सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

श्रीनरेश मेहता की कविताएँ : Shrinaresh Mehta Kavita

 श्रीनेश मेहता (1922–2000) हिंदी के प्रमुख कवि, लेखक और नई कविता के महत्वपूर्ण रचनाकारों में गिने जाते हैं। उनका जन्म मध्य प्रदेश के शाजापुर में हुआ था। वे प्रयोगवाद और नई कविता से जुड़े रहे और उन्होंने कविता को नए विषयों, विचारों और भाषा के साथ आगे बढ़ाया। उनकी रचनाओं में प्रकृति, प्रेम, मनुष्य के जीवन, संस्कृति और बदलते समय की अनुभूतियाँ दिखाई देती हैं। भारतीय परंपरा और आधुनिक जीवन को साथ रखकर देखने की उनकी अपनी दृष्टि थी। माध्यम मैं, उत्सवा, अरण्या और चैत्या उनकी प्रमुख कृतियों में शामिल हैं। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


धूप की भाषा

श्रीनरेश मेहता

धूप की भाषा-सी
खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया!
शॉल-सा
कंधों पर पड़ा यह फाल्गुन
चैत्र-सा तपने लगेगा!
केश सुखा लेने के बाद
ढीला जूड़ा बना
तुम तो लौट जाओगी,
परंतु तुम्हें क्या पता, कि
तुम—
इस गवाक्ष आकाश और
बालुकणों जैसे रिसते
इस नि:शब्द समय से कहीं अधिक
मुझमें एक मर्म
एक प्रसंग बन कर लिखी जा चुकी हो
प्रिया!
इस प्रकार लिखा जाना ही पुरालेख होता है
हवा, तुम्हारा आँचल
मुझमें मलमली भाव से टाँक गई है
जैसे कि पहली बार
मेरे आकाश को मंदाकिनी मिली हो
भले ही अब यहाँ कुछ भी न हो
फिर भी
तुम्हारी वह चीनांशुक-पताका
कैसी आकुल पुकार-सी लगती है
जैसे कि उस पुकार पर जाना
इतिहास में जाना है—
जहाँ प्रत्येक पत्थर पर
अधूरे पात्र
और आकुल घटनाएँ
अपनी भाषा की तलाश में कब से थरथरा रही हैं
इससे पूर्व, कि
यह उजाड़ रूपमती महल लगे
समेट लो अपनी यह वैभव-मुद्रा
इसलिए धूप की भाषा-सी
खिड़की में मत खड़ी होओ प्रिया!
इतिहास में जाकर फिर लौटना नहीं होता!

यायावर से

श्रीनरेश मेहता

ले गए तुम कई बार साथ में
हमें अपनी यात्राओं पर
चित्रकूट, वृंदावन, सौराष्ट्री सागर-तट
या कहीं और भी,
पर यह कौन-सी यात्रा है
यायावर!
जहाँ तुमने
अकेले ही असंग जाने का निर्णय लिया,
और चल भी दिए?

भ्रम

श्रीनरेश मेहता

तुम्हें भ्रम है, कि
ये कविताएँ मेरी हैं;
नहीं, ऐसा नहीं है।
शायद यही हुआ होगा कि
मैंने तुम्हें अपनी भाषा में रखकर देखा होगा
और मुझमें ये कविताएँ
वैसी ही फूट उठी होंगी
जैसे फूल, वृक्ष में प्रस्फुटित हो उठता है।
वस्तुतः तुम्हारी ही नहीं
वरन मनुष्य, प्रकृति, जीवन,
जीवन ही क्या
समस्त सृष्टि की ये छंद हैं।
आज तो नहीं
पर कल तुम अपने को।
निश्चित ही इन कविताओं में वैसे ही पाओगे
जैसे आकाश, नदी या फूल देखते हुए
तुम अपने को उपलब्ध करते हो।
कल इसलिए कहा, कि
कल जब मैं नहीं रहूँगा
और ये कविताएँ प्राकृतिक सत्ता-सी
हवाएँ बनकर तुम्हारे कमरे के पर्दे हिलाएँगी।
या तुम्हारी खिड़की में
प्रातःकाल बनकर
एक दृश्य लगेंगी।
तब निश्चित ही,
न तुम्हें और न कविताओं को ही
मेरा स्मरण रहेगा
इसलिए मुझे भी
उसी कल की प्रतीक्षा है
जब मेरे अनुपस्थित होते ही
ये कविताएँ—
वृक्ष, आकाश ही नहीं।
स्कूल जाती तुम्हारी बेटी बन जाएगी।
या और भी
कोई आत्मीय क्षण।

