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अहमद फ़राज़ की नज्में : Ahmad Faraz Nazms Lyrics in Hindi

भली सी एक शक्ल थी : अहमद फ़राज़

भले दिनों की बात है
भली सी एक शक्ल थी
न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
न देखने में आम सी
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
कोई भी रुत हो उस की छब
फ़ज़ा का रंग-रूप थी
वो गर्मियों की छाँव थी
वो सर्दियों की धूप थी
न मुद्दतों जुदा रहे
न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
न ये कि इज़्न-ए-आम हो
न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
कि सादगी गिला करे
न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
कि आइना हया करे
न इख़्तिलात में वो रम
कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
न इस क़दर सुपुर्दगी
कि ज़च करें नवाज़िशें
न आशिक़ी जुनून की
कि ज़िंदगी अज़ाब हो
न इस क़दर कठोर-पन
कि दोस्ती ख़राब हो
कभी तो बात भी ख़फ़ी
कभी सुकूत भी सुख़न
कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
कभी उदासियों का बन
सुना है एक उम्र है
मुआमलात-ए-दिल की भी
विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी
सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई
मैं इश्क़ का असीर था
वो इश्क़ को क़फ़स कहे
कि उम्र भर के साथ को
वो बद-तर-अज़-हवस कहे
शजर हजर नहीं कि हम
हमेशा पा-ब-गिल रहें
न ढोर हैं कि रस्सियाँ
गले में मुस्तक़िल रहें
मोहब्बतों की वुसअतें
हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
बस एक दर से निस्बतें
सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं
मैं कोई पेंटिंग नहीं
कि इक फ़्रेम में रहूँ
वही जो मन का मीत हो
उसी के प्रेम में रहूँ
तुम्हारी सोच जो भी हो
मैं उस मिज़ाज की नहीं
मुझे वफ़ा से बैर है
ये बात आज की नहीं
न उस को मुझ पे मान था
न मुझ को उस पे ज़ोम ही
जो अहद ही कोई न हो
तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
सो अपना अपना रास्ता
हँसी-ख़ुशी बदल दिया
वो अपनी राह चल पड़ी
मैं अपनी राह चल दिया
भली सी एक शक्ल थी
भली सी उस की दोस्ती
अब उस की याद रात दिन
नहीं, मगर कभी कभी

मुझ से पहले : अहमद फ़राज़

मुझ से पहले तुझे जिस शख़्स ने चाहा उस ने
शायद अब भी तिरा ग़म दिल से लगा रक्खा हो
एक बे-नाम सी उम्मीद पे अब भी शायद
अपने ख़्वाबों के जज़ीरों को सजा रक्खा हो
मैं ने माना कि वो बेगाना-ए-पैमान-ए-वफ़ा
खो चुका है जो किसी और की रानाई में
शायद अब लौट के आए न तिरी महफ़िल में
और कोई दुख न रुलाये तुझे तन्हाई में
मैं ने माना कि शब ओ रोज़ के हंगामों में
वक़्त हर ग़म को भुला देता है रफ़्ता रफ़्ता
चाहे उम्मीद की शमएँ हों कि यादों के चराग़
मुस्तक़िल बोद बुझा देता है रफ़्ता रफ़्ता
फिर भी माज़ी का ख़याल आता है गाहे-गाहे
मुद्दतें दर्द की लौ कम तो नहीं कर सकतीं
ज़ख़्म भर जाएँ मगर दाग़ तो रह जाता है
दूरियों से कभी यादें तो नहीं मर सकतीं
ये भी मुमकिन है कि इक दिन वो पशीमाँ हो कर
तेरे पास आए ज़माने से किनारा कर ले
तू कि मासूम भी है ज़ूद-फ़रामोश भी है
उस की पैमाँ-शिकनी को भी गवारा कर ले
और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझा
एक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैं
इसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ

वापसी : अहमद फ़राज़

उस ने कहा
सुन
अहद निभाने की ख़ातिर मत आना
अहद निभाने वाले अक्सर
मजबूरी या महजूरी की थकन से लौटा करते हैं
तुम जाओ
और दरिया दरिया प्यास बुझाओ
जिन आँखों में डूबो
जिस दिल में उतरो
मेरी तलब आवाज़ न देगी
लेकिन जब मेरी चाहत
और मिरी ख़्वाहिश की लौ
इतनी तेज़ और इतनी
ऊँची हो जाए
जब दिल रो दे
तब लौट आना

मुहासरा : अहमद फ़राज़

मिरे ग़नीम ने मुझ को पयाम भेजा है
कि हल्क़ा-ज़न हैं मिरे गिर्द लश्करी उस के
फ़सील-ए-शहर के हर बुर्ज हर मनारे पर
कमाँ-ब-दस्त सितादा हैं अस्करी उस के
वो बर्क़ लहर बुझा दी गई है जिस की तपिश
वजूद-ए-ख़ाक में आतिश-फ़िशाँ जगाती थी
बिछा दिया गया बारूद उस के पानी में
वो जू-ए-आब जो मेरी गली को आती थी
सभी दुरीदा-दहन अब बदन-दरीदा हुए
सपुर्द-ए-दार-ओ-रसन सारे सर-कशीदा हुए
तमाम सूफ़ी ओ सालिक सभी शुयूख़ ओ इमाम
उमीद-ए-लुत्फ़ पे ऐवान-ए-कज-कुलाह में हैं
मोअज़्ज़िज़ीन-ए-अदालत भी हल्फ़ उठाने को
मिसाल-ए-साइल-ए-मुबर्रम नशिस्ता राह में हैं
तुम अहल-ए-हर्फ़ कि पिंदार के सना-गर थे
वो आसमान-ए-हुनर के नुजूम सामने हैं
बस इक मुसाहिब-ए-दरबार के इशारे पर
गदागरान-ए-सुख़न के हुजूम सामने हैं
क़लंदरान-ए-वफ़ा की असास तो देखो
तुम्हारे साथ है कौन आस-पास तो देखो
सो शर्त ये है जो जाँ की अमान चाहते हो
तो अपने लौह-ओ-क़लम क़त्ल-गाह में रख दो
वगर्ना अब के निशाना कमान-दारों का
बस एक तुम हो सो ग़ैरत को राह में रख दो
ये शर्त-नामा जो देखा तो एलची से कहा
उसे ख़बर नहीं तारीख़ क्या सिखाती है
कि रात जब किसी ख़ुर्शीद को शहीद करे
तो सुब्ह इक नया सूरज तराश लाती है
सो ये जवाब है मेरा मिरे अदू के लिए
कि मुझ को हिर्स-ए-करम है न ख़ौफ़-ए-ख़म्याज़ा
उसे है सतवत-ए-शमशीर पर घमंड बहुत
उसे शिकोह-ए-क़लम का नहीं है अंदाज़ा
मिरा क़लम नहीं किरदार उस मुहाफ़िज़ का
जो अपने शहर को महसूर कर के नाज़ करे
मिरा क़लम नहीं कासा किसी सुबुक-सर का
जो ग़ासिबों को क़सीदों से सरफ़राज़ करे
मिरा क़लम नहीं औज़ार उस नक़ब-ज़न का
जो अपने घर की ही छत में शिगाफ़ डालता है
मिरा क़लम नहीं उस दुज़द-ए-नीम-शब का रफ़ीक़
जो बे-चराग़ घरों पर कमंद उछालता है
मिरा क़लम नहीं तस्बीह उस मोबल्लिग़ की
जो बंदगी का भी हर दम हिसाब रखता है
मिरा क़लम नहीं मीज़ान ऐसे आदिल की
जो अपने चेहरे पे दोहरा नक़ाब रखता है
मिरा क़लम तो अमानत है मेरे लोगों की
मिरा क़लम तो अदालत मिरे ज़मीर की है
इसी लिए तो जो लिक्खा तपाक-ए-जाँ से लिखा
जभी तो लोच कमाँ का ज़बान तीर की है
मैं कट गिरूँ कि सलामत रहूँ यक़ीं है मुझे
कि ये हिसार-ए-सितम कोई तो गिराएगा
तमाम उम्र की ईज़ा-नसीबियों की क़सम
मिरे क़लम का सफ़र राएगाँ न जाएगा
सरिश्त-ए-इश्क़ ने उफ़्तादगी नहीं पाई
तू कद्द-ए-सर्व न बीनी ओ साया-पैमाई

ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में : अहमद फ़राज़

ये मेरी ग़ज़लें ये मेरी नज़्में
तमाम तेरी हिकायतें हैं
ये तज़्किरे तेरे लुत्फ़ के हैं
ये शे'र तेरी शिकायतें हैं
मैं सब तिरी नज़्र कर रहा हूँ
ये उन ज़मानों की साअ'तें हैं
जो ज़िंदगी के नए सफ़र में
तुझे किसी वक़्त याद आएँ
तो एक इक हर्फ़ जी उठेगा
पहन के अन्फ़ास की क़बाएँ
उदास तन्हाइयों के लम्हों
में नाच उट्ठेंगी ये अप्सराएँ
मुझे तिरे दर्द के अलावा भी
और दुख थे ये मानता हूँ
हज़ार ग़म थे जो ज़िंदगी की
तलाश में थे ये जानता हूँ
मुझे ख़बर थी कि तेरे आँचल में
दर्द की रेत छानता हूँ
मगर हर इक बार तुझ को छू कर
ये रेत रंग-ए-हिना बनी है
ये ज़ख़्म गुलज़ार बन गए हैं
ये आह-ए-सोज़ाँ घटा बनी है
ये दर्द मौज-ए-सबा हुआ है
ये आग दिल की सदा बनी है
और अब ये सारी मता-ए-हस्ती
ये फूल ये ज़ख़्म सब तिरे हैं
ये दुख के नौहे ये सुख के नग़्मे
जो कल मिरे थे वो अब तिरे हैं
जो तेरी क़ुर्बत तिरी जुदाई
में कट गए रोज़-ओ-शब तिरे हैं
वो तेरा शाइ'र तिरा मुग़न्नी
वो जिस की बातें अजीब सी थीं
वो जिस के अंदाज़ ख़ुसरवाना थे
और अदाएँ ग़रीब सी थीं
वो जिस के जीने की ख़्वाहिशें भी
ख़ुद उस के अपने नसीब सी थीं
न पूछ इस का कि वो दिवाना
बहुत दिनों का उजड़ चुका है
वो कोहकन तो नहीं था लेकिन
कड़ी चटानों से लड़ चुका है
वो थक चुका था और उस का तेशा
उसी के सीने में गड़ चुका है

