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गोरखनाथ के पद : Gorakhnath Ji Ke Pad

परिचय 

गोरखनाथ (लगभग 9वीं–10वीं शताब्दी) प्रसिद्ध नाथ संत, योगी और कवि थे। वे मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य तथा नाथ परंपरा के प्रमुख प्रवर्तक माने जाते हैं और नौ नाथों में उनका प्रमुख स्थान है।
उनकी रचनाओं में योग, साधना, गुरु-महिमा और आत्मज्ञान की भावना प्रमुख है। सहज एवं लोकभाषा में व्यक्त उनकी वाणी का हिंदी के आरंभिक संत साहित्य और भक्ति परंपरा पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा।

गुर कीजै गहिला निगुरा न रहिला

गोरखनाथ

गुर कीजै गहिला निगुरा न रहिला।
गुर बिन ग्यांन न पायला रे भाइला॥
दूधै धोया कोइला उजला न होइला।
कागा कंठै पहुप माल हंसला न भइला॥
आभा जैसी रोटली कागा ले जाइला।
पूछौं म्हारा गुरु नै कहां बैसि खाइला॥
उतर दिसि आविला पछिम दिस जाइला।
पूछौ म्हारा सतगुरु नै तिहां बैसि खाइला॥
चींटी केरा नेत्र मैं गज्येंद्र समाइला।
गावड़ी के मुख में बाघला बिवाइला॥
बारे बरसें बंझ ब्याई हाथ पाँव टूटा।
बदंत गोरखनाथ मछिंद्र ना पूता॥

ऐसा जाप जपौ मन लाई

गोरखनाथ

ऐसा जाप जपौ मन लाई, सोहं सोहं अजपा गाई॥
आसण दिढ करि धरौ धियानं, अहनिसि सुमरौ ब्रह्मगियानं।
जाग्रत न्यंद्रा सुलप अहारं, काम क्रोध अहंकार निवारं॥
नासा अग्र निज, ज्यौ बाई, इडा प्यंगुला मधि समाई।
छसैं सहस इकीसौ जाप, अनहद उपजै आपहि आप॥
बंकनालि में ऊगै सूर, रोम रोम धुनि बाजै तूर।
उलटै कमल सहस्त्रदल बास, भ्रमर गुफा महिं जोति प्रकास॥
सुणि मथुरा सिव गारेख कहै, परम तत ते साधु लहै॥

अवधू ऐसा ग्यांन बिचारी

गोरखनाथ

अवधू ऐसा ग्यांन बिचारी।
ता मैं झिलमिल होत उजाली॥
जरा जोग रोग न व्यापै, ऐसा परखि गुरु करनां।
तन मन सूँ जे परचा नहीं, तौ काहे को पचि मरनां॥
काल न मिट्या जंजाल न छूट्या, तप करि हूवा न सूरा।
कुल का नास करै मति कोई, जै गुर मिलै न पूरा॥
सप्त धात का काया पींजरा, ता मांहि जुगति बिन सूवा।
सतगुर मिलै तौ ऊबरै बाबू, नहिं तै परलै हूवा॥
कंद्रप रूप माया का मंडण, अंबिरथा कांइ उलीची।
गोरख कहै सुणौ रे भौंदू, अरंड अमी कत सींची॥

कहा बूझै अवधू राई

गोरखनाथ

कहा बूझै अवधू राई, गगन न धरनीं।
चंदन सूर दिवस नहीं रैनी॥
ऊँकार निराकार सूछिम न अस्थूलं।
पेड़ न पत्र फलै नहीं फूलं॥
डाल न मूल न बृच्छ न बेला।
साखी न सबद गुरु नहीं चेला॥
ग्यानें न ध्यानें जोगे न जुक्ता।
पापे न पुंये मोखे न मुक्ता॥
उपजै न बिनसै आवै न जाई।
जुरा न मरण वाकै बाप न माई॥
भणत गोरखनाथ मछिंद्र नां दासा।
भाव भगति आस न पासा॥