अरण्यानी से वापसी

श्रीनरेश मेहता

मेरी अरण्यानी! मुझे यहाँ से वापस अपनी धरती
अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा!
ताकि मैं—
मात्र एक व्यक्ति
केवल एक कवि न रह कर
अपने समय की सबसे बड़ी घटना बन सकूँ—
एक कविता!
कविता—
जब केवल विचार होती है।
तब वह
सत्य का साक्षात्,
तब वह
परम-पुरुष की लीला
तब वह
आत्म-उपनिषद् होती है,
पर, जब वह
भाषा के भोजपत्र पहन लेती है।
तब वह
आनंद के मंत्र
आसक्ति के पद
तन्मयता के कीर्तन
विनय की प्रार्थना
और लालित्य के गान के
अपराजित हिमालय तथा अक्षत उपत्यकाओं से उतरती हुई
जलते मानवीय मैदानों में पहुँच कर
विराट करुणा
पीड़ा मात्र बन जाती है।
मेरी अरण्यानी!
मेरी इस वैष्णवता को भी परीक्षा देनी होगी
मेरी इन प्रार्थनाओं को भी
अपने समय
और कोटि-कोटि लोगों के बीच
एक कविता
एक घटना
एक मनुष्य-सा घटित होना ही पड़ेगा।
युद्ध के अठारह दिनों के रक्ताभिषेक के बाद ही
कृष्ण की वैष्णवता
इतिहास का वासुदेव बन सकी थी।
शतानक हुई इस पृथिवी
और संत्रस्त लोगों के पुनः उत्सव होने से अधिक
न कोई मंत्र है।
और न वैष्णवता।
मनुष्य का कविता हो जाना ही उत्सव है।
इसलिए मेरी अरण्यानी! मुझे यहाँ से वापस अपनी धरती
अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा!
पांडवों के कीर्ति-स्तंभों जैसे भोजपत्रो!
ऊर्ध्वमनस् के योगियों जैसे देवदारुओ!
गायों की त्वचा जैसे चिकने और संस्पर्शी हिमनदो!
मैं अपने पर से उतार रहा हूँ
हिम के ये मलमली चीवर।
वनस्पतियों के वल्कल
औषधियों के ये अंगराग
ब्रह्मकमल की यह व्यक्तित्व-गंध
नदियों के ये यज्ञोपवीत
हवाओं की ये माधवी रागिनियाँ
और एकांत में धरोहर-सा रखे जा रहा हूँ।
हिमालय का यह इंद्र-मुकुट।
बादलों हवाओं, ग्रहों-नक्षत्रों में
अहोरात्र संपन्न होने वाला।
यह राजसूय-यज्ञ भी छोड़े जा रहा हूँ।
मेरी अरण्यानी! इतना वैराट्य
इतनी पवित्रता लेकर
कोई भी हाट-बाज़ार में नहीं जा सकता।
इतिहास और राजनीति में दग्ध हुए।
मनुष्य मात्र को
अब केवल कविता की प्रतीक्षा है।
कविता का लोगों के बीच लौटना
मनु के लौटने जैसा होगा।
कविता का लोगों के बीच लौटना
एक अविश्वसनीय घटना होगी
इसलिए मेरी अरण्यानी! मुझे यहाँ से अपनी धरती
अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा!!
मैंने सूर्य को अर्घ्य दिया ही इसलिए था, कि
उसकी तेजस्वी सूर्याएँ—
नित्य मेरी गलियों में
इस धरती पर आकर
मनुष्य, पशु, पक्षी, फूल-वनस्पतियाँ बनकर उगें।
नित्य एक शब्द-उत्सव
पेड़ों पर चिड़ियाँ बनकर
घर-आँगन में भाषा बनकर
और एकांत में प्रिया बनकर संपन्न हों।
धरती, सूर्य की सुगंध हो जाए, पर
किसने अपमानित कर दिया है मानवीय देवत्व को?
जीवन की कुल-गोत्रता को?
नहीं—
मनुष्य से लेकर दूर्वा तक के अपमानित मुख पर
मेरी वैष्णवता!
मेरी कविता की लिखनी होगी।
एक गरिमा
एक पवित्रता
एक उत्सव।
मनुष्य या दूर्वा
किसी के भी हँसते हुए मुख से बड़ी
न कोई प्रार्थना है।
न कोई उत्सव है।
और न स्वयं ईश्वर ही।
मेरी अरण्यानी!
युधिष्ठिर की भाँति आग्रह करना ही होगा, कि
मुझे अकेले नहीं।
पूरी मानवता के लिए
सृष्टि मात्र के लिए स्वर्ग का प्रवेश स्वीकार होगा
इससे कम नहीं।
इसलिए मेरी अरण्यानी! मुझे यहाँ से वापस अपनी धरती
अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा!!
चलो मेरी वैष्णवता!
मेरी प्रार्थना! मेरी कविता! चलो—
इस पृथिवी पर वनस्पतियाँ बनकर
सृष्टि की भाषा बनकर चलो,
प्रत्येक चलना अवतार होता है,
धूप, सूर्य का।
और नदियाँ, बादलों का अवतार ही तो हैं।
सृष्टि मात्र को
मनुष्य मात्र को इतिहास और राजनीति नहीं
एक कविता चाहिए।
व्यक्तियों, घरों, दीवारों और भाषाओं—
सबसे कहना पड़ेगा कि
उतार फेंको ये आग्रहों की वर्दियाँ
पोस्टरों के वस्त्र—
ये मनुष्यता के अपमान हैं।
भाषा को दोग़ला बना देने वाले ये भाषण—
भाषा को गाली बना देने वाले ये नारे—
अपने स्वत्व और देह पर से नोंच फेंको
जो कि गुदनों की तरह
तुम्हारे शरीर पर गोद दिए गए हैं।
मेरी वैष्णवता!
एक कविता,
एक कदंब-सी उपस्थित होओ।
कविता जब प्रार्थना हो जाती है
कविता जब मनुष्य हो जाती है
तब वह
इस पृथिवी की
साधारण जन की रामायण हो जाती है।
मनुष्य मात्र में कविता अवतरित हो।
इसके लिए मेरी अरण्यानी! मुझे यहाँ से वापस अपनी धरती
अपनी शाश्वती के पास लौटना ही होगा !!
लौटना ही होगा!!

