिजली का गौर कि
भीमाकार हूँ मेघ मैं काला
परंतु, मुझको है गंभीर आवेश
अथाह प्रेरणा-स्रोत का संयम।
अरे, इन रंगीन पत्थर-फूलों से मेरा
काम नहीं चलेगा!!
क्या कहूँ,
मस्तक-कुंड में जलती
सत्-चित्-वेदना-सचाई व ग़लती—
मस्तक शिराओं में तनाव दिन-रात।

अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक
ले जाने उसको धँसना ही होगा
झील के हिम-शीत सुनील जल में
चाँद उग आया है
गलियों की आकाशी लंबी-सी चीर में
तिरछी है किरनों की मार
उस नीम पर
जिसके कि नीचे
मिट्टी के गोल चबूतरे पर, नीली
चाँदनी में कोई दिया सुनहला
जलता है मानो कि स्वप्न ही साक्षात्
अदृश्य साकार।
मकानों के बड़े-बड़े खंडहर जिनके कि सूने
मटियाले भागों में खिलती ही रहती
महकती रातरानी फूल-भरी जवानी में लज्जित
तारों की टपकती अच्छी न लगती।

भागता मैं दम छोड़,
घूम गया कई मोड़,
ध्वस्त दीवालों के उस पार कहीं पर
बहस गरम है
दिमाग़ में जान है, दिलों में दम है
सत्य से सत्ता के युद्ध को रंग है,
पर, कमज़ोरियाँ सब मेरे संग हैं,
पाता हूँ सहसा—
अँधेरे की सुरंग-गलियों में चुपचाप
चलते हैं लोग-बाग
दृढ़-पद गंभीर,
बालक युवागण
मंद-गति नीरव
किसी निज भीतरी बात में व्यस्त हैं,
कोई आग जल रही तो भी अंत:स्थ।

विचित्र अनुभव!!
जितना मैं लोगों की पाँतों को पार कर
बढ़ता हूँ आगे,
उतना ही पीछे मैं रहता हूँ अकेला,
पश्चात्-पद हूँ।
पर, एक रेला और
पीछे से चला और
अब मेरे साथ है।
आश्चर्य! अद्भुत!!
लोगों की मुट्ठियाँ बँधी हैं।
अँगुली-संधि से फूट रहीं किरनें
लाल-लाल
यह क्या!!
मेरे ही विक्षोभ-मणियों को लिए वे,
मेरे ही विवेक-रत्नों को लेकर,
बढ़ रहे लोग अँधेरे में सोत्साह।
किंतु मैं अकेला।
बौद्धिक जुगाली में अपने से दुकेला।

गलियों के अँधेरे में मैं भाग रहा हूँ,
इतने से चुपचाप कोई एक
दे जाता पर्चा,
कोई गुप्त शक्ति
हृदय में करने-सी लगती है चर्चा!!
मैं बहुत ध्यान से पढ़ता हूँ उसको
आश्चर्य!
उसमें तो मेरे ही गुप्त विचार व
दबी हुई संवेदनाएँ व अनुभव
पीड़ाएँ जगमगा रही हैं।
यह सब क्या है!

आसमान झाँकता है लकीरों के बीच-बीच
वाक्यों की पाँतों में आकाशगंगा-सी फैली
शब्दों के व्यूहों में ताराएँ चमकीं
तारक-दलों में भी खिलता है आँगन
जिसमें कि चंपा के फूल चमकते।
शब्दाकाशों के कानों में गहरे तुलसी के श्यामल खिलते हैं
चेहरे!!
चमकता है आशय मनोज्ञ मुखों से
पारिजात-पुष्प महकते।

पर्चा पढ़ते हुए उड़ता हूँ हवा में,
चक्रवात-गतियों में घूमता हूँ नभ पर,
ज़मीन पर एक साथ
सर्वत्र सचेत उपस्थित।
प्रत्येक स्थान पर लगा हूँ मैं काम में,
प्रत्येक चौराहे, दुराहे व राहों के मोड़ पर
सड़क पर खड़ा हूँ,
मनाता हूँ, मानता हूँ, मनवाता अड़ा हूँ!!

और तब दिक्काल-दूरियाँ
अपने ही देश के नक्शे-सी टँगी हुई
रँगी हुई लगतीं!!
स्वप्नों की कोमल किरनें कि मानो
घनीभूत संघनित द्युतिमान्
शिलाओं में परिणत
ये सब दृढ़ीभूत कर्म-शिलाएँ हैं
जिनसे कि स्वप्नों की मूर्ति बनेगी
सस्मित सुखकर
जिसकी कि किरनें,
ब्रह्मांड-भर में नापेंगी सब कुछ!
सचमुच, मुझको तो ज़िंदगी-सरहद
सूर्यों के प्रांगण पार भी जाती-सी दीखती!!
मैं परिणत हूँ,
कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ
वर्तमान समाज में चल नहीं सकता।
पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातन्त्र्य व्यक्ति का वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,
जन को।

आठ

एकाएक हृदय धड़ककर रुक गया, क्या हुआ!!
नगर में भयानक धुआँ उठ रहा है,
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
सड़कों पर मरा हुआ फैला है सुनसान,
हवाओं में अदृश्य ज्वाला की गरमी
गरमी का आवेग।
साथ-साथ घूमते हैं, साथ-साथ रहते हैं,
साथ-साथ सोते हैं, खाते हैं, पीते हैं,
जन-मन उद्देश्य!!
पथरीले चेहरों के ख़ाकी ये कसे ड्रेस
घूमते हैं यंत्रवत्,
वे पहचाने-से लगते हैं वाक़ई
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई!!
सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्
चिंतक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं
उनके ख़्याल से यह सब गप है
मात्र किवंदंती।
रक्तपायी वर्ग से नाभिनाल-बद्ध ये सब लोग
नपुंसक भोग-शिरा-जालों में उलझे।
प्रश्न की उथली-सी पहचान
राह से अनजान
वाक् रुदंती।
चढ़ गया उर पर कहीं कोई निर्दयी,
कहीं आग  लग गई, कहीं गोली चल गई।

भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गए
समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थूल।
गढ़े जाते संवाद,
गढ़ी जाती समीक्षा,
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूर।
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
किराए के विचारों का उदभास।
बड़े-बड़े चेहरों पर स्याहियाँ पुत गईं।
नपुंसक श्रद्धा
सड़क के नीचे की गटर में छिप गई,
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।

धुएँ के ज़हरीले मेघों के नीचे ही हर बार
द्रुत निज-विश्लेष-गतियाँ,
एक स्प्लिट सेकेंड में शत साक्षात्कार।
टूटते हैं धोखों से भरे हुए सपने।
रक्त में बहती हैं शान की किरनें
विश्व की मूर्ति में आत्मा ही ढल गई,
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।
राह के पत्थर-ढोकों के अंदर
पहाड़ों के झरने
तड़पने लग गए।
मिट्टी के लोंदे के भीतर
भक्ति की अग्नि का उद्रेक
भड़कने लग गया।
धूल के कण में
अनहद नाद का कंपन
ख़तरनाक!!
मकानों के छत से
गाडर कूद पड़े धम से।
घूम उठे खंभे
भयानक वेग से चल पड़े हवा में।
दादा का सोंटा भी करता है दाँव-पेंच
नाचता है हवा में
गगन में नाच रही कक्का की लाठी।
यहाँ तक कि बच्चे की पेपें भी उड़तीं,
तेज़ी से लहराती घूमती है हवा में
सलेट-पट्टी।
एक-एक वस्तु या एक-एक प्राणाग्नि-बम है,
ये परमास्त्र हैं, प्रेक्षपास्त्र हैं, यम हैं।
शून्याकाश में से होते हुए वे
अरे, अरि पर ही टूट पड़े अनिवार।
यह कथा नहीं है, यह सब सच है, हाँ भई!!
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई!!

किसी एक बलवान् तम-श्याम लुहार ने बनाया
कंडों का वर्तुल ज्वलंत मंडल।
स्वर्णिम कमलों की पाँखुरी-जैसी ही
ज्वालाएँ उठती हैं उससे,
और उस गोल-गोल ज्वलंत रेखा में रक्खा
लोहे का चक्का
चिनगियाँ स्वर्णिम नीली व लाल-लाल
फूलों-सी खिलतीं। कुछ बलवान् जन साँवले मुख के
चढ़ा रहे लकड़ी के चक्के पर जबरन
लाल-लाल लोहे की गोल-गोल पट्टी
घन मार घन मार,
उसी प्रकार अब
आत्मा के चक्के पर चढ़ाया जा रहा
संकल्प-शक्ति के लोहे का मज़बूत
ज्वलंत टायर!!
अब युग बदला है वाक़ई,
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई।

गेरुआ मौसम, उड़ते हैं अंगार,
जंगल जल रहे ज़िंदगी के अब
जिनके कि ज्वलंत-प्रकाशित भीषण
फूलों से बहतीं वेदना नदियाँ
जिनके कि जल में
सचेत होकर सैकड़ों सदियाँ, ज्वलंत अपने
बिंब फेंकती!!
वेदना नदियाँ
जिनमें कि डूबे हैं युगानुयुग से
मानो कि आँसू
पिताओं की चिंता का उद्विग्न रंग भी,
विवेक-पीड़ा की गहराई बेचैन,
डूबा है जिसमें श्रमिक का संताप।
वह जल पीकर
मेरे युवकों में होता जाता व्यक्तित्वांतर ,
विभिन्न क्षेत्रों में कई तरह से करते हैं संगर,
मानो कि ज्वाला-पंखुरियों से घिर हुए वे सब
अग्नि के शत-दल-कोष में बैठे!!
द्रुत-वेग बहती हैं शक्तियाँ निश्चयी।
कहीं आग लग गई, कहीं गोली चल गई!!
x  x  x
एकाएक फिर स्वप्न भंग
बिखर गए चित्र कि मैं फिर अकेला।
मस्तिष्क-हृदय में छेद पड़ गए हैं।
पर, उन दुखते हुए रंध्रों में गहरा
प्रदीप्त ज्योति का रस बस गया है।
मैं उन सपनों का खोजता हूँ आशय,
अर्थों की वेदना घिरती है मन में।
अजीब झमेला।
घूमता है मन उन अर्थों के घावों के आस-पास
आत्मा में चमकीली प्यास भर गई है।
जग-भर दीखती हैं सुनहली तस्वीरें मुझको
मानो कि कल रात किसी अनपेक्षित क्षण में ही सहसा
प्रेम कर लिया हो
जीवन-भर के लिए!!
मानो कि उस क्षण
अतिशय मृदु किन्हीं बाँहों ने आकर
कस लिया था इस भाँति कि मुझको
उस स्वप्न-स्पर्श की, चुंबन की याद आ रही है,
याद आ रही है!!
अज्ञात प्रणयिनी कौन थी, कौन थी?

कमरे में सुबह की धूप आ गई है,
गैलरी में फैला है सुनहला रवि छोर
क्या कोई प्रेमिका सचमुच मिलेगी?
हाय! यह वेदना स्नेह की गहरी
जाग गई क्यों कर?

सब ओर विद्युत्तरंगीय हलचल
चुंबकीय आकर्षण।
प्रत्येक वस्तु का निज-निज आलोक,
मानो कि अलग-अलग फूलों के रंगीन
अलग-अलग वातावरण हैं बेमाप,
प्रत्येक अर्थ की छाया में अन्य अर्थ
झलकता साफ़-साफ़!
डेस्क पर रखे हुए महान् ग्रंथों के लेखक
मेरी इन मानसिक क्रियाओं के बन गए प्रेक्षक,
मेरे इस कमरे में आकाश उतरा,
मन यह अंतरिक्ष-वायु में सिहरा।

उठता हूँ, जाता हूँ, गैलरी में खड़ा हूँ।
एकाएक वह व्यक्ति
आँखों के सामने
गलियों में, सड़कों पर, लोगों की भीड़ में
चला जा रहा है।
वही जन जिसे मैंने देखा था गुहा में।
धड़कता है दिल
कि पुकारने को खुलता है मुँह
कि अकस्मात्—
वह दिखा, वह दिखा
वह फिर खो गया किसी जन-यूथ में...
उठी हुई बाँह यह उठी हुई रह गई!!

अनखोजी निज-समृद्धि का वह परम-उत्कर्ष,
परम अभिव्यक्ति...
मैं उसका शिष्य हूँ
वह मेरी गुरु है,
गुरु है!!
वह मेरे पास कभी बैठा ही नहीं था,
वह मेरे पास कभी आया ही नहीं था,
तिलस्मी खोह में देखा था एक बार,
आख़िरी बार ही।
पर, वह जगत् ही गलियों में घूमता है प्रतिपल
वह फटेहाल रूप।
तड़ित्तरंगीय वही गतिमयता,
अत्यंत उद्विग्न ज्ञान-तनाव वह
सकर्मक प्रेम की वह अतिशयता
वही फटेहाल रूप!!
परम अभिव्यक्ति 
लगातार घूमती है जग में
पता नहीं जाने कहाँ, जाने कहाँ
वह है।
इसीलिए मैं हर गली में
और हर सड़क पर
झाँक-झाँक देखता हूँ हर एक चेहरा,
प्रत्येक गतिविधि
प्रत्येक चरित्र,
व हर एक आत्मा का इतिहास,
हर एक देश व राजनैतिक परिस्थिति
प्रत्येक मानवीय स्वानुभूत आदर्श
विवेक-प्रक्रिया, क्रियागत परिणति!!
खोजता हूँ पठार... पहाड़... समुंदर
जहाँ मिल सके मुझे
मेरी वह खोई हुई
परम अभिव्यक्ति अनिवार
आत्म-संभवा।


ब्रह्मराक्षस

गजानन माधव मुक्तिबोध

शहर के उस ओर खंडहर की तरफ़
परित्यक्त सूनी बावड़ी
के भीतरी
ठंडे अँधेरे में
बसी गहराइयाँ जल की...
सीढ़ियाँ डूबीं अनेकों
उस पुराने घिरे पानी में...
समझ में आ न सकता हो
कि जैसे बात का आधार
लेकिन बात गहरी हो।
बावड़ी को घेर
डालें ख़ूब उलझी हैं,
खड़े हैं मौन औदुम्बर।
व शाखों पर
लटकते घुग्घुओं के घोंसले
परित्यक्त, भूरे, गोल।
विगत शत पुण्यों का आभास
जंगली हरी कच्ची गंध में बसकर
हवा में तैर
बनता है गहन संदेह
अनजानी किसी बीती हुई उस श्रेष्ठता का जो कि
दिल में एक खटके-सी लगी रहती।
बावड़ी की इन मुँडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक
बैठी है टगर
ले पुष्प-तारे-श्वेत
उसके पास
लाल फूलों का लहकता झौंर—
मेरी वह कन्हेर...
वह बुलाती एक ख़तरे की तरफ़ जिस ओर
अँधियारा खुला मुँह बावड़ी का
शून्य अंबर ताकता है।
बावड़ी की उन घनी गहराइयों में शून्य
ब्रह्मराक्षस एक पैठा है,
व भीतर से उमड़ती गूँज की भी गूँज,
हड़बड़ाहट शब्द पागल से।
गहन अनुमानिता
तन की मलिनता
दूर करने के लिए प्रतिपल
पाप छाया दूर करने के लिए, दिन-रात
स्वच्छ करने—
ब्रह्मराक्षस
घिस रहा है देह
हाथ के पंजे, बराबर,
बाँह-छाती-मुँह छपाछप
ख़ूब करते साफ़,
फिर भी मैल
फिर भी मैल!!
और... होंठों से
अनोखा स्तोत्र कोई क्रुद्ध मंत्रोच्चार,
अथवा शुद्ध संस्कृत गालियों का ज्वार,
मस्तक की लकीरें
बुन रहीं
आलोचनाओं के चमकते तार!!
उस अखंड स्नान का पागल प्रवाह...
प्राण में संवेदना है स्याह!!
किंतु, गहरी बावड़ी
की भीतरी दीवार पर
तिरछी गिरी रवि-रश्मि
के उड़ते हुए परमाणु, जब
तल तक पहुँचते हैं कभी
तब ब्रह्मराक्षस समझता है, सूर्य ने
झुककर नमस्ते कर दिया।
पथ भूलकर जब चाँदनी
की किरन टकराए
कहीं दीवार पर,
तब ब्रह्मराक्षस समझता है
वंदना की चाँदनी ने
ज्ञान-गुरु माना उसे।
अति प्रफुल्लित कंटकित तन-मन वही
करता रहा अनुभव कि नभ ने भी
विनत हो मान ली है श्रेष्ठता उसकी!!
और तब दुगुने भयानक ओज से
पहचानवाला मन
सुमेरी-बेबिलोनी जन-कथाओं से
मधुर वैदिक ऋचाओं तक
व तब से आज तक के सूत्र
छंदस्, मंत्र, थियोरम,
सब प्रमेयों तक
कि मार्क्स, एंजेल्स, रसेल, टॉएन्बी
कि हीडेग्गर व स्पेंग्लर, सार्त्र, गाँधी भी
सभी के सिद्ध-अंतों का
नया व्याख्यान करता वह
नहाता ब्रह्मराक्षस, श्याम
प्राक्तन बावड़ी की
उन घनी गहराइयों में शून्य।
...ये गरजती, गूँजती, आंदोलिता
गहराइयों से उठ रहीं ध्वनियाँ, अतः
उद्भ्रांत शब्दों के नए आवर्त में
हर शब्द निज प्रति-शब्द को भी काटता,
वह रूप अपने बिंब से भी जूझ
विकृताकार-कृति
है बन रहा
ध्वनि लड़ रही अपनी प्रतिध्वनि से यहाँ
बावड़ी की इन मुँडेरों पर
मनोहर हरी कुहनी टेक सुनते हैं
टगर के पुष्प-तारे श्वेत
वे ध्वनियाँ!
सुनते हैं करौंदी के सुकोमल फूल
सुनता है उन्हे प्राचीन औदुम्बर
सुन रहा हूँ मैं वही
पागल प्रतीकों में कही जाती हुई
वह ट्रैजिडी
जो बावड़ी में अड़ गई।
x x x
ख़ूब ऊँचा एक जीना साँवला
उसकी अँधेरी सीढ़ियाँ...
वे एक आभ्यंतर निराले लोक की।
एक चढ़ना औ' उतरना,
पुनः चढ़ना औ' लुढ़कना,
मोच पैरों में
व छाती पर अनेकों घाव।
बुरे-अच्छे-बीच के संघर्ष
से भी उग्रतर
अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर
गहन किंचित सफलता,
अति भव्य असफलता
...अतिरेकवादी पूर्णता
की व्यथाएँ बहुत प्यारी हैं...
ज्यामितिक संगति-गणित
की दृष्टि के कृत
भव्य नैतिक मान
आत्मचेतन सूक्ष्म नैतिक मान...
...अतिरेकवादी पूर्णता की तुष्टि करना
कब रहा आसान
मानवी अंत:कथाएँ बहुत प्यारी हैं!!
रवि निकलता
लाल चिंता की रुधिर-सरिता
प्रवाहित कर दीवारों पर,
उदित होता चंद्र
व्रण पर बाँध देता
श्वेत-धौली पट्टियाँ
उद्विग्न भालों पर
सितारे आसमानी छोर पर फैले हुए
अनगिन दशमलव से
दशमलव-बिंदुओं के सर्वतः
पसरे हुए उलझे गणित मैदान में
मारा गया, वह काम आया,
और वह पसरा पड़ा है...
वक्ष-बाँहें खुली फैलीं
एक शोधक की।
व्यक्तित्व वह कोमल स्फटिक प्रासाद-सा,
प्रासाद में जीना
व जीने की अकेली सीढ़ियाँ
चढ़ना बहुत मुश्किल रहा।
वे भाव-संगत तर्क-संगत
कार्य सामंजस्य-योजित
समीकरणों के गणित की सीढ़ियाँ
हम छोड़ दें उसके लिए।
उस भाव तर्क व कार्य-सामंजस्य-योजन...
शोध में
सब पंडितों, सब चिंतकों के पास
वह गुरु प्राप्त करने के लिए
भटका!!
किंतु युग बदला व आया कीर्ति-व्यवसायी
...लाभकारी कार्य में से धन,
व धन में से हृदय-मन,
और, धन-अभिभूत अंतकरण में से
सत्य की झाईं
निरंतर चिलचिलाती थी।
आत्मचेतस् किंतु इस
व्यक्तित्व में थी प्राणमय अनबन...
विश्वचेतस् बे-बनाव!!
महत्ता के चरण में था
विषादाकुल मन!
मेरा उसी से उन दिनों होता मिलन यदि
तो व्यथा उसकी स्वयं जीकर
बताता मैं उसे उसका स्वयं का मूल्य
उसकी महत्ता!
व उस महत्ता का
हम सरीखों के लिए उपयोग,
उस आंतरिकता का बताता मैं महत्व!!
पिस गया वह भीतरी
औ' बाहरी दो कठिन पाटों बीच,
ऐसी ट्रैजिडी है नीच!!
बावड़ी में वह स्वयं
पागल प्रतीकों में निरंतर कह रहा
वह कोठरी में किस तरह
अपना गणित करता रहा
औ' मर गया...
वह सघन झाड़ी के कँटीले
तम-विवर में
मरे पक्षी-सा
विदा ही हो गया
वह ज्योति अनजानी सदा को सो गई
यह क्यों हुआ!
क्यों यह हुआ!!
मैं ब्रह्मराक्षस का सजल-उर शिष्य
होना चाहता
जिससे कि उसका वह अधूरा कार्य,
उसकी वेदना का स्रोत
संगत, पूर्ण निष्कर्षों तलक
पहुँचा सकूँ।

