परिचय
रघुवीर सहाय (1929–1990) हिंदी के प्रमुख आधुनिक कवि, लेखक और पत्रकार थे। वे नई कविता के महत्वपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं। उनकी कविताओं में आम आदमी का जीवन, सामाजिक विषमता, राजनीतिक व्यवस्था, सत्ता का चरित्र और लोकतांत्रिक समाज की विडंबनाएँ प्रमुखता से दिखाई देती हैं। उन्होंने सरल और बोलचाल की भाषा के माध्यम से अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक सच्चाइयों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया। ‘लोग भूल गए हैं’, ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ और ‘हँसो हँसो जल्दी हँसो’ उनकी प्रमुख काव्य-कृतियों में शामिल हैं। आधुनिक हिंदी कविता में रघुवीर सहाय का स्थान एक सजग और जनपक्षधर कवि के रूप में महत्वपूर्ण है।
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| Raghuvir Sahay |
किताब पढ़कर रोना
रघुवीर सहाय
रोया हूँ मैं भी किताब पढ़कर केपर अब याद नहीं कि कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तांत था
पात्र जिसके अनेक
बनते थे चारों तरफ़ से मँडराते हुए आते थे
पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं
क्षण-भर में सहसा पहचाना
यह पढ़ता कुछ और हूँ
रोता कुछ और हूँ
दोनों जुड़ गए हैं पढ़ना किताब का
और रोना मेरे व्यक्ति का
लेकिन मैंने जो पढ़ा था
उसे नहीं रोया था
पढ़ने ने तो मुझमें रोने का बल दिया
दु:ख मैंने पाया था बाहर किताब के जीवन से
पढ़ता जाता और रोता जाता था मैं
जो पढ़ता हूँ उस पर मैं नहीं रोता हूँ
बाहर किताब के जीवन से पाता हूँ
रोने का कारण मैं
पर किताब रोना संभव बनाती है।
कोई एक और मतदाता
रघुवीर सहाय
जब शाम हो जाती है तब ख़त्म होता है मेरा कामजब काम ख़त्म होता है तब शाम ख़त्म होती है
रात तक दम तोड़ देता है परिवार
मेरा नहीं एक और मतदाता का संसार
रोज़ कम खाते-खाते ऊबकर
प्रेमी-प्रेमिका एक पत्र लिख दे गए सूचना विभाग को
दिन-रात साँस लेता है ट्रांजिस्टर लिए हुए ख़ुशनसीब ख़ुशीराम
फ़ुर्सत में अन्याय सहते में मस्त
स्मृतियाँ खँखोलता हकलाता बतलाता सवेरे
अख़बार में उसके लिए ख़ास करके एक पृष्ठ पर दुम
हिलाता संपादक एक पर गुरगुराता है।
एक दिन आख़िरकार दुपहर में छुरे से मारा गया ख़ुशीराम
वह अशुभ दिन था; कोई राजनीति का मसला
देश में उस वक़्त पेश नहीं था। ख़ुशीराम बन नहीं
सका क़त्ल का मसला, बदचलनी का बना, उसने
जैसा किया वैसा भरा
इतना दुख मैं देख नहीं सकता।
कितना अच्छा था छायावादी
एक दुख लेकर वह एक गान देता था
कितना कुशल था प्रगतिवादी
हर दुख का कारण वह पहचान लेता था
कितना महान था गीतकार
जो दुख के मारे अपनी जान लेता था
कितना अकेला हूँ मैं इस समाज में
जहाँ सदा मरता है एक और मतदाता।
रामदास
रघुवीर सहाय
चौड़ी सड़क गली पतली थीदिन का समय घनी बदली थी
रामदास उस दिन उदास था
अंत समय आ गया पास था
उसे बता यह दिया गया था उसकी हत्या होगी
धीरे-धीरे चला अकेले
सोचा साथ किसी को ले ले
फिर रह गया, सड़क पर सब थे
सभी मौन थे सभी निहत्थे
सभी जानते थे यह उस दिन उसकी हत्या होगी
खड़ा हुआ वह बीच सड़क पर
दोनों हाथ पेट पर रख कर
सधे क़दम रख करके आए
लोग सिमट कर आँख गड़ाए
लगे देखने उसको जिसकी तय था हत्या होगी
निकल गली से तब हत्यारा
आया उसने नाम पुकारा
हाथ तौलकर चाक़ू मारा
छूटा लोहू का फ़व्वारा
कहा नहीं था उसने आख़िर उसकी हत्या होगी
कैमरे में बंद अपाहिज
रघुवीर सहाय
हम दूरदर्शन पर बोलेंगेहम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में
उससे पूछेंगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा
देता है?