आश्वासन

श्रीनरेश मेहता

बड़ी देर तक
हवा और वृक्ष बतियाते रहे।
हवा की हर बात पर
वृक्ष
पेट पकड़-पकड़ कर हँसता रहा।
और तभी
हवा को ध्यान आया अपनी यात्रा का;
और वह हड़बड़ाते हुए बोली,
—“हटो, तुम हमेशा देर करा देते हो।”
अपने धूप के वस्त्र व्यवस्थित करते हुए
वृक्ष बोला,
—“मैं देर करा देता हूँ या तुम्हीं...”
—“अच्छा, अब रहने दो,
तुम्हें तो कहीं आना-जाना है नहीं।”
हवा को जाते देख
वृक्ष उदास हो गया।
हवा—
इस उदासी को समझ तो ले गई।
पर केवल इतना ही बोली,
—“अच्छा अब मुँह मत लटकाओ
मैं तुम्हारे इन बाल-गोपालों को लिए जा रही हूँ
और हुआ तो लौटते में...
वृक्ष ने देखा, कि
सामने के मैदान में
हवा को घेरे पत्ते।
चैत्र-मेला घूमने के उत्साह में
कैसे किलकारियाँ मारते चले जा रहे हैं।

प्रतीति

श्रीनरेश मेहता

कोई आने को है
इस संभावना मात्र से
तुम—
हरिण-सी चौंक कर
अपने एकांत में
हठात् स्मृति-सी लौट जाती हो।
कुछ क्षण को
परदे के घुँघरू
बलात् कुछ बोलने लगते हैं
और फिर नीरव हो जाते हैं
अभी-अभी का तुम्हारा होना—
हवा में
केवल एक क्षीण सुगंध-सा
कहीं थरथरा रहा होता है, बस—
और सब शांत हो जाता है।
लेकिन—
ऐसी भी क्या चौंकना प्रिया! कि
मेरे वक्षस्थल पर
अपने नयन तक छोड़ गईं।
ये मिथुन-नयन
मेरी आँखों में
मेरे व्यक्तित्व में
समय के मेरे समस्त आकाशों में
विवश पाखी से तिरने लगते हैं
और
अपनी और ताकते हुए
रसलीन के दोहे वाले
ये नेत्र
पहली बार मुझे भी कविता लगते हैं।

कातरता

श्रीनरेश मेहता

जब भी कहीं किसी वृक्ष को
पूर्णता देता
वर्णप्राप्त फूल खिला होता है
उस वृक्ष की वनस्पति
प्रियंवदा नारी-सी
सिर ढँकती आनत नेत्र हो जाती है
और मुझे लगता है—
मैं ऐसी
मानुषी पूर्णता को वहन करता वृक्ष क्यों न हुआ?
मुझे भी मिल जाती।
वनस्पतियों वाले गुलाल-व्यक्तित्व की कृतार्थता।
क्यों न हुआ?
मानुषी काव्य-फूल की
ऐसी पूर्णता को वहन करता वृक्ष
क्यों न हुआ?
क्यों न हुआ?