चाँद का मुँह टेढ़ा है

गजानन माधव मुक्तिबोध

नगर के बीचो-बीच
आधी रात—अँधेरे की काली स्याह
शिलाओं से बनी हुई
भीतों और अहातों के, काँच-टुकड़े जमे हुए
ऊँचे-ऊँचे कंधों पर
चाँदनी की फैली हुई सँवलाई झालरें।
कारख़ाना—अहाते के उस पार
धूम्र मुख चिमनियों के ऊँचे-ऊँचे
उद्गार—चिह्नाकार—मीनार
मीनारों के बीचो-बीच
चाँद का है टेढ़ा मुँह!!
भयानक स्याह सन तिरपन का चाँद वह!!
गगन में करफ़्यू है
धरती पर चुपचाप ज़हरीली छिः थूः है!!
पीपल के ख़ाली पड़े घोंसलों में पक्षियों के,
पैठे हैं ख़ाली हुए कारतूस।
गंजे-सिर चाँद की सँवलाई किरणों के जासूस
साम-सूम नगर में धीरे-धीरे घूम-घाम
नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे हैं!!
चाँद की कनखियों की कोण-गामी किरनें
पीली-पीली रोशनी की, बिछाती है
अँधेरे में, पट्टियाँ।
देखती है नगर की ज़िंदगी का टूटा-फूटा
उदास प्रसार वह।
समीप विशालाकार
अँधियाले लाल पर
सूनेपन की स्याही में डूबी हुई
चाँदनी भी सँवलाई हुई है!!
भीमाकार पुलों के बहुत नीचे, भयभीत
मनुष्य-बस्ती के बियाबान तटों पर
बहते हुए पथरीले नालों की धारा में
धराशायी चाँदनी के होंठ काले पड़ गए
हरिजन गलियों में
लटकी है पेड़ पर
कुहासे के भूतों की साँवली चूनरी—
चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर
टेढ़े-मुँह चाँद की।
बारह का वक़्त है,
भुसभुसे उजाले का फुसफुसाता षड्यंत्र
शहर में चारों ओर;
ज़माना भी सख़्त है!!
अजी, इस मोड़ पर
बरगद की घनघोर शाखाओं की गठियल
अजगरी मेहराब—
मरे हुए ज़मानों की संगठित छायाओं में
बसी हुई
सड़ी-बुसी बास लिए—
फैली है गली के
मुहाने में चुपचाप।
लोगों के अरे! आने-जाने में चुपचाप,
अजगरी कमानी से गिरती है टिप-टिप
फड़फड़ाते पक्षियों की बीट—
मानो समय की बीट हो!!
गगन में करफ़्यू है,
वृक्षों में बैठे हुए पक्षियों पर करफ़्यू है,
धरती पर किंतु अजी! ज़हरीली छिः थूः है।
बरगद की डाल एक
मुहाने से आगे फैल
सड़क पर बाहरी
लटकती है इस तरह—
मानो कि आदमी के जनम के पहले से
पृथ्वी की छाती पर
जंगली मैमथ की सूँड़ सूँघ रही हो
हवा के लहरीले सिफ़रों को आज भी
घिरी हुई विपदा घेरे-सी
बरगद की घनी-घनी छाँव में
फूटी हुई चूड़ियों की सूनी-सूनी कलाई-सा
सूनी-सूनी गलियों में
ग़रीबों के ठाँव में—
चौराहे पर खड़े हुए
भैरों की सिंदूरी
गेरुई मूरत के पथरीले व्यंग्य स्मित पर
टेढ़े-मुँह चाँद की ऐयारी रोशनी,
तिलिस्मी चाँद की राज़-भरी झाइयाँ!!
तजुर्बों का ताबूत
ज़िंदा यह बरगद
जानता कि भैरों यह कौन है !!
कि भैरों की चट्टानी पीठ पर
पैरों की मज़बूत
पत्थरी-सिंदूरी ईंट पर
भभकते वर्णों के लटकते पोस्टर
ज्वलंत अक्षर !!
सामने है अँधियाला ताल और
स्याह उसी ताल पर
सँवलाई चाँदनी,
समय का घंटाघर,
निराकार घंटाघर,
गगन में चुपचाप अनाकार खड़ा है!!
परंतु, परंतु... बतलाते
ज़िंदगी के काँटे ही
कितनी रात बीत गई
चप्पलों की छपछप,
गली के मुहाने से अजीब-सी आवाज़,
फुसफुसाते हुए शब्द!
जंगल की डालों से गुज़रती हवाओं की सरसर
गली में ज्यों कह जाए
इशारों के आशय,
हवाओं की लहरों के आकार—
किन्हीं ब्रह्मराक्षसों के निराकार
अनाकार
मानो बहस छेड़ दें
बहस जैसे बढ़ जाए
निर्णय पर चली आए
वैसे शब्द बार-बार
गलियों की आत्मा में
बोलते हैं एकाएक
अँधेरे के पेट में से
ज्वालाओं की आँत बाहर निकल आए
वैसे, अरे, शब्दों की धार एक
बिजली के टॉर्च की रोशनी की मार एक
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गई अकस्मात्
बरगद के खुरदरे अजगरी तने पर
फैल गए हाथ दो
मानो हृदय में छिपी हुई बातों ने सहसा
अँधेरे से बाहर आ भुजाएँ पसारी हों
फैले गए हाथ दो
चिपका गए पोस्टर
बाँके-तिरछे वर्ण और
लाल नीले घनघोर
हड़ताली अक्षर
इन्हीं हलचलों के ही कारण तो सहसा
बरगद में पले हुए पंखों की डरी हुई
चौंकी हुई अजीब-सी गंदी फड़फड़
अँधेरे की आत्मा से करते हुए शिकायत
काँव-काँव करते हुए पक्षियों के जमघट
उड़ने लगे अकस्मात्
मानो अँधेरे के
हृदय में संदेही शंकाओं के पक्षाघात!!
मद्धिम चाँदनी में एकाएक एकाएक
खपरैलों पर ठहर गई
बिल्ली एक चुपचाप
रजनी के निजी गुप्तचरों की प्रतिनिधि
पूँछ उठाए वह
जंगली तेज़
आँख
फैलाए
यमदूत-पुत्री-सी
[सभी देह स्याह, पर
पंजे सिर्फ़ श्वेत और
ख़ून टपकाते हुए नाख़ून]
देखती है मार्जार
चिपकाता कौन है
मकानों की पीठ पर
अहातों की भीत पर
बरगद की अजगरी डालों के फंदों पर
अँधेरे के कंधों पर
चिपकाता कौन है?
चिपकाता कौन है
हड़ताली पोस्टर
बड़े-बड़े अक्षर
बाँके-तिरछे वर्ण और
लंबे-चौड़े घनघोर
लाल-नीले भयंकर
हड़ताली पोस्टर!!
टेढ़े-मुँह चाँद की ऐयारी रोशनी भी ख़ूब है
मकान-मकान घुस लोहे के गज़ों की जाली
के झरोखों को पार कर
लिपे हुए कमरे में
जेल के कपड़े-सी फैली है चाँदनी,
दूर-दूर काली-काली
धारियों के बड़े-बड़े चौखट्टों के मोटे-मोटे
कपड़े-सी फैली है
लेटी है जालीदार झरोखे से आई हुई
जेल सुझाती हुई ऐयारी रोशनी!!
अँधियाले ताल पर
काले घिने पंखों के बार-बार
चक्करों के मँडराते विस्तार
घिना चिमगादड़-दल भटकता है चारों ओर
मानो अहं के अवरुद्ध
अपावन अशुद्ध घेरे में घिरे हुए
नपुंसक पंखों की छटपटाती रफ़्तार
घिना चिमगादड़-दल
भटकता है प्यासा-सा,
बुद्धि की आँखों में
स्वार्थों के शीशे-सा!!
बरगद को किंतु सब
पता था इतिहास,
कोलतारी सड़क पर खड़े हुए सर्वोच्च
गाँधी के पुतले पर
बैठे हुए आँखों के दो चक्र
यानी घुग्घू एक—
तिलक के पुतले पर
बैठे हुए घुग्घू से
बातचीत करते हुए
कहता ही जाता है—
...मसान में...
मैंने भी सिद्धि की।
देखो मूठ मार दी
मनुष्यों पर इस तरह...
तिलक के पुतले पर बैठे हुए घुग्घू ने
देखा कि भयानक लाल मूठ
काले आसमान में
तैरती-सी धीरे-धीरे जा रही
उद्गार-चिह्नाकार विकराल
तैरता था लाल-लाल!!
देख, उसने कहा कि वाह-वाह
रात के जहाँपनाह
इसीलिए आज-कल
दिल के उजाले में भी अँधेरे की साख है
रात्रि की काँखों में दबी हुई
संस्कृति-पाखी के पंख है सुरक्षित!!
...पी गया आसमान
रात्रि की अँधियाली सचाइयाँ घोंट के,
मनुष्यों को मारने के ख़ूब हैं ये टोटके!
गगन में करफ़्यू है,
ज़माने में ज़ोरदार ज़हरीली छिः थूः है!!
सराफ़े में बिजली के बूदम
खंभों पर लटके हुए मद्धिम
दिमाग़ में धुँध है,
चिंता है सट्टे की हृदय-विनाशिनी!!
रात्रि की काली स्याह
कड़ाही से अकस्मात्
सड़कों पर फैल गई
सत्यों की मिठाई की चाशनी!!
टेढ़े-मुँह चाँद की ऐयारी रोशनी
भीमाकार पुलों के
ठीक नीचे बैठकर,
चोरों-सी उचक्कों-सी
नालों और झरनों के तटों पर
किनारे-किनारे चल,
पानी पर झुके हुए
पेड़ों के नीचे बैठ,
रात-बे-रात वह
मछलियाँ फँसाती है
आवारा मछुओं-सी शोहदों-सी चाँदनी
सड़कों के पिछवाड़े
टूटे-फूटे दृश्यों में,
गंदगी के काले-से नाले के झाग पर
बदमस्त कल्पना-सी फैली थी रात-भर
सेक्स के कष्टों के कवियों के काम-सी!
किंग्सवे में मशहूर
रात की है ज़िंदगी!
सड़कों की श्रीमान्
भारतीय फिरंगी दूकान,
सुगंधित प्रकाश में चमचमाता ईमान
रंगीन चमकती चीज़ों के सुरभित
स्पर्शों में
शीशों की सुविशाल झाँइयों के रमणीय
दृश्यों में
बसी थी चाँदनी
खूबसूरत अमरीकी मैग्ज़ीन-पृष्ठों-सी
खुली थी,
नंगी-सी नारियों के
उघरे हुए अंगों के
विभिन्न पोजों में
लेटी थी चाँदनी
सफ़ेद
अंडरवियर-सी, आधुनिक प्रतीकों में
फैली थी
चाँदनी!
करफ़्यू नहीं यहाँ, पसंदगी... संदली,
किंग्सवे में मशहूर रात की है ज़िंदगी
अजी, यह चाँदनी भी बड़ी मसखरी है!!
तिमंज़िले की एक
खिड़की में बिल्ली के सफे़द धब्बे-सी
चमकती हुई वह
समेटकर हाथ-पाँव
किसी की ताक में
बैठी हुई चुपचाप
धीरे से उतरती है
रास्तों पर पथों पर;
चढ़ती है छतों पर
गैलरी में घूम और
खपरैलों पर चढ़कर
नीमों की शाखों के सहारे
आँगन में उतरकर
कमरों में हल्के-पाँव
देखती है, खोजती है—
शहर के कोनों के तिकोने में छुपी हुई
चाँदनी
सड़क के पेड़ों के गुंबदों पर चढ़कर
महल उलाँघ कर
मुहल्ले पार कर
गलियों की गुहाओं में दबे-पाँव
ख़ुफ़िया सुराग़ में
गुप्तचरी ताक में
जमी हुई खोजती है कौन वह
कंधों पर अँधेरे के
चिपकाता कौन है
भड़कीले पोस्टर,
लंबे-चौड़े वर्ण और
बाँके-तिरछे घनघोर
लाल-नीले अक्षर।
कोलतारी सड़क के बीचो-बीच खड़ी हुई
गांधी की मूर्ति पर
बैठे हुए घुग्घू ने
गाना शुरू किया,
हिचकी की ताल पर
साँसों ने तब
मर जाना
शुरू किया,
टेलीफ़ोन-खंभों पर थमे हुए तारों ने
सट्टे के ट्रंक-कॉल-सुरों में
थर्राना और झनझनाना शुरू किया!
रात्रि का काला-स्याह
कन-टोप पहने हुए
आसमान-बाबा ने हनुमान-चालीसा
डूबी हुई बानी में गाना शुरू किया।
मसान के उजाड़
पेड़ों की अँधियाली शाख पर
लाल-लाल लटके हुए
प्रकाश के चीथड़े—
हिलते हुए, डुलते हुए, लपट के पल्लू।
सचाई के अध-जले मुर्दों की चिताओं की
फटी हुई, फूटी हुई दहक में कवियों ने
बहकती कविताएँ गाना शुरू किया।
संस्कृति के कुहरीले धुएँ से भूतों के
गोल-गोल मटकों से चेहरों ने
नम्रता के घिघियाते स्वाँग में
दुनिया को हाथ जोड़
कहना शुरू किया—
बुद्ध के स्तूप में
मानव के सपने
गड़ गए, गाड़े गए!!
ईसा के पंख सब
झड़ गए, झाड़े गए!!
सत्य की
देवदासी-चोलियाँ उतारी गईं
उघारी गईं,
सपनों की आँते सब
चीरी गईं, फाड़ी गईं!!
बाक़ी सब खोल है,
ज़िंदगी में झोल है!!
गलियों का सिंदूरी विकराल
खड़ा हुआ भैरों, किंतु,
हँस पड़ा ख़तरनाक
चाँदनी के चेहरे पर
गलियों की भूरी ख़ाक
उड़ने लगी धूल और
सँवलाई नंगी हुई चाँदनी!
और, उस अँधियाले ताल के उस पार
नगर निहारता-सा खड़ा है पहाड़ एक
लोहे की नभ-चुंबी शिला का चबूतरा
लोहांगी कहाता है
कि जिसके भव्य शीर्ष पर
बड़ा भारी खंडहर
खंडहर के ध्वंसों में बुज़ुर्ग दरख़्त एक
जिसके घने तने पर
लिक्खी है प्रेमियों ने
अपनी याददाश्तें,
लोहांगी में हवाएँ
दरख़्त में घुसकर
पत्तों से फुसफुसाती कहती हैं
नगर की व्यथाएँ
सभाओं की कथाएँ
मोर्चों की तड़प और
मकानों के मोर्चे मीटिंगों के मर्म-राग
अंगारों से भरी हुई
प्राणों की गर्म राख
गलियों में बसी हुई छायाओं के लोक में
छायाएँ हिलीं कुछ
छायाएँ चलीं दो
मद्धिम चाँदनी में
भैरों के सिंदूरी भयावने मुख पर
छाईं दो छायाएँ
छरहरी छाइयाँ!!
रात्रि की थाहों में लिपटी हुई साँवली तहों में
ज़िंदगी का प्रश्नमयी थरथर
थरथराते बेक़ाबू चाँदनी के
पल्ले-सी उड़ती है गगन-कंगूरों पर।
पीपल के पत्तों के कंप में
चाँदनी के चमकते कंप से
ज़िंदगी की अकुलाई थाहों के अंचल
उड़ते हैं हवा में!!
गलियों के आगे बढ़
बग़ल में लिए कुछ
मोटे-मोटे काग़ज़ों की घनी-घनी भोंगली
लटकाए हाथ में
डिब्बा एक टीन का
डिब्बे में धरे हुए लंबी-सी कूँची एक
ज़माना नंगे-पैर
कहता मैं पेंटर
शहर है साथ-साथ
कहता मैं कारीगर—
बरगद की गोल-गोल
हड्डियों की पत्तेदार
उलझनों के ढाँचों में
लटकाओ पोस्टर,
गलियों के अलमस्त
फ़क़ीरों के लहरदार
गीतों से फहराओ
चिपकाओ पोस्टर
कहता है कारीगर।
मज़े में आते हुए
पेंटर ने हँसकर कहा—
पोस्टर लगे हैं,
कि ठीक जगह
तड़के ही मज़दूर
पढ़ेंगे घूर-घूर,
रास्ते में खड़े-खड़े लोग-बाग
पढ़ेंगे ज़िंदगी की
झल्लाई हुई आग!
प्यारे भाई कारीगर,
अगर खींच सकूँ मैं—
हड़ताली पोस्टर पढ़ते हुए
लोगों के रेखा-चित्र,
बड़ा मज़ा आएगा।
कत्थई खपरैलों से उठते हुए धुएँ
रंगों में
आसमानी सियाही मिलाई जाए,
सुबह की किरनों के रंगों में
रात के गृह-दीप-प्रकाश को आशाएँ घोलकर
हिम्मतें लाई जाएँ,
स्याहियों से आँख बने
आँखों की पुतली में धधक की लाल-लाल
पाँख बने,
एकाग्र ध्यान-भरी
आँखों की किरनें
पोस्टरों पर गिरें—तब
कहो भाई कैसा हो?
कारीगर ने साथी के कंधे पर हाथ रख
कहा तब—
मेरे भी करतब सुनो तुम,
धुएँ से कजलाए
कोठे की भीत पर
बाँस की तीली की लेखनी से लिखी थी
राम-कथा व्यथा की
कि आज भी जो सत्य है
लेकिन, भाई, कहाँ अब वक़्त है!!
तस्वीरें बनाने की
इच्छा अभी बाक़ी है—
ज़िंदगी भूरी ही नहीं, वह ख़ाकी है।
ज़माने ने नगर के कंधे पर हाथ रख
कह दिया साफ़-साफ़
पैरों के नखों से या डंडे की नोक से
धरती की धूल में भी रेखाएँ खींचकर
तस्वीरें बनाती हैं
बशर्ते कि ज़िंदगी के चित्र-सी
बनाने का चाव हो
श्रद्धा हो, भाव हो।
कारीगर ने हँसकर
बगल में खींचकर पेंटर से कहा, भाई
चित्र बनाते वक़्त
सब स्वार्थ त्यागे जाएँ,
अँधेरे से भरे हुए
ज़ीने की सीढ़ियाँ चढ़ती-उतरती जो
अभिलाषा—अंध है
ऊपर के कमरे सब अपने लिए बंद हैं
अपने लिए नहीं वे!!
ज़माने ने नगर से यह कहा कि
ग़लत है यह, भ्रम है
हमारा अधिकार सम्मिलित श्रम और
छीनने का दम है।
फ़िलहाल तस्वीरें
इस समय हम
नहीं बना पाएँगे
अलबत्ता पोस्टर हम लगा जाएँगे।
हम धधकाएँगे।
मानो या मानो मत
आज तो चंद्र है, सविता है,
पोस्टर ही कविता है!!
वेदना के रक्त से लिखे गए
लाल-लाल घनघोर
धधकते पोस्टर
गलियों के कानों में बोलते हैं
धड़कती छाती की प्यार-भरी गरमी में
भाफ-बने आँसू के ख़ूँख़ार अक्षर!!
चटाख से लगी हुई
रायफ़ली गोली के धड़ाकों से टकरा
प्रतिरोधी अक्षर
ज़माने के पैग़ंबर
टूटता आसमान थामते हैं कंधों पर
हड़ताली पोस्टर
कहते हैं पोस्टर—
आदमी की दर्द-भरी गहरी पुकार सुन
पड़ता है दौड़ जो
आदमी है वह ख़ूब
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
बूढ़ी माँ के झुर्रीदार
चेहरे पर छाए हुए
आँखों में डूबे हुए
ज़िंदगी के तजुर्बात
बोलते हैं एक साथ
जैसे तुम भी आदमी
वैसे मैं भी आदमी,
चिल्लाते हैं पोस्टर।
धरती का नीला पल्ला काँपता है
यानी आसमान काँपता है,
आदमी के हृदय में करुणा कि रिमझिम,
काली इस झड़ी में
विचारों की विक्षोभी तडित् कराहती
क्रोध की गुहाओं का मुँह खोले
शक्ति के पहाड़ दहाड़ते
काली इस झड़ी में वेदना की तड़ित् कराहती
मदद के लिए अब,
करुणा के रोंगटों में सन्नाटा
दौड़ पड़ता आदमी,
व आदमी के दौड़ने के साथ-साथ
दौड़ता जहान
और दौड़ पड़ता आसमान!!
मुहल्ले के मुहाने के उस पार
बहस छिड़ी हुई है,
पोस्टर पहने हुए
बरगद की शाखें ढीठ
पोस्टर धारण किए
भैंरों की कड़ी पीठ
भैंरों और बरगद में बहस खड़ी हुई है
ज़ोरदार जिरह कि कितना समय लगेगा
सुबह होगी कब और
मुश्किल होगी दूर कब
समय का कण-कण
गगन की कालिमा से
बूँद-बूँद चू रहा
तड़ित्-उजाला बन!!

