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नवग्रह सूक्तम् | Navagraha Suktam

ॐ शुक्लांबरधरं-विँष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्।

प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्व विघ्नोपशांतये ॥


ॐ भूः ॐ भुवः॑ ओग्ं॒ सुवः॑ ॐ महः॑ ॐ जनः ॐ तपः॑ ओग्ं स॒त्यं ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे᳚ण्यं॒ भर्गो॑दे॒वस्य॑ धीमहि धियो॒ यो नः॑

प्रचो॒दया᳚त् ॥ ॐ आपो॒ ज्योती॒रसो॒ऽमृतं॒ ब्रह्म॒ भूर्भुव॒स्सुव॒रोम् ॥


ममोपात्त-समस्त-दुरितक्षयद्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थं आदित्यादि नवग्रह देवता प्रसाद सिद्ध्यर्थं आदित्यादि नवग्रह नमस्कारान् करिष्ये ॥


ॐ आस॒त्येन॒ रज॑सा॒ वर्त॑मानो निवे॒शय॑न्न॒मृतं॒ मर्त्यं॑च । हि॒र॒ण्यये॑न सवि॒ता रथे॒नाऽऽदे॒वो या॑ति॒भुव॑ना वि॒पश्यन्॑ ॥ अ॒ग्निं दू॒तं-वृँ॑णीमहे॒ होता॑रं-विँ॒श्ववे॑दसम् । अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतुम्᳚ ॥ येषा॒मीशे॑ पशु॒पतिः॑ पशू॒नां चतु॑ष्पदामु॒त च॑ द्वि॒पदा᳚म् । निष्क्री॑तो॒ऽयं-यँ॒ज्ञियं॑ भा॒गमे॑तु रा॒यस्पोषा॒ यज॑मानस्य संतु ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय आदि॑त्याय॒ नमः॑ ॥ 1 ॥


ॐ आप्या॑यस्व॒ समे॑तु ते वि॒श्वत॑स्सोम॒ वृष्णि॑यम् । भवा॒ वाज॑स्य संग॒थे ॥ अ॒प्सुमे॒ सोमो॑ अब्रवीदं॒तर्विश्वा॑नि भेष॒जा । अ॒ग्निंच॑ वि॒श्वशं॑भुव॒माप॑श्च वि॒श्वभे॑षजीः ॥ गौ॒री मि॑माय सलि॒लानि॒ तक्ष॒त्येक॑पदी द्वि॒पदी॒ सा चतु॑ष्पदी । अ॒ष्टाप॑दी॒ नव॑पदी बभू॒वुषी॑ स॒हस्रा᳚क्षरा पर॒मे व्यो॑मन्न् ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय सोमा॑य॒ नमः॑ ॥ 2 ॥


ॐ अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्या अ॒यम् । अ॒पाग्ंरेताग्ं॑सि जिन्वति ॥ स्यो॒ना पृ॑थिवि॒ भवा॑ऽनृक्ष॒रा नि॒वेश॑नी । यच्छा॑न॒श्शर्म॑ स॒प्रथाः᳚ ॥ क्षेत्र॑स्य॒ पति॑ना व॒यग्ंहि॒ते ने॑व जयामसि । गामश्वं॑ पोषयि॒त्.ंवा स नो॑ मृडाती॒दृशे᳚ ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय अंगा॑रकाय॒ नमः॑ ॥ 3 ॥


ॐ उद्बु॑ध्यस्वाग्ने॒ प्रति॑जागृह्येनमिष्टापू॒र्ते सग्ंसृ॑जेथाम॒यंच॑ । पुनः॑ कृ॒ण्वग्ग्‍स्त्वा॑ पि॒तरं॒-युँवा॑नम॒न्वाताग्ं॑सी॒त्त्वयि॒ तंतु॑मे॒तम् ॥ इ॒दं-विँष्णु॒र्विच॑क्रमे त्रे॒धा निद॑धे प॒दम् । समू॑ढमस्यपाग्ं सु॒रे ॥ विष्णो॑ र॒राट॑मसि॒ विष्णोः᳚ पृ॒ष्ठम॑सि॒ विष्णो॒श्श्नप्त्रे᳚स्थो॒ विष्णो॒स्स्यूर॑सि॒ विष्णो᳚र्ध्रु॒वम॑सि वैष्ण॒वम॑सि॒ विष्ण॑वे त्वा ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय बुधा॑य॒ नमः॑ ॥ 4 ॥