ख़्वाबों के ब्योपारी : अहमद फ़राज़

हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे
पर इस में हुआ नुक़सान बड़ा
कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी
कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा
हम राख लिए हैं झोली में
और सर पे है साहूकार खड़ा
याँ बूँद नहीं है डेवे में
वो बाज-ब्याज की बात करे
हम बाँझ ज़मीन को तकते हैं
वो ढोर अनाज की बात करे
हम कुछ दिन की मोहलत माँगें
वो आज ही आज की बात करे
जब धरती सहरा सहरा थी
हम दरिया दरिया रोए थे
जब हाथ की रेखाएँ चुप थीं
और सुर संगीत में सोए थे
तब हम ने जीवन-खेती में
कुछ ख़्वाब अनोखे बोए थे
कुछ ख़्वाब सजल मुस्कानों के
कुछ बोल कबत दीवानों के
कुछ लफ़्ज़ जिन्हें मअनी न मिले
कुछ गीत शिकस्ता-जानों के
कुछ नीर वफ़ा की शम्ओं के
कुछ पर पागल परवानों के
पर अपनी घायल आँखों से
ख़ुश हो के लहू छिड़काया था
माटी में मास की खाद भरी
और नस नस को ज़ख़माया था
और भूल गए पिछली रुत में
क्या खोया था क्या पाया था
हर बार गगन ने वहम दिया
अब के बरखा जब आएगी
हर बीज से कोंपल फूटेगी
और हर कोंपल फल लाएगी
सर पर छाया छतरी होगी
और धूप घटा बन जाएगी
जब फ़स्ल कटी तो क्या देखा
कुछ दर्द के टूटे गजरे थे
कुछ ज़ख़्मी ख़्वाब थे काँटों पर
कुछ ख़ाकिस्तर से कजरे थे
और दूर उफ़ुक़ के सागर में
कुछ डोलते डूबते बजरे थे
अब पाँव खड़ाऊँ धूल-भरी
और जिस्म पे जोग का चोला है
सब संगी साथी भेद-भरे
कोई मासा है कोई तोला है
इस ताक में ये इस घात में वो
हर ओर ठगों का टोला है
अब घाट न घर दहलीज़ न दर
अब पास रहा है क्या बाबा
बस तन की गठरी बाक़ी है
जा ये भी तू ले जा बाबा
हम बस्ती छोड़े जाते हैं
तू अपना क़र्ज़ चुका बाबा

मत क़त्ल करो आवाज़ों को : अहमद फ़राज़

तुम अपने अक़ीदों के नेज़े
हर दिल में उतारे जाते हो
हम लोग मोहब्बत वाले हैं
तुम ख़ंजर क्यूँ लहराते हो
इस शहर में नग़्मे बहने दो
बस्ती में हमें भी रहने दो
हम पालनहार हैं फूलों के
हम ख़ुश्बू के रखवाले हैं
तुम किस का लहू पीने आए
हम प्यार सिखाने वाले हैं
इस शहर में फिर क्या देखोगे
जब हर्फ़ यहाँ मर जाएगा
जब तेग़ पे लय कट जाएगी
जब शेर सफ़र कर जाएगा
जब क़त्ल हुआ सुर साज़ों का
जब काल पड़ा आवाज़ों का
जब शहर खंडर बन जाएगा
फिर किस पर संग उठाओगे
अपने चेहरे आईनों में
जब देखोगे डर जाओगे

दोस्ती का हाथ : अहमद फ़राज़

गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं
उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं
फ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी
कि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं
तुम्हारे बाम की शमएँ भी ताबनाक नहीं
मिरे फ़लक के सितारे भी ज़र्द ज़र्द से हैं
तुम्हारे आइना-ख़ाने भी ज़ंग-आलूदा
मिरे सुराही ओ साग़र भी गर्द गर्द से हैं
न तुम को अपने ख़द-ओ-ख़ाल ही नज़र आएँ
न मैं ये देख सकूँ जाम में भरा क्या है
बसारतों पे वो जाले पड़े कि दोनों को
समझ में कुछ नहीं आता कि माजरा क्या है
न सर्व में वो ग़ुरूर-ए-कशीदा-क़ामती है
न क़ुमरियों की उदासी में कुछ कमी आई
न खिल सके किसी जानिब मोहब्बतों के गुलाब
न शाख़-ए-अम्न लिए फ़ाख़्ता कोई आई
तुम्हें भी ज़िद है कि मश्क़-ए-सितम रहे जारी
हमें भी नाज़ कि जौर-ओ-जफ़ा के आदी हैं
तुम्हें भी ज़ोम महा-भारता लड़ी तुम ने
हमें भी फ़ख़्र कि हम कर्बला के आदी हैं
सितम तो ये है कि दोनों के मर्ग़-ज़ारों से
हवा-ए-फ़ित्ना ओ बू-ए-फ़साद आती है
अलम तो ये है कि दोनों को वहम है कि बहार
अदू के ख़ूँ में नहाने के बा'द आती है
तो अब ये हाल हुआ इस दरिंदगी के सबब
तुम्हारे पाँव सलामत रहे न हाथ मिरे
न जीत जीत तुम्हारी न हार हार मिरी
न कोई साथ तुम्हारे न कोई साथ मिरे
हमारे शहरों की मजबूर ओ बे-नवा मख़्लूक़
दबी हुई है दुखों के हज़ार ढेरों में
अब उन की तीरा-नसीबी चराग़ चाहती है
जो लोग निस्फ़ सदी तक रहे अँधेरों में
चराग़ जिन से मोहब्बत की रौशनी फैले
चराग़ जिन से दिलों के दयार रौशन हों
चराग़ जिन से ज़िया अम्न-ओ-आश्ती की मिले
चराग़ जिन से दिए बे-शुमार रौशन हूँ
तुम्हारे देस में आया हूँ दोस्तो अब के
न साज़-ओ-नग़्मा की महफ़िल न शाइ'री के लिए
अगर तुम्हारी अना ही का है सवाल तो फिर
चलो मैं हाथ बढ़ाता हूँ दोस्ती के लिए

हच-हाईकर : अहमद फ़राज़

मैं कि दो रोज़ का मेहमान तिरे शहर में था
अब चला हूँ तो कोई फ़ैसला कर भी न सका
ज़िंदगी की ये घड़ी टूटता पुल हो जैसे
कि ठहर भी न सकूँ और गुज़र भी न सकूँ
मेहरबाँ हैं तिरी आँखें मगर ऐ मूनिस-ए-जाँ
इन से हर ज़ख़्म-ए-तमन्ना तो नहीं भर सकता
ऐसी बे-नाम मसाफ़त हो तो मंज़िल कैसी
कोई बस्ती हो बसेरा ही नहीं कर सकता
एक मुद्दत हुई लैला-ए-वतन से बिछड़े
अब भी रिसते हैं मगर ज़ख़्म पुराने मेरे
जब से सरसर मिरे गुलशन में चली है तब से
बर्ग-ए-आवारा की मानिंद ठिकाने मेरे
आज इस शहर कल उस शहर का रस्ता लेना
हाए क्या चीज़ ग़रीब-उल-वतनी होती है
ये सफ़र इतना मुसलसल है कि थक हार के भी
बैठ जाता हूँ जहाँ छाँव घनी होती है
तू भी ऐसा ही दिल-आराम शजर है जिस ने
मुझ को इस दश्त-ए-क़यामत से बचाए रखा
एक आशुफ़्ता-सर ओ आबला-पा की ख़ातिर
कभी ज़ुल्फ़ों कभी पलकों को बिछाए रखा
दुख तो हर वक़्त तआक़ुब में रहा करते हैं
यूँ पनाहों में कहाँ तक कोई रह सकता है
कब तलक रेत की दीवार सँभाले कोई
वो थकन है कि मेरा जिस्म भी ढह सकता है
अजनबी लोग नए लोग पराई गलियाँ
ज़िंदगी ऐसे क़राइन में कटेगी कैसे
तेरी चाहत भी मुक़द्दस तेरी क़ुर्बत भी बहिश्त
देस प्रदेश की तफ़रीक़ घटेगी कैसे
ना-गुज़ीर आज हुआ जैसे बिछड़ना अपना
कल किसी रोज़ मुलाक़ात भी इम्कान में है
मैं ये पैराहन-ए-जाँ कैसे बदल सकता हूँ
कि तिरा हाथ मेरे दिल के गरेबान में है

ऐ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा : अहमद फ़राज़

उम्रों की मसाफ़त से
थक-हार गए आख़िर
सब अह्द अज़िय्यत के
बेकार गए आख़िर
अग़्यार की बाँहों में
दिलदार गए आख़िर
रो कर तिरी क़िस्मत को
ग़म-ख़्वार गए आख़िर
यूँ ज़िंदगी गुज़रेगी
ता चंद वफ़ा-केशा
वो वादी-ए-उल्फ़त थी
या कोह-ए-अलम जो था
सब मद्द-ए-मुक़ाबिल थे
ख़ुसरव था कि जम जो था
हर राह में टपका है
ख़ूनाबा बहम जो था
रस्तों में लुटाया है
वो बेश कि कम जो था
नै रंज-ए-शिकस्त-ए-दिल
नै जान का अंदेशा

