दूलनदास 18वीं शताब्दी के निर्गुण संत-कवि थे और उनका संबंध अवध क्षेत्र से माना जाता है। वे संत जगजीवन साहब के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं तथा उनके द्वारा स्थापित सतनामी संत-परंपरा से जुड़े थे। उनकी वाणी में गुरु-भक्ति, नाम-स्मरण, आत्मज्ञान, वैराग्य और आंतरिक साधना के भाव प्रमुख हैं। उन्होंने बाहरी आडंबर और कर्मकांड की अपेक्षा मनुष्य के भीतर की साधना और ईश्वर के अनुभव को अधिक महत्व दिया।
दूलनदास की रचनाएँ मुख्यतः पद और साखी के रूप में मिलती हैं। उनकी भाषा सहज और लोक के निकट है, जिसमें आध्यात्मिक विचारों को सरल ढंग से व्यक्त किया गया है। संत साहित्य में उनकी वाणी निर्गुण भक्ति की उस धारा का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें गुरु और नाम को साधना का आधार माना गया है।
देख आयो मैं तो साईं की सेजरिया
दूलनदास
देख आयो मैं तो साईं की सेजरिया।साईं की सेजरिया सतगुरु की डगरिया॥
सबदहि ताला सबदहि कुंजी, शब्द की लगी है जंजिरिया।
सबद उगेढ़ना सबद बिछौना, सबद की चटक चुनरिया॥
सबद सरूपी स्वामी आप बिराजैं, सीस चरन में धरिया।
दूलनदास भजु साईं जगजीवन, अगिन से अहंग उजरिया॥
सुरत बौरी कातै निरमल ताग
दूलनदास
सुरत बौरो कातै निरमल ताग॥तन का चरखा नाम का टेकुआ, प्रेम की पिउनी करि अनुराग।
सतगुरु धोबी अलख जुलाहा, मलि-मलि धोवैं करम के दाग॥
इतना पहिरि मन मानिक साजो, पिय अपने पर सबै सिंगार।
दूलनदास अचल गुरु साहिब, गुरु के चरन पर मनुआँ लाग॥
धन मोरि आज सुहागिन घड़िया
दूलनदास
धन मोरि आज सुहागिन घड़िया॥आज मोर अँगना संत चलि आये, कौन करौं मिहमनिया।
निहुरि-निहुरि मैं अँगना बुहारौँ, मातो मैं प्रेम लहरिया॥
भाव कै भात प्रेम कै फुलका, ज्ञान की दाल उतरिया।
दुलनदास के साईं जगजीवन, गुरु के चरन बलिहारिया॥
नाम सुमिरु मन मुरुख अनारी
दूलनदास
नाम सुमिरु मन मुरुख अनारी।छिन-छिन आयु घटत जातु है, समुझि गहहु सत डोरि संभारी॥
यह जीवन सुपने को लेखा, का भूलसि झूठी संसारी।
अंत काल कोइ काम न अइहै, मातु-पिता-सुत-बंधू-नारी॥
दिवस चारि को जगत सगाई, आख़िर नाम सनेह करारी।
रखना सत्त नाम रटि लावहु, उघरि जाइ तोरि कपट किवारी॥
नाम कि डोरि पोढ़ि धरनी धरु, उलटि पवन चढ़ु गगन अटारी।
तहँ सत साहिब अलख रूप वै, जन दूलन करु दरस दिदारी॥
रसना राम नाम न लिया
दूलनदास
रसना राम नाम न लिया।मनहिं ज्ञान बिचार गुरु के, चरन सीस न दिया।
रक्त पानि समोइ कै, जिन्ह अजब जामा सिया॥