मुझे क़दम-क़दम पर

गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे क़दम-क़दम पर
चौराहे मिलते हैं
बाँहें फैलाए!!
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूँ;
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तज़ुर्बे और अपने सपने...
सब सच्चे लगते हैं;
अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाए!!
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है;
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदा नीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है,
पल-भर में सबसे गुज़रना चाहता हूँ,
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,
इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,
अजीब है ज़िंदगी!!
बेवक़ूफ़ बनने के ख़ातिर ही
सब तरफ़ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ;
और यह सब देख बड़ा मज़ा आता है
कि मैं ठगा जाता हूँ...
हृदय में मेरे ही,
प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है
हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,
कि जगत्...स्वायत्त हुआ जाता है।
कहानियाँ लेकर और
मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते
जहाँ ज़रा खड़े होकर
बातें कुछ करता हूँ...
...उपन्यास मिल जाते।
दु:ख की कथाएँ, तरह-तरह की शिकायतें
अहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
ज़माने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं!
कविताएँ मुस्कुरा लाग-डाँट करती हैं
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ
श्रद्धाएँ चढ़ती हैं!!
घबराए प्रतीक और मुस्काते रूप-चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता...
उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।
घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,
बाँहें फैलाए रोज़ मिलती हैं सौ राहें,
शाखा-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं,
नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय
रोज़-रोज़ मिलते हैं...
और, मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन् यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है,
और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है!!

सहर्ष स्वीकारा है

गजानन माधव मुक्तिबोध

ज़िंदगी में जो कुछ है, जो भी है
सहर्ष स्वीकारा है;
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है।
गरबीली ग़रीबी यह, ये गभीर अनुभव सब
यह विचार-वैभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल-पल में
जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है—
संवेदन तुम्हारा है!!
जाने क्या रिश्ता है,
जाने क्या नाता है
जितना भी उड़ेलता हूँ,
भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!
सचमुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं
तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता है।
नहीं सहा जाता है।
ममता के बादल की मँडराती कोमलता—
भीतर पिराती है
कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है
बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है!!
सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ
पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में
धुएँ के बादलों में
बिल्कुल मैं लापता!!
लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है!!
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
या मेरा जो होता-सा लगता है, होता-सा संभव है
सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव है
अब तक तो ज़िंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है
सहर्ष स्वीकारा है
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है।

मैं उनका ही होता

गजानन माधव मुक्तिबोध

मैं उनका ही होता, जिनसे
मैंने रूप-भाव पाए हैं।
वे मेरे ही लिए बँधे हैं
जो मर्यादाएँ लाए हैं।
मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा,
मेरा अंत और अथ मेरा,
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।
मैं ऊँचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर-गिर,
उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
मैं गहरा होता चलता हूँ।

मैं उनका ही होता

गजानन माधव मुक्तिबोध

मैं उनका ही होता, जिनसे
मैंने रूप-भाव पाए हैं।
वे मेरे ही लिए बँधे हैं
जो मर्यादाएँ लाए हैं।
मेरे शब्द, भाव उनके हैं,
मेरे पैर और पथ मेरा,
मेरा अंत और अथ मेरा,
ऐसे किंतु चाव उनके हैं।
मैं ऊँचा होता चलता हूँ
उनके ओछेपन से गिर-गिर,
उनके छिछलेपन से खुद-खुद,
मैं गहरा होता चलता हूँ।

भूल-ग़लती

गजानन माधव मुक्तिबोध

भूल-ग़लती
आज बैठी है ज़िरहबख़्तर पहनकर
तख़्त पर दिल के,
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,
आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज़ पत्थर-सी;
खड़ी हैं सिर झुकाए
सब क़तारें
बेज़ुबाँ बेबस सलाम में,
अनगिनत खंभों व मेहराबों-थमे
दरबारे-आम में।
सामने
बेचैन घावों की अज़ब तिरछी लकीरों से कटा
चेहरा
कि जिस पर काँप
दिल की भाप उठती है...
पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा क़द
समूचे जिस्म पर लत्तर
झलकते लाल लंबे दाग़
बहते ख़ून के
वह क़ैद कर लाया गया ईमान...
सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,
बेख़ौफ़ नीली बिजलियों को फेंकता
ख़ामोश!!
सब ख़ामोश
मनसबदार,
शाइर और सूफ़ी,
अल ग़जाली, इब्ने सिन्ना, अलबरूनी
आलिमो फ़ाज़िल सिपहसालार, सब सरदार
हैं ख़ामोश !!
नामंजूर,
उसको ज़िंदगी की शर्म की-सी शर्त
नामंजूर,
हठ इनकार का सिर तान... ख़ुद-मुख़तार।
कोई सोचता उस वक़्त—
छाए जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुलतानी जिरहबख़्तर बना है सिर्फ़ मिट्टी का,
वो—रेत का-सा ढेर—शाहंशाह,
शाही धाक का अब सिर्फ़ सन्नाटा!!
(लेकिन, ना,
ज़माना साँप का काटा)
भूल (आलमगीर)
मेरी आपकी कमज़ोरियों के स्याह
लोहे का ज़िरहबख़्तर पहन, ख़ूँख़्वार
हाँ ख़ूँख़्वार आलीजाह;
वो आँखें सचाई की निकाले डालता,
सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता
करता हमें वह घेर
बेबुनियाद, बेसिर-पैर...
हम सब क़ैद हैं उसके चमकते तामझाम में,
शाही मुक़ाम में!!
इतने में, हमीं में से
अजीब कराह-सा कोई निकल भागा
भरे दरबारे-आम में मैं भी
सँभल जागा!!
क़तारों में खड़े ख़ुदग़र्ज़-बा-हथियार
बख़्तरबंद समझौते
सहमकर, रह गए,
दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए,
दुमुँहेपन के सौ तज़ुर्बों की बुज़ुर्गी से भरे,
दढ़ियल सिपहसालार संजीदा
सहमकर रह गए!!
लेकिन, उधर उस ओर,
कोई, बुर्ज़ के उस तरफ़ जा पहुँचा,
अँधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया,
महसूस होता है कि यह बेनाम
बेमालूम दर्रों के इलाक़े में
(सचाई के सुनहले तेज़ अक्सों के धुँधलके में)
मुहैया कर रहा लश्कर;
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,
हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट होकर विकट हो जाएगा!!

डूबता चाँद कब डूबेगा

गजानन माधव मुक्तिबोध

अँधियारे मैदान के इन सुनसानों में
बिल्ली की, बाघों की आँखों-सी चमक रहीं
ये राग-द्वेष, ईर्ष्या, भय, मत्सर की आँखें,
हरियातूता की ज़हरीली-नीली-नीली
ज्वाला, कुत्सा की आँखों में।
ईर्ष्या-रूपी औरत की मूँछ निकल आई।
इस द्वेष-पुरुष के दो हाथों के
चार और पंजे निकले।
मत्सर को ठस्सेदार तेज़ दो बौद्धिक सींग निकल आए।
स्वार्थी भावों की लाल
विक्षुब्ध चींटियों को सहसा
अब उजले पर कितने निकले।
अँधियारे बिल से झाँक रहे
सर्पों की आँखें तेज़ हुईं।
अब अहंकार उद्विग्न हुआ,
मानव के सब कपड़े उतार
वह रीछ एकदम नग्न हुआ।
ठूँठों पर बैठे घुग्घू-दल
के नेत्र-चक्र घूमने लगे
इस बियाबान के नभ में सब
नक्षत्र वक्र घूमने लगे।
कुछ ऐसी चलने लगी हवा,
अपनी अपराधी कन्या की चिंता में माता-सी बेकल
उद्विग्न रात
के हाथों से
अँधियारे नभ की राहों पर
है गिरी छूटकर
गर्भपात की तेज़ दवा
बीमार समाजों की जो थी।
दुर्घटना से ज्वाला काँपी कंदीलों में
अँधियारे कमरों की मद्धिम पीली लौ में,
जब नाच रही भीतों पर भुतही छायाएँ
आशंका की—
गहरे कराहते गर्भों से
मृत बालक ये कितने जनमे,
बीमार समाजों के घर में!
बीमार समाजों के घर में
जितने भी हल है प्रश्नों के
वे हल, जिनके पूर्व मरे।
उनके प्रेतों के आस-पास
दार्शनिक दुखों की गिद्ध-सभा
आँखों में काले प्रश्न-भरे बैठी गुम-सुम।
शोषण के वीर्य-बीज से अब जनमे दुर्दम
दो सिर के, चार पैर वाले राक्षस-बालक।
विद्रूप सभ्यताओं के लोभी संचालक।
मानव की आत्मा से सहसा कुछ दानव और निकल आए!
मानव मस्तक में से निकले
कुछ ब्रह्म-राक्षसों ने पहनी
गाँधी जी की टूटी चप्पल
हरहरा उठा यह पीपल तब
हँस पड़ा ठठाकर, गर्जन कर, गाँव का कुआँ।
तब दूर, सुनाई दिया शब्द, 'हुआँ' 'हुआँ'!
त्यागे मंदिर के अध-टूटे गुंबद पर स्थित
वीरान प्रदेशों का घुग्घू
चुपचाप, तेज़, देखता रहा—
झरने के पथरीले तट पर
रात के अँधेरे में धीरे
चुपचाप, कौन वह आता है, या आती है,
उसके पीछे—
पीला-पीला मद्धिम कोई कंदील
छिपाए धोती में (डर किरणों से)
चुपचाप कौन वह आता है या आती है—
मानो सपने के भीतर सपना आता हो,
सपने में कोई जैसे पीछे से टोके,
फिर, कहे कि ऐसा कर डालो!
फिर, स्वयं देखता खड़ा रहे
औ' सुना करे वीराने की आहटें, स्वयं ही सन्नाकर
रह जाए अपने को खो के!
त्यागे मंदिर के अध-टूटे गुंबद पर स्थित
घुग्घू की आँखों को अब तक
कोई भी धोखा नहीं हुआ,
उसने देखा—
झरने के तट पर रोता है कोई बालक,
अँधियारे में काले सियार-से घूम रहे
मैदान सूँघते हुए हवाओं के झोंके।
झरने के पथरीले तट पर
सो चुका, अरे, किन-किन करके, कुछ रो-रो के
चिथड़ों में सद्योजात एक बालक सुंदर।
आत्मा-रूपी माता ने जाने कब त्यागा
जीवन का आत्मज सत्य न जाने किसके डर?
माँ की आँखों में भय का कितना बीहड़पन
जब वन्य तेंदुओं की आँखों से दमक उठे
गुरु शुक्र और तारे नभ में
जब लाल बबर फ़ौजी-जैसा
जो ख़ूनी चेहरा चमक उठा
वह चाँद कि जिसकी नज़रों से
यों बचा-बचा,
यदि आत्मज सत्य यहाँ रक्खें झरने के तट,
अनुभव शिशु की रक्षा होगी।
ले इसी तरह के भाव अनगिनत लोगों ने
अपने ज़िंदा सत्यों का गला बचाने को
अपना सब अनुभव छिपा लिया,
हाँ में हाँ, नहीं नहीं में भर
अपने को जग में खपा लिया!
चुपचाप सो रहा था मैं अपने घर में जब,
सहसा जगकर, चट क़दम बढ़ा,
अँधियारे के सुनसान पथों पर निकल पड़ा,
बहते झरने के तट आया
देखा—बालक! अनुभव-बालक!!
चट, उठा लिया अपनी गोदी में,
वापस ख़ुश-ख़ुश घर आया!
अपने अँधियारे कमरे में
आँखें फाड़े मैने देखा मन के मन में
जाने कितने कारावासी वसुदेव
स्वयं अपने कर में, शिशु-आत्मज ले,
बरसाती रातों में निकले,
धँस रहे अँधेरे जंगल में
विक्षुब्ध पूर में यमुना के
अति-दूर, अरे, उस नंद-ग्राम की ओर चले।
जाने किसके डर स्थानांतरित कर रहे वे
जीवन के आत्मज सत्यों को,
किस महाकंस से भय खाकर गहरा-गहरा।
भय से अभ्यस्त कि वे उतनी
लेकिन परवाह नहीं करते !!
इसलिए, कंस के घंटाघर
में ठीक रात के बारह पर
बंदूक़ थमा दानव-हाथों,
अब दुर्जन ने बदला पहरा!
पर इस नगरी के मरे हुए
जीवन के काले जल की तह
के नीचे सतहों में चुप
जो दबे पाँव चलती रहतीं
जल-धाराएँ ताज़ी-ताज़ी निर्भय, उद्धत
तल में झींरे वे अप्रतिहत!
कानाफूसी से व्याप्त बहुत हो जाती है,
इन धाराओं में बात बहुत हो जाती है।
आते-जाते, पथ में, दो शब्द फुसफुसाते
इनको, घर आते, रात बहुत हो जाती है।
एक ने कहा—
अंबर के पलने से उतार रवि—राजपुत्र
ढाँककर साँवले कपड़ों में
रख दिशा-टोकरी में उसको
रजनी-रूपी पन्ना दाई
अपने से जन्मा पुत्र-चंद्र फिर सुला गगन के पलने में
चुपचाप टोकरी सिर पर रख
रवि-राजपुत्र ले खिसक गई
पुर के बाहर पन्ना दाई।
यह रात-मात्र उसकी छाया।
घबराहट जो कि हवा में है
इसलिए कि अब
शशि की हत्या का क्षण आया।
अन्य ने कहा—
घन तम में लाल अलावों की
नाचती हुई ज्वालाओं में
मृद चमक रहे जन-जन मुख पर
आलोकित ये विचार हैं अब,
ऐसे कुछ समाचार हैं अब
यह घटना बार-बार होगी,
शोषण के बंदीगृह-जन में
जीवन की तीव्र धार होगी!
और ने कहा—
कारा के चौकीदार कुशल
चुपचाप फलों के बक्से में
युगवीर शिवाजी को भरते
जो वेश बदल, जाता दक्षिण को ओर निकल!
एक ने कहा—
बंदूक़ों के कुंदों पर स्याह अंगूठों ने
लोहे के घोड़े खड़े किए,
पिस्तौलों ने अपने-अपने मुँह बड़े किए,
अस्त्रों को पकड़े कलाइयों
की मोटी नस हाँफने लगी
एकाग्र निशाना बने ध्यान के माथे पर
फिर मोटी नसें कसीं, उभरीं
पर पैरों में काँपने लगीं।
लोहे की नालों की टापें गूँजने लगीं।
अंबर के हाथ-पैर फूले,
काल की जड़ें सूजने लगीं।
झाड़ों की दाढ़ी में फंदे झूलने लगे,
डालों से मानव-देह बँधे झूलने लगे।
गलियों-गलियों हो गई मौत की गस्त शुरू,
पागल-आँखों, सपने सियाह बदमस्त शुरू!
अपने ही कृत्यों-डरी
रीढ़ हड्डी
पिचपिची हुई,
वह मरे साँप के तन-सी ही लुचलुची हुई।
अन्य ने कहा—
दुर्दांत ऐतिहासिक स्पंदन
के लाल रक्त से लिखते तुलसीदास आज
अपनी पीड़ा की रामायण,
उस रामायण की पीड़ा के आलोक-वलय
में मुख-मंडल माँ का झुर्रियों-भरा
उभरा-निखरा,
उर-कष्ट-भरी स्मित-हँसी
कि ज्यों आहत पक्षी
रक्तांकित पंख फड़फड़ाती
मेरे उर की शाखाओं पर आ बैठी है
कराह दाबे गहरी
(जिससे कि न मैं जाऊँ घबरा)
माँ की जीवन-भर की ठिठुरन,
मेरे भीतर
गहरी आँखोंवाला सचेत
बन गई दर्द।
उसकी जर्जर बदरंग साड़ी का रंग
मेरे जीवन में पूरा फैल गया।
मुझको, तुमको
उसकी आस्था का विक्षोभी
गहरी धक्का
विक्षुब्ध ज़िंदगी की सड़कों पर ठेल गया।
भोली पुकारती आँखें वे
मुझको निहारती बैठी हैं।
और ने कहा—
वह चादर ओढ़, दबा ठिठुरन, मेरे साथी!
वह दूर-दूर बीहड़ में भी,
बीहड़ के अंधकार में भी,
जब नहीं सूझ कुछ पड़ता है,
जब अँधियारा समेट बरगद
तम की पहाड़ियों-से दिखते,
जब भाव-विचार स्वयं के भी
तम-भरी झाड़ियों-से दिखते।
जब तारे सिर्फ़ साथ देते
पर नहीं हाथ देते पल-भर
तब, कंठ मुक्त कर, मित्र-स्वजन
नित नभ-चुंबी गीतों द्वारा
अपना सक्रिय अस्तित्व जताते एक-दूसरे को
वे भूल और फिर से सुधार के रास्ते से
अपना व्यक्तित्व बनाते हैं।
तब हम भी अपने अनुभव के सारांशों को
उन तक पहुँचाते हैं, जिसमें
जिस पहुँचाने के द्वारा, हम सब साथी मिल
दंडक वन में से लंका का
पथ खोज निकाल सकें प्रतिपल
धीरे-धीरे ही सही, बढ़ उत्थानों में अभियानों में
अँधियारे मैदानों के इन सुनसानों में
रात की शून्यताओं का गहरापन ओढ़े
ज़्यादा मोटे, ज़्यादा ऊँचे, ज़्यादा ऐंठे
भारी-भरकम लगने वाले
इन क़िले-कंगूरों-छज्जों-गुंबद-मीनारों
पर, क्षितिज-गुहा-माँद में से निकल
तिरछा झपटा,
जो गंजी साफ़-सफ़ेद खोपड़ीवाला चाँद
कुतर्की वह
सिर-फिरे किसी ज्यामिति-शाली-सा है।
नीले-पीले में घुले सफ़ेद उजाले की
आड़ी-तिरछी लंबी-चौड़ी
रेखाओं से
इन अंधकार-नगरी की बढ़ी हुई
आकृति के खींच खड़े नक्षे
वह नए नमूने बना रहा
उस वक़्त हवाओं में अजीब थर्राहट-सी
मैं उसको सुनता हुआ,
बढ़ रहा हूँ आगे
चौराहे पर
प्राचीन किसी योद्धा की ऊँची स्फटिक मूर्ति,
जिस पर असंग चमचमा रही है
राख चाँदनी की अजीब
उस हिमीभूत सौंदर्य-दीप्ति
में पुण्य कीर्ति
की वह पाषाणी अभिव्यक्ति
कुछ हिली।
उस स्फटिक मूर्ति के पास
देखता हूँ कि चल रही साँस
मेरी उसकी।
वे होंठ हिले
वे होंठ हँसे
फिर देखा बहुत ध्यान से तब
भभके अक्षर!!
वे लाल-लाल नीले-से स्वर
बाँके टेढ़े जो लटक रहे
उसके चबूतरे पर, धधके!!
मेरी आँखों में धूमकेतु नाचे,
उल्काओं की पंक्तियाँ काव्य बन गईं
घोषणा बनी!!
चाँदनी निखर हो उठी
उस स्फटिक मूर्ति पर, उल्काओं पर
मेरे चेहरे पर!!
पाषाण मूर्ति के स्फटिक अधर
पर वक्र-स्मित
कि रेखाएँ उसकी निहारती हैं
उन रेखाओं में सहसा मैं बँध जाता हूँ
मेरे चेहरे पर नभोगंधमय एक भव्यता-सी।
धीरे-धीरे मैं क़दम बढ़ा
गलियों की ओर मुड़ा
जाता हूँ। ज्वलत् शब्द-रेखा
दीवारों पर, चाँदनी-धुँधलके में भभकी
वह कल होनेवाली घटनाओं की कविता
जी में उमगी!!
तब अंधकार-गलियों की
गहरी मुस्कुराहट
के लंबे-लंबे गर्त-टीले
मेरे पीले चेहरे पर सहसा उभर उठे!!
यों हर्षोत्फुल्ल ताज़गी ले
मैं घर में घुसता हूँ कि तभी
सामने खड़ी स्त्री कहती है—
अपनी छायाएँ सभी तरफ़
हिल-डोल-रहीं,
ममता मायाएँ सभी तरफ़
मिल बोल रहीं,
हम कहाँ नहीं, हम जगह-जगह
हम यहाँ-वहाँ,
माना कि हवा में थर्राता गाना भुतहा,
हम सक्रिय हैं।
मेरे मुख पर
मुस्कानों के आंदोलन में
बोलती नहीं, पर डोल रही
शब्दों की तीखी तड़ित्
नाच उठती, केवल प्रकाश-रेखा बनकर!
अपनी खिड़की से देख रहे हैं हम दोनों
डूबता चाँद, कब डूबेगा!!

