सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मुनीर नियाज़ी की नज़्में : Muneer Niyaji Nazm Hindi

हमेशा देर कर देता हूँ : मुनीर नियाज़ी

हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो
उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
मदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना हो
बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं
किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....

मोहब्बत अब नहीं होगी : मुनीर नियाज़ी

सितारे जो दमकते हैं
किसी की चश्म-ए-हैराँ में
मुलाक़ातें जो होती हैं
जमाल-ए-अब्र-ओ-बाराँ में
ये ना-आबाद वक़्तों में
दिल-ए-नाशाद में होगी
मोहब्बत अब नहीं होगी
ये कुछ दिन बा'द में होगी
गुज़र जाएँगे जब ये दिन
ये उन की याद में होगी

सपना आगे जाता कैसे : मुनीर नियाज़ी

छोटा सा इक गाँव था जिस में
दिए थे कम और बहुत अँधेरा
बहुत शजर थे थोड़े घर थे
जिन को था दूरी ने घेरा
इतनी बड़ी तन्हाई थी जिस में
जागता रहता था दिल मेरा
बहुत क़दीम फ़िराक़ था जिस में
एक मुक़र्रर हद से आगे
सोच न सकता था दिल मेरा
ऐसी सूरत में फिर दिल को
ध्यान आता किस ख़्वाब में तेरा
राज़ जो हद से बाहर में था
अपना-आप दिखाता कैसे
सपने की भी हद थी आख़िर
सपना आगे जाता कैसे

कुछ बातें अन-कही रहने दो : मुनीर नियाज़ी

कुछ बातें अन-कही रहने दो
कुछ बातें अन-सुनी रहने दो
सब बातें दिल की कह दीं अगर
फिर बाक़ी क्या रह जाएगा
सब बातें उस की सुन लीं अगर
फिर बाक़ी क्या रह जाएगा
इक ओझल बे-कली रहने दो
इक रंगीं अन-बनी दुनिया पर
इक खिड़की अन-खुली रहने दो

विसाल की ख़्वाहिश : मुनीर नियाज़ी

कह भी दे अब वो सब बातें
जो दिल में पोशीदा हैं
सारे रूप दिखा दे मुझ को
जो अब तक नादीदा हैं
एक ही रात के तारे हैं
हम दोनों उस को जानते हैं
दूरी और मजबूरी क्या है
उस को भी पहचानते हैं
क्यूँ फिर दोनों मिल नहीं सकते
क्यूँ ये बंधन टूटा है
या कोई खोट है तेरे दिल में
या मेरा ग़म झूटा है

अब मैं उसे याद बना देना चाहता हूँ : मुनीर नियाज़ी

मैं उस की आँखों को देखता रहता हूँ
मगर मेरी समझ में कुछ नहीं आता
मैं उस की बातों को सुनता रहता हूँ
मगर मेरी समझ में कुछ नहीं आता
अब अगर वो कभी मुझ से मिले
तो मैं उस से बात नहीं करूँगा
उस की तरफ़ देखूँगा भी नहीं
मैं कोशिश करूँगा
मेरा दिल कहीं और मुब्तला हो जाए
अब मैं उसे याद बना देना चाहता हूँ

दूरी : मुनीर नियाज़ी

दूर ही दूर रही बस मुझ से
पास वो मेरे आ न सकी थी
लेकिन उस को चाह थी मेरी
वो ये भेद छुपा न सकी थी
अब वो कहाँ है और कैसी है
ये तो कोई बता न सकेगा
पर कोई उस की नज़रों को
मेरे दिल से मिटा न सकेगा
अब वो ख़्वाब में दुल्हन बन कर
मेरे पास चली आती है
मैं उस को तकता रहता हूँ
लेकिन वो रोती जाती है

आख़िरी उम्र की बातें : मुनीर नियाज़ी

वो मेरी आँखों पर झुक कर कहती है ''मैं हूँ''
उस का साँस मिरे होंटों को छू कर कहता है ''मैं हूँ''
सूनी दीवारों की ख़मोशी सरगोशी में कहती है ''मैं हूँ''
''हम घायल हैं'' सब कहते हैं
मैं भी कहता हूँ ''मैं हूँ''