कुछ अहल-ए-रिया भी तो
हमराह हमारे थे
रहरव थे कि रहज़न थे
जो रूप भी धारे थे कुछ सहल-तलब भी थे
वो भी हमें प्यारे थे
अपने थे कि बेगाने
हम ख़ुश थे कि सारे थे
सौ ज़ख़्म थे नस नस में
घायल थे रग-ओ-रेशा
जो जिस्म का ईंधन था
गुलनार किया हम ने
वो ज़ह्र कि अमृत था
जी भर के पिया हम ने
सौ ज़ख़्म उभर आए
जब दिल को सिया हम ने
क्या क्या न मोहब्बत की
क्या क्या न जिया हम ने
लो कूच किया घर से
लो जोग लिया हम ने
जो कुछ था दिया हम ने
और दिल से कहा हम ने
रुकना नहीं दरवेशा
यूँ है कि सफ़र अपना
था ख़्वाब न अफ़्साना
आँखों में अभी तक है
फ़र्दा का परी-ख़ाना
सद-शुक्र सलामत है
पिंदार-ए-फ़क़ीराना
इस शहर-ए-ख़मोशी में
फिर नारा-ए-मस्ताना
ऐ हिम्मत-ए-मर्दाना
सद-ख़ारा-ओ-यक-तेशा
ऐ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा
ऐ इश्क़-ए-जुनूँ-पेशा

अगर ये सब कुछ नहीं : अहमद फ़राज़

मिले तो हम आज भी हैं लेकिन
न मेरे दिल में वो तिश्नगी थी
कि तुझ से मिल कर कभी न बिछड़ूँ
न आज तुझ में वो ज़िंदगी थी
कि जिस्म-ओ-जाँ में उबाल आए
न ख़्वाब-ज़ारों में रौशनी थी
न मेरी आँखें चराग़ की लौ
न तुझ में ही ख़ुद-सुपुर्दगी थी
न बात करने की कोई ख़्वाहिश
न चुप ही में ख़ूब-सूरती थी
मुजस्समों की तरह थे दोनों
न दोस्ती थी न दुश्मनी थी
मुझे तो कुछ यूँ लगा है जैसे
वो साअ'तें भी गुज़र गई हैं
कि जिन को हम ला-ज़वाल समझे
वो ख़्वाहिशें भी तो मर गई हैं
जो तेरे मेरे लहू की हिद्दत
को आख़िरश बर्फ़ कर गई हैं
मोहब्बतें शौक़ की चटानों
से घाटियों में उतर गई हैं
वो क़ुर्बतें वो जुदाइयाँ सब
ग़ुबार बन कर बिखर गई हैं
अगर ये सब कुछ नहीं तो बतला
वो चाहतें अब किधर गई हैं

ईद-कार्ड : अहमद फ़राज़

तुझ से बिछड़ कर भी ज़िंदा था
मर मर कर ये ज़हर पिया है
चुप रहना आसान नहीं था
बरसों दिल का ख़ून किया है
जो कुछ गुज़री जैसी गुज़री
तुझ को कब इल्ज़ाम दिया है
अपने हाल पे ख़ुद रोया हूँ
ख़ुद ही अपना चाक सिया है
कितनी जाँकाही से मैं ने
तुझ को दिल से महव किया है
सन्नाटे की झील में तू ने
फिर क्यूँ पत्थर फेंक दिया है

ऐ मेरे सारे लोगो : अहमद फ़राज़

अब मिरे दूसरे बाज़ू पे वो शमशीर है जो
इस से पहले भी मिरा निस्फ़ बदन काट चुकी
उसी बंदूक़ की नाली है मिरी सम्त कि जो
इस से पहले मिरी शह-रग का लहू चाट चुकी
फिर वही आग दर आई है मिरी गलियों में
फिर मिरे शहर में बारूद की बू फैली है
फिर से ''तू कौन है मैं कौन हूँ'' आपस में सवाल
फिर वही सोच मियान-ए-मन-ओ-तू फैली है
मिरी बस्ती से परे भी मिरे दुश्मन होंगे
पर यहाँ कब कोई अग़्यार का लश्कर उतरा
आश्ना हाथ ही अक्सर मिरी जानिब लपके
मेरे सीने में सदा अपना ही ख़ंजर उतरा
फिर वही ख़ौफ़ की दीवार तज़ब्ज़ुब की फ़ज़ा
फिर वही आम हुईं अहल-ए-रिया की बातें
नारा-ए-हुब्ब-ए-वतन माल-ए-तिजारत की तरह
जिंस-ए-अर्ज़ां की तरह दीन-ए-ख़ुदा की बातें
इस से पहले भी तो ऐसी ही घड़ी आई थी
सुब्ह-ए-वहशत की तरह शाम-ए-ग़रीबाँ की तरह
इस से पहले भी तो पैमान-ए-वफ़ा टूटे थे
शीशा-ए-दिल की तरह आईना-ए-जाँ की तरह
फिर कहाँ अहमरीं होंटों पे दुआओं के दिए
फिर कहाँ शबनमीं चेहरों पे रिफ़ाक़त की रिदा
संदलीं पाँव से मस्ताना-रवी रूठ गई
मरमरीं हाथों पे जल-बुझ गया अँगार-ए-हिना
दिल-नशीं आँखों में फुर्क़त-ज़दा काजल रोया
शाख़-ए-बाज़ू के लिए ज़ुल्फ़ का बादल रोया
मिस्ल-ए-पैराहन-ए-गुल फिर से बदन चाक हुए
जैसे अपनों की कमानों में हों अग़्यार के तीर
इस से पहले भी हुआ चाँद मोहब्बत का दो-नीम
नोक-ए-दशना से खिची थी मिरी धरती पे लकीर
आज ऐसा नहीं ऐसा नहीं होने देना
ऐ मिरे सोख़्ता-जानो मिरे पियारे लोगो
अब के गर ज़लज़ले आए तो क़यामत होगी
मेरे दिल-गीर मिरे दर्द के मारे लोगो
किसी ग़ासिब किसी ज़ालिम किसी क़ातिल के लिए
ख़ुद को तक़्सीम न करना मिरे सारे लोगो

अभी हम ख़ूबसूरत हैं : अहमद फ़राज़

अभी हम ख़ूबसूरत हैं
हमारे जिस्म औराक़-ए-ख़िज़ानी हो गए हैं
और रिदा-ए-ज़ख़्म से आरास्ता हैं
फिर भी देखो तो
हमारी ख़ुश-नुमाई पर कोई हर्फ़
और कशीदा-कामती में ख़म नहीं आया
हमारे होंट ज़हरीली रुतों से कासनी हैं
और चेहरे रतजगों की शो'लगी से
आबनूसी हो चुके हैं
और ज़ख़्मी ख़्वाब
नादीदा जज़ीरों की ज़मीं पर
इस तरह बिखरे पड़े हैं
जिस तरह तूफ़ाँ-ज़दा कश्ती के टुकड़ों को
समुंदर साहिलों पर फेंक देता है
लहू की बारिशें
या ख़ुद-कुशी की ख़्वाहिशें थीं
इस अज़िय्यत के सफ़र में
कौन सा मौसम नहीं आया
मगर आँखों में नम
लहजे में सम
होंटों पे कोई नग़्मा-ए-मातम नहीं आया
अभी तक दिल हमारे
ख़ंदा-ए-तिफ़लाँ की सूरत बे-कुदूरत हैं
अभी हम ख़ूबसूरत हैं
ज़माने हो गए
हम कू-ए-जानाँ छोड़ आए थे
मगर अब भी
बहुत से आश्ना ना-आश्ना हमदम
और उन की याद के मानूस क़ासिद
और उन की चाहतों के हिज्र-नामे
दूर देसों से हमारी ओर आते हैं
गुलाबी मौसमों की धूप
जब नौरस्ता सब्ज़े पर क़दम रखती हुई
मा'मूरा-ए-तन में दर आती है
तू बर्फ़ानी बदन में
जू-ए-ख़ूँ आहिस्तगी से गुनगुनाती है
उदासी का परिंदा
चुप के जंगल में
सर-ए-शाख़-ए-निहाल-ए-ग़म चहकता है
कोई भूला हुआ बिसरा हुआ दुख
आबला बिन कर टपकता है
तो यूँ लगता है
जैसे हर्फ़ अपने
ज़िंदा आवाज़ों की सूरत हैं
अभी हम ख़ूबसूरत हैं
हमारी ख़ुश-नुमाई हर्फ़-ए-हक़ की रू-नुमाई है
उसी ख़ातिर तो हम आशुफ़्ता-जाँ
उश्शाक़ की यादों में रहते हैं
कि जो उन पर गुज़रती है वो कहते हैं
हमारी हर्फ़-साज़ी
अब भी महबूब-ए-जहाँ है
शायरी शोरीद-गान-ए-इश्क़ के विर्द-ए-ज़बाँ है
और गुलाबों की तरह शादाँ चेहरे
ला'ल ओ मर्जां की तरह लब
संदलीं हाथों से
चाहत और अक़ीदत की बयाज़ों पर
हमारे नाम लिखते हैं
सभी दर्द-आश्ना
ईसार मशरब
हम-नफ़स अहल-ए-क़फ़स
जब मक़्तलों की सम्त जाते हैं
हमारे बैत गाते हैं
अभी तक नाज़ करते हैं सब अहल-ए-क़ाफ़िला
अपने हुदी-ख़्वानों पर आशुफ़्ता-कलामों पर
अभी हम दस्तख़त करते हैं अपने क़त्ल-नामों पर
अभी हम आसमानों की अमानत
और ज़मीनों की ज़रूरत हैं
अभी हम ख़ूबसूरत हैं

