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सूरत की बात (कहानी) | Soorat Ki Baat : लियो टॉल्स्टॉय

हिंदुस्तान के सूरत शहर में एक अतिथिशाला थी। उसी की बात है। सूरत शहर उन दिनों बढ़ा-चढ़ा बंदरगाह था और दुनियाभर से देश-विदेश के यात्री वहाँ आया करते और उस अतिथिशाला में मिला करते थे।
एक दिन एक फ़ारसी आलिम वहाँ आए। उन्होंने ईश-तत्त्व पर मनन-चिंतन करने में जीवन बिताया था और उस विषय पर बहुत-कुछ लिखा-पढ़ा था। ईश्वर के बारे में उन्होंने इतना सोचा, इतना पढ़ा और इतना लिखा था कि आख़िर उनकी बुद्धि भ्रम में पड़ गई थी और ईश्वर की सत्ता से भी उनका विश्वास जाता रहा था। यह पता पाकर वहाँ के शाह ने अपने देश फ़ारस से उन्हें देश-निकाला दे दिया था।
जीवनभर सृष्टि के आदि-कारण पर विवाद करते-करते यह बिचारे तत्त्व-भेदी आख़िर विभ्रम में पड़ गए थे और बजाए समझने के कि उनकी बुद्धि में विकार है, वह मानने लग गए थे कि सृष्टि की व्यवस्था में ही कोई मूल-चेतना काम नहीं कर रही है।
इन आलिम-फ़ाज़िल के साथ अफ़्रीका का एक हब्शी ग़ुलाम भी था। वह संग-संग रहता था। आलिम अतिथिशाला में आए तो ग़ुलाम दरवाज़े के बाहर ही ठहर गया। यहाँ वह धूप में एक पत्थर पर बैठ गया और मक्खियाँ बहुत थीं, सो बैठा-बैठा मक्खियाँ उड़ाने लगा।
वह फ़ारसी आलिम अंदर पहुँचकर आराम से मसनद पर जम गए और एक अफ़ीम के शरबत के प्याले का हुक्म दिया। उसकी घूँट लेने पर उनके दिमाग़ की नसों में तेज़ी आ गई। उस वक़्त शाला के खुले दरवाज़े में से उधर बैठे ग़ुलाम से वह बोले, क्यों रे, क्या ख़्याल है तेरा ? ख़ुदा है या नहीं?
वह तो है—
ग़ुलाम ने कहा और कमर में बँधी अपनी पेटी में से लकड़ी की एक मूरत उसने निकाली। बोला—
–जी, देखिए, यह है। इसी ख़ुदा ने मेरे पैदा होने के रोज़ से मुझे बचाया और पाला है। हमारे देश में हरएक आदमी जिस बरगद की पूजा करता है, वह ख़ुदा मेरा उसी की लकड़ी का बना है।
वहाँ अतिथिशाला में जमा हुए और लोग आलिम मालिक और बेवक़ूफ़ ग़ुलाम की यह बातचीत अचरज से सुनने लगे। पहले तो उन्हें मालिक के सवाल पर आश्चर्य था। लेकिन ग़ुलाम के जवाब पर और भी आश्चर्य हुआ।
उन्हीं लोगों में एक ब्राह्मण पंडित थे। ग़ुलाम की बात सुनकर उन्होंने उस तरफ़ मुँह किया और बोले—
अरे मूर्ख, क्या तुम संभव समझते हो कि ईश्वर को तुम अपनी पेटी में लिए फिर सकते हो? ईश्वर एक है, अखिल है। वह ब्रह्म है। समस्त सृष्टि से वह बड़ा है, क्योंकि स्रष्टा है। ब्रह्म ही सत् है, वही सत्ताधीश है। उसकी महिमा-पूजा में गंगा तट पर अनेकानेक हमारे मंदिर बने हुए हैं, जहाँ सन्निष्ठ ब्राह्मण उसकी पूजा-अर्चा में निरत रहते हैं। सत्य परमेश्वर का ज्ञान उन्हीं को है और किसी को नहीं है। सहस्र-सहस्र वर्ष हो गए परंतु कई काल-चक्रों के अनंतर भी ब्राह्मण ही उस ब्रह्म-ज्ञान के अधिकारी हैं, क्योंकि स्वयं ब्रह्म उनके रक्षक हैं।