निवेदन

श्रीनरेश मेहता

जब तुम मुझे अपमानित करते हो।
तब तुम मेरे निकष होते हो।
प्रभु से प्रार्थना है।
वह तुम्हें निकष ही रखे।

पताका

श्रीनरेश मेहता

बालक के हाथ में पहुँच
वह फटी पतंग
बन गई है
पताका।
कितने प्रसन्न हैं दोनों—
धूप में चिटख आया है रंग
हवा में लहरा रहे हैं अंग-अंग
दोनों के।
पतंग ने
उसे बालक से बना दिया है
विजेता
और बालक ने
उसे अपने गर्वोन्नत हाथों की
विजयनी पताका।

दैवीय-पुकार

श्रीनरेश मेहता

कितना आश्चर्य है कि
देवता अहोरात्र मनुष्य की पुकारते हैं, कि—
आओ, धरती के कार्मिक मनुष्यो!
यहाँ आओ।
आकाशों की इस अपरिमेय ग्रहीय प्रशांतता
और नक्षत्रीय शून्यता में आओ
और हमारी मैत्री तथा भ्रातृत्व स्वीकारो।
कभी हमारी इन आकाशगंगाओं तक आकर देखो—
मनुष्य के बिना।
हमें भी इस कालहीन अनंतता में
कितना आदिम सखाहीन अकेलापन लगता है।
जिस प्रकार ब्रह्मांड का प्रकाश
धरती पाकर नानावर्णी धूप बनता है
उसी प्रकार तुम्हारे आकाशों में पक्षी बनकर उड़ने
नदियों का लालित्य बनकर चलने
और छोटे-छोटे दूर्वा-अक्षरों में पद लिखने के लिए
हमारा देवत्व भी कैसा विवश आकुल है।
आओ, धरती के कार्मिक बंधुओ!
वैराट्य स्वयं कभी अभिव्यक्त नहीं होता
इसलिए हमारे माध्यम बनने के लिए आओ
और हमारी मैत्री तथा भ्रातृत्व स्वीकारो।
मिट्टी, प्रतिमा बनती ही तब है।
जब वह धरती पर आकाश का प्रतिनिधित्व करती है,
मनुष्य, देवता बनता ही तब है।
जब वह व्यक्ति का नहीं वैराट्य का प्रतीक होता है।
देखो, यह पृथिवी।
कभी अंधकार में डूबी कैसी उजाड़ थी
इंद्र और वरुण जैसे मेधावियों ने
इसे हिमाँधियों और अतिवृष्टियों से मुक्त किया,
आंगिरसों ने।
इसके ठिठुरते अंगों को ऊष्णता दी
और सूर्य ने इस पर चलकर
वन, पर्वत, नदियों और वनस्पतियों के
सृष्टि-श्लोक लिखे
और धरती
कैसे खिलखिलाते मुखवाली
कहीं माधवी-प्रिया
तो कहीं उदात्त अन्नपूर्णा हो गई।
इसी प्रकार हम भी तुम्हें
प्रकाश, सुगंध और भास्वर-वाणी के
अंगराग और अंगवस्त्रों से भूषित कर
मंत्र-देवता बना देना चाहते हैं।
इसलिए आओ, धरती के कार्मिक बंधुओ!
यहाँ आओ
और हमारी मैत्री तथा भ्रातृत्व स्वीकारो।
आश्चर्य मत करो—
हमारे लिए न दिन है न रात्रि
न देश है, न काल
न सृष्टि है, न संहार
हम तो इस अपरिमेयता में केवल एक स्थिति हैं।
हम नित्य हैं।
हमारी कोई छाया नहीं होती
इसलिए काल भी हमें व्यतीत नहीं बना पाता।
इसीलिए देवता ही अहोरात्र मनुष्य को पुकार सकते हैं।
और वे ही
समस्त प्रहरों, आठो यामों में पुकार रहे हैं, कि—
आओ, धरती के कार्मिक बंधुओ!
यहाँ आओ
और हमारी मैत्री तथा भ्रातृत्व स्वीकारो।

