अपना दीवाना बना कर ले जाए / 'आफ़ताब' हुसैन

अपना दीवाना बना कर ले जाए
कभी वो आए और आ कर ले जाए

रोज़ बुनियाद उठाता हूँ नयी
रोज़ सैलाब बहा कर ले जाए

हुस्न वालों में कोई ऐसा हो
जो मुझे मुझ से चुरा कर ले जाए

रंग-ए-रुख़्सार पे इतराओ नहीं
जाने कब वक़्त उड़ा कर ले जाए

किसे मालूम कहाँ कौन किसे
अपने रास्ते पे लगा कर ले जाए

'आफ़ताब' एक तो ऐसा हो कहीं
जो हमें अपना बना कर ले जाए

श्रेणी: ग़ज़ल

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