ब्राह्मण पंडित ने इस भाव से यह कहा कि उपस्थित मंडली सब उनके प्रभाव से विश्वस्त ही रहेगी। लेकिन वहीं एक यहूदी दलाल बैठे थे। जवाब में वह बोले—
नहीं, सच्चा ईश्वर हिंदुस्तान के मंदिर में नहीं न ब्राह्मण लोग ईश्वर को विशेष प्रिय हैं। सच्चा ईश्वर ब्राह्मणोंवाला ईश्वर नहीं है। बल्कि इब्राहीम, इसाक, याकूब का ख़ुदा सच्चा ख़ुदा है। और उसका साया सबको छोड़ पहले इज़राइलवालों को मिला है। दुनिया शुरू हुई तब हमारी जाति को ही उसकी शरण का वरदान मिला है। हम लोग जितने उसके निकट हैं और कोई नहीं है। अगर हम आज दुनिया पर छितरे हुए फैले हैं, तो इसका और मतलब नहीं है, यह तो हमारी परीक्षा है, क्योंकि उसका वचन है कि एक दिन होगा कि उसकी प्रिय (हमारी) जाति के सब जन यरुशलम में जमा होंगे। तब यरुशलम का हमारा प्राचीन मंदिर अपनी पहली महिमा पर आ जाएगा और हज़रत इज़राइल वहाँ बैठकर तमाम जातियों और मुल्कों पर हकूमत करेंगे।
इतना कहते भावावेश से उस यहूदी के आँसू आ गए। वह और भी कहना चाहते थे; लेकिन एक रोमन पादरी भी वहाँ थे। वह बीच में पड़कर यहूदी की तरफ़ मुख़ातिब होकर बोले—
तुमने जो कहा सत्य नहीं है। तुम ईश्वर के माथे अन्याय मढ़ते हो। वह तुम्हारी जाति को औरों से ज़्यादा प्यार नहीं कर सकते। नहीं, अगर यह सच भी हो कि इज़राइल के लोग ईश्वर को विशेष प्यारे थे, तो इधर 1900 साल से उन लोगों ने अपनी करतूतों से उसे नाराज़ कर दिया है। तभी तो ईश्वर ने अपने क्रोध में तुम्हारी तमाम जाति को तितर-बितर कर डाला है। अब अपने मज़हब में औरों को तुम बढ़ा भी नहीं सकते हो और उसके मानने वाले जहाँ-तहाँ थोड़े-ही-बहुत रहते जा रहे हैं।
परमात्मा किसी ख़ास जाति के साथ पक्षपात नहीं करता। हाँ, रोमन चर्च को उसने विशेष प्रकाश दिया है और जिसका कल्याण होने वाला है उसको वह उस चर्च की शरण भेज देता है। इससे रोमन-चर्च के सिवाय मुक्ति का उपाय दूसरा नहीं।
वहाँ एक प्रोटेस्टेंट भी थे। रोमन पादरी के ये वचन सुनकर उनका चेहरा पीला हो आया और रोमन पादरी की तरफ़ मुड़कर वह बोले—
कैसे कहते हो कि मुक्ति तुम्हारे धर्म में है। असल में रक्षा और मुक्ति उन्हीं को मिलेगी जो ईशु के उपदेशों को मन से और सच्चाई से मानेंगे और उसके अनुसार चलेंगे।