ख़ूब-सूरत ज़िंदगी को हम ने कैसे गुज़ारा : मुनीर नियाज़ी

आज का दिन कैसे गुज़रेगा कल गुज़रेगा कैसे
कल जो परेशानी में बीता वो भूलेगा कैसे
कितने दिन हम और जिएँगे काम हैं कितने बाक़ी
कितने दुख हम काट चुके हैं और हैं कितने बाक़ी
ख़ास तरह की सोच थी जिस में सीधी बात गँवा दी
छोटे छोटे वहमों ही में सारी उम्र बिता दी

मैं और मेरा ख़ुदा : मुनीर नियाज़ी

लाखों शक्लों के मेले में तन्हा रहना मेरा काम
भेस बदल कर देखते रहना तेज़ हवाओं का कोहराम
एक तरफ़ आवाज़ का सूरज एक तरफ़ इक गूँगी शाम
एक तरफ़ जिस्मों की ख़ुशबू एक तरफ़ उस का अंजाम
बन गया क़ातिल मेरे लिए तो अपनी ही नज़रों का दाम
सब से बड़ा है नाम ख़ुदा का उस के बाद है मेरा नाम

एक लड़की : मुनीर नियाज़ी

ज़रा उस ख़ुद अपने ही
जज़्बों से मजबूर लड़की को देखो
जो इक शाख़-ए-गुल की तरह
अन-गिनत चाहतों के झकोलों की ज़द में
उड़ी जा रही है
ये लड़की
जो अपने ही फूल ऐसे कपड़ों से शरमाती
आँचल समेटे निगाहें झुकाए चली जा रही है
जब अपने हसीं घर की दहलीज़ पर जा रुकेगी
तो मुख मोड़ कर मुस्कुराएगी जैसे
अभी उस ने इक घात में बैठे
दिल को पसंद आने वाले
शिकारी को धोका दिया है

पहली बात ही आख़िरी थी : मुनीर नियाज़ी

पहली बात ही आख़िरी थी
इस से आगे बढ़ी नहीं
डरी हुई कोई बेल थी जैसे
पूरे घर पे चढ़ी नहीं
डर ही क्या था कह देने में
खुल कर बात जो दिल में थी
आस-पास कोई और नहीं था
शाम थी नई मोहब्बत की
एक झिजक सी साथ रही क्यूँ
क़ुर्ब की साअत-ए-हैराँ में
हद से आगे बढ़ने की
फैल के उस तक जाने की
उस के घर पर चढ़ने की

इक और घर भी था मिरा : मुनीर नियाज़ी

इक और घर भी था मिरा
जिस में मैं रहता था कभी
इक और कुम्बा था मिरा
बच्चों बड़ों के दरमियाँ
इक और हस्ती थी मिरी
कुछ रंज थे कुछ ख़्वाब थे
मौजूद हैं जो आज भी
वो घर जो थी बस्ती मिरी
ये घर जो है बस्ती मिरी
उस में भी थी हस्ती मिरी
इस में भी है हस्ती मिरी
और मैं हूँ जैसे कोई शय
दो बस्तियों में अजनबी

हक़ीक़त : मुनीर नियाज़ी

न तू हक़ीक़त है और न मैं
और न तेरी मेरी वफ़ा के क़िस्से
न बरखा-रुत की सियाह रातों में
रास्ता भूल कर भटकती हुई सजल नारियों के झुरमुट
न उजड़े नगरों में ख़ाक उड़ाते
फ़सुर्दा-दिल प्रेमियों के नौहे
अगर हक़ीक़त है कुछ तो ये इक हवा का झोंका
जो इब्तिदा से सफ़र में है
और जो इंतिहा तक सफ़र करेगा