शहर-नामा : अहमद फ़राज़

वो 'अजीब सुब्ह-ए-बहार थी
कि सहर से नौहागरी रही
मिरी बस्तियाँ थीं धुआँ-धुआँ
मिरे घर में आग भरी रही
मिरे रास्ते थे लहू-लहू
मिरा क़र्या क़र्या फ़िगार था
ये कफ़-ए-हवा पे ज़मीन थी
वो फ़लक कि मुश्त-ए-ग़ुबार था
कई आबशार से जिस्म थे
कि जो क़तरा-क़तरा पिघल गए
कई ख़ुश-जमाल तिलिस्म थे
जिन्हें गर्द-बाद निगल गए
कोई ख़्वाब नोक-ए-सिनाँ पे था
कोई आरज़ू तह-ए-संग थी
कोई फूल आबला आबला
कोई शाख़ मरक़द-ए-रंग थी
कई लापता मेरी लो'बतें
जो किसी तरफ़ की न हो सकीं
जो न आने वालों के साथ थीं
जो न जाने वालों को रो सकीं
कई तार साज़ से कट गए
किसी मुतरिबा की रग-ए-गुलू
मय-ए-आतिशीं में वो ज़हर था
कि तड़ख़ गए क़दह-ओ-सुबू
कोई नय-नवाज़ था दम-ब-ख़ुद
कि नफ़स से हिद्दत-ए-जाँ गई
कोई सर-ब-ज़ानू था 'बारबद'
कि सदा-ए-दोस्त कहाँ गई
कहीं नग़मगी में वो बैन थे
कि समा'अतों ने सुने नहीं
कहीं गूँजते थे वो मरसिए
कि 'अनीस' ने भी कहे नहीं
ये जो संग-रेज़ों के ढेर हैं
यहाँ मोतियों की दुकान थी
ये जो साएबान धुएँ के हैं
यहाँ बादलों की उड़ान थी
जहाँ रौशनी है खंडर खंडर
यहाँ क़ुमक़ुमों से जवान थे
जहाँ च्यूंटियाँ हुईं ख़ेमा-ज़न
यहाँ जुगनूओं के मकान थे
कहीं आबगीना ख़याल का
कि जो कर्ब-ए-ज़ब्त से चूर था
कहीं आईना किसी याद का
कि जो 'अक्स-ए-यार से दूर था
मिरे बिस्मिलों की क़नाअतें
जो बढ़ाएँ ज़ुल्म के हौसले
मिरे आहूओं का चकीदा ख़ूँ
जो शिकारियों को सुराग़ दे
मिरी अद्ल-गाहों की मस्लहत
मिरे क़ातिलों की वकील है
मिरे ख़ानक़ाहों की मंज़िलत
मिरी बुज़दिली की दलील है
मिरे अहल-ए-हर्फ़-ओ-सुख़न-सरा
जो गदागरों में बदल गए
मिरे हम-सफ़ीर थे हीला-जू
किसी और सम्त निकल गए
कई फ़ाख़्ताओं की चाल में
मुझे करगसों का चलन लगा
कई चाँद भी थे सियाह रू
कई सूरजों को गहन लगा
कोई ताजिर-ए-हस्ब-ओ-नसब
कोई दीं-फ़रोश क़दीम है
यहाँ क़फ़्श-बर भी इमाम हैं
यहाँ ना'त-ख़्वाँ भी कलीम है
कोई फ़िक्रमंद कुलाह का
कोई दा'वे-दार क़बा का है
वही अहल-ए-दिल भी हैं ज़ेब-तन
जो लिबास अहल-ए-रिया का है
मिरे पासबाँ मिरे नक़्ब-ज़न
मिरा मुल्क मुल्क-ए-यतीम है
मिरा देस मीर-ए-सिपाह का
मिरा शहर माल-ए-ग़नीम है
जो रविश है साहिब-ए-तख़्त की
सो मुसाहिबों का तरीक़ है
यहाँ कोतवाल भी दुज़्द-ए-शब
यहाँ शैख़-ए-दीं भी फ़रीक़ है
यहाँ सब के नर्ख़ जुदा जुदा
इसे मोल लो इसे तौल दो
जो तलब करे कोई ख़ूँ-बहा
तो दहन ख़ज़ाने का खोल दो
वो जो सर-कशी का हो मुर्तकिब
उसे क़मचियों से ज़ुबूँ करो
जहाँ ख़ल्क़-ए-शहर हो मुश्त'इल
उसे गोलियों से निगूँ करो
मगर ऐसे ऐसे ग़नी भी थे
इसी क़ह्त-ज़ार-ए-दमिशक़ में
जिन्हें कू-ए-यार 'अज़ीज़ था
जो खड़े थे मक़्तल-ए-इश्क़ में
कोई बाँकपन में था कोहकन
तो जुनूँ में क़ैस सा था कोई
जो सुराहियाँ लिए जिस्म की
मय-ए-नाब ख़ूँ से भरी हुई
थे सदा-ब-लब कि पियो पियो
ये सबील अहल-ए-सफ़ा की है
ये नशीद नोश-ए-बदन करो
ये कशीद ताक-ए-वफ़ा की है
कोई तिश्ना-लब ही न था यहाँ
जो पुकारता कि इधर उधर
सभी मुफ़्त-बर थे तमाश-बीं
कोई बज़्म में कोई बाम पर
सभी बे-हिसी के ख़ुमार में
सभी अपने हाल में मस्त थे
सभी रहरवान-ए-रह-ए-अदम
मगर अपने ज़ो'म में हस्त थे
सो लहू के जाम उंडेल कर
मिरे जाँ-फ़रोश चले गए
वो सुकूत था सर-ए-मय-कदा
कि वो नम-बदोश चले गए
कोई महबसों में रसन-ब-पा
कोई मक़्तलों में दरीदा तन
न किसी के हाथ में शाख़-ए-नय
न किसी के लब पे गुल-ए-सुख़न
इसी अर्सा-ए-शब-ए-तार में
यूँही एक 'उम्र गुज़र गई
कभी रोज़-ए-वस्ल भी देखते
ये जो आरज़ू थी वो मर गई
यहाँ रोज़ हश्र बपा हुए
पे कोई भी रोज़-ए-जज़ा नहीं
यहाँ ज़िंदगी भी 'अज़ाब है
यहाँ मौत में भी शिफ़ा नहीं

हमदर्द : अहमद फ़राज़

ऐ दिल उन आँखों पर न जा
जिन में वफ़ूर-ए-रंज से
कुछ देर को तेरे लिए
आँसू अगर लहरा गए
ये चंद लम्हों की चमक
जो तुझ को पागल कर गई
इन जुगनुओं के नूर से
चमकी है कब वो ज़िंदगी
जिस के मुक़द्दर में रही
सुब्ह-ए-तलब से तीरगी
किस सोच में गुम-सुम है तू
ऐ बे-ख़बर नादाँ न बन
तेरी फ़सुर्दा रूह को
चाहत के काँटों की तलब
और उस के दामन में फ़क़त
हमदर्दियों के फूल हैं

मैं और तू : अहमद फ़राज़

रोज़ जब धूप पहाड़ों से उतरने लगती
कोई घटता हुआ बढ़ता हुआ बेकल साया
एक दीवार से कहता कि मिरे साथ चलो
और ज़ंजीर-ए-रिफ़ाक़त से गुरेज़ाँ दीवार
अपने पिंदार के नश्शे में सदा इस्तादा
ख़्वाहिश-ए-हमदम-ए-देरीना पे हँस देती थी
कौन दीवार किसी साए के हम-राह चली
कौन दीवार हमेशा मगर इस्तादा रही
वक़्त दीवार का साथी है न साए का रफ़ीक़
और अब संग-ओ-गिल-ओ-ख़िश्त के मलबे के तले
उसी दीवार का पिंदार है रेज़ा रेज़ा
धूप निकली है मगर जाने कहाँ है साया

सरहदें : अहमद फ़राज़

किस से डरते हो कि सब लोग तुम्हारी ही तरह
एक से हैं वही आँखें वही चेहरे वही दिल
किस पे शक करते हो जितने भी मुसाफ़िर हैं यहाँ
एक ही सब का क़बीला वही पैकर वही गिल
हम तो वो थे कि मोहब्बत था वतीरा जिन का
प्यार से मिलता तो दुश्मन के भी हो जाते थे
इस तवक़्क़ो पे कि शायद कोई मेहमाँ आ जाए
घर के दरवाज़े खुले छोड़ के सो जाते थे
हम तो आए थे कि देखेंगे तुम्हारे क़र्ये
वो दर-ओ-बाम कि तारीख़ के सूरत-गर हैं
वो अरीने वो मसाजिद वो कलीसा वो महल
और वो लोग जो हर नक़्श से अफ़ज़ल-तर हैं
रोम के बुत हों कि पैरिस की हो मोनालीज़ा
कीट्स की क़ब्र हो या तुर्बत-ए-फ़िरदौसी हो
क़र्तबा हो कि अजंता कि मोहनजोदाड़ो
दीदा-ए-शौक़ न महरूम-ए-नज़र-बोसी हो
किस ने दुनिया को भी दौलत की तरह बाँटा है
किस ने तक़्सीम किए हैं ये असासे सारे
किस ने दीवार तफ़ावुत की उठाई लोगो
क्यूँ समुंदर के किनारे पे हैं प्यासे सारे

