क्या लिखूँ कैसे लिखूँ – Kya Likhu Kaise Likhu / Ravindra Jain

 क्या लिखूँ कैसे लिखूँ लिखने के भी क़ाबिल नहीं

यूँ समझ लीजे कि मैं पत्थर हूँ मुझ में दिल नहीं

क्या लिखूँ कैसे लिखूँ ...


हर क़दम पर आप ने समझा सही मैं ने ग़लत

अब सफ़ायी पेश कर के भी कोई हासिल नहीं

यूँ समझ लीजे कि मैं ...


इस तरह बढ़ती गयी कुछ रास्ते की उलझने

सामने मंज़िल थी मैं कहती रही मंज़िल नहीं

क्या लिखूँ कैसे लिखूँ ...


मैं ये मानूँ या न मानूँ दिल मेरा कहने लगा

अब मेरी नज़दीकियों में दूरियाँ शामिल नहीं

क्या लिखूँ कैसे लिखूँ ...

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