(कैमरा
दिखाओ इसे बड़ा बड़ा)
हाँ तो बताइए आपका दुख क्या है
जल्दी बताइए वह दुख बताइए
बता नहीं पाएगा
सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है
कैसा
यानी कैसा लगता है।
(हम ख़ुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?)
सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे
इंतज़ार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं?
(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)
फिर हम परदे पर दिखलाएँगे
फूली हुई आँख की एक बड़ी तस्वीर
बहुत बड़ी तस्वीर
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी
(आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे)
एक और कोशिश
दर्शक
धीरज रखिए
देखिए
हमें दोनों एक संग रुलाने हैं
आप और वह
दोनों
(कैमरा
बस करो
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक़्त की क़ीमत है)
अब मुस्कुराएँगे हम
आप देख रहे थे एक सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम
(बस थोड़ी ही कसर रह गई)
धन्यवाद।
आत्महत्या के विरुद्ध
रघुवीर सहाय
समय आ गया है जब तब कहता है संपादकीयहर बार दस बरस पहले मैं कह चुका होता हूँ कि समय आ गया है।
एक ग़रीबी, ऊबी, पीली, रोशनी, बीवी
रोशनी, धुंध, जाला, यमन, हरमुनियम अदृश्य
डब्बाबंद शोर
गाती गला भींच आकाशवाणी
अंत में टडंग।
अकादमी की महापरिषद की अनंत बैठक
अदबदाकर निश्चित कर देती है जब कुछ और नहीं पाती
तो ऊब का स्तर
एक सीली उँगली का निशान डाल दस्तख़त कर
तले हुए नाश्ते की तेलौस मेज़ पर।
नगरनिगम ने त्योहार जो मनाया तो जनसभा की
मंथर मटकता मंत्री मुसद्दीलाल महंत मंच पर चढ़ा
छाती पर जनता की
वसंती रंग जानते थे न पंसारी न मुसद्दीलाल
दोनों ने राय दी
कंधे से कंधा भिड़ा ले चलो
पालकी।
कल से ज़्यादा लोग पास मँडराते हैं
ज़रूरत से ज़्यादा आस-पास ज़रूरत से ज़्यादा नीरोग
शक से कि व्यर्थ है जो मैं कर रहा हूँ
क्योंकि जो कह रहा हूँ उसमें अर्थ है।
कल मैंने उसे देखा लाख चेहरों में एक वह चेहरा
कुढ़ता हुआ और उलझा हुआ वह उदास कितना बोदा
वही था नाटक का मुख्य पात्र
पर उसकी ठस पीठ पर मैं हाथ रख न सका
वह बहुत चिकनी थी।
लौट आओ फिर उसी खाते-पीते स्वर्ग में
पिटे हुए नेता, पिटे अनुचर बुलाते हैं
मार फड़फड़ाते हैं पंख साल दो साल गले बँधी घंटियाँ
पढ़ी-लिखी गर्दनें बजाती हैं फिर उड़ जाता है विचार
हम रह जाते हैं अधेड़
कुछ होगा कुछ होगा अगर मैं बोलूँगा
न टूटे न टूटे तिलिस्म सत्ता का मेरे अंदर एक कायर टूटेगा टूट