कर गए कूच कहाँ : अहमद फ़राज़

इतनी मुद्दत दिल-ए-आवारा कहाँ था कि तुझे
अपने ही घर के दर-ओ-बाम भुला बैठे हैं
याद यारों ने तो कब हर्फ़-ए-मोहब्बत रक्खा
ग़ैर भी तअना ओ दुश्नाम भुला बैठे हैं
तो समझता था कि ये दर-बदरी का आलम
दूर देसों की इनायत था सो अब ख़त्म हुआ
तू ने जाना था कि आशुफ़्ता-सरी का मौसम
दश्त-ए-ग़ुर्बत की वदीअत था सो अब ख़त्म हुआ
अब जो तू शहर-ए-निगाराँ में क़दम रक्खेगा
हर तरफ़ खिलते चले जाएँगे चेहरों के गुलाब
दोस्त-अहबाब तिरे नाम के टकराएँगे जाम
ग़ैर-अग़्यार चुकाएँगे रक़ाबत के हिसाब
जब भी गाएगी कोई ग़ैरत-ए-नाहीद ग़ज़ल
सब को आएगा नज़र शोला-ए-आवाज़ में तू
जब भी साक़ी ने सुराही को दिया इज़्न-ए-ख़िराम
बज़्म की बज़्म पुकारेगी कि आग़ाज़ में तू
माएँ रक्खेंगी तिरे नाम पे औलाद का नाम
बाप बेटों के लिए तेरी बयाज़ें लेंगे
जिन पे क़दग़न है वो अशआर पढ़ेगी ख़िल्क़त
और टूटे हुए दिल तुझ को सलामी देंगे
लोग उल्फ़त के खिलौने लिए बच्चों की तरह
कल के रूठे हुए यारों को मना लाएँगे
लफ़्ज़ को बेचने वाले नए बाज़ारों में
ग़ैरत हर्फ़ को लाते हुए शरमाएँगे
लेकिन ऐसा नहीं ऐसा नहीं ऐ दिल ऐ दिल
ये तिरा देस ये तेरे दर-ओ-दीवार नहीं
इतने यूसुफ़ तो न थे मिस्र के बाज़ार में भी
जिंस इस दर्जा है वाफ़िर कि ख़रीदार नहीं
सर किसी का भी दिखाई नहीं देता है यहाँ
जिस्म ही जिस्म हैं दस्तारें ही दस्तारें हैं
तू किसी क़र्या-ए-ज़िंदाँ में है शायद कि जहाँ
तौक़ ही तौक़ हैं दीवारें ही दीवारें हैं
अब न तिफ़्लाँ को ख़बर है किसी दीवाने की
और न आवाज़ कि ''ओ चाक गरेबाँ वाले''
न किसी हाथ में पत्थर न किसी हाथ में फूल
कर गए कूच कहाँ कूचा-ए-जानाँ वाले

कनीज़ : अहमद फ़राज़

हुज़ूर आप और निस्फ़ शब मिरे मकान पर
हुज़ूर की तमाम-तर बलाएँ मेरी जान पर
हुज़ूर ख़ैरियत तो है हुज़ूर क्यूँ ख़मोश हैं
हुज़ूर बोलिए कि वसवसे वबाल-ए-होश हैं
हुज़ूर होंट इस तरह से कपकपा रहे हैं क्यूँ
हुज़ूर आप हर क़दम पे लड़-खड़ा रहे हैं क्यूँ
हुज़ूर आप की नज़र में नींद का ख़ुमार है
हुज़ूर शायद आज दुश्मनों को कुछ बुख़ार है
हुज़ूर मुस्कुरा रहे हैं मेरी बात बात पर
हुज़ूर को न जाने क्या गुमाँ है मेरी ज़ात पर
हुज़ूर मुँह से ब रही है पीक साफ़ कीजिए
हुज़ूर आप तो नशे में हैं मुआफ़ कीजिए
हुज़ूर क्या कहा मैं आप को बहुत अज़ीज़ हूँ
हुज़ूर का करम है वर्ना मैं भी कोई चीज़ हूँ
हुज़ूर छोड़िए हमें हज़ार और रोग हैं
हुज़ूर जाइए कि हम बहुत ग़रीब लोग हैं

तो बेहतर है यही : अहमद फ़राज़

ये तिरी आँखों की बे-ज़ारी ये लहजे की थकन
कितने अंदेशों की हामिल हैं ये दिल की धड़कनें
पेश-तर इस के कि हम फिर से मुख़ालिफ़ सम्त को
बे-ख़ुदा-हाफ़िज़ कहे चल दें झुका कर गर्दनें
आओ उस दुख को पुकारें जिस की शिद्दत ने हमें
इस क़दर इक दूसरे के ग़म से वाबस्ता किया
वो जो तन्हाई का दुख था तल्ख़ महरूमी का दुख
जिस ने हम को दर्द के रिश्ते में पैवस्ता किया
वो जो इस ग़म से ज़ियादा जाँ-गुसिल क़ातिल रहा
वो जो इक सैल-ए-बला-अंगेज़ था अपने लिए
जिस के पल पल में थे सदियों के समुंदर मौजज़न
चीख़ती यादें लिए उजड़े हुए सपने लिए
मैं भी नाकाम-ए-वफ़ा था तो भी महरूम-ए-मुराद
हम ये समझे थे कि दर्द-ए-मुश्तरक रास आ गया
तेरी खोई मुस्कुराहट क़हक़हों में ढल गई
मेरा गुम-गश्ता सुकूँ फिर से मिरे पास आ गया
तपती दो-पहरों में आसूदा हुए बाज़ू मिरे
तेरी ज़ुल्फ़ें इस तरह बिखरीं घटाएँ हो गईं
तेरा बर्फ़ीला बदन बे-साख़्ता लौ दे उठा
मेरी साँसें शाम की भीगी हवाएँ हो गईं
ज़िंदगी की साअतें रौशन थीं शम्ओं की तरह
जिस तरह से शाम गुज़रे जुगनुओं के शहर में
जिस तरह महताब की वादी में दो साए रवाँ
जिस तरह घुंघरू छनक उट्ठें नशे की लहर में
आओ ये सोचें भी क़ातिल हैं तो बेहतर है यही
फिर से हम अपने पुराने ज़हर को अमृत कहें
तू अगर चाहे तो हम इक दूसरे को छोड़ कर
अपने अपने बे-वफ़ाओं के लिए रोते रहें

ऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओ : अहमद फ़राज़

इक उम्र के बाद तुम मिले हो
ऐ मेरे वतन के ख़ुश-नवाओ
हर हिज्र का दिन था हश्र का दिन
दोज़ख़ थे फ़िराक़ के अलाव
रोऊँ कि हँसूँ समझ न आए
हाथों में हैं फूल दिल में घाव
तुम आए तो साथ ही तुम्हारे
बिछड़े हुए यार याद आए
इक ज़ख़्म पे तुम ने हाथ रक्खा
और मुझ को हज़ार याद आए
वो सारे रफ़ीक़ पा-ब-जौलाँ
सब कुश्ता-ए-दार याद आए
हम सब का है एक ही क़बीला
इक दश्त के सारे हम-सफ़र हैं
कुछ वो हैं जो दूसरों की ख़ातिर
आशुफ़्ता-नसीब ओ दर-ब-दर हैं
कुछ वो हैं जो ख़िलअत-ओ-क़बा से
ऐवान-ए-शही में मो'तबर हैं
सुक़रात ओ मसीह के फ़साने
तुम भी तो बहुत सुना रहे थे
मंसूर ओ हुसैन से अक़ीदत
तुम भी तो बहुत जता रहे थे
कहते थे सदाक़तें अमर हैं
औरों को यही बता रहे थे
और अब जो हैं जा-ब-जा सलीबें
तुम बाँसुरियाँ बजा रहे हो
और अब जो है कर्बला का नक़्शा
तुम मदह-ए-यज़ीद गा रहे हो
जब सच तह-ए-तेग़ हो रहा है
तुम सच से नज़र चुरा रहे हो
जी चाहता है कि तुम से पूछूँ
क्या राज़ इस इज्तिनाब में है
तुम इतने कठोर तो नहीं थे
ये बे-हिसी किसी हिसाब में है
तुम चुप हो तो किस तरह से चुप हो
जब ख़ल्क़-ए-ख़ुदा अज़ाब में है
सोचो तो तुम्हें मिला भी क्या है
इक लुक़्मा-ए-तर क़लम की क़ीमत
ग़ैरत को फ़रोख़्त करने वालो
इक कासा-ए-ज़र क़लम की क़ीमत
पिंदार के ताजिरो बताओ
दरबान का दर क़लम की क़ीमत
नादाँ तो नहीं हो तुम कि समझूँ
ग़फ़लत से ये ज़हर घोलते हो
थामे हुए मस्लहत की मीज़ान
हर शेर का वज़्न तौलते हो
ऐसे में सुकूत, चश्म-पोशी
ऐसा है कि झूट बोलते हो
इक उम्र से अदल ओ सिद्क़ की लाश
ग़ासिब की सलीब पर जड़ी है
इस वक़्त भी तुम ग़ज़ल-सरा हो
जब ज़ुल्म की हर घड़ी कड़ी है
जंगल पे लपक रहे हैं शोले
ताऊस को रक़्स की पड़ी है
है सब को अज़ीज़ कू-ए-जानाँ
इस राह में सब जिए मरे हैं
हाँ मेरी बयाज़-ए-शेर में भी
बर्बादी-ए-दिल के मरसिए हैं
मैं ने भी किया है टूट कर इश्क़
और एक नहीं कई किए हैं
लेकिन ग़म-ए-आशिक़ी नहीं है
ऐसा जो सुबुक-सरी सिखाए
ये ग़म तो वो ख़ुश-मआल ग़म है
जो कोह से जू-ए-शीर लाए
तेशे का हुनर क़लम को बख़्शे
जो क़ैस को कोहकन बनाए
ऐ हीला-गरान-ए-शहर-ए-शीरीं
आया हूँ पहाड़ काट कर मैं
है बे-वतनी गवाह मेरी
हर-चंद फिरा हूँ दर-ब-दर मैं
बेचा न ग़ुरूर-ए-नय-नवाज़ी
ऐसा भी न था सुबुक हुनर में
तुम भी कभी हम-नवा थे मेरे
फिर आज तुम्हें ये क्या हुआ है
मिट्टी के वक़ार को न बेचो
ये अहद-ए-सितम जिहाद का है
दरयूज़ा-गरी के मक़बरों से
ज़िंदाँ की फ़सील ख़ुशनुमा है
कब एक ही रुत रही हमेशा
ये ज़ुल्म की फ़स्ल भी कटेगी
जब हर्फ़ कहेगा क़ुम-बे-इज़्नी
मरती हुई ख़ाक जी उठेगी
लैला-ए-वतन के पैरहन में
बारूद की बू नहीं रहेगी
फिर बाँधेंगे अबरुओं के दोहे
फिर मद्ह-ए-रुख़-ओ-दहन कहेंगे
ठहराएँगे उन लबों को मतला
जानाँ के लिए सुख़न कहेंगे
अफ़्साना-ए-यार ओ क़िस्सा-ए-दिल
फिर अंजुमन अंजुमन कहेंगे

