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अतिमा : सुमित्रानंदन पंत Atima Sumitranandan Pant




1. गीतों का दर्पण


यदि मरणोन्मुख वर्तमान से
ऊब गया हो कटु मन,
उठते हों न निराश लौह पग
रुद्ध श्वास हो जीवन !
रिक्त बालुका यंत्र,…खिसक हो
चुके सुनहले सब क्षण,
क्यों यादों में बंदी हो
सिसक रहा उर स्पन्दन !

तो मेरे गीतों में देखो
नव भविष्य की झाँकी,
नि:स्वर शिखरों पर उड़ता
गाता सोने का पाँखी ।
चीर कुहासों के क्षितिजों को
भर उड़ान दिग् भास्वर,
वह प्रभात नभ में फैलाता
स्वर्णिम लपटों के पर !

दुविधा के ये क्षितिज,-
मौन वे श्रद्धा शुभ्र दिगंतर,
सत्यों के स्मित शिखर,
अमित उल्लास भरे ये अंबर !
नीलम के रे अंतरिक्ष,
विद्रुम प्रसार दिग् दीपित,
स्वप्नों के स्वर्गिक दूतों की
पद चापों से कंपित !

प्राणों का पावक पंछी यह,
मुक्त चेतना की गति,
प्रीति मधुरिमा सुषमा के स्वर,
अंतर की स्वर संगति !
उज्जवल गैरिक पंख, चंचु
मणि लोहित, गीत तरंगित,
नील पीठ, मुक्ताभ वक्ष,
चल पुच्छ हरित दिग्लंबित !

दृढ़ संयम ही पीठ, शांति ही
वक्ष, पक्ष मन चेतन,
पुच्छ प्रगति क्रम, सुरुचि चंचु,
लुंठित छाया भू जीवन !
हीरक चितवन, मनसिज शर-से
स्वर्ण पंख निर्मम स्वर,
मर्म तमस को वेध, प्रीति व्रण
करते उर में नि:स्वर !

दिव्य गरुड़ रे यह, उड़ता
सत रज प्रसार कर अतिक्रम,
पैने पंजों में दबोच, नत
काल सर्प सा भू तम !
वह श्रद्धा का रे भविष्य,--
जो देश काल युग से पर,
स्वप्नों की सतरंग शोभा से
रंग लो हे निज अंतर !

मन से प्राणों में, प्राणों से
जीवन में कर मूर्तित,
शोभा आकृति में जन भू का
स्वर्ग करो नव निर्मित !
उस भविष्य ही की छाया
इस वर्तमान के मुख पर,
सदा रेंगता रहा रहस छवि…
इंगित पर जो खिंचकर ।

यह भावी का वर्तमान रे
युग प्रभात सा प्रहसित,
कढ़ अतीत के धूमों से जो
नव क्षितिजों में विकसित !
यदि भू के प्राणों का जीवन
करना हो संयोजित,
तो अंतरतम में प्रवेश कर
करो बाह्य पट विस्तृत !

वर्तमान से छिन्न तुम्हें जो
लगता रिक्त भविष्यत्-
वह नव मानव का मुख,
अंकित काल पटी पर अक्षत !
नहीं भविष्यत् रे वह,
मानवता की आत्मा विकसित,
जड़ भू जीवन में, जन मन में
करना जिसे प्रतिष्ठित !

यदि यथार्थ की चकाचौंध से
मूढ़ दृष्टि अब निष्फल,--
डुबो गीतों में, जिनका
चेतना द्रवित अंतस्तल !
लहराता आनंद अमृत रे
इनमें शाश्वत उज्जवल,
ये रेती की चमक न,
प्यासा रखता जिसका मृग जल !

यदि ह्रासोन्मुख वर्तमान से
ऊब गया हो अब मन,
गीतों के दर्पण में देखो
अपना श्री-नव आनन ।

2. स्मृति


वन फूलों की तरु डाली में
गाती अह, निर्दय गिरि कोयल,
काले कौओं के बीच पली,
मुँहजली, प्राण करती विह्वल !
कोकिल का ज्वाला का गायन,
गायन में मर्म व्यया मादन,
उस मूक व्यथा में लिपटी स्मृति,
स्मृति पट में प्रीति कथा पावन !

वह प्रीति तुम्हारी ही प्रिय निधि,
निधि, चिर शोभा की ! (जो अनंत
कलि कुसुमों के अंगों में खिल
बनती रहती जीवन वसंत ! )
उस शोभा का स्वप्नों का तन,
(जिन स्वप्नों से विस्मित लोचन ।--
जो स्वप्न मूर्त हो सके नहीं,
भरते उर में स्वर्णिम गुंजन ! )

उस तन कीभाव द्रवित आकृति,…
(जो धूपछाँह पट पर अंकित । )
आकृति की खोई सी रेखा
लहरों में वेला सी मज्जित !