उस समय एक तुर्क, जो सूरत में ही चुंगी दफ़्तर में अफ़सर थे, चुरट पीने बैठे थे, उन दोनों पादरियों की तरफ़ उन्होंने ऐसे देखा मानो दोनों भूल में हैं। और बोले—रोमन या दूसरे ईसाई धर्म में आपका ईमान रखना अब फ़िज़ूल है। बारह सौ बरस हुए कि उसकी जगह एक सच्चे मज़हब ने ले ली है। उसके नबी हज़रत मोहम्मद पर ईमान लाइए। वह मज़हब है इस्लाम। आप देखते ही हैं कि इस्लाम किस तरह दोनों मुल्क यूरोप और एशिया में बढ़ता जा रहा है। यहाँ तक कि इल्मो-हुनर के मरकज़ चीन में भी वह फैल रहा है। आपने अभी ख़ुद कहा था कि ख़ुदा ने यहूदियों का साथ छोड़ दिया है। यह इससे भी साबित है कि यहूदियों की छीछालेदर हो रही है और उनका मज़हब फल नहीं रहा है। तो फिर इस्लाम की सच्चाई का आपको इक़बाल करना होगा, क्योंकि उनको दूर-दराज़ तक फतह हासिल हो रही है। आख़िर बहिश्त में उन्हीं को जगह होगी जो मोमिन होंगे। और मुहम्मद को ख़ुदा का आख़िरी पैगंबर मानकर उस पर ईमान लावेंगे। उनमें भी वह जो उमर के पैरोकार होंगे, अली के नहीं। अली को मानने वाले क़ाफ़िर हैं।
इसके जवाब में उस फ़ारसी आलिम ने कुछ कहना चाहा, क्योंकि वह अली के तबके के थे। लेकिन तब तक तो वहाँ उपस्थित नाना मत-संप्रदायों के लोगों के बीच ख़ासा विवाद छिड़ आया था। अबीसीनिया के ईसाई वहाँ थे और तिब्बत के लामा ईस्माईली और अग्निपूजक, सब-के-सब परमात्मा के बारे में और उसकी सच्ची राह-पूजा के बारे में झगड़ रहे थे। सबका आग्रह था कि उन्हीं की जाति और देश को सच्चे ईश्वर का ज्ञान मिला है और उन्हीं की विधि सच्ची है।
बहस हो रही थी और चिल्लाहट मची थी। पर उनके बीच एक महाशय चुप थे। यह चीन देश के थे और कनफ़्यूशस में श्रद्धा रखते थे। एक कोने में अपने शांत बैठे थे और विवाद में भाग नहीं ले रहे थे। चुपचाप वह चाय पी रहे थे और दूसरे लोग जो बोल रहे थे सबकी सुनते थे; पर अपनी कुछ नहीं कहते थे।
उस तुर्क ने उन सज्जन को इस तरह बैठे देखा और बोला, ऐ चीनी दोस्त, जो मैंने कहा उम्मीद है उसकी ताईद मुझे तुमसे मिलेगी। तुम चुप बाँधे बैठे हो, लेकिन अगर बोले तो मैं जानता हूँ कि मेरी राय की ताईद ही करोगे। तुम्हारे मुल्क के व्यापारी जो चुंगी के मामले में मेरी मदद लेने आते हैं, उनका कहना है कि चीन में अगरचे बहुतेरे मत चले, लेकिन चीन के लोगों को इस्लाम की सबसे बढ़कर मालूम हुआ। वे ख़ुशी से उसे क़बूल करते जा रहे हैं। मेरी बात की तुम ताईद करोगे मैं जानता हूँ। इससे बोलो कि ख़ुदा और उनके सच्चे रसूल की बाबत तुम्हारा क्या ख़याल है!
दूसरे लोगों ने भी उन चीनी आदमी की तरफ़ मुड़कर कहा, हाँ, हाँ, बताओ कि इस विषय में तुम क्या सोचते हो?