इंतिसाब : अहमद फ़राज़

हमारी चाहतों की बुज़-दिली थी
वर्ना क्या होता
अगर ये शौक़ के मज़मूँ
वफ़ा के अहद-नामे
और दिलों के मरसिए
इक दूसरे के नाम कर देते
ज़ियादा से ज़ियादा
चाहतें बद-नाम हो जातीं
हमारी दोस्ती की दास्तानें आम हो जातीं
तो क्या होता
ये हम जो ज़ीस्त के हर इश्क़ में सच्चाइयाँ सोचें
ये हम जिन का असासा तिश्नगी, तन्हाइयाँ सोचें
ये तहरीरें
हमारी आरज़ू-मंदी की तहरीरें
बहम पैवस्तगी और ख़्वाब पैवंदी की तहरीरें
फ़िराक़ ओ वस्ल ओ महरूमी ओ खुर्संदी की तहरीरें
हम इन पर मुन्फ़इल क्यूँ हूँ
ये तहरीरें
अगर इक दूसरे के नाम हो जाएँ
तो क्या इस से हमारे फ़न के रसिया
शेर के मद्दाह
हम पर तोहमतें धरते
हमारी हमदमी पर तंज़ करते
और ये बातें
और ये अफ़्वाहें
किसी पीली निगारिश में
हमेशा के लिए मर्क़ूम हू जातीं
हमारी हस्तियाँ मज़मूम हो जातीं
नहीं ऐसा न होता
और अगर बिल-फ़र्ज़ होता भी
तो फिर हम क्या
सुबुक-सारान-ए-शहर-ए-हर्फ़ की चालों से डरते हैं
सगान-ए-कूचा-ए-शोहरत के ग़ौग़ा
काले बाज़ारों के दल्लालों से डरते हैं
हमारे हर्फ़ जज़्बों की तरह
सच्चे हैं, पाकीज़ा हैं, ज़िंदा हैं
बला से हम अगर मस्लूब हो जाते
ये सौदा क्या बुरा था
गर हमारी क़ब्र के कतबे
तुम्हारे और हमारे नाम से मंसूब हो जाते!

पहली आवाज़ : अहमद फ़राज़

इतना सन्नाटा कि जैसे हो सुकूत-ए-सहरा
ऐसी तारीकी कि आँखों ने दुहाई दी है
जाने ज़िंदाँ से उधर कौन से मंज़र होंगे
मुझ को दीवार ही दीवार दिखाई दी है
दूर इक फ़ाख़्ता बोली है बहुत दूर कहीं
पहली आवाज़ मोहब्बत की सुनाई दी है

मुजस्समा : अहमद फ़राज़

ऐ सियह-फ़ाम हसीना तिरा 'उर्यां पैकर
कितनी पथराई हुई आँखों में ग़ल्तीदा है
जाने किस दौर-ए-अलम-नाक से ले कर अब तक
तू कड़े वक़्त के ज़िंदानों में ख़्वाबीदा है
तेरे सब रंग हयूले के ये बे-जान नुक़ूश
जैसे मरबूत ख़यालात के ताने-बाने
ये तिरी साँवली रंगत ये परेशान ख़ुतूत
बारहा जैसे मिटाया हो इन्हें दुनिया ने
रेशा-ए-संग से खींची हुई ज़ुल्फ़ें जैसे
रास्ते सीना-ए-कोहसार पे बल खाते हैं
अब्रूओं की झुकी मेहराबों में जामिद पलकें
जिस तरह तीर कमानों में उलझ जाते हैं
मुंजमिद होंटों पे सन्नाटों का संगीन तिलिस्म
जैसे नायाब ख़ज़ानों पे कड़े पहरे हों
तुंद जज़्बात से भरपूर बरहना सीना
जैसे सुस्ताने को तूफ़ान ज़रा ठहरे हों
जैसे यूनान के मग़रूर ख़ुदावंदों ने
रेगज़ारान-ए-हब्श की किसी शहज़ादी को
तिश्ना रूहों के हवसनाक तअ'य्युश के लिए
हजला-ए-संग में पाबंद बना रख्खा हो

नामा-ए-जानाँ : अहमद फ़राज़

मुद्दतों बाद मिला नामा-ए-जानाँ लेकिन
न कोई दिल की हिकायत न कोई प्यार की बात
न किसी हर्फ़ में महरूमी-ए-जाँ का क़िस्सा
न किसी लफ़्ज़ में भूले हुए इक़रार की बात
न किसी सत्र पे भीगे हुए काजल की लकीर
न कहीं ज़िक्र जुदाई का न दीदार की बात
बस वही एक ही मज़मूँ कि मिरे शहर के लोग
कैसे सहमे हुए रहते हैं घरों में अपने
इतनी बे-नाम ख़मोशी है कि दीवाने भी
कोई सौदा नहीं रखते हैं सरों में अपने
अब क़फ़स ही को नशेमन का बदल जान लिया
अब कहाँ ताक़त-ए-परवाज़ परों में अपने
वो जो दो चार सुबू-कश थे कि जिन के दम से
गर्दिश-ए-जाम भी थी रौनक़-ए-मय-ख़ाना भी थी
वो जो दो चार नवा-गर थे कि जिन के होते
हुर्मत-ए-नग़्मा भी थी जुरअत-ए-रिंदाना भी थी
कोई मक़्तल कोई ज़िंदाँ कोई परदेस गया
चंद ही थे कि रविश जिन की जुदागाना भी थी
अब तो बस बुर्दा-फ़रोशी है जिधर भी जाओ
अब तो हर कूचा-ओ-कू मिस्र का बाज़ार लगे
सर-ए-दरबार सितादा हैं बयाज़ें ले कर
वो जो कुछ दोस्त कभी साहब-ए-किरदार लगे
ग़ैरत-ए-इश्क़ कि कल माल-ए-तिजारत में न थी
आज देखो कि हैं अम्बार के अम्बार लगे
ऐसा आसेब-ज़दा शहर कि देखा न सुना
ऐसी दहशत है कि पत्थर हुए सब के बाज़ू
दर-ओ-दीवार-ए-ख़राबात वही हैं लेकिन
न कहीं क़ुलक़ुल-ए-मीना है न गुल-बाँग-ए-सुबू
बे-दिली शेवा-ए-अर्बाब-ए-मुहब्बत ठहरा
अब कोई आए कि जाए ''तन्नाहू-याहू''

काली दीवार : अहमद फ़राज़

कल वॉशिंगटन शहर की हम ने सैर बहुत की यार
गूँज रही थी सब दुनिया में जिस की जय-जय-कार
मुल्कों मुल्कों हम घूमे थे बंजारों की मिस्ल
लेकिन इस की सज-धज सच-मुच दिल-दारों की मिस्ल
रौशनियों के रंग बहें यूँ रस्ता नज़र न आए
मन की आँखों वाला भी याँ अंधा हो हो जाए
ऊँचे बाम चराग़ाँ रस्ते रूप-भरे बाज़ार
जागती आँखों से देखा है ख़्वाबों का संसार
एक सफ़ेद इमारत जिस की नगर नगर में धूम
अंदर दुनिया भर की कालक बाहर से मासूम
यही सफ़ेद इमारत जिस में बहुत बड़ी सरकार
यहीं करें सौदागर छोटी क़ौमों का व्यापार
यहीं पे जादू-गर बैठा जब कहीं की डोर हिलाए
हर बस्ती नागा-साकी हीरोशीमा बन जाए
इसी इमारत से कुछ दूर ही इक काली दीवार
लोगों का मेला ऐसा लगा था जैसे कोई त्यौहार
इस काली दीवार पे कंदा देखे हज़ारों नाम
उन नामों के बीच लिखा था शोहदा-ए-वियतनाम
आस-पास तो जम्अ हुआ था ख़िल्क़त का अम्बोह
सब की आँखों में सन्नाटा चेहरों पर अंदोह
बेकल बहनें घायल माएँ और दुखी बेवाएँ
साजन तुम किस देस सिधारे सोचें महबूबाएँ
अपने प्यारों दिल-दारों का ओझल मुखड़ा ढूँडें
इस काली दीवार पे उन के नाम का टुकड़ा ढूँडें
दिलों में दुख आँखों में शबनम हाथों में फूल उठाए
इस नामों के क़ब्रिस्तान का भेद कोई क्या पाए
ना तुर्बत ना कतबा कोई ना हड्डी ना मास
फिर भी पागल नैनाँ को थी पिया मिलन की आस
कहीं कहीं इस काली सिल पर कोई सफ़ेद गुलाब
यूँ बे-ताब पड़ा था जैसे अंधी आँख का ख़्वाब
काँटा बन कर सभी के दिल में खटके एक सवाल
किस कारन मिट्टी में मिलाए हीरों जैसे लाल
होची-मिन के देस में हम ने क्या क्या सितम न ढाए
उस के जियाले तो आज़ादी का सूरज ले आए
लेकिन इतने चाँद गँवा कर हम ने भला क्या पाया
हम बद-क़िस्मत ऐसे जिन को धूप मिली ना साया
मुख मोती दे कर हासिल की ये काली दीवार
ये काली दीवार जो है बस इक ख़ाली दीवार
ये काली दीवार जो है नामों का क़ब्रिस्तान
वॉशिंगटन के शहर में दफ़्न हैं किस किस के अरमान