तुझ पर बारी हो अणघड़िया देवा

गोरखनाथ

तुझ पर बारी हो अणघड़िया देवा।
घड़ी मूरत कूँ सब कोई सेवै, ताहि न जाणैं भेवा॥
तू अबिनासी आदू कहिये, मोहि भरोसा पड़िया।
सब संसार घड्या है तेरा, तू किन्हूँ नहीं घड़िया॥
दस औतार औतरिया तरिया, वै पणि राम न होई।
कमाई अपनी उनहूँ पाई, करता औरै कोई॥
तू पूरण ब्रह्म पुरुष प्रिथमी का, सूरति मूरति सारा।
श्रवणां सुणयां न नैनां देख्या, तेरा घड़णौंहारा॥
तू तौ आप आप तैं हूवा, तूँ देख्या उजियारा।
गोरख कहै गुरु कै सब्दां, तू ही घड़णैहारा॥

आवै संगै जाइ अकेला

गोरखनाथ

आवै संगै जाइ अकेला।
ताथैं गारेख रांम रमेला॥
काया हंस संगि ह्वै आवा।
जाता जोगी किन्हूँ न पावा॥
जीवत जग मैं मूवां मसाणं।
प्राण पुरिस कत कीया पयाणं॥
जांमण मरणां बहुरि बियोगी।
ताथैं गोरख भैला जोगी॥

कासौं झूझौं अवधू राई

गोरखनाथ

कासौं झूझौं अवधू राई, विषय न दीसै कोई।
जासौं अब झूझौं रे आतम राम सोई॥
आपण ही मछ कछ आपण ही जाल।
आपण ही धीवर आपण ही काल॥
आपण ही स्यंघ बाध आपण ही गाइ।
आपण ही मारीला आपण ही खाइ॥
आपण ही टाटी फड़िका आपण ही बंध।
आपण ही मारीला आपण ही कंध॥
न्हाइबे कौं तीरथ न पूजिबै को देव।
भणंत गोरखनाथ अलख अभेव॥

कैसे बोलौं पंडिता, देव कौनैं ठांई

गोरखनाथ

कैसे बोलौं पंडिता, देव कौनैं ठांई।
निज तत निहारतां, अम्हें तुम्हें नाहीं॥
पखांणची देवली पखाण चां देव।
पखांण पूजिला कैसें फटीला सनेह॥
सरजीव तोड़िया निरजीवी पूजिला।
पापचीं करणीं कैसें दूतर तिरोला॥
तीरथि तीरथि सनानं करीला।
बाहर धोये कैसें भीतरि भेदिला॥
आदिनाथ नाती मछिंद्रनाथ पूता।
निज तत निहारं गारेख अवधूता॥

चेला सब सूता, नाथ सतगुर जागै

गोरखनाथ

चेला सब सूता, नाथ सतगुर जागै।
दसवैं द्वारि अवधू मधुकरी मांगै॥
सहजै खपरा सुषमनि डंडा।
पांच संगाती मिलि खेलैं नव खंडा॥
गंग जमन मधि आसण बालौ।
अनहद नाद काल मैं टालौ॥
गगन मंडल मैं रमूँ अकेला।
उरध मुखि बंकनालि अमी रस झेला॥
कथंत गारेखनाथ गुरु उपदेसा।
मिल्यां संत जन टल्या अंदेसा॥

थान दे गोरिए बाला

गोरखनाथ

थान दे गोरिए बाला, भाई बिन प्याले प्याला जी।
गियांन की हाल्हीला पालंखू, गोरख बाला पौढ़ीला जी॥
देवलोक की देवकंन्या, मृतलोक की नारी जी।
पाताल लोक की नागकंन्या, गोरख बाला भारी जी॥
माया मारिली मावसी तजिली, तजीला कुटुंब बंधु जी।
सहस्र कंवल तहां गोरख बाला, जहाँ मन मनसा सुरबंधु जी॥
आसा तजीला तृष्नां तजिला, तजिला मनसा माई जी।
नौ खंड पृथ्वी फेरि नैं आलौं, गोरख रहीला मछिंद्र ठाई जी॥