सदा ब-सहरा : मुनीर नियाज़ी

चारों सम्त अंधेरा घुप है और घटा घनघोर
वो कहती है कौन
मैं कहता हूँ मैं
खोलो ये भारी दरवाज़ा
मुझ को अंदर आने दो
उस के बाद इक लम्बी चुप और तेज़ हवा का शोर

जादूगर : मुनीर नियाज़ी

जब मेरा जी चाहे मैं जादू के खेल दिखा सकता हूँ
आँधी बन कर चल सकता हूँ बादल बन कर छा सकता हूँ
हाथ के एक इशारे से पानी में आग लगा सकता हूँ
राख के ढेर से ताज़ा रंगों वाले फूल उगा सकता हूँ
इतने ऊँचे आसमान के तारे तोड़ के ला सकता हूँ
मेरी उम्र तो बस ऐसे ही खेल दिखाते गुज़री है
अपनी साँस के शोलों से गुलज़ार खिलाते गुज़री है
झूटी सच्ची बातों के बाज़ार सजाते गुज़री है
पत्थर की दीवारों को संगीत सुनाते गुज़री है
अपने दर्द को दुनिया की नज़रों से छुपाते गुज़री है

मैं और वो : मुनीर नियाज़ी

रोज़-ए-अज़ल से वो भी मुझ तक आने की कोशिश में है
रोज़-ए-अज़ल से मैं भी उस से मिलने की कोशिश में हूँ
लेकिन मैं और वो हम दोनों
अपनी अपनी शक्लों जैसे लाखों गोरख धंदों में
चुप चुप और हैरान खड़े हैं
कौन है मैं
और कौन है तू
बस इस दर्द में खोए हुए हैं
सुब्ह को मिलने वाले समझें
जैसे ये तो रोए हुए हैं

ख़लिश : मुनीर नियाज़ी

वो ख़ूब-सूरत लड़कियाँ
दश्त-ए-वफ़ा की हिरनियाँ
शहर-ए-शब-ए-महताब की
बेचैन जादू-गर्नियाँ
जो बादलों में खो गईं
नज़रों से ओझल हो गईं
अब सर्द काली रात को
आँखों में गहरा ग़म लिए
अश्कों की बहती नहर में
गुलनार चेहरे नम किए
हस्ती की सरहद से परे
ख़्वाबों की संगीं ओट से
कहती हैं मुझ को बेवफ़ा
हम से बिछड़ कर क्या तुझे
सुख का ख़ज़ाना मिल गया

इन लोगों से ख़्वाबों में मिलना ही अच्छा रहता है : मुनीर नियाज़ी

थोड़ी देर को साथ रहे किसी धुँदले शहर के नक़्शे पर
हाथ में हाथ दिए घूमे कहीं दूर दराज़ के रस्ते पर
बे-पर्दा स्थानों पर दो उड़ते हुए गीतों की तरह
ग़ुस्से में कभी लड़ते हुए कभी लिपटे हुए पेड़ों की तरह
अपनी अपनी राह चले फिर आख़िर शब के मैदाँ में
अपने अपने घर को जाते दो हैराँ बच्चों की तरह

मैं और शहर : मुनीर नियाज़ी

सड़कों पे बे-शुमार गुल-ए-ख़ूँ पड़े हुए
पेड़ों की डालियों से तमाशे झड़े हुए
कोठों की ममटियों पे हसीं बुत खड़े हुए
सुनसान हैं मकान कहीं दर खुला नहीं
कमरे सजे हुए हैं मगर रास्ता नहीं
वीराँ है पूरा शहर कोई देखता नहीं
आवाज़ दे रहा हूँ कोई बोलता नहीं

वतन में वापसी : मुनीर नियाज़ी

कल वो मिली जो बचपन में मेरे भाई से खेला करती थी
जाने तब क्या बात थी उस में मुझ से बहुत ही डरती थी
पर क्या हुआ? वो कहाँ गई? अब कौन ये बातें जानता है
कब इतनी दूरी से कोई शक्लों को पहचानता है
लेकिन अब जो मिली है मुझ से ऐसा कभी न देखा था
उस को इतनी चाह थी मेरी मैं ने कभी न सोचा था
नाम भी उस ने बच्चे का मेरे ही नाम पे रक्खा था
फिर कहीं उस से बिछड़ न जाऊँ ऐसे मुझ को तकती थी
कोई गहरी बात थी जी में जिसे वो कह भी न सकती थी
ऐसी चुप और पागल आँखें दमक रही थीं शिद्दत से
मैं तो सच-मुच डरने लगा था इस ख़ामोश मोहब्बत से