ॐ बृह॑स्पते॒ अति॒यद॒र्यो अर्​हा᳚द्द्यु॒मद्वि॒भाति॒ क्रतु॑म॒ज्जने॑षु ।यद्दी॒दय॒च्चव॑सर्तप्रजात॒ तद॒स्मासु॒ द्रवि॑णंधेहि चि॒त्रम् ॥ इंद्र॑मरुत्व इ॒ह पा॑हि॒ सोमं॒-यँथा॑ शार्या॒ते अपि॑बस्सु॒तस्य॑ । तव॒ प्रणी॑ती॒ तव॑ शूर॒शर्म॒न्नावि॑वासंति क॒वय॑स्सुय॒ज्ञाः ॥ ब्रह्म॑जज्ञा॒नं प्र॑थ॒मं पु॒रस्ता॒द्विसी॑म॒तस्सु॒रुचो॑ वे॒न आ॑वः । सबु॒ध्निया॑ उप॒मा अ॑स्य वि॒ष्ठास्स॒तश्च॒ योनि॒मस॑तश्च॒ विवः॑ ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय बृह॒स्पत॑ये॒ नमः॑ ॥ 5 ॥


ॐ प्रव॑श्शु॒क्राय॑ भा॒नवे॑ भरध्वम् । ह॒व्यं म॒तिं चा॒ग्नये॒ सुपू॑तम् । यो दैव्या॑नि॒ मानु॑षा ज॒नूग्ंषि॑ अं॒तर्विश्वा॑नि वि॒द्म ना॒ जिगा॑ति ॥ इं॒द्रा॒णीमा॒सु नारि॑षु सु॒पत्.ंई॑म॒हम॑श्रवम् । न ह्य॑स्या अप॒रंच॒न ज॒रसा॒ मर॑ते॒ पतिः॑ ॥ इंद्रं॑-वोँ वि॒श्वत॒स्परि॒ हवा॑महे॒ जने᳚भ्यः । अ॒स्माक॑मस्तु॒ केव॑लः॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय शुक्रा॑य॒ नमः॑ ॥ 6 ॥


ॐ शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवंतु पी॒तये᳚ । शं​योँर॒भिस्र॑वंतु नः ॥ प्रजा॑पते॒ न त्वदे॒तान्य॒न्यो विश्वा॑ जा॒तानि॒ परि॒ता ब॑भूव । यत्का॑मास्ते जुहु॒मस्तन्नो॑ अस्तु व॒यग्ग्‍स्या॑म॒ पत॑यो रयी॒णाम् ॥ इ॒मं-यँ॑मप्रस्त॒रमाहि सीदाऽंगि॑रोभिः पि॒तृभि॑स्सं​विँदा॒नः । आत्वा॒ मंत्राः᳚ कविश॒स्ता व॑हंत्वे॒ना रा॑जन्\, ह॒विषा॑ मादयस्व ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय शनैश्च॑राय॒ नमः॑ ॥ 7 ॥


ॐ कया॑ नश्चि॒त्र आभु॑वदू॒ती स॒दावृ॑ध॒स्सखा᳚ । कया॒ शचि॑ष्ठया वृ॒ता ॥ आऽयंगौः पृश्नि॑रक्रमी॒दस॑नन्मा॒तरं॒ पुनः॑ । पि॒तरं॑च प्र॒यंत्सुवः॑ ॥ यत्ते॑ दे॒वी निर्‍ऋ॑तिराब॒बंध॒ दाम॑ ग्री॒वास्व॑विच॒र्त्यम् । इ॒दंते॒ तद्विष्या॒म्यायु॑षो॒ न मध्या॒दथा॑जी॒वः पि॒तुम॑द्धि॒ प्रमु॑क्तः ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहिताय राह॑वे॒ नमः॑ ॥ 8 ॥


ॐ के॒तुंकृ॒ण्वन्न॑के॒तवे॒ पेशो॑ मर्या अपे॒शसे᳚ । समु॒षद्भि॑रजायथाः ॥ ब्र॒ह्मा दे॒वानां᳚ पद॒वीः क॑वी॒नामृषि॒र्विप्रा॑णां महि॒षो मृ॒गाणा᳚म् । श्ये॒नोगृध्रा॑णा॒ग्॒स्वधि॑ति॒र्वना॑ना॒ग्ं॒ सोमः॑ प॒वित्र॒मत्ये॑ति॒ रेभन्॑ ॥ सचि॑त्र चि॒त्रं चि॒तयन्᳚तम॒स्मे चित्र॑क्षत्र चि॒त्रत॑मं-वँयो॒धाम् । चं॒द्रं र॒यिं पु॑रु॒वीरम्᳚ बृ॒हंतं॒ चंद्र॑चं॒द्राभि॑र्गृण॒ते यु॑वस्व ॥

ॐ अधिदेवता प्रत्यधिदेवता सहितेभ्यः केतु॑भ्यो॒ नमः॑ ॥ 9 ॥


॥ ॐ आदित्यादि नवग्रह देव॑ताभ्यो॒ नमो॒ नमः॑ ॥

॥ ॐ शांतिः॒ शांतिः॒ शांतिः॑ ॥

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