तेहि बिसारि गँवार काहे, समुझि काम न किया।
अछत नाम पियूष पासहिं, मोह माहुर पिया॥
गयो गर्म बिनास काहे न, कौल कारन जिया।
दूलन हरिकौ भक्ति बिनु, यह ज़िंदगानी छिया॥
साईं तेरो गुप्त मर्म हम जानी
दूलनदास
साईं तेरो गुप्त मर्म हम जानी।कस करि कहौं बखानी॥
सतगुरु संत भेद मोहि दीन्हा, जग से राखा छानी।
निज घर का कोउ खोज न कीन्हा, करम भरम अटकानी॥
निज घर है वह अगम अपारा, जहाँ बिराजै स्वामी।
ता के परे अलोक अनामी, जा का रूप न नामी॥
ब्रम्ह रूप धरि सृष्टि उपाई, आप रहा अलगानी।
बेद कितेब की रचन रचाई, दस औतार घरानी॥
निज माता सीता सोइ राधा, निज पितु राम सुवामी।
दोउ मिलि जीवन बंद छुड़ाया, निज पद मैं दिया ठामी॥
दूलनदास के साईं जगजीवन, निज सुत जक्त पठानी।
मुक्ति द्वार की कूँची दीन्ही, ता तें कुलुफ खुलानी॥
ऐसा रंग रँगै हौं
दूलनदास
ऐसा रंग रँगै हौं, मैं तो मतवालिन होइहौं।भट्टी अधर लगाइ, नाम की सोज जगैहौं।
पौन सँभारि उलटि दै झौंका, करकट कुमति जलैहौं॥
गुरुमति लहन सुरति भरि गागरि, नरिया नेह लगैहौं।
प्रेम नीर दै प्रीति पुचारी, यहि बिधि मदवा चुवैहौं॥
अमल अगारी नाम खुमारी, नैनन छवि निरतैहौं।
दै चित चरन भयूँ सत सन्मुख, बहुरिन यहि जग ऐहौं॥
है रस मगन पियो भर प्याला, माला नाम डोलैहौं।
कह दूलन सतसाईं जगजीवन, पिउ मिलि प्यारी कहैहौं॥
जोगी चेत नगर में रहो रे
दूलनदास
जोगी चेत नगर में रहो रे।प्रेम रंग रस ओढ़ चदरिया, मन तसबीह गहो रे।
अंतर लाओ नामही की धुनि, करम भरम सब धो रे॥
सूरत साधि गहो सत मारग, भेद न प्रगट कहो रे।
दूलनदास के साईं जगजीवन, भवजल पार करो रे॥
पिया मिलन कब होइ
दूलनदास
पिया मिलन कब होइ, अँदेसवा लागि रही।जब लग तेल दिया में बाती, सूझ पड़े सब कोइ।
जरिगा तेल निपटि गई बाती, लै चलु लै चलु होइ॥
बिन गुरु मारग कौन बतावै, करिये कौन उपाय।
बिना गुरु के माला फेरै, जनम अकारथ जाय॥
सब संतन मिलि इक मत कीजै, चलिये पिय के देस।
पिया मिलै तो बड़े भाग से, नहिं तो कठिन कलेस॥
या जग ढूँढ़ वा जग ढूँढूँ, पाऊँ अपने पास।
सब संतन के चरन बंदगी, गावै दूलनदास॥
जग में जै दिन है जिंदगानी
दूलनदास
जग में जै दिन है जिंदगानी।लाइ लेव चित गुरु के चरनन, आलस करहु न प्रानी॥
या देही का कौन भरोसा, उभसा-भाठा पानी।
उपजत मिटत बार नहिं लागत, क्या मगरूर गुमानी॥
यह तो है करता की कुदरत, नाम तू ले पहिचानी।
आज भलो भजने को औसर, काल की काहु न जानी॥
काहु के हाथ साथ कछु नाहीं, दुनियाँ है हैरानी।