कनफ़्यूशस के अनुयायी उन चीनी सज्जन ने आँखें बंद कीं जैसे अपनी ही थाह ली। फिर आँखें खोलीं और अपनी चौड़ी आस्तीनों में से बाहर निकाल दोनों हाथों को अपनी छाती पर ले लिया और शांत और सौम्य वाणी में उन्होंने कहना आरंभ किया—
भाइयो, मुझे मालूम होता है कि बड़ा कारण अहंकार है। वही धर्म-विश्वास के मामलों में हमको आपस में सहमत होने से रोकता है। आप लोग मेहरबानी करें और आपकी इच्छा हो तो एक कहानी कहकर मैं इस बात को साफ़ करना चाहूँगा।
हम लोग यहाँ चीन से एक अँग्रेज़ी जहाज़ पर सवार होकर आए हैं। वह जहाज़ दुनिया भर का चक्कर लगा चुका है। राह में पानी के लिए हमें ठहरना था। सो सुमात्रा द्वीप के पूर्वी किनारे पर हम उतरे। वक़्त था और ऊपर धूप थी। इससे उतरकर हम कुछ जने समुद्र के किनारे नारियलों की छाँह में बैठ गए। पास ही वहाँ के लोगों का गाँव था। हम उस समय जगह-जगह और मुल्क-मुल्क के आदमी वहाँ जमा थे।
बैठे हुए थे कि एक अंधा आदमी उसी तरफ़ आया। पीछे मालूम हुआ कि लगातार बहुत काल सूरज की तरफ़ देखते रहने से वह आदमी अंधा हुआ है।
असल में आँख गाड़कर वह सूरज का भेद और उनकी ज्योति को अपनी समझ में पकड़ रखना चाहता था। उस कोशिश में वह एक अर्से तक रहा। सदा उधर ही ताका करता। नतीजा यह हुआ कि सूरज की रोशनी से उसकी आँखों को नुकसान हुआ और वह अंधा हो गया।
अंधा होने पर तो और भी वह अपने मन में तर्क चलाने लगा। सोचता कि सूरज की रोशनी कोई तरल पदार्थ तो है नहीं, क्योंकि तरल होती तो इस बरतन से उस बरतन में ढाली जा सकती और पानी की भाँति हवा से वह यहाँ-वहाँ भी हिलती-डुलती दिखती। और न वह आग है। आग होती तो पानी उसे बुझा सकता। न वह चेतन आत्मा है, क्योंकि आत्मा तो अदृश्य है और रोशनी आँखों से दिखती है। फिर न वह कोई जड़ वस्तु है, क्योंकि उसे उठा-पकड़ नहीं सकते। और यदि सूरज की रोशनी तरल नहीं है, अग्नि अथवा चेतन या जड़ भी नहीं है तो सिद्ध हुआ कि वह है ही नहीं। अतः वह असिद्ध है।
इस तरह उसका तर्क चलने लगा। और सदा सूरज की तरफ़ देखने और बुद्धि लगाए रखने से उसने अपनी आँख भी और बुद्धि भी दोनों को खो दिया। सो जब वह अंधा हो गया तो उसे और पक्का हो गया कि सूरज की रोशनी कोई सत्-वस्तु ही नहीं है।
इस अँधे आदमी के साथ एक दास भी था। उसने मालिक को नारियल के पेड़ों की छाँह में बिठा दिया था और ज़मीन पर से एक नारियल उठाकर रात के लिए रोशनी का इंतज़ाम करने लगा। बटकर नारियल की जटा की उसने बत्ती बनाई; गिरी को कुचलकर उसी के खोल में तेल निकाल लिया और बत्ती को उस तेल में भिगोकर रख दिया।
वह दास वहाँ बैठा जब यह कर रहा था तभी उसका अंधा मालिक उससे बोला कि क्यों रे, मैंने तुझे ठीक कहा था न कि सूरज नहीं है। देखो यह कैसा गुप अँधेरा चारों तरफ़ है। फिर भी लोग कहते हैं कि सूरज है...अगर है तो भला क्या है?