कौतूहल

श्रीनरेश मेहता

क्या आवश्यकता थी इस कौतूहल की?
बाँसों के अनंत वृक्षों वाले
उस अरण्य में
मैं भी एक अनाम वानीर-वृक्ष ही था।
तुमने मुझे कृपा-भाव से देखा—
मेरे वृक्ष को जैसे पैर आ गए।
तुम्हारे इस वैभव-परिवेश में पहुँचकर भी
ऐसा नहीं लगा कि
कुछ बुरा हुआ,
लेकिन तुम्हारे शिल्पियों ने
मुझे एक वाद्य का स्वरूप क्यों दे दिया?
चलो, कोई बात नहीं थी।
यदि मुझे
मात्र एक वाद्य ही रहने दिया होता।
परंतु—
एक दिन संध्यालोक में
उस गवाक्ष में बैठे हुए
तुमने
अनायास अपने अधरों पर क्यों रख लिया?
कुछ तो सोचा होता, कि
वाद्य ही नहीं
कोई भी
इन देव-दुर्लभ अधर-पल्लवों का स्पर्श पाकर
आद्यंत बाँशी बन सकता है—
मानवीय आकुलता का वाद्य
बाँशी!
परंतु—
तुमने मुझे बाँशी भी कहाँ रहने दिया?
उस माधवी-स्पर्श को बीते तो
एक युग हुआ
और तब से।
मैं—
हवा मात्र में बजता हुआ
केवल तुम्हारा नाम हूँ,
बाँशी भी नहीं
केवल नाम!
वृक्ष से नाम तक की यह यात्रा!!
क्या आवश्यकता थी इस कौतूहल की?

चंद्रोदय

श्रीनरेश मेहता

जाऊँगा, चंद्रोदय हो लेने दो—
वन में नदी को ऐसे अकेले छोड़कर
कैसे चला जाऊँ?
जाऊँगा, पर चंद्रोदय हो लेने दो।
चंद्रोदय होते ही देखना—
बाँसों के पीछे से टिटहरी बोलेगी
जिसे सुन
पगडंडियाँ थोड़ी-सी निर्भय हो
जंगल में भटके पशुओं-सी
चलने लगेंगी बस्तियों की ओर।
सरपतों में दुबके ख़रगोशों को लगेगा—
टिटहरी ही सही
पर अब वे अकेले नहीं हैं,
इन सरपतों पर विश्वास किया जा सकता है।
हवाएँ भी
पेड़ों से कूदकर नदी में
अबाबीलों-सी पंख गीले कर
टीलों के कानों में बजने लगेंगी।
अभी यह जो निरभ्रता का सन्नाटा है।
जिसमें पेड़ क्या
जंगल तक आसन्न है
चंद्रोदय होते ही देखना—
तारों को भी नदी में उतरने में संकोच नहीं होगा
क्योंकि मछलियाँ
गहरे जल की चट्टानों में चली गई होंगी
और आकाश दृष्टिसंपन्न हो जाएगा।
इस पार से उस पार तक
अँधेरे में
किसी नाव के चप्पुओं की आवाज सुनाई पड़ना ही
काफ़ी नहीं होता
बल्कि ज़रूरी होता है दिखना भी, कि
पेड़, पेड़ ही हैं।
और दूरियाँ अभी भी जंगलों के पार जा रही हैं।
जबकि जंगल
हिंस्र पशु-सा झुका हुआ है नदी पर
और वह कैसी कपिला-सी थरथरा रही है।
नहीं, वन में नदी को ऐसे अकेले छोड़कर
कैसे चला जाऊँ?
चंद्रोदय में
जंगल को पहले वन हो जाने दो
तब जाऊँगा, चला जाऊँगा
पर चंद्रोदय के बाद ही जाऊँगा।

पीले फूल कनेर के

श्रीनरेश मेहता

पीले फूल कनेर के!
पथ अगोरते।
सिंदूरी बडरी अँखियन के
फूले फूल दुपेर के!
दौड़ी हिरना
बन-बन अँगना—
बेंतवनों की चोर मुरलिया
समय-संकेत सुनाए,
नाम बजाए;
साँझ सकारे
कोयल-तोतों के संग हारे
ये रतनारे—
खोजे कूप, बावली, झाऊ,
बाट, बटोही, जमुन कछारें—
कहाँ रास के मधु पलास हैं?
बटशाखों पे सगुन डाकते मेरे मिथुन बटेर के!
पीले फूल कनेर के!
पाट पट गए,
कगराए तट,
सरसों घेरे खड़ी हिलाती पीत-सँवरिया सूनी पगवट,
सखि! फागुन की आया मन पे हलद चढ़ गई—
मँहदी महुए की पछुआ में
नींद सरीखी लाज उड़ गई—
कागा बोले मोर अटरिया
इस पाहुन बेला में तूने।
चौमासा क्यों किया पिया?
क्यों किया पिया?
यह टेसू-सी नील गगन में हलद चाँदनी उग आई री—
उग आई री—
पर अभी न लौटे उस दिन गए सबेर के!
पीले फूल कनेर के!


टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...