दूलनदास बिस्वास भजन करु, यहि है नाम निसानी॥
मन तुम रहौ चरनन लगे
दूलनदास
मन तुम रहौ चरनन लगे।बिनु चरन कँवल सनेह, अवर बिधान सब डगमगे॥
सब देह धरि-धरि गये मरि-मरि, जीव बिरले जगे।
नर जनम उत्तम पाइ, चरन सनेह बिन सब ठगे॥
का अन्न तजि पथ पिये, का भुज दंड देही दगे।
का तजे घर घरनी, जो चरन सनेह नाम न रँगे॥
जन दुलन सतगुरु चरन जानहु, हित सनेही सगे।
धरि ध्यान लै सत सुरति संगम, रहहु छबि रस पगे॥
जब गज अरध नाम गुहरायो
दूलनदास
जब गज अरध नाम गुहरायो।जब लगि आवै दूसर अच्छर, तब लगि आपुहि धायो॥
पाँय पियादे भे करुनामय, गरुड़ासन बिसरायो।
धाय गजंद गोद प्रभु लीन्हो, आपनि भक्ति दिढ़ायो॥
मीरा को बिष अमृत कीन्हो, बिमल सुजस जग छायो।
नामदेव हित कारन प्रभु तुम, मिर्तक गाय जियायो॥
भक्त हेत तुम जुग-जुग जनमेउ, तुमहिं सदा यह भायो।
बलि-बलि दूलनदास नाम की, नामहि ते चित लायो॥
तैं राम-राम भजु राम रे
दूलनदास
तैं राम-राम भजु राम रे, राम ग़रीब निवाज हो।राम कहे सुख पाइहो, सुफल होइ सब काज।
परम सनेही राम जी, रामहिं जन की लाज हो॥
जनम दीन्ह है राम जी, राम करत प्रतिपाल।
राम-राम रट लाव रे, रामहिं दीनदयाल हो॥
मात-पिता गुरु राम जी, रामहिं जिन बिसराव।
रही भरोसे राम के, तैं रामहिं से चित चाव हो॥
घर बन निसु दिन राम जी, भक्तन के रखवार।
दुखिया दूलनदास को रे, राम लगइहैं पार हो॥
मन रहि जा चरनन सीस घरी
दूलनदास
मन रहि जा चरनन सीस घरी।लागि रहै धुनि हरि-हरि॥
तोहि समझावों घरी-घरी।
कुमति बिपति तोरि जाइ टरी॥
पाँच पचीसौ एक करी।
पियहु दरस रस पेट भरी॥
हारे बहुत-बहुत रबरी।
चरन प्रीति बिन कछु न सरी॥
चरन प्रभाव जानु कुबरी।
परसत गौतम नारि तरी॥
साईं जगजीवन कृपा करी।
जन दूलन परतीत परी॥
मन राम भजन रहु राजी रे
दूलनदास
मन राम भजन रहु राजी रे।दुनियाँ दौलत काम न अईहै, मति भूलहु गज बाजी रे।
निसु दिन लगन लगी भगवानहिं, काह करै जम पाजी रे॥
तन मन मगन रहौ सिधि साधो, अमर लोक सुधि साजी रे।
दूलनदास के साईं जगजीवन, हरि भगती कहि गाजी रे॥
मन वहि नाम की धुनि लाउ
दूलनदास
मन वहि नाम की धुनि लाउ।रटु निरंतर नाम केवल, अवर सब बिसराउ॥
साधि सूरत आपनी, करि सुवा सिखर चढ़ाउ|
पोषि प्रेम प्रतीत तैं, कहि राम नाम पढ़ाउ॥
नामही अनुरागु निसु दिन, नाम के गुन गाउ।
बनी तौ का अबहिं, आगे और बनी बनाउ॥
जगजीवन सतगुरु बचन साचे, साच मन माँ लाउ।
करु बास दूलनदास सत माँ, फिरि न यहि जग आउ॥
सतनाम तें लागी अखियाँ
दूलनदास