दास बोला, यह तो मैं नहीं जानता कि सूरज क्या है। सो जानने से मुझे है भी क्या! पर रोशनी क्या है यह तो मैं जानता ही हूँ। यह मैंने अपना दीया तैयार कर लिया है। उसके सहारे उँगली पकड़कर मैं आपको राह दिखाने के काम भी आ जाऊँगा और रात को झोंपड़ी में उससे जो चीज़ आप चाहें पाकर दे भी सकूँगा।”
इतना कहकर उसने अपने नारियल के दीपक को ऊपर उठा लिया। बोला—
सो मेरा तो यही सूरज है।
पास ही वहाँ एक लंगड़ा आदमी भी बैसाखी रखे बैठा था। यह सुनकर वह हँस दिया और अंधे आदमी से बोला, 'मालूम होता है तुम जन्म के अंधे हो। तभी तो नहीं जानते सूरज क्या है। मैं बताता हूँ, क्या है। वह एक आग का गोला है। हर सबेरे समंदर में से उगता और शाम हमारे टापू की पहाड़ियों में जाकर छिप जाता है। हम यह रोज़ देखते हैं। आँखें होतीं तो तुम भी देख लेते।'
यह बातचीत एक मछुआ मल्लाह भी सुन रहा था। वह लँगड़े आदमी से बोला कि दिखता है तुम अपने इस छोटे-से टापू से बाहर कभी कहीं गए नहीं हो। जो तुम लँगड़े न होते और मेरी तरह डोंगी लेकर बाहर निकल सकते तो देखते कि सूरज तुम्हारी पहाड़ियों में जाकर नहीं छिपता है। लेकिन जैसे ही हर सबेरे वह निकलता समंदर से है, वैसे हर रात डूबता भी समंदर में ही है। जो कह रहा हूँ उसको तुम बिलकुल सच्ची बात मानना। क्योंकि हर रोज़ मैं यह अपनी आँखें देखता हूँ।
उस समय हमारे दल में एक हिंदुस्तानी भी था। बात के बीच में पड़कर वह बोले, 'कोई समझदार आदमी तो नासमझी की ऐसी बात कर नहीं सकता। तुमने जो कहा उस पर मुझे अचरज होता है। आग का गोला पानी में उतरे तो भला बिना बुझे कैसे रहेगा? असल में वह गोला नहीं है, न आग है। वह तो एक देवता हैं जो सात घोड़ों के रथ में बैठकर स्वर्ण-पर्वत मेरु की प्रदक्षिणा करते हैं। तभी राहु और केतु नाम के असुर उन देवता पर चढ़ाई करते हैं और ग्रस लेते हैं। तब दुनिया पर अंधकार छा जाता है। लेकिन हमारे पंडित-पुरोहित होम-स्तवन आदि करते हैं। उससे देवता मुक्त हो जाते हैं और फिर प्रकाश देने लगते हैं। तुम—जैसे अनजान लोग जो बस अपने द्वीप के इर्द-गिर्द रहते हैं और आगे का कुछ नहीं जानते, वही ऐसी बचपन की बात कह सकते हैं कि सूरज उन्हीं के देश के लिए होता है।
“एक मिस्री सज्जन भी वहाँ मौजूद थे। उनका पहले एक अपना जहाज़ था। अपनी बारी लेकर वह बोले, 'तुम्हारी बात भी सही नहीं है। सूरज कोई देवता नहीं है। और न तुम्हारे हिंदुस्तान के या तुम्हारे स्वर्ण-पर्वत के चारों तरफ़ ही घूमता है। मैं दूर-दूर घूमा हूँ। काले सागर गया हूँ, अरब का किनारा मेरा देखा है, मेडागास्कर और फिलिपाइन टापू भी मैंने घूमे हैं। सूरज हिंदुस्तान को ही नहीं, सारी धरती को रोशनी देता है। कोई एक पहाड़ का चक्कर वह नहीं करता, पर पूरब में