ऐ मिरे बे-दर्द शहर : अहमद फ़राज़

दिल सुलग उठता है अपने बाम-ओ-दर को देख कर
फैलने लगती हैं जब भी शाम की परछाइयाँ
इस क़दर वीरान लम्हे इस क़दर सुनसान रात
सोच में गुम हैं उफ़ुक़ से ता-उफ़ुक़ पहनाइयाँ
किस लिए रौशन करूँ दीवार-ओ-दर कोई तो हो
गुंग दीवारों में क्या हों अंजुमन-आराइयाँ
दूर हर शब जाग उठते हैं कई माह-ओ-नुजूम
आग भड़काती हैं संग-ओ-ख़िश्त की रा'नाइयाँ
रास्तों से ख़्वाब-गाहों तक मुसलसल मौज-ए-रंग
जिस तरह क़ौस-ए-क़ुज़ह की टूटती अंगड़ाइयाँ
ज़ख़्म-ए-नज़्ज़ारा लिए आँखों में चुप तकता रहा
गो मिरी नींदें भी मुझ से ले उड़ीं शहनाइयाँ
कल ज़रा सी देर चमके थे मिरे दीवार-ओ-दर
झिलमिला उट्ठी थीं मेरी रूह की गहराइयाँ
चंद लम्हों के लिए लौ दे उठा था इक चराग़
और दमक उट्ठी थीं कुछ लम्हे मिरी तन्हाइयाँ
आज इतना शोर क्यों है ऐ मिरे बेदर्द शहर
हर नज़र मेरी तरफ़ है इस क़दर रुस्वाइयाँ

सवाल : अहमद फ़राज़

इक संग तराश जिस ने बरसों
हीरों की तरह सनम तराशे
आज अपने सनम-कदे में तन्हा
मजबूर निढाल ज़ख़्म-ख़ुर्दा
दिन रात पड़ा कराहता है
चेहरे पे उजाड़ ज़िंदगी के
लम्हात की अन-गिनत ख़राशें
आँखों के शिकस्ता मरक़दों में
रूठी हुई हसरतों की लाशें
साँसों की थकन बदन की ठंडक
एहसास से कब तलक लहू ले
हाथों में कहाँ सकत कि बढ़ कर
ख़ुद-साख़्ता पैकराँ को छू ले
ये ज़ख़्म-ए-तलब ये ना-मुरादी
हर बुत के लबों पे है तबस्सुम
ऐ तेशा-ब-दस्त देवताओ!
तख़्लीक़ अज़ीम है कि ख़ालिक़
इंसान जवाब चाहता है

मयूरका : अहमद फ़राज़

मयूरका के साहिलों पे किस क़दर गुलाब थे
कि ख़ुशबुएँ थी बे-तरह कि रंग बे-हिसाब थे
तुनुक-लिबासियाँ शनावरों की थीं क़यामतें
तमाम सीम-तन शरीक-ए-जश्न-ए-शहर-ए-आब थे
शुआ-ए-महर की ज़िया से थे जिगर जिगर बदन
क़मर-जमाल जिन के अक्स-ए-रौशनी के बाब थे
खुली फ़ज़ा की धूप वो कि जिस्म साँवले करे
बुतान-ए-आज़री कि मस्त-ए-ग़ुस्ल-ए-आफ़्ताब थे
यहीं पता चला कि ज़ीस्त हुस्न है बहार है
यहीं ख़बर हुई कि ज़िंदगी के दुख सराब थे
यहीं लगा कि गर्दिशों के ज़ाविए बदल गए
न रोज़ ओ शब की तल्ख़ियाँ न वक़्त के अज़ाब थे
मिरे तमाम दोस्त अजनबी रफ़ाक़तों में गुम
मिरी नज़र में तेरे ख़द्द-ओ-ख़ाल तेरे ख़्वाब थे
मैं दूरियों के बावजूद तेरे आस पास था
मयूरका के साहिलों पे मैं बहुत उदास था

बन-बास की एक शाम : अहमद फ़राज़

ये आख़िरी साअत शाम की है
ये शाम जो है महजूरी की
ये शाम अपनों से दूरी की
इस शाम उफ़ुक़ के होंटों पर
जो लाली है ज़हरीली है
इस शाम ने मेरी आँखों से
सहबा-ए-तरब सब पी ली है
ये शाम ग़ज़ब तन्हाई की
पतझड़ की हवा बर्फ़ीली है
इस शाम की रंगत पीली है
इस शाम फ़क़त आवाज़ तिरी
कुछ ऐसे सुनाई देती है
आवाज़ दिखाई देती है
ये आख़िरी साअत शाम की है
ये शाम भी तेरे नाम की है

ज़ेर-ए-लब : अहमद फ़राज़

कस बोझ से जिस्म टूटता है
इतना तो कड़ा सफ़र नहीं था
वो चार क़दम का फ़ासला क्या
फिर राह से बे-ख़बर नहीं था
लेकिन ये थकन ये लड़खड़ाहट
ये हाल तो उम्र भर नहीं था
आग़ाज़-ए-सफ़र में जब चले थे
कब हम ने कोई दिया जलाया
कब अहद-ए-वफ़ा की बात की थी
कब हम ने कोई फ़रेब खाया
वो शाम वो चाँदनी वो ख़ुश्बू
मंज़िल का किसे ख़याल आया
तू महव-ए-सुख़न थी मुझ से लेकिन
मैं सोच के जाल बुन रहा था
मेरे लिए ज़िंदगी तड़प थी
तेरे लिए ग़म भी क़हक़हा था
अब तुझ से बिछड़ के सोचता हूँ
कुछ तू ने कहा था! क्या कहा था

तख़्लीक़ : अहमद फ़राज़

दर्द की आग बुझा दो कि अभी वक़्त नहीं
ज़ख़्म-ए-दिल जाग सके नश्तर-ए-ग़म रक़्स करे
जो भी साँसों में घुला है उसे उर्यां न करो
चुप भी शोला है मगर कोई न इल्ज़ाम धरे
ऐसे इल्ज़ाम कि ख़ुद अपने तराशे हुए बुत
जज़्बा-ए-काविश-ए-ख़ालिक़ को निगूँ-सार करें
मू-क़लम हल्क़ा-ए-अबरू को बना दे ख़ंजर
लफ़्ज़ नौहों में रक़म मद्ह-ए-रुख़-ए-यार करें
रक़्स-ए-मीना से उठे नग़्मा-ए-रक़्स-ए-बिस्मिल
साज़ ख़ुद अपने मुग़न्नी को गुनहगार करें
मरहम-ए-अश्क नहीं ज़ख़्म-ए-तलब का चारा
ख़ूँ भी रोओगे तो किस ख़ाक की सज-धज होगी
काँपते हाथों से टूटी हुई बुनियादों पर
जो भी दीवार उठाओगे वही कज होगी
कोई पत्थर हो कि नग़्मा कोई पैकर हो कि रंग
जो भी तस्वीर बनाओगे अपाहज होगी

तज़मीन : अहमद फ़राज़

ग़म तुम्हारा था ज़िंदगी गोया
तुम को खोया उसे नहीं खोया
फ़र्त-ए-गिर्या से जी न हल्का हो
बस यही सोच कर नहीं रोया
अश्क तो अश्क हैं शराब से भी
मैं ने ये दाग़-ए-दिल नहीं धोया
मैं वो किश्त-ए-नशात क्यों काटूँ
जिस को मैं ने कभी नहीं बोया
आबला आबला थी जाँ फिर भी
बार-ए-हस्ती को उम्र भर ढोया
दीदा-ओ-दिल गवाह हैं जानाँ
सुख से जागा न चैन से सोया
दूसरा कोई साथ हो कि न हो
तुम मिरे पास होते हो गोया