आंबलियौ थल मौरियौ

गोरखनाथ

आंबलियौ थल मौरियौ, ऊपर नींब बिजौरं फलियौ।
सो फल खातां लागै मीठौ, जाणै रे जिन गुर प्रसादैं दीठौ॥
ऊँट सिचाणै जब ग्रह्यौ, जाइ कैरूँ डाली बैठौ।
बांझैं बेटा जन्म्यूँ, नैणैं पुरिष न दीठौ॥
लाकड़ डूबै सिल तिरै, देखतां जग जाइ।
ऊँट प्रनालै बहि गयौ, सुसि ल्यौ पौली नै माइ॥
डूँगरि मंछा जल सुसा, पाणीं मैं दौं लागा।
अरहट बहै तुसालवाँ, सूलै काँटा भागा॥
एक गाइ नौ बछड़ा, पंच दुहेबा जाइ।
एक फूल सोलह करंडियाँ, मालनि हरषि न माइ॥
पगां बिहूनड़ै चोरी कीधी, चोरी नैं आणीं गाइ।
मछिंद्र प्रसादैं गोरख बोल्या, दूझै पाणी न ब्याइ॥

बांधौ बांधौ बछरा पीओ खीरं

गोरखनाथ

बांधौ बांधौ बछरा पीओ खीरं।
कलि अजरावर होय सरीरं॥
आकास की धेनु बछा जाया।
ता धेन कै पूँछ न पाया॥
बारह बछा सोलह गाई।
धैनु दुहावत रैन बिहाई॥
अचरा न चरै धेन कचरा न खाई।
पंच गवलियाँ को मारन धाई॥
याही धेन का दूध जू मीठा।
पीवै गोरखनाथ गगन बईठा॥

नाथ बोले अमृतबाणीं

गोरखनाथ

नाथ बोले अमृतबाणीं।
बरसैगी कंबली भीजैगा पाणीं॥
गाडि पडरवा बाँधिलै खूँटा।
चलै दमामा बाजिलै ऊँटा॥
कउवा की डाली पीपल बासौ।
मूसा के सबद बिलइया नासै॥
चले बटावा थ की बाट।
सोवै डुकरिया ठौरै खाट॥
ढूकिले कूकर भूकिले चोर।
काढै धणीं पुकारै ढोर॥
ऊजड़ खेड़ा नगर मझारी।
तलि गागर ऊपर पणिहारी॥
मगरी परि चूल्हा धुँधाई।
पोवणहारी को रोटी खाइ॥
कामिनी जलै अंगीठी तापै।
बिचि बैसंदर थरहर काँपै॥
एक जु रढिया रढती आई।
बहू बिवाई सासू जाई॥
नगरी कौ पांणी कूवै आवै।
उलटी चर्चा गोरख गावै॥

बूझौ पंडित ब्रह्म गियानं

गोरखनाथ

बूझौ पंडित ब्रह्म गियानं।
गौरख बोलै जांण सुजानं॥
बीज बिन निसपति, मूल बिन बिरखा, पानं फूल बिन फलिया।
बाँझ केरा बालूडा प्यंगल तरुवर चढिया॥
गगन बिना चंद्रमा, ब्रह्मांड बिन सूरं, झूझ बिना रचिया थानं।
ए परमारथ जे नर जाणैं, ता घट परं गियानं॥
सुंनि न अस्थूल, लिंग नहीं पूजा, धुनि बिन अनहद बाजै।
बाड़ी बिन पहुप, पहुप बिन सोइर, पवन बिन भृंगा छाजै॥
राहु बिन गिलिया, अगिन बिन जलिया, अंबर बिन जल भरिया।
यहु परमारथ कहौ हो पंडित, जुग जुग स्याम अथरवन पढिया॥
ससंवेद सोंह प्रकासं धरती गगन न आदं।
गंग जमुन बिच खेलै, गोरख गुरु मछिंद्र प्रसादं॥

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