विचार आते हैं

गजानन माधव मुक्तिबोध

विचार आते हैं—
लिखते समय नहीं,
बोझ ढोते वक़्त पीठ पर
सिर पर उठाते समय भार
परिश्रम करत समय
चाँद उगता है व
पानी में झलमलाने लगता है
हृदय के पानी में।
विचार आते हैं
लिखते समय नहीं,
...पत्थर ढोते वक़्त
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ
साँप मारते समय पिछवाड़े
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त!!
पत्थर पहाड़ बन जाते हैं
नक़्शे बनते हैं भौगोलिक
पीठ कच्छप बन जाते हैं
समय पृथ्वी बन जाता है...

पूँजीवादी समाज के प्रति

गजानन माधव मुक्तिबोध

इतने प्राण, इतने हाथ; इतनी बुद्धि
इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशद्धि
इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति
यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति,
इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद—
जितना ढोंग, जितना भोग है निर्बंध
इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर जाल—
केवल एक जलता सत्य देने टाल।
छोड़ो हाय, केवल घृणा औ' दुर्गंध
तेरी रेशमी वह शब्द-संस्कृति अंध
देती क्रोध मुझको, ख़ूब जलता क्रोध
तेरे रक्त में भी सत्य का अवरोध
तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र
तुझको देख मिलती उमड़ आती शीघ्र
तेरे हास में भी रोग-कृमि हैं उग्र
तेरा नाश तुझ पर क्रुद्ध, तुझ पर व्यग्र।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता से धो चलें अविवेक
तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।

ओ काव्यात्मन् फणिधर!

गजानन माधव मुक्तिबोध

एक वे आते होंगे लोग...अरे, जिनके हाथों में तुम्हें सौंपने ही होंगेये मौन उपेक्षित रत्न!मात्र तब तक,केवल तब तकतुम छिपा चलो द्युतिमान् उन्हेंतम-गुहा-तले!ओ, संवेदनमय ज्ञान-नाग...कुंडली मार तुम दबा रखोफूटती हुई रश्मियाँकि यह सच मुश्किल है,किरनों के उजियाले बादल ये निर्मल हैं,फन तक उठतेमेरे मन तक।वल्मीक विभासित है,यह गुहा दमकती भीतर से,देदीप्यमान उस मधुर रश्मि-वर्षा काअसहनीय आनंद दबातुम छिपा चलो जो कुछ तुम हो!यह काल तुम्हारा नहीं!दोकिंतु एकत्र करोप्रज्वलित प्रस्तरों को...वे आते ही होंगे लोगजिन्हें तुम दोगे—देना ही होगा, पूरा हिसाबअपना, सबका, मन का, जन का!तीनउन रत्नों के लिए तुम्हारी व्याकुलतरगति-सरसरजंगल-पारपुरों-नगरों में, आँगन के पीछेकचरे के ढेरों में, जिनकीमैली सतहों में फँसा-दबाचुपचाप धँसाए गए, छिपाए गए रत्न मन के, जन के,जो मूल्य सत्य हैं इस जग के परिवर्तन के!वे विविध असुविधाओं के कारक होने सेनित उपेक्षिता भूमि में फिंके!चारउनके निष्कासक आज सुन रहे हैं—पिछवाड़े ढेरों में खड़खड़,कोई गड़बड़,सर्पिल गति के भूचाल भीति-प्रद अनजाने!“जी नहीं, नहीं, कुछ नहीं, यूँ ही यह मन में खटका——जिस उच्च शिखर कोपश्चिम के भूगोल-शास्त्रियों ने देखा,जिस पर प्रसन्न मुद्रा में आसन जमा लिया,कुछ महामहिम सभ्यों ने दर्शन कमा लिया,वह हो न कहींभू-ज्वाल-विवर—जी नहीं, नहीं कुछ नहीं, यूँ ही यह मन में खटका!”पाँचपिछवाड़े, ढेरों में खड़खड़,कोई गड़बड़,सर-सर करता छत चढ़ा, फाँद दीवार बढ़ावह नागएक भय-जनक श्याम-संवेदन-कोब्रा। कमरों में,लाठियाँ घूमतीं कोठों मेंपर, वह खपरैलों-चढ़ा तेज़ बढ़ता जाताछहलहराओ, लहराओ, नागात्मक कविताओ,झाड़ियों छिपो,उन श्याम झुरमुटों-तले कईमिल जाएँ कहींवे फेंके गए रत्न, ऐसेजो बहुत असुविधाकारक थे,इसलिए कि उनके किरण-सूत्र से होता थापट-परिवर्तन, यवनिका-पतनमन में जग में!ओ काव्यात्मन् फणिधर, अपना फन फैलाओ!मणि-गण को धारण करो, उन्हेंवल्मीक-गुहा में ले जाओ,एकत्र करो...सात...अँधेरे में निकलो, जंगल भटको!गति-सरसर सेखंडहर-पीपल काबड़ा वास्ता है...देखो तो उस ओर,नदी के पार, रास्ता है!वन-तुलसी के तल से निकलो—पाओ वट को!आठउस अंधकार-न्यग्रोध-तले वे कई सो रहे हैं!!ऊपर डालों पर भूतों की-सी परछाईंहिलती, डुलती,नीचे, तल में,पागल स्त्री केस्तन से चिपकीबालक झाईं,जंगल में दूर सियार रो रहे हैं!!लहराओ, लहराओ, ओ मेरी कविताओ!!वट-शाखाओं पर द्रुततर सरसर चढ़ जाओ!!नौउन अंधकार-शाखाओं के पत्राच्छद मेंछिपकर कोईस्वर दबा सिसकती हैदार्शनिक एक आत्मा...जब जीवित थी,आचरण-रहित सोचती रहीअकर्मक विवके-धी,औ’ उदरंभरि पल-क्षण-प्रसार में अटक गईसारे अन्वय-व्यतिरेक-प्रमा-उपपत्ति सहित!!वह श्याम दार्शनिक आत्माअपने जीवन मेंछाया जीवन जीकर भी, उदर-शिश्न के सुखभोगती रही,आध्यात्मिक गहन प्रश्न के सुखभोगती रहीजन-उत्पीड़न विभ्राट्-व्यवस्था के सम्मुख!!उसके आशय का विष पी लोओ काली-काली भान-आगओ नागराज,इस वट की शाखाओं पर तुम करवट बदलो!!दसनीचे उतरो, खुरदुरा अँधेरा सभी ओर,वह बड़ा तना, मोटी डालें,अधजले फिंके कंडे व राखनीचे तल में।वह पागल युवती सोई हैमैली दरिद्र स्त्री अस्त-व्यस्त—उसके बिखरे हैं बाल व स्तन है लटका-सा,अनगिनत वासना-ग्रस्तों का मन अटका था!उनमें जो उच्छृंखल था, विशृंखल भी था,उसने काले पल में इस स्त्री को गर्भ दिया!शोषिता व व्यभिचरिता आत्मा को पुत्र हुआस्तन मुँह में डाल, मरा बालक! उसकी झाईं,अब तक लेटी है पास उसी की परछाईं!!आधुनिक सभ्यता-संकट की प्रतीक-रेखा,उसको मैंने सपनों में कई बार देखा!!ओ नागराज, चुपचाप यहाँ से चल!!ग्यारहयह है अँधियारा कुआँ,करौंदी की झाड़ी मेंछिपी हुई चौड़ी मुँडेरअधटूटी-सी।वीरान महक सूखी-सूनी,ठंडी कन्हेरपर लाल-लाल कुछ फूल,कि यह क्या है!!चुपचाप अँधेरे में उतरो!!कुएँ का गोल तला सूखाजिसमें कचरे के बड़े-बड़े हैं ढेर, अरे!!—यह तो विचित्र है बात,किसी ने आत्मज सद्योजातवहाँ लाकर रक्खा, छोड़ा-त्यागा,शिशु रोता है वह ज़ोर-शोर के साथ!!बारहअरे रे! कौन अभागा वह,जिसने यों आत्मोत्पन्न सत्य त्यागा?किस मौन विवशता के कारण?किसके भय से?पर, भय किसका?कौन-सी क्रांति करने वाला था यह बालक!!चुपचाप सरकते चलो, पास उसके पहुँचो!निज नाग-नेत्र की कोमल द्युतियों सेगीले गुलाब पर मृदु प्रकाश डालो,आक्रोशवती मुख-गरिमा का सौंदर्य देख,आवेग-भरा उल्लास-नृत्यतुम नाच-नाच डालो!!आनंद आदिवासी-नर्तक-सी धूम करो!!अत्यंत तीव्र-गति नाग-नृत्य-मुद्राएँप्रस्तुत करो सबल!प्रस्फूर्त-अश्रुमय नाचो, कविताओं के पल!!तेरहउस शिशु-स्वर से, अर्गला टूटती है,दरवाज़े खुलते हैं,मन मिलते-जुलते हैं।अंतर-आनंद मुक्ति बन बाहर आता है,पल-पल भविष्य उच्छृंखल होता जाता है,आगामी कई हविष्यों के संकेत असाधारणउसके स्वर मेंचौदहमेरे कोब्रा, ओ क्रेट, पुष्ट पायथन,तम-विशेषज्ञ, प्रज्वलंत मन,ओ लहरदार रफ़्तार, स्याह बिजली,भू-लोक-विपथ-विज्ञान-गणित-शास्त्री,तम छायाओं द्वारा प्रकाश-पथ के ज्ञाता,आज की श्याम भूताकृतियों के द्वारा हीकल की प्रकाश छवियों के ओ दर्शन-कर्ता!विष-रासायनिक, चिकित्सक,पंडित कर्कोटक,ओ जिप्सी! जग-पर्यटक अथक,तक्षण मेरे,मेरी छाती से चिपक रक्त का पान करो,अपने विष से मेरे अभ्यंतर प्राण भरो,मेरा सब दुःख पियोसुख पियो, ज्ञान पी लो!पर, पल-भर केवल पल-भर,मानव-रूप धरो!वह शिशु-आक्रोश जी चलो तुम अँधियारे मेंउतरो बेसूझ साँवलेपन में साहस से।वक्ष पर रखो बालक-आत्मा,उस ऊष्म नवल आत्मा से संपर्कान्वित होविश्लेषण करते हुए,स्वप्न देखते हुए,पथ खोज चलो।पथ खोज चलो-सोचते हुए—शायद, सज्जन था व्यक्ति कि जिसके अंतर मेंएक और आत्मा प्रकट हुईप्रज्वलनमयी।पर उसको वह सह नहीं सका,इसलिए कि कोरा और निरा वह सज्जन था!!निज बालक को तम-कूप-विवर में डाल गया!उसके स्वप्नों की ज्यामिति-रेखाएँ नापो,उसके आत्म-स्थित जगत्-गणित को पहचानो,ओ नागात्मे,इन सब रंगों को पीयो, उन्हें विष में परिणतकरके भीतरभोगों थर-थर,भोगो ज़हरीला संवेदन!पर, उससे अधिकाधिक जाग्रत्अधिकाधिक उत्तेजित-आक्रामक हो।सूँघते हुए वीरान हवा,तुम, स्वप्न देखते हुए,मन के मन में विश्लेषण करते हुएझाड़ियों से गुजरो!!पंद्रहरात का समय, वह गाँव, और वह औदुंबर,—गहरा-सा एक स्याह धब्बा!उसके तल में श्रमिक-प्रपा,अंजलि से जल पीने वालेतृषितों के मुख-विगलित जल सेहै भूमि आर्द्र-कोमल अब तक!प्रशांत पल मेंनिःसंग, स्तब्ध, गंभीर सुगंधें लहराती,औ’ वहाँ कहींसाँवली सिवंती, श्याम गुलाब सो रहे हैं,निद्रा में खुला-खुला आँचल,सिरहाने पत्थर हैस्तन उघरा-सा।धीमे चल केशिशु उसके पास रखो धीरे हल्के-हल्के।तुम खड़े रहो चुपचाप!!सिवंती हिली-डुली,बालक के भी मन की कर ली।श्रम-गरिमा का पी दूधसत्य नव-जातविकसता जाएगा।सोलहओ कविताओ!जलमयी मुखाकृति पोंछो मत,रहने दो, बहने दो!!इस तम में कौन देखता है,केवल कुछ तारों के सिवायजो अंधकार में चमक रहे, उस विवेक से जो चिर-तटस्थअच्छे व बुरे के बीच, क्योंउन दोनों के पर, सूक्ष्मवह मात्र स्वार्थ बौना-चपटा,आध्यात्मिक भाष्यों में लिपटा!सत्रहओ काव्यात्मन्, तुम लौट चलो,सौंपकर भार भी, अधिकाधिक गंभीर औरआँखों में आँसू की झाईं,मानो तन है ही नहीं, वरन्चलती है मन की परछाईं,तुम लौटो गुहा-ओर जल्दी—ओ नागात्मन्!अठारहअजीब हुआ,वह भीतर से देदीप्यमान जो रहती थीभू-गर्भ-गुहाअब अँधियारी, काली व स्तब्धनिश्चेतन, जड़, दुःसहा!!अजीब हुआ!!उन्नीसपर, शोक मत करो नागात्मन्...आ गए तुम्हारी अनुपस्थिति में लोगप्रतीक्षा जिनकी थी,ले गए ज्वलत्-द्युति प्रस्तर-घन!!अब उन रत्नों का अर्थ दीप्त होगा,उनका प्रभाव घर-घर में पहुँचेगा फिर से,उनके प्रकाश मेंदीख सकेगा भीषण मुख...वह भीषण मुख उस ब्रह्मदेव काजो रहकर प्रच्छन्न स्वयं,निज अंक-शापिनी दुहिता-पत्नी सरस्वतीया विवेक-धीके द्वारा हीउद्दाम स्वार्थ या सूक्ष्म आत्म-रति का प्रचारकर, भटकाताविक्षुब्ध जगत् को, उसके अपने से हीकाटकर अलग,फेंककर पृथक्,उन दोनों को दूर परस्पर से, तुरंतअपने को स्वयं चूम जाता!उस ब्रह्मदेव का टेढ़ा मुँहजग देख चुकेगा पूरा ही।उस ब्रह्मदेव का दर्शन सभी कर सकेंगे,जिसकी छत्रच्छाया में रहअधिकाधिक दीप्तिमान होतेघन के श्रीमुख,पर, निर्धन एक-एक सीढ़ी नीचे गिरते जातेउस ब्रह्मदेव का विवेक-दर्शनहोगा उद्घाटित पूरा!ओ नागात्मन्,संक्रमण-काल में धीर धरो,ईमान न जाने दो!!तुम भटक चलो,इन अंधकार-मैदानों में सरसर करते!!शत-उपेक्षिता भूमि में फिंकेचुपचाप छिपाए गएशुक्र, गुरु, बुध-मंगलकचरे की परतों-ढँके, तुम्हें मिल जाएँगे!!खोदो, जड़ मिट्टी को खोदो!ओ भूगर्भ-शास्त्री,भीतर का बाहर काव्यापक सर्वेक्षण कर डालो।

मुझे पुकारती हुई पुकार

गजानन माधव मुक्तिबोध

मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...
प्रलंबिता अंगार रेख-सा खिंचा
अपार चर्म
वक्ष प्राण का
पुकार खो गई कहीं बिखेर अस्थि के समूह
जीवनानुभूति की गंभीर भूमि में।
अपुष्प-पत्र, वक्र-श्याम झाड़-झंखड़ों-घिरे असंख्य ढूह
भग्न निश्चयों-रुँधे विचार-स्वप्न-भाव के
मुझे दिखे
अपूर्त सत्य की क्षुधित
अपूर्ण यत्न की तृषित
अपूर्त जीवनानुभूति-प्राणमूर्ति की समस्त भग्नता दिखी
(कराह भर उठा प्रसार प्राण का अजब)
समस्त भग्नता दिखी
कि ज्यों विरक्त प्रांत में
उदास-से किसी नगर
सटर-पटर
मलीन, त्यक्त, ज़ंग-लगे कठोर ढेर—
भग्न वस्तु के समूह
चिलचिल रहे प्रचंड धूप में उजाड़...
दिख गए कठोर स्याह
(घोर धूप में) पहाड़
कठिन-सत्त्व भावना नपुंसका असंज्ञ के
मुझे दिखी विराट् शून्यता अशांत काँपती
कि इस उजाड़ प्रांत के प्रसार में रही चमक।
रहा चमक प्रसार...
फाड़ श्याम-मृत्तिका-स्तरावरण उठे सकोण
प्रस्तरी प्रतप्त अंग यत्र-तत्र-सर्वतः
कि ज्यों ढँकी वसुंधरा-शरीर की समस्त अस्थियाँ खुलीं
रहीं चमक कि चिलचिला रही वहाँ
अचेत सूर्य की सफ़ेद औ' उजाड़ धूप में।
समीर-हीन ख़ैबरी
अशांत घाटियों गई असंग राह
शुष्क पार्वतीय भूमि के उतार औ' उठान की निरर्थ
उच्चता निहारती चली वितृष्ण दृष्टि से
(कि व्यर्थ उच्चता बधिर असंज्ञ यह)
उजाड़ विश्व की कि प्राण की
इसी उदास भूमि में अचक जगा
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं।
दरार पड़ गई तुरत गभीर-दीर्घ
प्राण की गहन धरा प्राप्त के
अनीर श्याम मृत्तिका शरीर ये
कि भाव स्वप्न भार में
पुकार के अधीर व्यग्र स्पर्श से बिलख उठे
तिमिर-विवर में पड़ी अशांत नागिनी—
छिपी हुई तृषा
अपूर्त स्वप्न-लालसा
तुरत दिखी
कि भूल-चूक ध्वंसिनी अनावृता हुई।
पुकार ने समस्त खोल दी छिपी प्रवंचना
कहा कि शुष्क है अथाह यह कुआँ
कि अंधकार-अंतराल में लगे
महीन श्याम जाल
घृण्य कीट जो कि जोड़ते दिवाल को दिवाल से
व अंतराल का तला
अमानवी कठोर ईंट-पत्थरों से भरा हुआ
न नीर है, न पीर है, मलीन है
सदा विशून्य शुष्क ही कुआँ रहा।
विराट् झूठ के अनंत छंद-सी
भयावनी अशांत पीत धुंध-सी
सदा अगेय
गोपनीय द्वंद्व-सी असंग जो अपूर्त-स्वप्न-लालसा
प्रवेग में उड़े सुतीक्ष्ण बाण पर
अलक्ष्य भार-सी वृथा
जगा रही विरूप चित्र हार का
सधे हुए निजत्व की अभद्र रौद्र हार-सी।
मैं उदास हाथ में
हार की प्रतप्त रेत मल रहा
निहारता हुआ प्रचंड उष्ण गोल दूर के क्षितिज।
शून्य कक्ष की उदास
श्वासहीन, पीत-वायु शांति में
दिवाल पर
सचेष्ट छिपकली
अजान शब्द-शब्द ज्यों करे
कि यों अपार भाव-स्वप्न-भार ये
प्रशांति गाढ़ में
प्रशांति गाढ़ से
प्रगाढ़ हो
समस्त प्राण की कथा बखानते
अधीर यंत्र-वेग से अजीब एक-रूप-तान
शब्द, शब्द, शब्द में।
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई कहीं...
आज भी नवीन प्रेरणा यहाँ न मर सकी,
न जी सकी, परंतु वह न डर सकी।
घनांधकार के कठोर वक्ष
दंश-चिह्न-से
गभीर लाल बिंब प्राण-ज्योति के
गभीर लाल इंदु-से
सगर्व भीम शांति में उठे अयास मुस्कुरा
घनांधकार की भिदी परंपरा।
सफ़ेद राख के अचेत शीत
सर्व ओर रेंगते प्रसार में
दबी हुई अनंत ज्योति जग उठी
मलीन मृत्यु-गीत के उदास छंद बावरे
घनांधकार के भुजंग-बंध दीर्घ साँवरे
विनष्ट हो गए
प्रबुद्ध ज्वाल में हताश हो।
विशाल भव्य वक्ष से
बही अनंत स्नेह की महान् कृतिमयी व्यथा
बही अशांत प्राण से महान् मानवी कथा।
किसी उजाड़ प्रांत के
विशाल रिक्त-गर्भ गुंबजों घिरे
विहंग जो
अधीर पंख फड़फड़ा दिवाल पर
सहाय-हीन, बद्ध-देह, बद्ध-प्राण
हारकर न हारते
अरे नवीन मार्ग पा खुला हुआ
तुरंत उड़ गए सुनील व्योम में अधीर हो।
मुझे पुकारती हुई पुकार खो गई वहीं
सँवारती हुई मुझे
उठी सहास प्रेरणा।
प्रभात भैरवी जगी अभी-अभी।

