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श्री सम्भवनाथ जी चालीसा – सम्पूर्ण पाठ हिंदी में (Lyrics व Video सहित)

श्री सम्भवनाथ जी चालीसा 🎬 वीडियो देखें

श्री सम्भवनाथ जी चालीसा एक अत्यंत पावन एवं भक्तिभाव से परिपूर्ण स्तुति है। श्रद्धालु प्रतिदिन इस चालीसा का पाठ करके मन की शांति, सुख-समृद्धि और सभी कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं। नीचे दी गई सम्पूर्ण चालीसा को ध्यानपूर्वक पढ़ें और साथ ही ऊपर दिए गए बटन पर क्लिक करके इसका भक्ति वीडियो भी देखें।

श्री जिनदेव को कर कर वन्दन, जिनवाणी को मन में ध्याय ।
काम असंभव कर दे संभव, समदर्शी संभव जिनराय ।।

जगतपुज्य श्री संभव स्वामी, तीसरे तीर्थंकर हैं नामी ।
धर्म तीर्थ प्रगटाने वाले, भव दुःख दूर भागने वाले ।।

श्रावस्ती नगरी अति सोहे, देवो के भी मनको मोहे ।
मात सुषेणा पिता द्रढ़राज, धन्य हुए जन्मे जिनराज ।।

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी आए, गर्भ कल्याणक देव मनाए ।
पूनम कार्तिक शुक्ल आई, हुई पुन्य प्रगटे जिनराई ।।
तीन लोक में खुशिया छाई, शची प्रभु को लेने आई ।
मेरु पर अभिषेक रचाया, संभव प्रभु शुभ नाम धराया ।।

बिता बचपन यौवन आया, पिता ने राज्याभिषेक कराया ।
मिली रानिया सब अनुरूप, सुख भोगे चवालिस लक्ष पूर्व ।।

एक दिन महल की छत के ऊपर, देखे वन सुषमा मनहर ।
देखा मेघ महल हिमखण्ड, हुआ नष्ट चली वायु प्रचण्ड ।।

तभी हुआ वैराग्य एकदम, गृह्बंधन लगा नागपाश सम ।
करते वस्तु स्वरूप चिंतवन, देव लोकान्तिक करे समर्थन ।।

निज सूत को देकर राज, वन गमन करे जिनराज ।
हुए सवार सिद्धार्थ पालकी, गए राह सहेतुक वन की ।।

मंगसिर शुक्ल पूर्णिमा प्यारी, सहस भूप संघ दीक्षा धारी ।
तजा परिग्रह केश लोंच कर, ध्यान धरा पूरब को मुख कर ।।

धारण कर उस दिन उपवास, वन में ही किया निवास ।
आत्मशुद्धि का प्रबल प्रमाण, तत्क्षण हुआ मनः पर्याय ज्ञान ।।

प्रथामाहार हुआ मुनिवर का हुआ, धन्य जीवन सुरेन्द्र का ।
पंचाश्चार्यो से देवों के हुए, प्रजा जन सुखी नगर के ।।

चौदह वर्षो की आतम सिद्धि, स्वयं ही उपजी केवल ऋद्धि ।
कृष्ण चतुर्थी कार्तिक सार, समोशरण रचना हितकार ।।

खिरती सुखकारी जिनवाणी, निज भाषा में समझे प्राणी ।
विषयभोग हैं विषसम विषमय, इनमे मत होना तुम तन्मय ।।

तृष्णा बढती हैं भोगो से, काया घिरती हैं रोगों से ।
जिनलिंग से निज को पहचानो, अपना शुद्धातम सरधानो ।।

दर्शन ज्ञान चरित्र बताये, मोक्ष मार्ग एकत्व दिखाये ।
जीवों का सन्मार्ग बताया, भव्यो का उद्धार कराया ।।

गणधर एक सौ पांच प्रभू के, मुनिवर पंद्रह सहस संघ के ।
देवी देव मनुज बहुतेरे, सभा में थे तिर्यंच घनेरे ।।

एक महिना उम्र रही जब, पहुँच गए सम्मेद शिखर तब ।
अचल हुए खडगासन प्रभु, कर्म नाश कर हुए स्वयंभू ।।

चैत सुदी षष्ठी थी न्यारी, धवल कूट की महिमा भारी ।
साठ लाख पूर्व का जीवन, पग में अश्व था शुभ लक्षण।।

चालीसा श्री संभव नाथ, पथ करो श्रद्धा के साथ ।
मनवांछित सब पूरण होवे, अरुणा जनम मरण दुःख खोवे ।।

श्री सम्भवनाथ जी चालीसा पाठ का महत्व

नियमित रूप से इस चालीसा के पाठ से भक्तों के दुःख-दारिद्र दूर होते हैं, मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रतिदिन पढ़ें।

सभी जैन चालीसा एक साथ पढ़ने के लिए हमारा संग्रह पेज देखें: जैन चालीसा संग्रह (सम्पूर्ण सूची)

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