यौवन बेला वह, स्वप्न लिखी
छबि रेखाएँ जिसमें ओझल,
तुम अंर्तमुख शोभा धारा
बहती अब प्राणों में शीतल !
प्राणों की फूलों की डाली
स्मृति की छाया मधु की कोयल,
यह गीति व्यथा, अंर्तमुख स्वर,
वह प्रीति कथा, धारा निश्चल !

3. आत्मबोध


आड़ू नीबू की डालों सी…
स्वर्ण शुभ्र कलियों में पुलकित,…
तुम्हें अंक भरने को मेरी
बांहें युग युग से लालायित !
ओ नित नयी क्षितिज की शोभे,
पत्र हीन मैं पतझर का वन,…
शून्य नील की नीरवता को
प्राणों में बाँधे हूँ उन्मन !

मुझमें भी बहता वन शोणित
हरा भरा,-मरकत सा विगलित,-
मूक वनस्पति जीवन मेरा
मलय स्पर्श पा होता मुकुलित !
वन का आदिम प्राणी तरु मैं
जिसने केवल बढ़ना जाना,…
यह संयोग कि खिले कुसुम कलि,
नीड़ों ने बरसाया गाना !

माना, इन डालों में कांटे,
गहरे चिंतन के जिनके व्रण,-
मर्म गूँज के बिना मधुप क्या
होता सुखी, चूम मधु के कण ?
अकथित थी इच्छा,-सुमनों में
हँस, उड़ गई अमित सुगंध बन,
मूल रहे मिट्टी से लिपटे
आए बहु हेमंत, ग्रीष्म, घन !

अन फिर से मधु ऋतु आने को,-
पर, मैं जान गया हूँ, निश्चित
मैं ही स्वर्ग शिखाओं में जल
नए क्षितिज करता हूँ निर्मित !
यह मेरी ही अमृत चेतना,-
रिक्त पात्र बन जिसका पतझर
नयी प्राप्ति के नव वसंत में
नव श्री शोभा से जाता भर !

4. प्रकाश, पतंगे, छिपकलियाँ


वह प्रकाश, वे मुग्ध पतंगे,
ये भूखी, लोभी छिपकलियाँ,
प्रीति शिखा, उत्सर्ग मौन,
स्वार्थों की अंधी चलती गलियाँ !

वह आकर्षण, वे मिलनातुर,
ये चुपके छिप घात लगातीं,
आत्मोज्वल वह, विरह दग्ध वे,
ये ललचा, धीरे रिरियातीं !

ऊर्ध्व प्राण वह, चपल पंख वे,
रेंग पेट के बल ये चलतीं, --
इनके पर जमते तो क्या ये
आत्म त्याग के लिए मचलतीं ?

छि:, फलाँग भर ये, निरीह
लघु शलभों को खाते न अघातीं
नोंच सुनहले पंख निगलतीं, --
दीपक लौं पर क्या बलि जातीं ?

उच्च उड़ान नहीं भर सकते
तुच्छ बाहरी चमकीले पर,
महत् कर्म के लिये चाहिए
महत् प्रेरणा बल भी भीतर !

पर, प्रकाश, प्रेमी पतंग या
छिपकलियाँ केवल प्रतीक भर,
ये प्रवृतियाँ भू मानव की,
इन्हें समझ लेना श्रेयस्कर!

ये आत्मा, मन, देह रूप हैं,
साथ-साथ जो जग में रहते,
शिखा आत्म स्थित, ज्योति स्पर्श हित
अंध शलभ तपते, दुख सहते !

पर, प्रकाश से दूर, विरत,
छिपकली साधती कार्य स्वार्थ रत,
ऊपर लटक, सरकती औंधी,
कठिन साधना उसकी अविरत !

उदर देह को भरना, जिससे
मन पंखों पर उड़, उठ पाए,
आत्मा लीन रहकर प्रकाश को
मार्ग सुझाना, मन खिंच आए !

तुच्छ सरट से उच्च ज्योति तक
एक सृष्टि सोपान निरंतर,
जटिल जगत्, गति गूढ़ , मुक्त चिति,
तीनों सत्य,-- व्याप्त जगदीश्वर !
 सुमित्रानंदन पंत कविता संग्रह (मुख्य पृष्ठ देखें ) / Sumitranandan Pant Poem Introduction & Collection

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