चकमक की चिनगारियाँ

गजानन माधव मुक्तिबोध

एकअधूरी और सतही ज़िंदगी के गर्म रास्तों परहमारा गुप्त मननिज में सिकुड़ता जा रहाजैसे कि हब्शी एक गहरा स्याहगोरों की निगाहों से अलग ओझलसिमिटकर सिफ़र होना चाहता हो जल्द!!मानो क़ीमती मज़मूनगहरी, गैर क़ानूनी किताबों, ज़ब्त पर्चों को।कि पाबंदी लगे-से भेद-सा बेचैनदिल का ख़ूनजो भीतरहमेशा टप्प टप कर टपकता रहतातड़पते-से ख़यालों पर।यही कारण कि सिमटा जा रहा-सा हूँ।स्वयं की छाँह की भी छाँह-सा बारीकहोकर छिप रहा-सा हूँ।समझदारी व समझौतेविकट गड़ते।हमारे आपके रास्ते अलग होते।व पल-भर, मात्रआत्मालोचनात्मक स्वर प्रखर होता।दोअधूरी और सतही ज़िंदगी के गर्म रास्तों पर,अचानक सनसनी भौंचककि पैरों के तलों को काट-खाती कौन-सी यह आग?जिससे नच रहा-सा हूँ,खड़ा भी हो नहीं सकता, न चल सकता।भयानक, हाय, अंधा दौरजिंदा छातियों पर और चेहरों परकदम रखकरचले हैं पैर!अनगिन अग्निमय तन-मन व आत्माएँव उनकी प्रश्न-मुद्राएँ,हृदय की द्युति-प्रभाएँ,जन-समस्याएँकुचलता चल निकलता हूँ।इसी से, पैर-तलुओं मेंनुकीला एक कीला तेज़गहरा गड़ गया औ’ धँस घुस आया,लगी है झनझनाती आग,लाखों बर्र-काँटों ने अचानक काट खाया है।व्रणाहत पैर को लेकरभयानक नाचता हूँ, शून्यमन के टीन-छत पर गर्म।हर पल चीख़ता हूँ, शोर करता हूँकि वैसी चीख़ती कविता बनाने में लजाता हूँ।तीनइतने में अँधेरी दूरियों में सेउभरता एककोई श्याम, धुँधला हाथ,सहसा कनपटी पर ज़ोर से आघात।आँखों-सामने विस्फोट,तारा एक वह टूटा,दमकती लाल-नीली बैंगनीपीली व नारंगीअनगिनत चिनगारियाँ बिखरासितारा दूर वह फूटा।कि कंधे से अचानक सिरउड़ा, ग़ायब हुआ (जो शून्य यात्रा में स्वगत कहता—)अरे! कब तक रहोगे आप अपनी ओट!उड़ता ही गया वह, दीर्घ वृत्ताकारपथ से जा गिरा,उस दूर जंगल केकिसी गुमनाम गड्ढे में,(स्वगत स्वर ये—कहाँ मिल पाओगे उनसेकि जिनमें जनम ले, निकले)कि गिरते ही भयानक ‘खड्ड’सिर की थाह में से तबअचानक ज़ोर से उछलाचमकते रत्नबिखेरे श्याम गह्वर में।(कि इतनी मार खाई, तब कहीं वेस्पष्ट उद्घाटित हुए उत्तर)चारपरम आश्चर्य!उस गुमनाम खड्डे के अँधेरे मेंखुले हैं लाल-पीले-चमकते नक़्शे,खुली जुग्राफ़िया-हिस्टरी,खुले हैं फ़लसफ़े के वर्क़ बहुतेरेकि जिनकी पंक्तियों में सेउमड़ उठतेसमूची क्षुब्ध पृथ्वी केअनेकों कुछ गहरे सागरोंकि छटपटाते साँवले छींटेबरसते जा रहे हैंगीली हो रही हैं देश-देशों कीघनी बेचैन छायाएँ(यहाँ दिल के बड़े गड्ढों)पाँचअचानक आसमानी फ़ासलों में सेगुज़रते चाँद ने वह तम-विवर देखा,लिफ़ाफ़ा एक नीला दूर से फेंका,व पल ठिठका।कि इतने में अँधेरे तंग कोने सेनिकल बाहर,किसी ने बहुत आतुर हो,पढ़े अक्षर, पढ़े फिर-फिर!!वह अर्थों के घने, कोमलधुँधलके तैर आए औरमन की खिड़कियों में से घुसे भीतरव दिल में छा गए वे आसमानी रंग।लिखा था यह—अरे! जन-संग-ऊष्मा केबिना, व्यक्तित्व के स्तर जुड़ नहीं सकते!प्रयासी प्रेरणा के स्त्रोत,सक्रिय वेदना की ज्योति,सब साहाय्य उनसे लो।तुम्हारी मुक्ति उनके प्रेम से होगी।कि तद्गत लक्ष्य में से हीहृदय के नेत्र जागेंगे,वह जीवन-लक्ष्य उनके प्राप्तकरने की क्रिया में सेउभर-ऊपरविकसते जाएँगे निज केतुम्हारे गुणकि अपनी मुक्ति के रास्तेअकेले में नहीं मिलतेछहसुनकर यह, अचानक दीख पड़ती है!हृदय की श्याम लहरों केअतल में कुछसुनहली केंद्र थर-थर-सी,व उन अति सूक्ष्म केंद्रों मेंनिकट की दूर कीआकाश तारा-रश्मियाँ चमकींअनल-वर्षी।महत् संभावनाओं की उजलती एक रेखा है,जिसे मैंनेयहाँ आ ख़ूब देखा है।अरे! मेरे तिमिर-गह्वर कगारों परअचानक खिल उठी प्राचीन——अभिनव गंधमय तुलसीकि जिसके सघन-छाया-अंतरालों सेकिसी का श्याम भोला मुख (बहुत प्यारा)मुझे दिखताकि पाता हूँ—मुझे ही देखती रहतीमनो-आकार-चित्रा वह सुनेत्रा है।तड़पते तम विवर के उन कगारों परचमेली की कुंद कलियाँकि वे तारों-भरे व्यक्तित्व,मन के श्याम द्वारों परअभी भी हैं प्रतीक्षा में!!पुकारूँ? क्या करूँ!! लेकिनहृदय काला हुआ जीवन-समीक्षा में।महकती चाँदनी की यहप्रकाशित नीलिमा पीलीकि जिसके बीच मेरा गर्त-गह्वर घरभयानक स्याह धब्बे-सा।अतः, मैं कुंद-कलियों से बिचकता हूँ,हिचकता हूँ।कि इतने में घनी आवाज़ आती है—तुम्हारे तम-विवर के तटपुनः अवतार धारण कर,मनस्वी आत्माएँ और प्रतिभाएँपधारीं विविध देशों सेतुम्हारा निज-प्रसारण कर।सातनभ-स्पर्शी हवाओं में किसी पुनरागताध्वनि-सा तरंगित हो,सिविल लाइंस के सूने,पुराने एक बरगद पास स्पंदित होउसी के पत्र मर्मर में बिखरकर मैंतुरत अपने अकेले स्याहकुट्ठर में पहुँचता हूँ।बड़ा अचरज!कि जब मैं ग़ैर-हाज़िर, तोयहाँ पर एक हाज़िर है।—अँधेरे में,अकेली एक छाया-मूर्तिकोई लेखटाइप कर रही तड़-तड़ तड़ातड़-तड़व उसमें से उछलते हैंघने नीले-अरुण चिनगारियों के दल!!लुमुंबा है,वहाँ अल्जीरिया-लाओस-क्यूबा हैहृदय के रक्त-सर में, सूर्य-मणि-सा ज्ञान डूबा हैदिमाग़ी रग फड़कती है, फड़कती है,व उसमें से भभकतातड़फता-सा दुःख बहता है!!आठइतने में,समुंदर में कहीं डूबी हुई जो पुण्य-गंगा वहअचानक कूच करती सागरी तल सेउभर ऊपरभयानक स्याह बादल-पाँत बनकरफन उठाती है दिशाओं में।(व मेरे कुंद कमरे के अँधेरे मेंनिरंतर गूँजती तड़-तड़-तड़ातड़ तेज़)बाहर धूल में भी शब्द गड़ते हैंकि टाइप कर रहा है आसमानी हाथतिरछी मार छींटों की!घटाओं की गरज में,बिजलियों की चमचमाहट में,अँधेरी आत्म-संवादी हवाओं सेचपल रिमझिमदमकते प्रश्न करती है—मेरे मित्र,कुहरिल गत युगों के अपरिभाषितसिंधु में डूबीपरस्पर, जो कि मानव-पुण्य धारा है,उसी के क्षुब्ध काले बादलों को साथ लाई हूँ,बशर्ते तय करो,किस ओर हो तुम, अबसुनहले ऊर्ध्व-आसन केदबाते पक्ष में, अथवाकहीं उससे लुटी-टूटीअँधेरी निम्न-कक्षा में तुम्हारा मन,कहाँ हो तुम?हृदय में प्राकृतिक जो मूलमानव-न्याय संवेदनकभी बेचैन व्याकुल होतुम्हें क्या ले गया उस तट,जहाँ उसने तुम्हारे मन व आत्मा कोसमझकर श्वेत चकमक के घने टुकड़ेपरस्पर तड़ातड़ तेज़ दे रगड़ाकि उससे आग पैदा कीव हर अंगार में से एकजीवन-स्वप्न चमका औरतड़पा ज्ञान!!नौअचानक आसमानी फ़ासलों में सेचतुर संवाददाता चाँद ऐसे मुस्कुराता हैकि मेरे स्याह चेहरे परनिलाई चमचमाती है!!समुंदर है, समुंदर है!!गरजती इन उफ़नती में मैंकिसी वीरान टॉवर कीअँधेरी भीतरी गोलाइयों के बीचचक्करदार ज़ीना एक चढ़ता हूँ, उतरता हूँ।धपाधप पैर की आवाज़है नाराज़ निज से ही।फ़िरंगी, पुर्तगाली या कि ओलंदेज़ या अँगरेज़दरियाई लुटेरों के लिए जो एकतूफ़ानी समुंदर के गरजते मध्य में उठकरपुराने रोशनी-घर कीअँधेरी एक है मीनारउसमें आज मेरी रूह फिरती हैअनेकों मंज़िलों के तंग घेरों मेंघने धब्बेकि सदियों का पुराना मेल—लेटे धूल-खाते प्रेतजिनकी हड्डियों के हाथ में पीलेदबे काग़ज़भयानक चिट्ठियों का जाल,रॉयफल-गोलियों का कारतूसी ढेरफैले युद्ध के नक़्शे;समुद्री पक्षियों की उग्र, जंगली आँख,भीषण गंध घोंसलों में सेकि जिनमें पंख-दल की वे—घनी भीतें लटकती हैं।कि मैं सब पत्र-पुस्तक पढ़पुरानी रक्त-इतिहासी भयानकताजिए जाता।कि इतने में, कहीं से चोर आवाज़ेंविलक्षण सीटियाँ, खड़के,अनेकों रेडियो के गुप्त संदेशों-भरे षड्यंत्रजासूसी तहलके औ’ मुलाक़ातें।व उनको बीच में हीतोड़ने के, मोड़ने के तंत्र,तहख़ाने कि जिनमें ढेर ऐटम-बम!!कहाँ हो तुम, कहाँ हैं हम?प्रशोषण-सभ्यता की दुष्टता के भव्य देशों मेंग़रीबिन जो कि जनता है,उसी में से कई मल्लाह आते हैं यहाँ पर भीव, चोरी से, उन्हीं से हीमुझे सब-सूचनाएँ, ज्ञान मिलता है,कि वे तो दे गए हैं, अद्यतन सब शास्त्रमेरा भी सुविकसित हो गया है मनव मेरे हाथ में हैं क्षुब्ध सदियों केविविध-भाषी विविध-देशीअनेकों ग्रंथ-पुस्तक-पत्रसब अख़बार जिनमें मगन होकर मैंजगत्-संवेदनों से आगमिष्यत् केसही नक़्शे बनाता हूँ।मुझे मालूम,अनगिन सागरों के क्षुब्ध कूलों परपहाड़ो-जंगलों में मुक्तिकामी लोक-सेनाएँभयानक वार करतीं शत्रु-मूलों परव मेरे स्याह बालों में उलझता औरचेहरे पर लहरता हैउन्हीं का अग्नि-क्षोभी धूम!!मुझे मालूम,कैसी विश्व-घटनात्मकसघन वातावरण में,विचारों और भावों का कहाँ क्या काम,कब वह वचना का एक साधक अस्त्र,कब वह ज्ञान का प्रतिरूप!!यद्यपि मैं यहाँ पर हूँसभी देशों, हवाओं, सागरों पर अनदिखाउड़ता हुआ स्वर हूँ...मेरे सामने है प्रश्न,क्या होगा कहाँ किस भाँति,मेरे देश भारत में,पुरानी हाय में सेकिस तरह से आग भभकेगी,उड़ेंगी किस तरह भक् सेहमारे वक्ष पर लेटी हुईविकराल चट्टोंव इस पूरी क्रिया में सेउभरकर भव्य होंगे, कौन मानव-गुण?अँधेरे-ध्वस्त टॉवर केतले में भव्य चट्टोंगरजती क्षुब्ध लहरों को पकड़कर चूमऐसी डूबती उनमेंकि सागर की ज़बर्दस्तीउन्हें बेहद मज़ा देती।भयानक भव्य आंदोलन समुद्रों काहृदय में गूँजता रहता।गरजती स्याह लहरों मेंतड़कते-टूटते नीले चमकते काँच,अनगिन चंद्रमाओं के छितरते बिंब।फेनायित निरंतर एकता का बोधजिसकी घोर आवाज़ेंसमुंदर के तले के अंधकारों से उमड़ती हैं।पुराने रोशनी-घर के अँधेरे शून्य-टॉवर सेअचानक एक खिड़की खोलनीली तेज़ किरणें कुछ निकलती हैं।वहाँ हूँ मैंखड़ा हूँ,मुस्कुराता फेंकता अपनेचमकते चिह्न,मीलों दूर तक, उन स्याह लहरों परकि सूनी दूरियों के बीच रहकर भीजगत् से आत्म-संयोगीउपस्थित हूँ।प्रतीकों और बिंबों केअसंवृत रूप में भी रहहमारी ज़िंदगी है यह।जहाँ पर धूल के भूरे गरम फैलावपर, पसरीं लहरती चादरेंबेथाह सपनों की।जहाँ पर पत्थरों के सिर,ग़रीबी के उपेक्षित श्याम चेहरों कीदिलाते याद।टूटी गाड़ियों के साँवले चक्केदिखें तो मूर्त होते आज के धक्केभयानक बदनसीबी के।जहाँ सूखे बबूलों की कँटीली पाँतभरती है हृदय में धुंध-डूबा दुःख,भूखे बालकों के श्याम चेहरों साथमैं भी घूमता हूँ शुष्क,आती याद मेरे देश भारत की।अरे! मैं नित्य रहता हूँ अँधेरे घरजहाँ पर लाल ढिबरी-ज्योति के सिर परकसकते स्वप्न मँडराते।दसकि मानो या न मानो तुम...अधूरी और सतही ज़िंदगी में भीजगत्-पहचानते, मन-जानतेजी-माँगते तूफ़ान आते हैं।व उनके धूल-धुँधले, कर्ण-कर्कशगद्य-छंदों मेंतड़पते भान, दुनिया छान आते हैं।भयानक इम्तिहानों के तजुर्बों सेमरे जो दर्दवाले, ज्ञानवालेजो-पिलाते, मन-मिलाते दिलजगत् के भव्य भावोद्दंड तूफ़ानीसुरों से सुर मिला, अगलेकिन्हीं दुर्घट, विकट घटना-क्रमों का एकपूरा चित्र-स्वर संगीतप्रस्तुत करव उनके ऊष्म अर्थों के धुँधलकों मेंमगन होकरनभो-आलाप लेते हैंव उनके मित्र, सह-अनुभव-व्यक्तिस्वरकार या वादक—तजुर्बेकार साज़िंदेख़्यालों के उमड़ते दौर में से सहसानिजी रफ़्तार इतनी तेज़ करते हैं—थपाथप पीटते हैं ज़ोर से तबला ढपाढप, औरझंकृत नाद-गतियों की गगन में थामतुम-तुम-तोम तंबूरे,विलक्षण भोग अपनी वेदना के क्षण,मिलाते सुर हवाओं से,कि बिल्डिंग गूँजती है, काँप जाती है।दिवालें ले रहीं आलाप,पत्थर गा रहे हैं तेज़,तूफ़ानी हवाएँ धूम करती गूँजती रहतीं।उखड़ते चौखटों में हीखड़ाखड़ खिड़कियाँ नचतीं,भड़ाभड़ सब बजा करते खड़े बेडोल दरवाज़े।व बाहर के पहाड़ी पेड़जड़ में जम,भयानक नाचने लगते।विलक्षण गद्य-संगीतावली की सृष्टि होती है।अचानक हो गई बरख़ास्त मानो आजअत्याचार की सरकारजाने देश में किस ध्वस्त,शहरी रास्तों पर भीड़ से मुठभेड़।जमकर पत्थरों की चीख़ती बारिशव रॉयफल-गोलियों के तेज़ नारंगीधड़ाकों में उभड़ती आग की बौछार।ग्यारहमुझ पर क्षुब्ध बारूदी धुएँ की झार आती हैव उन पर प्यार आता हैकि जिनका तप्त मुखसँवला रहा हैधूम लहरों मेंकि जो मानव भविष्यत्-युद्ध में रत है,जगत् की स्याह सड़कों पर।कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता मेंसभी प्रश्नोत्तरी की तुंग प्रतिमाएँगिराकर तोड़ देता हूँ हथौड़े सेकि वे सब प्रश्न कृत्रिम औरउत्तर और भी छलमय,समस्या एक—मेरे सभ्य नगरों और ग्रामों मेंसभी मानवसुखी, सुंदर व शोषण-मुक्तकब होंगे?कि मैं अपनी अधूरी दीर्घ कविता मेंउमगकर,जन्म लेना चाहता फिर से,कि व्यक्तित्वांतरित होकर,नए सिरे से समझना और जीनाचाहता हूँ, सच!!बारहनहीं होती, कहीं भी ख़तम कविता नहीं होतीकि वह आवेग-त्वरित काल-यात्री है।व मैं उसका नहीं कर्ता,पिता-धाताकि वह अभी दुहिता नहीं होती,परम स्वाधीन है, वह विश्व-शास्त्री है।गहन गंभीर छाया आगमिष्यत् कीलिए, वह जन-चरित्री है।नए अनुभव व संवेदननए अध्याय-प्रकरण जुड़तुम्हारे कारणों से जगमगाती हैव मेरे कारणों से सकुच जाती है।कि मैं अपनी अधूरी बीड़ियाँ सुलगा,ख़्याली सीढ़ियाँ चढ़करपहुँचता हूँनिखरते चाँद के तल पर,अचानक विकल होकर तब मुझी से लिपट जाती है।