ख़्वाहिश के ख़्वाब : मुनीर नियाज़ी

घर था या कोई और जगह जहाँ मैं ने रात गुज़ारी थी
याद नहीं ये हुआ भी था या वहम ही की अय्यारी थी
एक अनार का पेड़ बाग़ में और घटा मतवारी थी
आस-पास काले पर्बत की चुप की दहशत तारी थी
दरवाज़े पर जाने किस की मद्धम दस्तक जारी थी

मैं, वो और रात : मुनीर नियाज़ी

कमरे में ख़ामोशी है और बाहर रात बहुत काली है
ऊँचे ऊँचे पेड़ों पर सियाही ने छावनी डाली है
तेज़ हवा कहती है पल में बरखा आने वाली है
वो सोला-सिंगार किए अपनी ही सोच में खोई हुई है
साँसों में वो गहरा पन है जैसे बे-सुध सोई हुई है
दिल में सौ अरमान हैं लेकिन मेरी सम्त निगाह नहीं है
यूँ बैठी है जैसे उस के दिल में किसी की चाह नहीं है

अपने शहर के लिए दुआ : मुनीर नियाज़ी

ऐ शहर-ए-बे-मिसाल तिरे बाम-ओ-दर की ख़ैर
ऐ हुस्न-ए-ला-ज़वाल तिरे बाम-ओ-दर की ख़ैर
देखे हैं तू ने दूर बहुत आसमान के
बीते हैं तुझ पे अहद बहुत इम्तिहान के
ऐ क़र्या-ए-जलाल तिरे बाम-ओ-दर की ख़ैर
इक दास्ताँ है साथ तिरे रंग-ओ-नूर की
यादें हैं तेरे साथ बहुत दूर दूर की
ख़्वाब-ए-शब-ए-जमाल तिरे बाम-ए-दर की ख़ैर
तस्ख़ीर तुझ को कौन करेगा जहान में
तू है ख़ुदा और उस के नबी की अमान में
लाहौर-ए-पुर-कमाल तिरे बाम-ओ-दर की ख़ैर

दुश्मन की तरफ़ दोस्ती का हाथ : मुनीर नियाज़ी

मेरे जिस्म में ज़हर है तेरा
मेरा दिल है तेरा घर
तू मौजूद है साथ हमेशा
ख़ौफ़ सा बन कर शाम-ओ-सहर
तेरा असर है मेरे लहू पर
जैसे चाँद समुंदर पर
इतनी ज़र्द है रंगत तेरी
जम जाती है उस पे नज़र
तू है सज़ा मिरे होने की
या है मेरा ज़ाद-ए-सफ़र
करेगा तू बीमार मुझे या
बनेगा ना-मालूम का डर
रहेगा दाइम गहरी तह में
जैसे अँधेरे में कोई दर
गुम कर देगा राह में मुझ को
या देगा मंज़िल की ख़बर
तू है मेरा दोस्त कि दुश्मन
ये तो बता मुझ को ऐ ज़र

मैं : मुनीर नियाज़ी

मैं भी दिल के बहलाने को क्या क्या स्वाँग रचाता हूँ
सायों के झुरमुट में बैठा सुख की सेज सजाता हूँ
बुझते जलते दीपक से सपनों के चाँद बनाता हूँ
आप ही काली आँखें बन कर अपने सामने आता हूँ
आप ही दुख का भेस बदल कर उन को ढूँडने जाता हूँ

