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निष्पाप-जीवन का रहस्य / विनोबा भावे - मृत्यु-स्मरण से पाप-विरति: एकनाथ का बोध

 एक सज्जन ने एकनाथ से पूछा, "महाराज, आपका जीवन कितना सीधा-साधा और निष्पाप है! हमारा जीवन ऐसा क्यों नहीं? आप कभी किसी पर गुस्सा नहीं होते। किसी से लड़ाई झगड़ा नहीं, टंटा-बखेड़ा नहीं। कितने शांत, कितने प्रेमपूर्ण, कितने पवित्र हैं आप!"


एकनाथ ने कहा, "अभी मेरी बात छोड़ो। तुम्हारे संबंध में मुझे एक बात मालूम हुई है। आज से सात दिन के भीतर तुम्हारी मौत आ जायेगी।"


एकनाथ की कही बात को झूठ कौन मानता! सात दिन में मृत्यु! सिर्फ १६८ घंटे बाकी रहे! हे भगवान! यह क्या अनर्थ? वह मनुष्य जल्दी-जल्दी घर दौड़ गया। कुछ सूझ नहीं पड़ता था। आखिरी समय की, सब कुछ समेट लेने की, बातें कर रहा था। वह बीमार हो गया। बिस्तर पर पड़ गया। छ: दिन बीत गये। सातवें दिन एक नाथ उससे मिलने आये। उसने नमस्कार किया। एकनाथ ने पूछा, "क्या हाल है?"


उसने कहा, "बस अब चला!"


नाथजी ने पूछा, "इन छ: दिनों में कितना पाप किया? पाप के कितने विचार मन में आये?"


वह मरणासन्न व्यक्ति बोला, "नाथजी, पाप का विचार करने की तो फुरसत ही नहीं मिली। मौत एक-सी आंखों के सामने खड़ी थी।"


नाथजी ने कहा, "हमारा जीवन इतना निष्पाप क्यों है, इसका उत्तर अब मिल गया न?"


मरणरुपी शेर सदैव सामने खड़ा रहे, तो फिर पाप सूझेगा किसे?

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