बन-बास : अहमद फ़राज़

मेरे शहर के सारे रस्ते बंद हैं लोगो
मैं इस शहर का नग़्मा-गर
जो दो इक मौसम ग़ुर्बत के दुख झेल के आया
ताकि अपने घर की दीवारों से
अपनी थकी हुई और तरसी हुई
आँखें सहलाऊँ
अपने दरवाज़े के उतरते रोग़न को
अपने अश्कों से सैक़ल कर लूँ
अपने चमन के जले हुए पौदों
और गर्द-आलूद दरख़्तों की
मुर्दा शाख़ों पर बैन करूँ
हर महजूर सुतून को इतना टूट के चूमूँ
मेरे लबों के ख़ून से
उन के नक़्श-ओ-निगार सभी जी उठें
गली के लोगों को इतना देखूँ
इतना देखूँ
मेरी आँखें
बरसों की तरसी हुई आँखें
चेहरों के आँगन बन जाएँ
फिर मैं अपना साज़ उठाऊँ
आँसुओं और मुस्कानों से झिलमिल झिलमिल
नज़्में ग़ज़लें गीत सुनाऊँ
अपने प्यारों
दर्द के मारों का दरमाँ बन जाऊँ
लेकिन मेरे शहर के सारे रस्तों पर
अब बाड़ है लोहे के काँटों की
शह दरवाज़े पर कुछ पहरे-दार खड़े हैं
जो मुझ से और मुझ जैसे दिल वालों की
पहचान से आरी
मेरे साज़ से
संगीनों से बात करें
मैं उन से कहता हूँ
देखो
मैं इस शहर का नग़्मा-गर हूँ
बरसों बा'द कड़ी राहों की
सारी अज़िय्यत झेल के अब वापस आया हूँ
उस मिट्टी की ख़ातिर
जिस की ख़ुशबुएँ
दुनिया भर की दो-शीज़ाओं के जिस्मों की महकों से
और सारे जहाँ के
सभी गुलाबों से
बढ़ कर है
मुझ को शहर में
मेरे शहर में जाने दो
लेकिन तने हुए नेज़ों ने
मेरे जिस्म को यूँ बर्माया
मेरे साज़ को यूँ रेज़ाया
मेरा हुमकता ख़ून और मेरे सिसकते नग़्मे
शह-दरवाज़े की दहलीज़ से
रिसते रिसते
शहर के अंदर जा पहुँचे हैं
और मैं अपने जिस्म का मलबा
साज़ का लाशा
अपने शहर के शह-दरवाज़े
की दहलीज़ पे छोड़ के
फिर अनजाने शहरों की शहराहों पर
मजबूर-ए-सफ़र हूँ
जिन को तज कर घर आया था
जिन को तज कर घर आया था

सफ़ेद छड़ियाँ : अहमद फ़राज़

जनम का अंधा
जो सोच और सच के रास्तों पर
कभी कभी कोई ख़्वाब देखे
तो ख़्वाब में भी
अज़ाब देखे
ये शाहराह-ए-हयात जिस पर
हज़ार-हा क़ाफ़िले रवाँ हैं
सभी की आँखें
हर एक का दिल
सभी के रस्ते
सभी की मंज़िल
इसी हुजूम-ए-कशाँ-कशाँ में
तमाम चेहरों की दास्ताँ में
न नाम मेरा
न ज़ात मेरी
मिरा क़बीला
सफ़ेद छड़ियाँ

तसलसुल : अहमद फ़राज़

कब से सुनसान ख़राबों में पड़ा था ये जहाँ
कब से ख़्वाबीदा थे इस वादी-ए-ख़ारा के सनम
किस को मालूम ये सदियों के पुर-असरार भरम
कौन जाने कि ये पत्थर भी कभी थे इंसाँ
सिर्फ़ लब-दोख़्ता पर्बत हैं जहाँ नौहा-कुनाँ
न दर-ओ-बाम न दीवार ओ दरीचा कोई
कोई दहलीज़-ए-शिकस्ता न हरीम-ए-वीराँ
शहर के शहर हैं पाताल के दामन में निहाँ
कौन पहचानता ज़ुल्मत हैं सियाही के निशाँ
जो नज़र ढूँडने उट्ठी वो नज़र भी खोई
चश्म-ए-महताब भी शबनम की जगह ख़ूँ रोई
इल्म ने आज कुरेदे हैं वो ज़ुल्मात के ढेर
वक़्त ने जिस पे बिठाए थे फ़ना के पहरे
जाग उठे सूर-ए-सराफ़ील से गूँगे बहरे
ता-अबद जिन के मुक़द्दर में थी दुनिया अंधेर
ये मगर अज़्मत-ए-इंसाँ है कि तक़दीर के फेर?
ये इमारात, ये मीनार, ये गुलज़ार, ये खेत
तोदा-ए-ख़ाक से हस्ती ने लिया ताज़ा जन्म
जी उठे वादी-ए-ख़ामोश के बे-जान सनम
फिर कोई चीरेगा ज़र्रे का जिगर क़तरा-ए-यम
दफ़्न कर देगा जो ख़ालिक़ को भी मख़्लूक़ समेत
और ये आबादियाँ बन जाएँगी फिर रेत ही रेत

दीवार-ए-गिर्या : अहमद फ़राज़

वो कैसा शोबदा-गर था
जो मसनूई सितारों
और नक़ली सूरजों की
इक झलक दिखला के
मेरे सादा दिल लोगों
की आँखों के दिए
होंटों के जुगनू
ले गया
और अब ये आलम है
कि मेरे शहर का
हर इक मकाँ
इक ग़ार की मानिंद
महरूम-ए-नवा है
और हँसता बोलता हर शख़्स
इक दीवार-ए-गिर्या है

ऐ निगार-ए-गुल : अहमद फ़राज़

निगार-ए-गुल तुझे वो दिन भी याद हों शायद
कि जिन के ज़िक्र से अब दिल पे ताज़ियाना लगे
तिरी तलब में वो दार-ओ-रसन के हंगामे
कि जिन की बात करें भी तो अब फ़साना लगे
ब-क़द्र-ए-ज़ौक़ जलाते रहे लहू के चराग़
कि तू जब आए तो ये घर निगार-ख़ाना लगे
इसी ख़याल से हर ज़ख़्म अपने दिल पे सहा
कि तुझ को गर्दिश-ए-अय्याम की हवा न लगे
मगर जो गुज़री है हम पर तिरे हुसूल के बा'द
वो हाल-ए-ग़म भी कहें गर तुझे बुरा न लगे
निगार-ए-गुल वो हमीं थे तिरे तमन्नाई
कि जिन के ख़ूँ से तिरे रंग ताबनाक हुए
हमीं हैं जिन से क़बा तेरी लाला-रंग हुई
हमीं हैं वो जो तिरी रहगुज़र में ख़ाक हुए
ख़िज़ाँ तो ख़ैर सितम-केशियों की रुत थी मगर
बहार में भी हमारे जिगर ही चाक हुए
हमीं मिनारा-ए-किसरा को तोड़ने वाले
तिरे हरीम में आ कर हमीं हलाक हुए
निगार-ए-गुल ये तक़ाज़ा मगर वफ़ा का है
कि अब भी हम तिरे वा'दों का ए'तिबार करें
गुज़र गई जो गुज़रनी थी सख़्त-जानों पर
फिर आज तेरी जफ़ाओं का क्या शुमार करें
अलम-गज़ीदा सही पैरहन-दरीदा सही
मगर लबों पे ग़म-ए-दिल न आश्कार करें
यही उसूल रहा है वफ़ा-परस्तों का
हर एक हाल में तौसीफ़-ए-हुस्न-ए-यार करें
जबीं से धो के हर इक नक़्श ना-मुरादी का
निगार-ए-गुल तिरे जल्वों का इंतिज़ार करें

किरदार : अहमद फ़राज़

हम अभी इस्तादा थे
अब से कुछ पहले
वफ़ा के फ़र्श-ए-पायंदा पे
ख़ुश-वक़्ती के रंगीं शामियानों के तले
अपने हाथों में
क़रार-ओ-क़ौल की शम'एँ लिए
आँधियों में ज़लज़लों में
ता-क़यामत साथ देने के लिए आमादा थे
इक दूसरे के किस क़दर दिल-दादा थे
देखने वालों में शामिल
यार भी अग़्यार भी
चंद आँखों में नमी
चंद आँखों में हिक़ारत बरहमी
चंद आँखों में सुकूत-ए-दाइमी
जम गए साए उधर
और काँप उट्ठी इस तरफ़ दीवार भी
दुश्मनों को भी यक़ीं
और बद-गुमाँ कुछ हम-नशीं ग़म-ख़्वार भी
देखने वालों ने देखा
किस तरह सदियाँ अचानक सानियों में बट गईं
शामियानों की तनाबें कट गईं
फ़र्श-ए-पायंदा-ओ-मरमर की सिलें भी फट गईं
और वो पैकर
ख़ुद अपने आप
ख़ूँ में तर-ब-तर
ख़ाक पर उफ़्तादा थे
हम अभी इस्तादा थे

गुल-शुदा शम'ओं का मातम न करो : अहमद फ़राज़

'उम्र गुज़री है सजाते हुए बाम-ओ-दर को
इस तमन्ना पे कि वो जान-ए-बहार आएगी
फ़र्श-ए-रह दीदा-ओ-दिल थे कि वो आसूदा-ख़िराम
दर्द की आग को गुलज़ार बना जाएगी
इस तवक़्क़ो' पे ख़राबे रहे आग़ोश-कुशा
खुल के बरसेगी अगर अब के घटा छाएगी
एक इक लम्हा क़यामत की तरह गुज़रा है
आख़िर-ए-कार वो महबूब नज़र भी आई
मुंतज़िर आँखें तो पथरा ही चुकी थीं लेकिन
कुश्तगान-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त की सहर भी आई
जिस्म क्यों शल हैं धड़कते हुए दिल क्यों चुप हैं
जरस-ए-गुल की तो आवाज़ इधर भी आई
आज फिर करते हो किस ज़ो'म पे ज़ख़्मों का शुमार
सर-फिरो वादी-ए-पुर-ख़ार में ये तो होगा
क्यों निगाहों में है अफ़्सुर्दा चराग़ों का धुआँ
आरज़ू-ए-लब-ओ-रुख़्सार में ये तो होगा
एक से एक कड़ी मंज़िल-ए-जाँ आएगी
रहगुज़ार-ए-तलब-ए-यार में ये तो होगा
होंट सिल जाएँ मगर जुरअत-ए-इज़हार रहे
दिल की आवाज़ को मद्धम न करो दीवानो
ढल चुकी रात तो अब कोहर भी छट जाएगी
अब भी उम्मीद की लौ कम न करो दीवानो
आँधियाँ आया ही करती हैं हर इक हब्स के बा'द
गुल-शुदा शम'ओं का मातम न करो दीवानो

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