दूर कहीं जापान के टापू के पार वह उगता है और पश्चिम में उधर इंग्लिस्तान के द्वीपों के परली तरफ़ कहीं छिपता है। जब भी तो जापान के लोग अपने देश को 'निपन' कहते हैं, जिसका मतलब होता है सूर्योदय। मैं इस बात को पूरे भरोसे से कह सकता हूँ, क्योंकि अव्वल तो मैंने ख़ुद कम नहीं देखा-जाना है, और फिर अपने दादा से सुनकर भी मैं बहुत जानता हूँ। ओर से छोर तक समंदर तमाम हमारे बाबा का छाना हुआ था।
अभी वह मिस्री सज्जन और आगे भी कहते। लेकिन हमारे जहाज़ के एक अँग्रेज़ नाविक जो वहीं थे बीच में काटकर बोलने लगे—‘असल में तो हमारे इंग्लैंड देश के रहनेवाले लोगों से सूरज की गति के बारे में ज़्यादा और कोई नहीं जान सकता। हमारे मुल्क का बच्चा-बच्चा जानता है कि सूरज न कहीं से निकलता है, न कहीं छिपता है। वह तो सदा पृथ्वी के चारों तरफ़ घूमता रहता है। इसका पक्का सबूत यह है कि हमने धरती का पूरा चक्कर लगाया है, पर सूरज से तो जाकर हम कहीं नहीं टकराए। जहाँ गए, सूरज सबेरे दिखने लगता और रात को छिप जाता। ठीक जैसे कि यहाँ होता है।’
यह कहकर वह अँग्रेज़ छड़ी से रेत में नक्शा बनाकर अपनी बात समझाने लगे कि किस तरह सूरज धरती के चारों तरफ़ आसमान में चक्कर लगाता है। लेकिन वह साफ़-साफ़ नहीं समझा सके। इससे जहाज़ के बड़े अफ़सर को बताकर बोले कि वह मुझसे ज़्यादा इन बातों को जानते हैं। वह ठीक-ठीक आपको समझा सकेंगे।
वह सज्जन, समझदार और बुर्दबार थे। अब तक चुपचाप सब सुने जा रहे थे। ख़ुद कहे जाने से पहले वह नहीं बोले थे। अब सबका उनसे अनुरोध होने लगा। इसलिए बोले—
आप सब लोग एक-दूसरे को असल में बरगला रहे हैं और ख़ुद भी धोखा खा रहे हैं। सूरज धरती के चारों तरफ़ नहीं घूमता, बल्कि धरती उसके चारों तरफ़ घूमती है। इस सफ़र में वह ख़ुद भी अपनी धुरी पर घूमती जाती है। उसका एक चक्कर चौबीस घंटे में पूरा होता है। इतने समय में न सिर्फ़ जापान, फिलिपाइन या जहाँ हम बैठे हैं, वह सुमात्रा का टापू ही सूरज के सामने आ जाते हैं, बल्कि अफ़्रीका, यूरोप, अमरीका या और जो मुल्क हों उस सूरज के सामने ही रहते हैं।
सूरज किसी एक पहाड़ या टापू या एक समंदर या एक धरती के लिए नहीं चमकता। बल्कि हमारी पृथ्वी की तरह और ग्रह हैं, उनको भी वह चमकाता है। अगर आप अपने पैर के नीचे की धरती के बजाए ऊपर आसमान पर भी निगाह रखा करें तो आप सभी लोग यह आसानी से समझ सकते हैं। तब यह मानने की ज़रूरत आपको न रहेगी कि सूरज आपके लिए या आप ही के लिए उगता और प्रकाश करता है।
जगत के देश-देश देखे हुए और ऊपर आसमान पर भी निगाह रखने वाले उन अनुभवी-ज्ञानी ने उनको यह सद्बोध दिया।