एक भूतपूर्व विद्रोही का आत्म-कथन

गजानन माधव मुक्तिबोध

दु:ख तुम्हें भी है,
दु:ख मुझे भी।
हम एक ढहे हुए मकान के नीचे
दबे हैं।
चीख़ निकलना भी मुश्किल है,
असंभव...
हिलना भी।
भयानक है बड़े-बड़े ढेरों की
पहाड़ियों-नीचे दबे रहना और
महसूस करते जाना
पसली की टूटी हुई हड्डी।
भयंकर है! छाती पर वज़नी टीलों
को रखे हुए
ऊपर के जड़ीभूत दबाव से दबा हुआ
अपना स्पंद
अनुभूत करते जाना,
दौड़ती रुकती हुई धुकधुकी
महसूस करते जाना भीषण है।
भयंकर है।
वाह क्या तजुर्बा है!!
छाती में गड्ढा है!!
पुराना मकान था, ढहना था, ढह गया,
बुरा क्या हुआ?
बड़े-बड़े दृढ़ाकार दंभवान
खंभे वे ढह पड़े!!
जड़ीभूत परतों में, अवश्य, हम दब गए।
हम उनमें रह गए,
बुरा हुआ, बहुत बुरा हुआ!!
पृथ्वी के पेट में घुसकर जब
पृथ्वी के हृदय की गरमी के द्वारा सब
मिट्टी के ढेर ये चट्टान बन जाएँगे
तो उन चट्टानों की
आंतरिक परतों की सतहों में
चित्र उभर आएँगे
हमारे चेहरे के, तन-बदन के, शरीर के,
अंतर की तस्वीरें उभर आएँगी, संभवतः,
यही एक आशा है कि
मिट्टी के अँधेरे उन
इतिहास-स्तरों में तब
हमारा भी चिह्न रह जाएगा।
नाम नहीं,
कीर्ति नहीं,
केवल अवशेष, पृथ्वी के खोदे हुए गड्ढों में
रहस्यमय पुरुषों के पंजर और
ज़ंग-खाई नोकों के अस्त्र!!
स्वयं कि ज़िंदगी फ़ॉसिल कभी
नहीं रही,
क्यों हम बाग़ी थे,
उस वक़्त,
जब रास्ता कहाँ था?
दीखता नहीं था कोई पथ।
अब तो रस्ते-ही-रस्ते हैं।
मुक्ति के राजदूत सस्ते हैं।
क्योंकि हम बाग़ी थे,
आख़िर, बुरा क्या हुआ?
पुराना महल था,
ढहना था, ढहना गया।
वह चिड़िया,
उसका वह घोंसला...
जाने कहाँ दब गया।
अँधेरे छेदों में चूहे भी मर गए,
हमने तो भविष्य
पहले कह रखा था कि-
केंचुली उतारता साँप दब जाएगा अकस्मात्,
हमने तो भविष्य पहले कह रखा था!
लेकिन अनसुनी की लोगों ने!!
वैसे, चूँकि
हम दब गए, इसलिए
दु:ख तुम्हें भी है,
मुझे भी।
नक्षीदार कलात्मक कमरे भी ढह पड़े,
जहाँ एक ज़माने में
चूमे गए होंठ,
छाती जकड़ी गई आवेशालिंगन में।
पुरानी भीतों की बास मिली हुई
इक महक तुम्हारे चुंबन की
और उस कहानी का अंगारी अंग-स्पर्श
गया, मृत हुआ!
हम एक ढहे हुए
मकान के नीचे दबे पड़े हैं।
हमने पहले कह रखा था महल गिर
जाएगा।
ख़ूबसूरत कमरों में कई बार,
हमारी आँखों के सामने,
हमारे विद्रोह के बावजूद,
बलात्कार किए गए
नक्षीदार कक्षों में।
भोले निर्व्याज नयन हिरनी-से
मासूम चेहरे
निर्दोष तन-बदन
दैत्यों की बाँहों के शिकंजों में
इतने अधिक
इतने अधिक जकड़े गए
कि जकड़े ही जाने के
सिकुड़ते हुए घेरे में वे तन-मन
दबते-पिघलते हुए एक भाप बन गए।
एक कुहरे की मेह,
एक धूमैला भूत,
एक देह-हीन पुकार,
कमरे के भीतर और इर्द-गिर्द
चक्कर लगाने लगी।
आत्म-चैतन्य के प्रकाश--
भूत बन गए।
भूत-बाधा-ग्रस्त
कमरों को अंध-श्याम साँय-साँय
हमने बताई तो
दंड हमीं को मिला,
बाग़ी करार दिए गए,
चाँटा हमीं को पड़ा,
बंद तहख़ाने में--कुओं में फेंके गए,
हमीं लोग!!
क्योंकि हमें ज्ञान था,
ज्ञान अपराध बना।
महल के दूसरे
और-और कमरों में कई रहस्य--
तकिए के नीचे पिस्तौल,
गुप्त ड्रॉअर,
गद्दियों के अंदर छिपाए-सिए गए
ख़ून-रंगे पत्र, महत्त्वपूर्ण!!
अजीब कुछ फ़ोटो!!
रहस्य-पुरुष छायाएँ
लिखती हैं
इतिहास इस महल का।
अजीब संयुक्त परिवार है--
औरतें व नौकर और मेहनतकश
अपने ही वक्ष को
खुरदुरा वृक्ष-धड़
मानकर घिसती हैं, घिसते हैं
अपनी ही छाती पर ज़बर्दस्ती
विष-दंती भावों का सर्प-मुख।
विद्रोही भावों का नाग-मुख।
रक्त लुप्त होता है!
नाग जकड़ लेता है बाँहों को,
किंतु वे रेखाएँ मस्तक पर
स्वयं नाग होती हैं!
चेहरे के स्वयं भाव सरीसृप होते हैं,
आँखों में ज़हर का नशा रंग लाता है।
बहुएँ मुँडेरों से कूद अरे!
आत्महत्या करती हैं!!
ऐसा मकान यदि ढह पड़ा,
हवेली गिर पड़ी
महल धराशायी, तो
बुरा क्या हुआ?
ठीक है कि हम भी तो दब गए,
हम जो विरोधी थे
कुओं-तहख़ानों में क़ैद-बंद
लेकिन, हम इसलिए
मरे कि ज़रूरत से
ज़्यादा नहीं, बहुत-बहुत कम
हम बाग़ी थे!!
मेरे साथ
खंडहर में दबी हुई अन्य धुकधुकियों,
सोचो तो
कि स्पंद अब...
पीड़ा-भरा उत्तरदायित्व-भार हो चला,
कोशिश करो,
कोशिश करो,
जीने की,
ज़मीन में गड़कर भी।
इतने भीम जड़ीभूत
टीलों के नीचे हम दबे हैं,
फिर भी जी रहे हैं।
सृष्टि का चमत्कार!!
चमत्कार प्रकृति का ज़रा और फैलाए।
सभी कुछ ठोस नहीं खँडेरों में।
हज़ारों छेद, करोड़ों रंध्र,
पवन भी आता है।
ऐसा क्यों?
हवा ऐसा क्यों करती है?
ऑक्सीजन
नाक से
पी लें ख़ूब, पी लें!
आवाज़ आती है,
सातवें आसमान में कहीं दूर
इंद्र के ढह पड़े महल के खंडहर को
बिजली कि गेतियाँ व फावड़े
खोद-खोद
ढेर दूर कर रहे।
कहीं से फिर एक
आती आवाज़--
'कई ढेर बिलकुल साफ़ हो चुके'
और तभी--
किसी अन्य गंभीर-उदात्त
आवाज़ ने
चिल्लाकर घोषित किया--
''प्राथमिक शाला के
बच्चों के लिए एक
खुला-खुला, धूप-भरा साफ़-साफ़
खेल कूद-मैदान सपाट अपार-
यों बनाया जाएगा कि
पता भी न चलेगा कि
कभी महल था यहाँ भगवान् इंद्र का''
हम यहाँ ज़मीन के नीचे दबे हुए हैं।
गड़ी हुई अन्य धुकधुकियो,
ख़ुश रहो
इसी में कि
वक्षों में तुम्हारे अब
बच्चे ये खेलेंगे।
छाती की मटमैली ज़मीनी सतहों पर
मैदान, धूप व खुली-खुली हवा ख़ूब
हँसेगी व खेलेगी।
किलकारी भरेंगे ये बालगण।
लेकिन, दबी धुकधुकियो,
सोचो तो कि
अपनी ही आँखों के सामने
ख़ूब हम खेत रहे!
ख़ूब काम आए हम!!
आँखों के भीतर की आँखों में डूब-डूब
फैल गए हम लोग!!
आत्म-विस्तार यह
बेकार नहीं जाएगा।
ज़मीन में गड़े हुए देहों की ख़ाक से
शरीर की मिट्टी से, धूल से।
खिलेंगे गुलाबी फूल।
सही है कि हम पहचाने नहीं जाएँगे।
दुनिया में नाम कमाने के लिए
कभी कोई फूल नहीं खिलता है
हृदयानुभव-राग अरुण
गुलाबी फूल, प्रकृति के गंध-कोष
काश, हम बन सकें!

बेचैन चील

गजानन माधव मुक्तिबोध

बेचैन चील!!
उस-जैसा मैं पर्यटनशील
प्यासा-प्यासा,
देखता रहूँगा एक दमकती हुई झील
या पानी का कोरा झाँसा
जिसकी सफ़ेद चिलचिलाहटों में है अजीब
इनकार एक सूना!!

एक अंत:कथा

गजानन माधव मुक्तिबोध

अग्नि के काष्ठ
खोजती माँ
बीनती नित्य सूखे डंठल
सूखी टहनी, रूखी डालें
घूमती सभ्यता के जंगल
वह मेरी माँ
खोजती अग्नि के अधिष्ठान
मुझमें दुविधा
पर माँ की आज्ञा से समिधा
एकत्र कर रहा हूँ
मैं हर टहनी में डंठल में
एक-एक स्वप्न देखता हुआ
पहचान रहा प्रत्येक
जतन से जमा रहा
टोकरी उठा, मैं चला जा रहा हूँ
टोकरी उठाना... चलन नहीं
वह फ़ैशन के विपरीत
इसलिए निगाहें बचा-बचा
आड़े-तिरछे चलता हूँ मैं
संकुचित और भयभीत
अजीब-सी टोकरी
कि उसमें प्राणवान् माया
गहरी कीमिया
सहज उभरी फैली-सँवरी
डंठल-टहनी की कठिन साँवली रेखाएँ
आपस में लग यों गुँथ जातीं
मानो अक्षर नवसाक्षर खेतिहर के-से
वे बेढब वाक्य फुसफुसाते
टोकरी विवर में से स्वर आते दबे-दबे
मानो कलरव गा उठता हो धीमे-धीमे
अथवा मनोज्ञ शत रंग-बिरंगी विहंग गाते हों
आगे-आगे माँ
पीछे मैं;
उसकी दृढ़ पीठ ज़रा-सी झुक
चुन लेती डंठल, पल-भर रुक
वह जीर्ण नील वस्त्र
है अस्थि-दृढ़
गतिमती व्यक्तिमत्ता
कर रहा अध्ययन मैं उसकी मज़बूती का
उसके जीवन से लगे हुए
वर्षा गरमी सर्दी और क्षुधा-तृषा के वर्षों से
मैं पूछ रहा—
टोकरी विवर में पक्षी स्वर
कलरव क्यों हैं
माँ कहती—
सूखी टहनी की अग्नि-क्षमता
ही गाती है पक्षी स्वर में
वह बंद आग है खुलने को।
मैं पाता हूँ
कोमल कोयल अतिशय प्राचीन
व अति नवीन
स्वर में पुकारती है मुझको
टोकरी विवर के भीतर से।
पथ पर ही मेरे पैर थिरक उठते
कोमल लय में।
मैं साश्रुनयन, रोमांचित तन, प्रकाशमय मन।
उपमाएँ उद्घाटित-वक्षा मृदु स्नेहमुखी
एक-टक देखती मुझको—
प्रियतर मुस्काती
मूल्यांकन करते एक-दूसरे का
हम एक-दूसरे को सँवारते जाते हैं
वे जगत्-समीक्षा करते-से
मेरे प्रतीक रूपक सपने फैलाते हैं
आगामी के।
दरवाज़े दुनिया के सारे खुल जाते हैं
प्यार के साँवले क़िस्सों की उदास गलियाँ
गंभीर-करुण मुस्कुराहट में
अपना उर का सब भेद खोलती हैं।
अनजाने हाथ मित्रता के
मेरे हाथों में पहुँच ऊष्मा करते हैं
मैं अपनों से घिर उठता हूँ
मैं विचरण करता-सा हूँ एक फ़ैंटेसी में
यह निश्चित है कि फ़ैंटेसी कल वास्तव होगी।
मेरा तो सिर फिर जाता है
औ’ मस्तक में
ब्रह्मांड दीप्ति-सी घिर उठती
रवि-किरण-बिंदु आँखों में स्थिर हो जाता है।
सपने से जगकर पाता हूँ सामने वहीं
बरगद के तने सरीखी वह अत्यंत कठिन
दृढ़ पीठ अग्रयायी माँ की
युग-युग अनुभव का नेतृत्व
आगे-आगे
मैं अनुगत हूँ।
वह एक गिरस्तिन आत्मा
मेरी माँ
मैं चिल्लाकर पूछता—
कि यह सब क्या
कि कौन-सी माया यह!
मुड़ करके मेरी ओर सहज मुस्का
वह कहती है—
आधुनिक सभ्यता के वन में
व्यक्तित्व-वृक्ष सुविधावादी।
कोमल-कोमल टहनियाँ भर गईं अनुभव-मर्मों की
यह निरुपयोग के फलस्वरूप हो गया।
अंतर्जीवन के मूल्यवान् जो संवेदन
उनका विवेक-संगत प्रयोग हो सका नहीं
कल्याणमयी करुणाएँ फेंकी गईं
रास्ते पर कचरे जैसी,
मैं चीन्ह रही उनको।
जो गहन अग्नि के अधिष्ठान
हैं प्राणवान्
मैं बीन रही उनको
देख तो
उन्हें सभ्यताभिरुचिवश छोड़ा जाता है
उनसे मुँह मोड़ा जाता है
यम नहीं किसी में
उनको दुर्दम करे
अनलोपम स्वर्णिम करे।
घर के बाहर आँगन में मैं सुलगाऊँगी
दुनिया-भर को उनका प्रकाश दिखलाऊँगी।
यह कह माँ मुस्काई,
तब समझा
हम दो
क्यों भटका करते हैं, बेगानों की तरह, रास्तों पर।
मिल नहीं किसी से पाते हैं
अंतस्थ हमारे प्ररयितृ अनुभव
जम नहीं किसी से पाते हम
फिट नहीं किसी से होते हैं...
मानो असंग की ओर यात्रा असंग की।
वे लोग बहुत जो ऊपर-ऊपर चढ़ते हैं
हम नीचे-नीचे गिरते हैं
तब हम पाते वीथी सुसंगमय ऊष्मामय।
हम हैं समाज की तलछट, केवल इसीलिए
हमको सर्वोज्ज्वल परंपरा चाहिए।
माँ परंपरा-निर्मिति के हित
खोजती ज़िंदगी के कचरे में भी
ज्ञानात्मक संवेदन
पर, रखती उनका भार कठिन मेरे सिर पर
अजीब अनुभव है
सिर पर की टोकरी-विवर में मानव-शिशु
वह कोई सद्योजात
मृदुल-कर्कश स्वर में
रो रहा;
सच, प्यार उमड़ आता उस पर
पर प्रतिपालन-दायित्व-भार से घबराकर
मैं तो विवेक खो रहा
वह शिकायतों से भरा बाल-स्वर मँडराता
प्रिय बालक दुर्भर, दुर्धर है—यह मैं विचारता कतराता
झखमार, झींख औ’ प्यार गुँथ रहे आपस में
वह सिर पर चढ़ रो रहा, नहीं मेरे बस में
बढ़ रहा बोझ। वह मानव-शिशु
भारी-भारी हो रहा।
वह कौन? कि सहसा प्रश्न कौंधता अंतर में—
वह है मानव-परंपरा
चिंघाड़ता हुआ उत्तर यह
सुन, कालिदास का कुमारसंभव वह
मेरी आँखों में अश्रु और अभिमान
किसी कारण
अंतर के भीतर पिघलती हुई हिमालयी चट्टान
किसी कारण,
तब एक क्षण-भर,
मेरे कंधों पर खड़ा हुआ है देव एक दुर्धर
थामता नभस् दो हाथों से;
भारान्वित मेरी पीठ बहुत झुकती जाती
वह कुचल रही है मुझे देव-आकृति
है दर्द बहुत रीढ़ में,
पसलियाँ पिरा रहीं...
पाँव में जम रहा ख़ून
द्रोह करता है मन
मैं जन्मा जब से इस साले ने कष्ट दिया
उल्लू का पट्ठा कंधे पर है खड़ा हुआ।
कि इतने में
गंभीर मुझे आदेश
कि बिलकुल जमे रहो।
तुम दाँव अड़ाओं, तने रहो
मैं अपने कंधे क्रमशः सीधा करता हूँ
तन गई पीठ
औ’ स्कंध नभोगामी होते
इतने ऊँचे हो जाते हैं।
मैं एकाकार हो गया-सा देवाकृति।
नभ मेरे हाथों पर आता
मैं उल्का-फूल फेंकता मधुर चंद्रमुख पर
मेरी छाया गिरती है दूर नेब्युला में।
बस, तभी तलब लगती है बीड़ी पीने की।
मैं पूर्वाकृति में आ जाता,
बस, चाय एक कप मुझे गर्म कोई दे दे
ऐसी-तैसी उस गौरव की
जो छीन चले मेरी सुविधा!
मित्रों से गप करने का मज़ा और ही है।
ये गर्म चिलचिलाती सड़कें
सौ बरस जिएँ।
मैं परिभ्रमण करता जाऊँगा जीवन-भर
मैं जिप्सी हूँ।
दिल को ठोकर
वह विकृत आईना मन का सहसा टूट गया
जिसमें या तो चेहरा दिखता था बहुत बड़ा
फूला-फूला
या अकस्मात् विकलांग व छोटा-छोटा-सा
सिट्टी गुम है,
नाड़ी ठंडी!
देखता हूँ कि माँ व्यंग्यस्मित मुस्कुरा रही
डाँटती हुई कहती है वह—
तब देव बना अब जिप्सी भी,
केवल जीवन-कर्तव्यों का
पालन न हो सके इसीलिए
निज को बहकाया करता है।
चल इधर, बीन रूखी टहनी
सूखी डालें,
भूरे डंठल,
पहचान अग्नि के अधिष्ठान
जा पहुँच स्वयं के मित्रों में
कर अग्नि-भिक्षा
लोगों से पड़ोसियों से मिल
चिलचिला रहा बेशर्म दलिद्दर भीतर का
पर, सेमल का ऊँचा-ऊँचा वह पेड़ रुचिर
संपन्न लाल फूलों को लेकर खड़ा हुआ
रक्तिमा प्रकाशित करता-सा
वह गहन प्रेम
उसका कपास रेशम-कोमल।
मैं उसे देख जीवन पर मुग्ध हो रहा!

दिमाग़ी गुहांधकार का ओराँगउटाँग!

