सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

कटहल पाने की तरक़ीब (कहानी) : गोपाल भाँड़ Kathal Paane Ki Tarqeeb (Bangla Story in Hindi) : Gopal Bhand

 गोपाल भांड अपने वाक्‌चातुर्य और समाज के अनुसार ख़ुद को ढाल लेने की अपनी विशिष्ट क्षमता के कारण महाराज कृष्णचंद्र का चहेता बन गया था। महाराज भी उसकी वाक्‌पटुता और बुद्धिकौशल से बहुत प्रभावित थे। उनका मन उसके साथ लगता था। अब वे दरबार के बाद भी गोपाल को किसी न किसी बहाने रोक लेते। उसके साथ इधर-उधर की बातें करते, घूमते-टहलते।


एक दिन की बात है। महाराज ने गोपाल भांड से कहा, ‘गोपाल, आज दरबार के बाद थोड़ी देर रुकना। सीधे-सरपट घर की राह मत पकड़ लेना।’


गोपाल ने शिष्टतावश कहा, ‘जो आज्ञा महाराज।’


शुरू से अंत तक उस दिन दरबार गहमागहमी वाला बना रहा। समापन पर जब कर्मचारीगण अपना-अपना खाता-बही समेटने लगे, तब महाराज अपने आसन से उठे और गोपाल को अपने साथ लेकर बाग़ीचे की तरफ़ चले गए। देर तक महाराज बाग़ीचे में टहलते रहे और गोपाल से बातें करते रहे।


बाग़ीचे में टहलते-टहलते वे दोनों उस भाग में आ गए, जहां फलदार वृक्ष लगे थे। गोपाल को पके कटहल की सुगंध मिलने लगी। उसे कटहल बहुत पसंद था। जैसे-जैसे दोनों आगे बढ़ते रहे, कटहल की गंध और तेज़ होती महसूस हुई। चलते-चलते वे दोनों उस स्थान पर पहुंच गए, जहां कटहल के पेड़ों का लम्बा सिलसिला था। पेड़ों के तनों से लटके पके कटहलों को देखकर गोपाल के मुंह से पानी आने लगा। इच्छा हुई कि वह महाराज से कटहल मांग ले, मगर संकोचवश वह ऐसा नहीं कर पाया।


सूरज डूबने के बाद जब अंधेरा घना होने को अाया, तब महाराज ने गोपाल को घर जाने की इजाज़त दी।


बाग़ीचे से घर की राह पकड़ने के बाद भी गोपाल की नाक में कटहल की सुगंध बसी रही। उसका मन ललचा रहा था। रास्ते में वह सोचने लगा कि ऐसी कोई तरक़ीब निकाली जाए कि बिना मांगे ही महाराज उसे कटहल दे दें।


इसी उधेड़-बुन में राह कैसे कट गई, उसे इसका भान नहीं रहा।


घर पहुंचकर गोपाल ने हाथ-पैर धोए और भोजन करके बिस्तर पर लेट गया। कटहल की सुवास उसे याद आती रही। अंतत: कुछ निश्चय कर वह सो गया।


दूसरे दिन जब वह दरबार जाने के लिए तैयार हुआ, तब आईने के सामने खड़ा होकर देर तक अपनी मूंछों पर तेल मलता रहा। उसने ख़ूब सारा तेल अपनी मूंछों और होंठों पर लगा लिया। जब गोपाल दरबार में उपस्थित हुआ, तब उसकी मूंछों से टपकते तेल को देखकर दरबारी हंसने लगे। दरबारियों के हंसने का कारण जानने के लिए महाराज ने जब गोपाल की ओर देखा तब उन्हें भी हंसी आ गई। उन्होंने गोपाल को छेड़ते हुए पूछा, ‘क्यों गोपाल, अभी तुम क्या किसी तेली के पास से आ रहे हो?’ महाराज के इस सवाल पर सभी दरबारी हंस पड़े। हंसी का यह सिलसिला देर तक दरबार में चलता रहा।


गोपाल के मेधा-बल, वाक्‌पटुता और बुद्धिचातुर्य की महाराज द्वारा इसी दरबार में प्राय: सराहना की जाती रही थी, जिससे सभी दरबारी गोपाल से जलते थे। आज जब महाराज ने उसकी तेल चुपड़ी मूंछों के कारण उसका उपहास किया तो दरबारियों को अपनी भड़ास निकालने का अवसर मिल गया। हंसी के बहाने वे दरबार में गोपाल का उपहास ही तो कर रहे थे। गोपाल इस स्थिति की कल्पना करके ही आया था, इसलिए दरबारियों की हंसी से उद्वेलित नहीं हुआ और न महाराज के सवाल से ही उसे कोई परेशानी हुई। उसने मुस्कराते हुए महाराज से कहा, ‘महाराज, मैं किसी तेली के पास क्यों जाऊंगा?’ ‘तो फिर तुम्हारी मूंछों से तेल क्यों टपक रहा है?’ महाराज ने पूछा। ‘महाराज, यह तो सतर्कता के लिए लगा लिया है।’ गोपाल ने उत्तर दिया। ‘कैसी सतर्कता।’ महाराज ने पूछा।


‘महाराज’ गोपाल ने मुस्कराते हुए कहा, ‘कटहल का लासा बहुत गाढ़ा होता है। चमड़ी पर लग जाएगा तो छूटना मुश्किल। मूंछों में लग जाए तो मूंछ मुंड़ाए बिना कोई उपाय नहीं है उस लासा से छुटकारा पाने का। और महाराज, मैं अपनी मूंछों से बहुत प्यार करता हूं, इसलिए उसकी सुरक्षा के लिए मैं मूंछों में पर्याप्त मात्रा में तेल लगाकर आया हूं।’ महाराज उसके उत्तर से चकरा गए। ‘अरे, यह राजदरबार है। यहां तुम्हें कटहल के लासे से बचाव की ज़रूरत क्या है?’ महाराज ने पूछा।


गोपाल थोड़ी देर तक महाराज को देखता हुआ मुस्कराता रहा फिर बोला, ‘महाराज, कल बाग़ीचे में मैंने कटहल के पेड़ों पर पककर तैयार हुए सैकड़ों कटहल लटके देखे। मुझे लगा कि यदि महाराज आज्ञा देंगे तो निश्चित रूप से मुझे कटहल खाना पड़ेगा, इसीलिए महाराज।’ महाराज को फिर हंसी आ गई। लेकिन इस बार कोई दरबारी हंस नहीं पाया। सबने समझ लिया कि गोपाल ने अपने लिए कटहल की जुगत भिड़ा ली है। महाराज ने हंसते हुए माली को बुलवाया तथा आज्ञा दी कि अभी पांच-सात तैयार कटहल तोड़कर गोपाल के घर भिजवा दिए जाएं। गोपाल मन-ही-मन मुस्कराता हुआ अपनी मूंछों के तेल को पोंछने में लग गया।

गोपाल भाँड़ की अन्य कहानियाँ : (बांग्ला कहानी) मुख्य पृष्ठ देखें 

Gopal Bhand's Stories: (Bengali Story) Kahani Main Page 

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...