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प्रेरक प्रसंग / महात्मा गांधी - चरखा का अर्थ: ग्रामोद्योग और सहभागी विकास

 स्वाधीनता आन्दोलन की सफलता के फलस्वरूप जब देश से जब अंग्रेजो के जाने का समय आ गया था उस समय भी गांधी जी आपने आश्रम में चरखे पर सूत ही कात रहे थे। भारत के भावी प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू विभिन्न मुद्दों पर मन्त्रणा करने के लिये गांधी जी के पास पहुंचे तो उन्हें सूत कातता देखकर बोले-


बापू ! अब आप चर्खा क्यों कात रहे हैं ? देश आजाद होने जा रहा है। हम ऐसी केन्द्रीय योजनाये शुरू करेंगे जिनसे लोगो को काम मिलेगा, बडे बडे कल कारखाने होगे भारी मात्रा में उत्पादन होग और इसके नतीजे में सब लोग सम्पन्न और सन्तुष्ठ होंगे । ऐसे में अब चर्खे की क्या जरूरत है अब तक अंग्रेजों के बडे बडे कारखाने लगे हैं कपडा मिल लगे हैं । आजाद होने पर हम अपने बडे उद्योग लगायेगें । ऐसे अल्प उत्पादक और छोटे यंत्रों का अब क्या काम है? अंग्रेजी हुकूमत के साथ साथ अब चर्खे को भी विदाई दे दीजिये।


यह सुनकर महात्मा गांधी रोष भरे स्वर में बोले -


जवाहर! अगर तुम्हारे राज में मेरा चर्खा खूंटी पर टंग जायेगा तो मेरी जगह तुम्हारी जेल में होगी।


वास्तव में गांधी का चरखा गा्रमोद्योग का प्रतीक था जिसके माध्यम से वो देश के विकास में भारत के प्रत्येक गांव की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहते थे।

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