गजानन माधव मुक्तिबोध

स्वप्न के भीतर एक स्वप्न,
विचारधारा के भीतर और
एक अन्य
सघन विचारधारा प्रच्छन!!
कथ्य के भीतर एक अनुरोधी
विरुद्ध विपरीत,
नेपथ्य...संगीत!!
मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क
उसके भी अंदर एक और कक्ष
कक्ष के भीतर
एक गुप्त प्रकोष्ठ और
कोठे के साँवले गुहांधकार में
मजबूत...संदूक़
दृढ़, भारी-भरकम
और उस संदूक़ भीतर कोई बंद है
यक्ष
या कि ओराँगउटाँग हाय
अरे! डर यह है...
न ओराँग...उटाँग कहीं छूट जाए,
कहीं प्रत्यक्ष न यक्ष हो।
करीने से सजे हुए संस्कृत...प्रभामय
अध्ययन-गृह में
बहस उठ खड़ी जब होती है--
विवाद में हिस्सा लेता हुआ मैं
सुनता हूँ ध्यान से
अपने ही शब्दों का नाद, प्रवाह और
पाता हूँ अकस्मात्
स्वयं के स्वर में
ओराँगउटाँग की बौखलाती हुंकृति ध्वनियाँ
एकाएक भयभीत
पाता हूँ पसीने से सिंचित
अपना यह नग्न मन!
हाय-हाय और न जान ले
कि नग्न और विद्रूप
असत्य शक्ति का प्रतिरूप
प्राकृत ओराँग...उटाँग यह
मुझमें छिपा हुआ है।
स्वयं की ग्रीवा पर
फेरता हूँ हाथ कि
करता हूँ महसूस
एकाएक गरदन पर उगी हुई
सघन अयाल और
शब्दों पर उगे हुए बाल तथा
वाक्यों में ओराँग...उटाँग के
बढ़े हुए नाख़ून!!
दीखती है सहसा
अपनी ही गुच्छेदार मूँछ
जो कि बनती है कविता
अपने ही बड़े-बड़े दाँत
जो कि बनते हैं तर्क और
दीखता है प्रत्यक्ष
बौना यह भाल और
झुका हुआ माथा
जाता हूँ चौंक मैं निज से
अपनी ही बालदार सज से
कपाल की धज से।
और, मैं विद्रूप वेदना से ग्रस्त हो
करता हूँ धड़ से बंद
वह संदूक़
करता हूँ महसूस
हाथ में पिस्तौल बंदूक़!!
अगर कहीं पेटी वह खुल जाए,
ओराँगउटाँग यदि उसमें से उठ पड़े,
धाँय धाँय गोली दागी जाएगी।
रक्ताल...फैला हुआ सब ओर
ओराँगउटाँग का लाल-लाल
ख़ून, तत्काल...
ताला लगा देता हूँ मैं पेटी का
बंद है संदूक़!!
अब इस प्रकोष्ठ के बाहर आ
अनेक कमरों को पार करता हुआ
संस्कृत प्रभामय अध्ययन-गृह में
अदृश्य रूप से प्रवेश कर
चली हुई बहस में भाग ले रहा हूँ!!
सोचता हूँ--विवाद में ग्रस्त कई लोग,
कई तल
सत्य के बहाने
स्वयं को चाहते है प्रस्थापित करना।
अहं को, तथ्य के बहाने।
मेरी जीभ एकाएक तालू से चिपकती
अक़्ल क्षारयुक्त-सी होती है...
और मेरी आँखें उन बहस करने वालों के
कपड़ों में छिपी हुई
सघन रहस्यमय लंबी पूँछ देखतीं!!
और मैं सोचता हूँ...
कैसे सत्य हैं--
ढाँक रखना चाहते हैं बड़े-बड़े
नाख़ून!!
किसके लिए हैं वे बाघनख!!
कौन अभागा वह!!

अंत:करण का आयतन

गजानन माधव मुक्तिबोध

अंत:करण का आयतन संक्षिप्त है
आत्मीयता के योग्य
मैं सचमुच नहीं!
पर, क्या करूँ,
यह छाँह मेरी सर्वगामी है!
हवाओं में अकेली साँवली बेचैन उड़ती है
कि श्यामल-अंचला के हाथ में
तब लाल कोमल फूल होता है
चमकता है अँधेरे में
प्रदीपित द्वंद्व चेतस् एक
सत्-चित्-वेदना का फूल
उसको ले
न जाने कहाँ किन-किन साँकलों को
खटखटाती वह,
नहीं इनकारवाले द्वार खुलते, किंतु
उन सोते हुओं के गूढ़ सपनों में
परस्पर-विरोधों का उर-विदारक शोर होता है!
विचित्र प्रतीक गुँथ जाते,
(अनिवार्य-सा भवितव्य) नीलाकाश
नीचे-और-नीचे उतरता आता
उस नीलाभ छत से शीश टकराता
कि सिर से ख़ून,
चेहरा रक्त धाराओं-भरा,
भीषण
उजाड़ प्रकाश सपने में
कि वे जाग पड़ते हैं
तुरत ही, गहन चिंताक्रांत होकर, सोचने लगते
कि बेबीलौन सचमुच नष्ट होगा क्या?
प्रतिष्ठित राज्य संस्कृति के प्रभावी दृश्य
सुंदर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश
सब आदर्श
उनके भाष्यकर्ता ज्ञानवान् महर्षि
ज्योतिर्विद, गणितशास्त्री, विचारक, कवि,
सभी वे याद आते हैं।
प्रतापी सूर्य हैं वे सब प्रखर जाज्वल्य
पर, यह क्या अँधेरे स्याह धब्बे सूर्य के भीतर
बहुत विकराल
धब्बों के अँधेरे विवर तल में-से
उभरकर उमड़कर दल बाँध उड़ते आ रहे हैं गिद्ध
पृथ्वी पर झपटते हैं
निकालेंगे नुकीली चोंच से आँखें,
कि खाएँगे हमारी दृष्टियाँ ही वे!
मन में ग्लानि,
गहन विरक्ति, मितली के बुरे चक्कर
भयानक क्षोभ
पीली धूल के बेदम बगूले, और
गंदे काग़ज़ों का मुन्सिपल कचरा!!
कि मेरी छाँह, उनको पार कर, भूरे पहाड़ों पर
अचानक खड़ी स्तब्ध
उसके गहन चिंतनशील नेत्रों में
विदारक क्षोभमय संतप्त जीवन-दृश्य
मैदानी प्रसारों पर क्रमागत तिर रहे-से हैं।
जहाँ भी डालती वह दृष्टि,
संवेदन-रुधिर-रेखा-रँगी तस्वीर तिर आती—
गगन में, भूमि पर, सर्वज्ञ दिखते हैं
तड़प मरते हुए प्रतिबिंब
जग उठते हुए द्युति-बिंब
दोनों की परस्पर-गुंथन
या उलझाव लहरीला
व उस उलझाव में गहरे,
बदलते जगत् का चेहरा!!
मेरी छाँह सागर-तरंगों पर भागती जाती,
दिशाओं पार हल्के पाँव।
नाना देश-दृश्यों में
अजाने प्रियतरों का मौन चरण-स्पर्श,
वक्ष-स्पर्श करती मुग्ध
घर में घूमती उनके,
लगाती लैंप, उनकी लौ बड़ी करती।
व अपने प्रियतरों के उजलते मुख को
मधुर एकांत में पाकर,
किन्हीं संवेदनात्मक ज्ञान-अनुभव के
स्वयं के फूल ताज़े पारिजात-प्रदान करती है,
अचानक मुग्ध आलिंगन,
मनोहर बात, चर्चा, वाद और विवाद
उनका अनुभवात्मक ज्ञान-संवेदन
समूची चेतना की आग
पीती है।
मनोहर दृश्य प्रस्तुत यों—
गहन आत्मीय सघनच्छाय
भव्याशय अँधेरे वृक्ष के नीचे
सुगंधित अकेलेपन में,
खड़ी हैं नीलतन दो चंद्र-रेखाएँ
स्वयं की चेतनाओं को मिलाती हैं
उनसे भभककर सहसा निकलती आग,
या निष्कर्ष
जिनको देखकर अनुभूत कर दोनों चमत्कृत हैं
अँधेरे औ’ उजाले के भयानक द्वंद्व
की सारी व्यथा जीकर
गुँथन-उलझाव के नक्षे बनाने,
भयंकर बात मुँह से निकल आती है
भयंकर बात स्वयं प्रसूत होती है।
तिमिर में समय झरता है,
व उसके सिर रहे एक-एक कण से
चिनगियों का दल निकलता है।
अँधेरे वृक्ष में से गहन आभ्यंतर
सुगंधे भभक उठती हैं
कि तन-मन में निराली फैलती ऊष्मा
व उन पर चंद्र की लपटें मनोहरी फैल जाती हैं।
कि मेरी छाँह
अपनी बाँह फैलाती
व अपने प्रियतरों के ऊष्मश्वस् व्यक्तित्व
की दुर्दांत
उन्मद बिजलियों में वह
अनेकों बिजलियों से खेल जाती है,
व उनके नेत्रों को दीखते परिदृश्य में
वह मुग्ध होकर फैल जाती है,
जगत् संदर्भ, अपने स्वयं के सर्वत्र फैलाती
अपने प्रियतरों के स्वप्न, उनके विचारों की वेदना जीकर,
व्यथित अंगार बनती है,
हिलगकर, सौ लगावों से भरी,
मृदु झाइयों की थरथरी
वह और अगले स्वप्न का विस्तार बनती है।
वह तो भटकती रहती है,
उतरती है खदानों के अँधेरे में
व ज़्यादा स्याह होती है
हृदय में वह किसी के सुलगती रहती
उलझकर, मुक्तिकामी श्याम गहरी भीड़ में चलती
उतरकर, आत्मा के स्याह घेरे में
अचानक दृप्त हस्तक्षेप करती है
सिखाती सीखती रहती,
परखती, बहस करती और ढोती बोझ
मेहनत से,
ज़मीनें साफ़ करती है,
दिवालों की दरारें परती-भरती,
व सीती फटे कपड़े, दिल रफ़ू करती,
किन्हीं प्राणांचलों पर वह कसीदा काढ़ती रहती
स्वयं की आत्मा की फूल-पत्ती के नमूने का!!
अजाने रास्तों पर रोज़
मेरी छाँह यूँ ही भटकती रहती
किसी श्यामल उदासी के कपोलों पर अटकती है
अँधेरे में, उजाले में,
कुहा के नील कुहरे और पाले में,
व खड्डों-खाइयों में घाटियों पर या पहाड़ों के कगारों पर
किसी को बाँह में भर, चूमकर, लिपटा
हृदय में विश्वृ-चेतस् अग्नि देती है
कि जिससे जाग उठती है
समूची आत्म-संविद् उष्मश्वस् गहराइयाँ,
गहराइयों से आग उठती है!!
मैं देखता क्या हूँ कि—
पृथ्वी के प्रसारों पर
जहाँ भी स्नेह या संगर,
वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है,
वहाँ है ज़ोर गहरा एक मेरा भी,
सतत मेरी उपस्थिति, नित्य-सन्निधि है।
एक मेरा भी वहाँ पर प्राण-प्रतिनिधि है
अनुज, अग्रज, मित्र
कोई आत्म-छाया-चित्र!!
धरती के विकासी द्वंद्व-क्रम में एक मेरा छटपटाया वक्ष,
स्नेहाश्लेष या संगर कहीं भी हो
कि धरती के विकासी द्वंद्व-क्रम में एक मेरा पक्ष,
मेरा पक्ष, निःसन्देह!!
यह जनपथ,
यहाँ से गुज़रते हैं फूल चेहरों के
लिए आलोक आँखों में।
स्वयं की दूरियाँ, सब फ़ासले लेकर
गुज़रते रातें अँधेरी,
गुज़रती हैं ढिबरियाँ, टिमटिम
सुबह गोरी लिए जाती ख़ुद अपनी
आईने-सी साफ़ दुपहरी,
हँसी, किलकारियाँ
रंगीन मस्त किनारियाँ
रंगीन मस्त किनारियाँ
वे झाइयाँ आत्मीय,
वे परछाइयाँ काली बहुत उद्विग्न,
श्यामल खाइयाँ गंभीर।
मुझको तो समूचा दृश्य धरती की सतह से उठ,
अनावृत, अंतरिक्षाकाश-स्थित दिखता,
नवल आकाश के प्रत्यक्ष मार्गों सेतुओं
पर चल रहा दिखता
व उस आकाश में से बरसते मुझ पर
सुगंधित रंग-निर्झर और
छाती भीग जाती है, व आँखों में
उसी की रंग-लौ कोमल चमकती-सी
कि इतने में
भयानक बात होती है
हृदय में घोर दुर्घटना
अचानक एक काला स्याह चेहरा प्रकट होता है
विकट हँसता हुआ।
अध्यक्ष वह
मेरी अँधेरी खाइयों में
कार्यरत कमज़ोरियों के छल-भरे षड्यंत्र का
केंद्रीय संचालक
किसी अज्ञात गोपन कक्ष में
मुझको अजंता की गुफाओं में हमेशा क़ैद रखता है
क्या इसलिए ही कर्म तक मैं लड़खड़ाता पहुँच पाता हूँ?
सामना करने
निपीड़क आत्मचिंता से
अकेले में गया मन, और
वह एकेक कमरा खोल भीतर घुस रहा हर बार
लगता है कि ये कमरे नहीं हैं ठीक
कमरे हैं नहीं ये ठीक,
इन सुनसान भीतों पर
लगे जो आईने उनमें
स्वयं का मुख
जगत् के बिंब
दिखते ही नहीं...
जो दीखता है वह
विकृत प्रतिबिंब है उद्भ्रांत
ऐसा क्यों?
उन्हें क्योंकर न साफ़ किया गया?
कमरे न क्यों खोले गए?
आश्चर्य है!
ये आईने किस काम के
जिनमें अँधेरा डूबता!!
सबकी पुनर्रचना न क्योंकर की गई?
इतने में कहीं से आ रहा है पास
कोई जादुई संगीत-स्वर-आलाप
आता पास और प्रकाश बनता-सा
कि स्वर ने रश्मियों में हो रहे परिणत
व उनसे किरण-वाक्यावलि
सहस्रों पीढ़ियों ने विश्व का
रमणीयतम जो स्वप्न देखा था
वही,
हाँ, वही
बिल्कुल, सामने, प्रत्यक्ष है!!
मैं देखता क्या हूँ,
अँधेरे आईनों में सिर उठाती है
प्रतेजस-आनना
प्रतिभामयी मुख-लालिमा
तेजस्विनी लावण्य भी
प्रत्यक्ष,
बिल्कुल सामने!!
(शायद, शमा कोई अचानक मुस्कुराई थी)
कई फ़ानूस, भीतर, रंग-बिरंगे झलमला उठते
गहन संवेदनाओं के...
आश्चर्य,
क्योंकि दूसरे ही क्षण
अचानक एक ठंडा स्पर्श कंधे पर
हृदय यह थरथरा उठता!!
भयानक काला लबादा ओढ़े है,
बराबर, सामने, प्रत्यक्ष कोई
स्याह परदे से ढँका चेहरा
सुरीली किंतु है आवाज़
व यद्यपि चीख़ते-से शब्द—
मुझसे भागते क्यों हो,
सुकोमल काल्पनिक तल पर,
नहीं है द्वंद्व का उत्तर
तुम्हारी स्वप्न-वीथी कर सकेगी क्या।
बिना संहार के, सर्जन असंभव है,
समन्वय झूठ है,
सब सूर्य फूटेंगे
व उनके केंद्र टूटेंगे
उड़ेंगे-खंड
बिखरेंगे गहन ब्रह्मांड में सर्वत्र
उनके नाश में तुम योग दो!!
आँखें देखती रहतीं,
हृदय यह स्तब्ध है,
कौन है जो सामने है, क्षुब्ध है!!
सहसा किसी उद्वेग से
मैं झपटता,
उस घोर आकृति पर भयानक टूट पड़ता हूँ!
व उसका आवरण ऊपर उठाकर फेंक देता हूँ,
कि मैं आतंक-हत
जी धक्
व जड़, निर्वाक्!!
वह तो है, वही है, हाँ वही बिल्कुल,
प्रतेजस-आनना
लावण्य-श्री मितस्मिता
जिसने अँधेरे आईने में सिर उठाया था
व हल्के मुस्कुराया था
व मेरा जी हिलाया था!!
सहस्रों पीढ़ियों ने विश्व का
रमणीयतम
जो स्वप्न देखा था
वही बिल्कुल वही।
स्वप्न के आवेश में यह जो
सुकोमल चाँदनी की मंद नीली श्री
क्षितिज पर देख,
फ़सलों के महकते सुनहले फैलाव
में ही चला जाता हूँ
व आँखों में चमकती चाँद की लपटें
हृदय में से
निकलती आम्र-तरु-मधु-मंजरी की गंध।
इतने में सुनहला एक गोरा झौंर
सहसा तोड़ लेता हूँ
अचानक देखता क्या हूँ
हर एक बोली में सुकोमल फूल में
तेजस्-स्मित धरती और मानव के
प्रभामय मुख समन्वय से
अरे किसका अरे किसका
प्रिय जनों का!! सहचरों का वह
कि उसको देख
गोरा झौंर
वापल लगा देता, जमा देता डाल पर सुस्थित
व वे मुख मुस्कुराते हैं
कि जादू है
व मैं इस जादुई षड्यंत्र में फँसता गया।
पर हाय!
मुझको तोड़ने की बुरी आदत है
कि क्या उत्पीड़कों के वर्ग से होगी न मेरी मुक्ति!!
इतने में वही रमणीयतम
मृदु मूर्ति
धीमे मुस्कुराती है
व मुझको, और गहरे और गहरे,
जान जाती है
कि इन्हें सब जगह यों फैल जाती हैं
कि मैं लज्जित
भयानक रूप से
विद्रूप मैं सचमुच!!
कि इतने में
अचानक कान में फिर से
नभोमय भूमिमय लहरा रहा-सा
गंधमय संगीत
मानो गा रहा कोई पुरुष
आकाश के नीचे,
खुले बेछोर क्षिप्रा कूल पर उन्मुक्त
लेकिन विरोधात्मक चेतना मेरी
उसी क्षण सुन रही है
श्याम संध्या काल मंदिर आरती आलाप वेला में
भयानक श्वानदल का ऊर्ध्व क्रंदन
वह उदासी की ऊँचाई पर चढ़ा लहरा रहा रोना
सुन रहा हूँ आज दोनों को
कि है आश्चर्य!!
यह भी ख़ूब
जिस सौंदर्य को मैं खोजता फिरता रहा दिन-रात
वह काला लबादा ओढ़
पीछे पड़ गया था रात-दिन मेरे।
कि उद्घाटित हुआ वह आज
कि अब सब प्रश्न जीवन के
मुझे लगते
कि मानो रक्त-तारा चमचमाता हो
कि मंगल-लोक
हमको बुलाता हो
साहसिक यात्रा-पथों पर और
मेरा हृदय दृढ़ होकर धड़कता है
कि मैं तो एक आयुध
मात्र साधन
प्रेम का वाहन
तुम्हारे द्वार आया हुआ मैं अस्त्र-सज्जित रथ
मेरे चक्र दोनों अग्र गति के लिए व्याकुल हैं
व मेरी प्राण-आसंदी तुम्हारी प्रतीक्षा में है
यहाँ बैठो, विराजो,
आत्मा के मृदुल आसन पर
हृदय के, बुद्धि के ये अश्व तुमको ले उड़ेंगे और
शैल-शिखरों की चढ़ानों पर बसी ठंडी हवाओं में
उसके पार
गुरुगंभीर मेघों की चमकती लहर-पीठों पर
व उसके भी परे, आगे व ऊँचे,
स्वर्ण उल्का-क्षेत्रों में रथ
तुम्हें ले जाएगा!!
नक्षत्र-तारक-ज्योति-लोकों में घुमा ले आएगा सर्वत्र।
रथ के यंत्र सब मज़बूत हैं।
उन प्रश्न-लोकों में यहाँ की बोलियाँ
तुमको बुलाती हैं
कि उनको ध्यान से सुन लो।