मेरे मन टूट एक बार सही तरह
अच्छी तरह टूट मत झूठमूठ ऊब मत रूठ
मत डूब सिर्फ टूट जैसे कि परसों के बाद
वह आया बैठ गया आदतन एक बहस छेड़कर
गया एकाएक बाहर ज़ोरों से एक नक़ली दरवाज़ा
भेड़कर
दर्द दर्द मैंने कहा क्या अब नहीं होगा
हर दिन मनुष्य से एक दर्जा नीचे रहने का दर्द
गरजा मुस्टंडा विचारक—समय आ गया है
कि रामलाल कुचला हुआ पाँव जो घसीटकर
चलता है अर्थहीन हो जाए।
छुओ
मेरे बच्चे का मुँह
गाल नहीं जैसा विज्ञापन में छपा
ओंठ नहीं
मुँह
पता चला जान का शोर डर कोई लगा
नहीं—बोला मेरा भाई मुझे पाँव-तले
रौंदकर, अंग्रेज़ी।
कितना आसान है पागल हो जाना
और भी जब उस पर इनाम मिलता है।
नक़ली दरवाज़े पीटते हैं जवान हाथों को
काम सर को आराम मिलता है : दूर
राजधानी से कोई कस्बा दुपहर बाद छटपटाता है
एक फटा कोट एक हिलती चौकी एक लालटेन
दोनों, बाप मिस्तरी, और बीस बरस का नरेन
दोनों पहले से जानते हैं पेंच की मरी हुई चूड़ियाँ
नेहरू-युग के औज़ारों को मुसद्दीलाल की सबसे बड़ी देन
अस्पताल में मरीज़ छोड़कर आ नहीं सकता तीमारदार
दूसरे दिन कौन बताएगा कि वह कहाँ गया
निष्कासित होते हुए मैंने उसे देखा था
जयपुर-अधिवेशन जब समेटा जा रहा था
जो मजूर लगे हुए थे कुर्सी ढोने में
उन्होंने देखा एक कोने में बैठा है
अजय अपमानित
वह उसे छोड़ गए
कुर्सी को
सन्नाटा छा गया
कितना आसान है नाम लिखा लेना
मरते मनुष्य के बारे में क्या करूँ क्या करूँ मरते मनुष्य का
अंतरंग परिषद से पूछकर तय करना कितना
आसान है कितनी दिलचस्प है नेहरू की
आशंसा पाटिल की भर्त्सना की कथा
कितनी घुटन के अंदर घुटन के
अंदर घुटन से कितनी सहज मुक्ति
कितना आसान है रख लेना अपने पास अपना वोट
क्योंकि प्रतिद्वंद्वी अयोग्य है
अत्याचारी हत्या किए जाए जब तक कि स्वर्णधूलि
स्वर्णशिखर से आकर आत्मा के स्वर्णखंड
किए जाए
गोल शब्दकोश में अमोल बोल तुतलाते
भीमकाय भाषाविद हाँफते डकारते हँकाते
अँगरेज़ी की अवध्य गाय
घंटा घनघनाते पुजारी जयजयकार
सरकार से क़रार ज़ारी हज़ार शब्द रोज़
क़ैद
रोज़ रोज़ एक और दर्द एक क्रोध एक बोध
और नापैद
कल पैदा करना होगा भूखी पीढ़ी को
आज जो अनाज पेट भरता है
लो हम चले यह रक्खे हैं उर्वरक संबंधी
कुछ विचार
मुन्न से बोले विनोबा से जैनेंद्र दिल्ली में बहुत बड़ी लपसी
पकाई गई युद्ध से बदहवास
जनता के लिए लड़ो या न लड़ो
भारत पाकिस्तान अलग-अलग करो
फिर मरो कढ़िल कर
भूल जाओ
राजनीति
अध्यापक याद करो किसके आदमी हो तुम
याद करो विद्यार्थी तुम्हें आदमी से
एक दर्जा नीचे
किसका आदमी बनना है—दर्द?