मैं और बादल : मुनीर नियाज़ी

शाम का बादल नए नए अंदाज़ दिखाया करता है
कभी वो नन्हा बच्चा बन कर मेरे सामने आता है
कभी वो अपना ख़ून बहा कर मेरे जी को डराता है
कभी किसी हँसमुख औरत की तरह मुझे बहलाता है
फिर आँखों से इशारा कर के कमरे में छुप जाता है
इसी तरह वो नए नए अंदाज़ दिखाया करता है
जब कोई उस को घूर के देखे नाज़ दिखाया करता है

अपने घर में : मुनीर नियाज़ी

मुँह धो कर जब उस ने मुड़ कर मेरी जानिब देखा
मुझ को ये महसूस हुआ जैसे कोई बिजली चमकी है
या जंगल के अंधेरे में जादू की अँगूठी दमकी है
साबुन की भीनी ख़ुश्बू से महक गया दालान
उफ़ उन भीगी भीगी आँखों में दिल के अरमान
मोतियों जैसे दाँतों में वो गहरी सुर्ख़ ज़बान
देख के गाल पे नाख़ुन का मद्धम सा लाल निशान
कोई भी होता मेरी जगह पर हो जाता हैरान

तू : मुनीर नियाज़ी

वहाँ जिस जगह पर सदा सो गई है
हर इक सम्त ऊँचे दरख़्तों के झुण्ड
अन-गिनत साँस रोके हुए चुप खड़े हैं
जहाँ अब्र-आलूद शाम उड़ते लम्हों को रोके अबद बन गई है
वहाँ इश्क़ पेचाँ की बेलों में लिपटा हुआ इक मकाँ हो
अगर मैं कभी राह चलते हुए उस मकाँ के दरीचों के
नीचे से गुज़रूँ
तो अपनी निगाहों में इक आने वाले मुसाफ़िर की
धुँदली तमन्ना लिए तू खड़ी हो

कल्पना : मुनीर नियाज़ी

रात है कितनी गहरी काली
दुख की बात सुझाने वाली
दूर दूर की आवाज़ों को
उजड़े घरों में लाने वाली
सर पर है घनघोर बदरिया
दिल में लगन प्रीतम के मिलन की
शोर मचाती बढ़ती आए
तेज़ हवा सूने मधुबन की
चढ़ता सागर रस्ता रोके
बैरन बिजली जी को डराए
दूर बहुत है पी की नगरिया
हम से तो अब चला न जाए

दुश्मनों के दरमियान शाम : मुनीर नियाज़ी

फैलती है शाम देखो डूबता है दिन अजब
आसमाँ पर रंग देखो हो गया कैसा ग़ज़ब
खेत हैं और इन में इक रू-पोश से दुश्मन का शक
सरसराहट साँप की गंदुम की वहशी गर महक
इक तरफ़ दीवार-ओ-दर और जलती-बुझती बतियाँ
इक तरफ़ सर पर खड़ा ये मौत जैसा आसमाँ

मौसम-ए-सरमा की बारिश का ये पहला रोज़ है : मुनीर नियाज़ी

मौसम-ए-सरमा की बारिश का ये पहला रोज़ है
धुँद है अतराफ़ में सूरज के ख़्वाब-ए-गर्म पर
मैं कि जो महसूर हूँ आराम-ए-हुस्न-ए-यार में
इक हिफ़ाज़त सी है मुझ को जिस्म की महकार में
याद और मौजूद दोनों की हक़ीक़त इस में है
ग़म की ताक़त को ग़लत करने की हिम्मत इस में है
सेहर इतने हैं जमाल-ए-मेहरबान-ए-यार में
जितने इस सरमा की बारिश के हसीं असरार में

इशारे : मुनीर नियाज़ी

शहर के मकानों के
सर्द साएबानों के
दिलरुबा थके साए
ख़्वाहिशों से घबराए
रह-रवों से कहते हैं
रात कितनी वीराँ है
मौत बाल-अफ़्शाँ है
इस घने अंधेरे में
ख़्वाहिशों के डेरे में
दिल के चोर बस्ते हैं
उन के पास जाने के
लाख चोर रस्ते हैं

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...