कन्फ़्यूशस के चेले वह चीनी महोदय ऊपर की कहानी सुनाकर अंत में बोले, 'इस तरह मत-मतांतर के बारे में यह अहंकार ही है जो हममें फूट डालता है और भूल करवाता है। सूरज की उपमा से ईश्वर को भी जान लीजिए। सब लोग अपना-अपना परमात्मा बनाना चाहते हैं। या कम-से-कम अपने देश-जाति के लिए एक विशेष ईश्वर को मानना चाहते हैं। हरेक मुल्क और जाति के लोग उस ईश्वर को अपने मंदिर-गिरजों में घेरकर बाँध लेना चाहते हैं, जो सारे ब्रह्मांड से भी बड़ा है और कुछ जिससे ख़ाली नहीं है।
क्या आदमी का बनाया कोई मंदिर-गिरजा इस कुदरत के मंदिर की बराबरी कर सकता है? ख़ुद भगवान ने यह जगत सिरजा है कि सब लोग यहाँ एक रहें और सिरजनहार मानें। अरे, आदमी के तमाम देवालय उसी की नक़ल तो हैं। और भगवान का आलय स्वयं यह जगत है। मंदिर क्या होता है? उसमें आँगन होता है, छत होती है, दीपक होते हैं, मूर्तिचित्र होते हैं। वहाँ उपदेश लिखे मिलते हैं, शास्त्र-पुराण रखे होते हैं। वेदी होती है, पुजारी होते हैं और पुजापे की भेंट-पूजा चढ़ती है। लेकिन किस देवालय का समंदर जैसा खुला आँगन है? आकाश के चँदोए जैसा किस मंदिर का कलश है? सूरज, चाँद और तारे किसके प्रकाशदीप हैं? सजीव भक्ति से भीगे उदार संतों के समान स्फूर्तिदायक चित्र-मूर्तियाँ और कहाँ हैं? आदेश और आलेख्य ईश्वर की महिमा के ऐसे सुलभ और कहा हैं जैसे इस जगती पर? यहाँ हर कहीं तो उन दयाधाम की दया के अनुकंपा के स्मृति-चिह्न हैं। और कहाँ वह नीतिशास्त्र है जिसका वचन आदमी के भीतर की वाणी जितना स्पष्ट और अविरोधी है? कौन पूजक और कौन पुजारी उस आत्माहुति से बढ़कर है जो इस पृथ्वी पर स्त्री-पुरुष नित्य एक-दूसरे के प्रति दे रहे और देकर जी रहे हैं? और कौन वेदी है जो सत्पुरुष के हृदय की वेदी की उपमा में ठहर सके, कि जहाँ का चढ़ा उपहार स्वयं भगवान ग्रहण करते हैं?
ईश-कल्पना जितनी ही ऊँची उठती जाएगी उतना सद्ज्ञान बढ़ेगा। उस ज्ञान के साथ-साथ मनुष्य स्वयं उत्तरोत्तर वैसा ही होता जाएगा। उसी महामहिम की भाँति कल्याणमय, दयामय और प्रेममय। फिर वह जीवमात्र को उसी की भाँति स्नेह करेगा।
इसलिए सब जगह जो उसी का प्रकाश और उसी की महिमा देखता है, वह किसी की त्रुटि नहीं निकालेगा, न किसी को हीन मानेगा। जो उस ज्योति की एक रेख लेकर, मूर्ति बना उसी में भगवान को देख लेता है, उसकी श्रद्धा भी स्खलित नहीं करेगा। न तो वह उस नास्तिक को हीन भाव से देखेगा जो दुर्दैव से ही अंधा होकर सूरज की रोशनी से अकस्मात् वंचित बन गया है।
इन शब्दों में कन्फ़्यूशस के शिष्य चीन के उस सत्पुरुष ने अपनी मान्यता प्रकट की। सुनकर वहाँ मौजूद सब आदमी शांत और गंभीर हो आए और मत-मतांतरों के बारे में अपना सब विवाद भूल गए।

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देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...