लकड़ी का रावण

गजानन माधव मुक्तिबोध

दीखता
त्रिकोण इस पर्वत-शिखर से
अनाम, अरूप और अनाकार
असीम एक कुहरा,
भस्मीला अंधकार
फैला है कटे-पिटे पहाड़ी प्रसारों पर;
लटकती हैं मटमैली
ऊँची-ऊँची लहरें
मैदानों पर सभी ओर
लेकिन उस कुहरे से बहुत दूर
ऊपर उठ
पर्वतीय ऊर्ध्वमुखी नोक एक
मुक्त और समुत्तुंग!!
उस शैल-शिखर पर
खड़ा हुआ दीखता है एक द्यौ: पिता भव्य
निःसंग
ध्यान-मग्न ब्रह्म...
मैं ही वह विराट् पुरुष हूँ
सर्व-तन्त्र, स्वतन्त्र, सत्-चित्!
मेरे इन अनाकार कंधों पर विराजमान
खड़ा है सुनील
शून्य
रवि-चंद्र-तारा-द्युति-मंडलों के परे तक।
दोनों हम
अर्थात्
मैं व शून्य
देख रहे...दूर...दूर...दूर तक
फैला हुआ
मटमैली जड़ीभूत परतों का
लहरीला कंबल ओर-छोर-हीन
रहा ढाँक
कंदरा-गुहाओं को, तालों को
वृक्षों के मैदानी दृश्यों के प्रसार को
अकस्मात्
दोनों हम
मैं वह शून्य
देखते कि कंबल की कुहरीली लहरें
हिल रही, मुड़ रही!!
क्या यह सच,
कंबल के भीतर है कोई जो
करवट बदलता-सा लग रहा?
आंदोलन?
नहीं, नहीं मेरी ही आँखों का भ्रम है
फिर भी उस आर-पार फैले हुए
कुहरे में लहरीला असंयम!!
हाय! हाय!
क्या है यह!! मेरी ही गहरी उसाँस में
कौन-सा है नया भाव?
क्रमशः
कुहरे की लहरीली सलवटें
मुड़ रही, जुड़ रही,
आपस में गुँथ रही!!
क्या है यह!!
यर क्या मज़ाक़ है,
अरूप अनाम इस
कुहरे की लहरों से अगनित
कइ आकृति-रूप
बन रहे, बनते-से दीखते!!
कुहरीले भाफ भरे चहरे
अशंक, असंख्य व उग्र...
अजीब है,
अजीबोग़रीब है
घटना का मोड़ यह।
अचानक
भीतर के अपने से गिरा कुछ,
खसा कुछ,
नसें ढीली पड़ रही
कमज़ोरी बढ़ रही; सहसा
आतंकित हम सब
अभी तक
समुत्तुंग शिखरों पर रहकर
सुरक्षित हम थे
जीवन की प्रकाशित कीर्ति के क्रम थे,
अहं-हुंकृति के ही... यम-नियम थे,
अब क्या हुआ यह
दुःसह!!
सामने हमारे
घनीभूत कुहरे के लक्ष-मुख
लक्ष-वक्ष, शत-लक्ष-बाहु ये रूप, अरे
लगते हैं घोरतर ।
जी नहीं,
वे सिर्फ़ कुहरा ही नहीं हैं,
काले-काले पत्थर
व काले-काले लोहे के लगते हैं वे लोग।
हाय, हाय, कुहरे की घनीभूत प्रतिमा या
भरमाया मेरा मन,
उनके वे स्थूल हाथ
मनमाने बलशाली
लगते हैं ख़तरनाक;
जाने-पहचाने-से लगते हैं मुख वे।
डरता हूँ,
उनमें से कोई, हाय
सहसा न चढ़ जाए
उत्तुंग शिखर की सर्वोच्च स्थिति पर,
पत्थर व लोहे के रंग का यह कुहरा!
बढ़ न जाएँ
छा न जाएँ
मेरी इस अद्वितीय
सत्ता के शिखरों पर स्वर्णाभ,
हमला न कर बैठे ख़तरनाक
कुहरे के जनतंत्री
वानर ये, नर ये!!
समुदाय, भीड़
डार्क मासेज़ ये मॉब हैं,
हलचलें गड़बड़,
नीचे थे तब तक
फ़ासलों में खोए हुए कहीं दूर, पार थे;
कुहरे के घने-घने श्याम प्रसार थे।
अब ये लंगूर हैं
हाय हाय
शिखरस्थ मुझको ये छू न जाएँ!!
आसमानी शमशीरो, बिजलियो,
मेरी इन भुजाओं में बन जाओ
ब्रह्म-शक्ति!
पुच्छल ताराओ,
टूट पड़ो बरसो
कुहरे के रंग वाले वानरों के चहरे
विकृत, असभ्य और भ्रष्ट हैं...
प्रहार करो उन पर,
कर डालो संहार!!
अरे, अरे !
नभचुंबी शिखरों पर हमारे
बढ़ते ही जा रहे
जा रहे चढ़ते
हाय, हाय,
सब ओर से घिरा हूँ।
सब तरफ़ अकेला,
शिखर पर खड़ा हूँ।
लक्ष-मुख दानव-सा, लक्ष-हस्त देव-सा।
परंतु, यह क्या
आत्म-प्रतीति भी धोखा ही दे रही!!
स्वयं को ही लगता हूँ
बाँस के व कागज़ के पुट्ठे के बने हुए
महाकाय रावण-सा हास्यप्रद
भयंकर!!
हाय, हाय,
उग्रतर हो रहा चेहरों का समुदाय
और कि भाग नहीं पाता मैं
हिल नहीं पाता हूँ
मैं मन्त्र-कीलि-सा, भूमि में गड़ा-सा,
जड़ खड़ा हूँ
अब गिरा, तब गिरा
इसी पल कि उस पल...

मेरे सहचर मित्र

गजानन माधव मुक्तिबोध

मेरे सहचर मित्र
ज़िंदगी के फूटे घुटनों से बहती
रक्तधार का ज़िक्र न कर,
क्यों चढ़ा स्वयं के कंधों पर
यों खड़ा किया
नभ को छूने, मुझको तुमने।
अपने से दुगुना बड़ा किया
मुझको क्योंकर?
गंभीर तुम्हारे वक्षस्थल में
अनुभव-हिम-कन्या
गंगा-यमुना के जल की
पावन शक्तिमान् लहरें पी लेने दो।
ओ मित्र, तुम्हारे वक्षस्थल के भीतर के
अंतस्तल का पूरा विप्लव जी लेने दो।
उस विप्लव के निष्कर्षों के
धागों से अब
अपनी विदीर्ण जीवन-चादर सी लेने दो।
इस विप्लव की चल तड़िल्लता की
शय्या पर
लोटती हुई बेचैनी को मेरी आँखें
हैं देख रहीं...
प्रश्नों की दानव-काँखों में
ये दबे-घुटे क़ैदी उत्तर
पर, ज्यों-ज्यों उत्तर के मुख पर
उद्विग्न दृष्टि की किरणें केंद्रित करता हूँ
ये लाल-लाल आँखों से मेरा
पीला मुँह निहार कहते—
“हमको यों ग़लत न दो उपमा,
तुम अपनी सड़ी-गली महिमाओं की
निर्माल्य मालिकाएँ
हमको मत पहनाओ।
तुम, देखो तो उस ओर...।”
और, मैं आँखें फाड़े देख रहा...
उन नीले-नीले आसमान की सरहद पर
परिचिता एक कोमल चिड़िया,
जो नित्य तुम्हारे घर-आँगन
रोशनदानों में उड़ती थी
घर की आत्मा,
वह दूर क्षितिज पर ठहरी-सी
काली बिंदिया
उस नीले-नीले आसमान की सरहद पर
वन-पक्षिराज बन
पंख पसारे उड़ती हुई मुझसे कहती,
वह पक्षिराज मुझसे कहता--
“ओ मित्र, तुम्हारे घर-आँगन को
शैलांचल-गिरिराज-शिखर
तो होने दो
वह आसमान तो झुकने दो
उसके मुख पर
इस समय बात के पूरे नहीं अधूरे तुम,
कमज़ोर-प्रखर होना बाक़ी,
अब बूटों-दबा दीन ढेला
कैलाश-शिखर होना बाक़ी,
कैलाश-शिखर पर बैठेंगे!!”
मैं ज्यों-ज्यों उत्तर के मुख पर
उद्विग्न दृष्टि की किरणें केंद्रित करता हूँ
उत्तर का मुँह—
पहले बादल,
फिर बादल में मानव-मुख रेखा ऊर्जस्वल
भव्याकृति, स्वेदायित,
रक्तांकित मुख-मंडल
धीरे-धीरे आ मेरे इतने निकट कि वह
आँखों पर झुकता आता है,
इतना समीप झुकता कि
त्वचा की रेखाएँ
रक्तिम घावों में कटी-पिटीं,
मेरी आँखों में उमट रहीं।
वह घाव-भरे चेहरे का कोई सैनिक है।
रण मैदानों की संध्या में
जब लाल विभा बैंगनी हुई
सँवलाई लाली में डूबी सरिताओं की
थर्रायी लहरों के भीतर से उझक-उचक
झल्लाहट-भरी
दिली तकलीफ़ों की बिजली
या पीड़ा-भरे विचारों की
जल-मुर्ग़-मछलियों की उछाल
बेचैन कोण जब बना रही,
पीड़ा के उस सरिता-तट पर
शत हताहतों के बिखरे दल
में देख मुझे मूर्च्छित आहत
अपना गहरा साथी-सैनिक पहचान मुझे
यह जान कि मेरी अभी
धुकधुकी बाक़ी है
मेरे टटोलने प्राण झुक रहा आँखों में
वह उत्तर-सहचर सैनिक है।
उसके मुख का
उद्वेग-भरा आनंद-भरा
वह रंग
आँख पी लेती है
मूँद जाती है
उत्तर के मात्र स्पर्श ही से
निर्णायक ठंडी गर्म झनझनाहट गहरी
तन-मन में फैल कि प्राणों में
फन फैलाकर अड़ जाती है,
रुँध जाती है
औ’ अकस्मात्, जबरन, धक्के से
खुलता है
औ’ अंतर के उस गुहा-तिमिर में
एक सुदृढ़
पत्थर के टेबल पर रक्खे
रक्ताभ दीप की लौ
कुछ हिलती-डुलती है
अँधियाले में प्रस्फुटिता
लाल-वलय-शाली
अंगार-ज्योति के नीचे
पीड़ा की पुस्तक के पन्ने
स्वयं पलट जाते।
कालांतर-अनुभव ग्रंथ
देश-देशांतर के,
जो पड़ता हुआ जातवेदस् उद्दंड
क्रांतिदर्शी कोई
बैठा है पत्थर-कुर्सी पर आजानुबाहु,
वह सहसा उठ
आँधी-बिजली पानी के क्रुद्ध देवता से
घुस पड़े भव्य उत्तर का अभिवादन
प्रचंड
उससे विशाल आलिंगन कर
सहसा वह बहस छेड़ देता
मानव समाज-रूपांतर विधि
की धाराओं में मग्न
मानवी-प्राणों के
मर्मों की व्यथा-कथा... अंगार तपस्या पर
मानव-स्वभाव के प्रश्नों पर,
मानव-सभ्यता-समस्या पर,
उस गुहा-भीत से कान लगा मैं सुनता हूँ
जो बहस कि उससे ज्ञान हुआ—
यह ज्ञान कि तुमने कंधों पर
सहसा मुझको
क्यों खड़ा किया नभ को छूने
अपने से दुगुना बड़ा किया
जिससे पैरों की उँगली पर
तनकर ऊँची गर्दन कर दोनों हाथों से
मैं स्याह-चंद्र का फ़्यूज़ बल्ब
जल्दी निकाल
पावन-प्रकाश का प्राण-बल्ब
वह लगा सकूँ
जो बल्ब तुम्हीं ने श्रमपूर्वक तैयार किया
विक्षुब्ध ज़िंदगी की अपनी
वैज्ञानिक प्रयोगशाला में।
उस शाला का मैं एक अल्प-मति
विद्यार्थी,
जड़ लेखक हूँ मैं अननुभवी,
आयु में यद्यपि मैं प्रौढ़
बुद्धि से बालक हूँ
मैं एकलव्य जिसने निरखा—
ज्ञान के बंद दरवाज़े की दरार से ही
भीतर का महा मनोमंथन-शाली मनोज्ञ
प्राणार्षक प्रकाश देखा।
पथ पर मँडराते विद्यालय के शब्दों से
विद्या के स्वर-कोलाहल में से
छनकर कुछ आए
वाक्यों से प्राप्त किया—
सब ग्रंथाध्ययन वंचिता मति ने सड़कों पर
ज्ञान के हृदय जागृति स्वप्नों को
प्राप्त किया
बचपन से ही,
आश्चर्य-चकित जिज्ञासु-आत्मा
चढ़ती किरणों की चढ़ान
नभ शिखरों तक
छुटपन से ही।
उस मुक्ति-काम बेचैनी में
मैं उन ग़रीब गलियों में घूमा-झूमा हूँ
जिन गलियों में तुम अक्षयवट
ले शत-सहस्र भावना-विचारों के पल्लव
ओ जटा जटिल
अनुभव-शाखाएँ लिए खड़े।
जाने कितने जन-कष्टों की
पीढ़ियाँ दुःखों की देखी हैं तुमने,
उस अक्षयवट से मैं
चिंता में अकुलाता झूमा,
बेचैनी के साँपों को मैंने छाती से
उस अक्षयवट के तने-तने पर रगड़ा है,
वह रगड़ अभी तक बाक़ी है
व्रण रेखाएँ जिसकी इस छाती पर साक्षी।
ओ अक्षयवट, यदि तुम न रहे होते
मेरी इन गलियों
तो अंधकार के सिंधु-तले
पानी के काले थर के नीचे कीचड़ में
अज्ञान-ह्वेल की प्रदीर्घ भीषण ठठरी-सा
मैं कहीं पड़ा होता सूने में,
किसी चोर की गठरी-सा
रह अंधकार से भूसे-सा
निशि-वृषभ-गले!!
ख़ूँख़ार, सिनिक, संशयवादी
शायद मैं कहीं न हो जाऊँ,
इसलिए, बुद्धि के हाथों पैरों की बेड़ी
ज़ंजीरें खनकाकर तोड़ीं
तुमने निर्दय औज़ारों से,
टूटती बेड़ियों की नोकों
से ज़ख़्म हुआ औ’ ख़ून बहा—
यह जान तुरत
अपने अनुभव के गंधक का
चुपड़ा मरहम मेरे व्रण पर तुमने सहसा।
भीषण स्पर्शों की तेज़ दवा
झनझना गई तन-मन की ढीली रगें झटक-झटकाकर
तानीं, बना गई।
जब दीप्त तुम्हारी आँखों में
मेरी ताक़त बढ़ गई स्वयं,
तुम कर्मवाद के धीर दार्शनिक से लौटे
गंभीर चरण चुपचाप क़दम।
मैं फिर भी अपने घावों में
उलझा-सा हूँ
जिससे कि तुम्हारे कुशल अनुभवी
प्राणों की
मुझको सहायता मिलती रहे।
यह जान तुम्हारे माथे की
तीनों रेखाएँ उलझ गईं
नभ में निकाल रेखाएँ विद्युत की चमकीं
मैंने जब नीली चकाचौंध
वह, देखी तो
वे भीषण होकर गरज गईं
झूठे अवलंबन की शहनाई मूक हुई
भावुक निर्भरता का संबल दो टूक हुआ,
देखा—सहसा मैं बदल गया,
भूरे निःसंग रास्ते पर
मैं अपने को ही सहल गया।
अपने छोटे निज जीवन में
जी ली हैं अनगिन ज़िंदगियाँ।
ज़िंदगी हरेक—
ज्वलित चंदन का ईंधन है।
मेरी धमनी में जलते चंदन का धुआँ,
छाती के रेशे-रेशे में
उसने घुस-फँसकर की काली
धड़कन मेरी
पर वह काजल है चंदन का।
वह सँवलाया कलियाया मुँह
है सनेही-भरी चिंता में
शाल्मलि वृक्ष तले
उद्विग्न खड़े वनवासी दुर्धर अर्जुन का
जिसके नेत्रों में चमक उठे,
चंदन के पावन अंगारे,
जो सोच रहा क्यों मानव के
इस तुलसी-वन में आग लगी,
क्यों मारी-मारी फिरती है
मन की यह गहरी सज्जनता,
दुःख के कीड़ों ने खाई क्यों,
ये जूही-पत्तियाँ जीवन की,
निर्माल्य हुए क्यों फूल युवक
युवती जन के
क्यों मानव-सुलभ सहज
आकांक्षाओं के तरु
यों ठूँठ हुए वृंदावन के,
मानव-आदर्शों के गुंबद में आज यहाँ
उलटे लटके चिमगादड़ पापी
भावों के।
क्यों स्वार्थ-घृणा-कुत्सा के
थहर जंगल में
हैं भटक गए थे लक्ष्य
पुराने पाँवों के
क्यों घर-आँगन की मौन अकेली
छाया में
चिंता के प्रेत
स्याह-बदन
हैं झूल रहे...
आवाज़ कड़ी उस झूले की
धँसते हिय की हिलडोल बनी
लोहे का गाडर
छत की छाती पर धम से आ धमका
किस कारण से?
वह कारण, सामाजिक जंगल का
घुग्घू है,
है घुग्घू का संगठन, रात का तंबू है!!
यह भीतर की ज़िंदगी नहाती रहती है
हिय के विक्षोभों के ख़ूनी फ़व्वारों में,
अंगारों में
इस दिल के भरे रिवॉल्वर में
बेचैनी ज़ोर मारती है, इसमें क्या शक।
क्यों ताक़तवर उस मशीन के
पिस्टन की-सी दिल की धक्-धक्,
उद्दाम वेग से चला रही
ये लौहचक्र
मन-प्राण-बुद्धि के विक्षोभी
यह स्याह स्टीम-रोलर जीवन का,
सुख-दुख की
कंकर गिट्टी यक-साँ करके,
है एक रास्ता बना रहा युग के मन का
मेरे मन का!!
रास्ते पर इस—
मानव व्यक्तित्व-कदंबों की शीतल छाया,
विद्रोहों की विधियाँ,
विक्षोभी मन का बल,
छाती में मधुमक्खी का छत्ता फैला है
जो अकुलाया,
औ’ दंश-तत्परा मधुमक्खी के दल-दल।
रस-मर्मज्ञाओं की सेना स्नेहान्वेषी,
पर डंक सतत तैयार,
बुद्धि का नित संबल।
मधुमक्खी दल ने ज़िंदगियों के फूलों से
रस-बिंदु-मधुर एकत्रित कर संचित रखने
मेरे प्राणों में
अग्नि-परीक्षाओं-से गहरे छेद किए
छाती मधुपूरित अनगिन छेदों का जाला
आत्मा में मधुमक्खी का है छत्ता फैला!!
मानव व्यक्तित्व-कदंब-तले,
मधुमक्खी छत्ते के जाले,
तुमसे सीखा कैसे ये पाले जाते हैं,
मेरे दिन, मेरी रातों में
ओ सहचर मित्र, तुम्हारे दिन हैं,
रातें हैं।
मेरे भीतर
मानव व्यक्तित्व-कदंब-तले,
तरु के गंभीर तने पर चाक़ू से लिक्खीं
काटीं-खोदीं,
वाक्यावलियाँ ज़िंदगियों ने
ज़िंदगी हरेक-निजत्व लिए पलकें
खोले,
अपना-अपना व्यक्तित्व लिए
अलकें खोले
अंतर के तरु की शाखा-शाखा पर
प्रतिपल
चाक़ू से काट-काट, चित्रित करती है
गहरा संवेदन।
मानव व्यक्तित्व-कदंब-तले,
(गंभीर रात्रि में) आ करके,
चुपचाप सिमिट,
अकुलाहट की चाँदनी
सरल निर्व्याज मुखी
तरु-तने खुदीं वाक्यावलियाँ
पढ़ती है बहुत ध्यान से, तब
पढ़ते-पढ़ते अक्षर-दल से,
उमड़ी चंदन की ज्वालाएँ,
पावनता की विक्षुब्ध
रश्मियाँ भभक उठीं,
ये खोदे गए मर्म-सारांश भभकते हैं
बस इसी तरह
अर्थों की गहरी ज्वालाएँ दिन-रात
निकलतीं इसी तरह
माधुरी और करुणा में भीगी रहकर भी
जी के भीतर की शिलालेख चट्टान,
गर्म रहती ही है।
संघर्ष-मार्ग-इतिहास-मर्म कहती ही है
ओ मेरे सहचर मित्र,
क्षितिज के मस्तक पर नाचती हुई
दो तड़ितल्लताओं में मैत्री रहती ही है।

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