दर्द, ख़ैराती अस्पताल में डॉक्टर ने कहा वह मेरा काम नहीं
वह मुसद्दी का है
वहीं भेजता है मुझे लिखकर इसे अच्छा करो
जो तुम बीमार हो तुमने उसे ख़ुश नहीं किया होगा
अब तुम बीमार हो तो उसे ख़ुश करो
कुछ करो
उसने कहा लोहिया से लोहिया ने कहा
कुछ करो
ख़ुश हुआ वह चला गया अस्पताल में भीड़
भौचक भीड़ धाँय धाँय
सौ हज़ार लाख दर्द आठ-दस क्रोध
तीन चार बंद बाज़ार भय भगदड़ गर्द
लाल
छाँह धूप छाँह, नहीं घोड़े बंदूक़
धुआँ ख़ून ख़त्म चीख़
कर हम जानते नहीं
हम क्या बनाते हैं
जब हम दफ़नाते हैं
एक हताश लड़के की लाश बार-बार
एक बेबसी
थोड़ी-सी मिटती है
फिर करने लगती है भाँय-भाँय
समय जो गया है उसके सन्नाटे में राष्ट्रपति
प्रकटे देते हुए सीख समाचारपत्र में छपी
दुधमुँही बच्ची खाती हुई भीख
खिसियाते कुलपति
मुसद्दीलाल
घिघियाते उपकुलपति
एक शब्द कहीं नहीं कि वह लड़का कौन था
क्या उसके बहनें थीं
क्या उसने रक्खे थे टीन के बक्से में अपने अजूबे
वह कौन-कौन से पकवान
खाता था
एक शब्द कहीं नहीं एक वह शब्द जो वह खोज
रहा था जब वह मारा गया।
सन्नाटा छा गया
चिट्ठी लिखते-लिखते छुटकी ने पूछा
'क्या दो बार लिख सकते हैं कि याद
आती है?'
‘एक बार मामी की एक बार मामा की?'
'नहीं, दोनों बार मामी की'
‘लिख सकती हो ज़रूर बेटी', मैंने कहा
समय आ गया है।
दस बरस बाद फिर पदारूढ़ होते ही
नेतराम, पदमुक्त होते ही न्यायाधीश
कहता है—समय आ गया है—
मौका अच्छा देखकर प्रधानमंत्री
पिटा हुआ दलपति अख़बारों से
सुंदर नौजवानों से कहता है गाता बजाता
हारा हुआ देश।
समय जो गया है
मेरे तलुवे से छनकर पाताल में
वह जानता हूँ मैं।
हँसो हँसो जल्दी हँसो
रघुवीर सहाय
हँसो तुम पर निगाह रखी जा रही हैहँसो अपने पर न हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट
पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे
ऐसे हँसो कि बहुत ख़ुश न मालूम हो
वरना शक होगा कि यह शख़्स शर्म में शामिल नहीं
और मारे जाओगे
हँसते-हँसते किसी को जानने मत दो किस पर हँसते हो
सबको मानने दो कि तुम सबकी तरह परास्त होकर
एक अपनापे की हँसी हँसते हो
जैसे सब हँसते हैं बोलने के बजाय
जितनी देर ऊँचा गोल गुंबद गूँजता रहे, उतनी देर
तुम बोल सकते हो अपने से
गूँज थमते-थमते फिर हँसना
क्योंकि तुम चुप मिले तो प्रतिवाद के जुर्म में फँसे
अंत में हँसे तो तुम पर सब हँसेंगे और तुम बच जाओगे
हँसो पर चुटकुलों से बचो
उनमें शब्द हैं
कहीं उनमें अर्थ न हों जो किसी ने सौ साल पहले दिए हों
बेहतर है कि जब कोई बात करो तब हँसो
ताकि किसी बात का कोई मतलब न रहे
और ऐसे मौकों पर हँसो
जो कि अनिवार्य हों
जैसे ग़रीब पर किसी ताक़तवर की मार
जहाँ कोई कुछ कर नहीं सकता
उस ग़रीब के सिवाय
और वह भी अक्सर हँसता है
हँसा-हँसो जल्दी हँसो
इसके पहले कि वह चले जाएँ
उनसे हाथ मिलाते हुए
नजरें नीची किए
उसको याद दिलाते हुए हँसो
कि तुम कल भी हँसे थे
हमने यह देखा
रघुवीर सहाय
यह क्या है जो इस जूते में गड़ता हैयह कील कहाँ से रोज़ निकल आती है
इस दुःख को रोज़ समझना क्यों पड़ता है
फिर कल की जैसी याद तुम्हारी आई
वैसी ही करुणा है वैसी ही तृष्णा
इस बार मगर कल से है कम दुखदायी
फिर ख़त्म हो गए अपने सारे पैसे
सब चला गया सुख-दुःख बट्टेखाते में
रह गए फ़क़त हम तुम वैसे के वैसे
फिर अपना पिछला दर्द अचानक जागा
फिर हमने जी लेने की तैयारी की
उस वक़्त तक़ाज़ा करने आया आग़ा
इस मुश्किल में हमने आख़िर क्या सीखा
इस कष्ट उठाने का कोई मतलब है
या है यह केवल अत्याचार किसी का
''यह तो है ही'', शुभचिंतक यों कहते हैं,
अपमान, अकेलापन, फ़ाक़ा, बीमारी
क्यों है? औ' वह सब हम ही क्यों सहते हैं?
हम ही क्यों यह तक़लीफ़ उठाते जाएँ
दुख देने वाले दुख दें और हमारे
उस दुख के गौरव की कविताएँ गाएँ!
यह है अभिजात तरीक़े की मक्कारी
इसमें सब दुख हैं, केवल यहीं नहीं हैं
—अपमान, अकेलापन, फ़ाक़ा, बीमारी
जो हैं, वे भी हो जाया करते हैं कम
है ख़ास ढंग दुख से ऊपर उठने का
है ख़ास तरह की उनकी अपनी तिकड़म
जीवन उनके ख़ातिर है खाना-कपड़ा
वह मिल जाता है और उन्हें क्या चहिए
आख़िर फिर किसका रह जाता है झगड़ा
हम सहते हैं इसलिए कि हम सच्चे हैं
हम जो करते हैं वह ले जाते हैं वे
वे झूठे हैं लेकिन सबसे अच्छे हैं
पर नहीं, हमें भी राह दीख पड़ती है
चलने की पीड़ा कम होती जाती है
जैसे-जैसे वह कील और गड़ती है
हमने यह देखा दर्द बहुत भारी है
आवश्यक भी है, जीवन भी देता है
—यह नहीं कि उससे कुछ अपनी यारी है
हमने यह देखा अपनी सब इच्छाएँ
रह ही जाती हैं थोड़ी बहुत अधूरी
—यह नहीं कि यह कहकर मन को समझाएँ
—यह नहीं कि जो जैसा है वैसा ही हो
यह नहीं कि सब कुछ हँसते-हँसते ले लें
देने वाले का मतलब कैसा ही हो
—यह नहीं कि हमको एक कष्ट है कोई
जो किसी तरह कम हो जाए, बस छुट्टी
कोई आकर कर दे अपनी दिलजोई
वह दर्द नहीं मेरे ही जीवन का है
वह दर्द नहीं है सिर्फ़ बिरह की पीड़ा
वह दर्द ज़िंदगी के उखड़ेपन का है
वह दर्द अगर ये आँखें नम कर जाए
करुणा कर आप हमारे आँसू पोंछे
—वह प्यार कहीं यह दर्द न कम कर जाए
चिकने कपड़े, अच्छी औरत, ओहदा भी
फ़िलहाल सभी नाकाफ़ी बहलावे हैं
ये तो पा सकता है कोई शोहदा भी
जब ठौर नहीं मिलता है कोई दिल को
हम जो पाते हैं उस पर लुट जाते हैं
क्या यही पहुँचना होता है मंज़िल को?
हमको तो अपने हक़ सब मिलने चहिए
हम तो सारा-का-सारा लेंगे जीवन
'कम-से-कम' वाली बात न हमसे कहिए।
हत्या की संस्कृति
रघुवीर सहाय
अँग्रेज़ी पढ़ा-लिखा हत्यारा कहता है‘‘मुझे कहीं छिपना है, पुलिस पीछे पड़ी है
आधुनिक प्रेमिका कहती है, “ख़ून, अरे लाओ, पट्टी कर दूँ”
औरत से कहता है अभिजात अपराधी, “धन्यवाद।”
(यह एक शब्द में संस्कृति है)
पट्टी करती है जब सर झुका कामिनी
मानो संवाद में बड़ा अभिप्राय भर कहता है
“तुमने पूछा नहीं ख़ून कैसे लगा?
यह मैं पूछना नहीं चाहती
इस समय मेरे लिए इतना ही काफ़ी है कि तुम मुश्किल में हो।”
हत्या की संस्कृति में प्रेम नहीं होता है
नैतिक आग्रह नहीं
प्रश्न नहीं पूछती है रखैल
सब कुछ दे देती है बिना कुछ लिए हुए पतिव्रता की तरह।

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