सतनाम तें लागी अखियाँ, मन परिगै जिकिर जँजीर हो।सखि नैना बरजे ना रहैं, अब ठिरे जात वोहि तीर हो।
नाम सनेही बावरे दृग, भरि-भरि आवत नीर हो॥
रस-मतवाले रस-मसे, यहि लागी लगन गँभीर हो।
सखि इस्क पिया से आसिकाँ, तजि दुनिया दौलत भीर हो।
सखि गोपीचंदा भरथरी, सुलताना भयो फ़क़ीर हो।
सखि दूलन का से कहै यह, अटपटि प्रेम की पीर हो॥
राम-राम रटु राम-राम सुनु
दूलनदास
राम-राम रटु राम-राम सुनु, मनुवाँ सुवा सलोना रे।तन हरियाले बदन सुलाले, बोल अमोल सुहौना रे।
सत्त तंत्र अरु सिद्ध मंत्र पढ़ु, सोई मृतक जियौना रे॥
सुबचन तेरे भौजल बेरे, आवागवन मिटौना रे।
दूलनदास के साईं जगजीवन, चरन सनेह दृढ़ौना रे॥
मन वहि नाम की धुनि लाउ
दूलनदास
मन वहि नाम की धुनि लाउ।रटु निरंतर नाम केवल, अवर सब बिसराउ॥
साघि सूरत आपनी, करि सुवा सिखर चढ़ाउ।
पोषि प्रेम प्रतीत तें, कहि राम नाम पढ़ाउ॥
नामही अनुरागु निसु दिन, नाम के गुन गाउ।
बनी तौ का अबहिं, आगे और बनी बनाउ॥
जगजीवन सतगुरु बचन साचे, साध मन माँ लाऊँ।
करु बास दूलनदास सत माँ, फिरि न यहि जग आऊँ॥
रहु मन नाम की डोरि सँभारे
दूलनदास
रहु मन नाम की डोरि सँभारे।धृग जीवन नर नाम भजन बिनु, सब गुन वृथा तुम्हारे॥
पाँच पचीसों के मद माते, निस दिन साँझ सकारे।
बंदी-छोर नाम सुमिरन बिनु, जन्म पदारथ हारे॥
अजहुँ चेत करु हेत नाम तैं, गज गनिका जिन्ह तारे।
चाखि नाम रस मस्त मगन ह्वै, बैठहु गगन दुवारे॥
यहि कलि काल उपाइ अवर नहीं, बनि है नाम पुकारे।
जगजीवन साईं के चरनन, लागे दास दुलारे॥
धन मोरि आज सुहागिन घड़िया
दूलनदास
धन मोरि आज सुहागिन घड़िया।आज मोरे अँगना संत चलि आये, कौन करौं मिहमनिया।
निहुरि-निहुरि मैं अँगना बुहारौं, माता मैं प्रेम लहरिया॥
भाव कै भात प्रेम कै फुलका, ज्ञान को दाल उतरिया।
दूलनदास के साईं जगजीवन, गुरु के चरन बलिहरिया॥
द्रुपदी राम कृस्न कहि टेरी
दूलनदास
द्रुपदी राम कृस्न कहि टेरी।सुनत द्वारिका तें उठि धायो, जानि आपनी चेरी॥
रही लाज पछितात दुसासन, अंबर लाग्यो ढेरी।
हरि लीला अवलोकि चकित चित, सकल सभा भुइँ हेरी॥
हरि रखवार सामरथ जा के, मूल अचल तेहि केरी।
कबहुँ न लागति ताति बाव तेहि, फिरत सुदरसन फेरी॥
अब मोहि आसा नाम सरन की, सीस चरन दियो तेरी।
दूलनदास के साईँ जगजीवन, इतनी बिनती मेरी॥
हुआ है मस्त मंसूरा
दूलनदास
हुआ है मस्त मंसूरा, चढ़ा सूली न छोड़ा हक़।पुकारा इश्कबाज़ों को, अहै मरना यही बरहक़॥
जो बोले आशिक़ाँ यारों, हमारे दिल में है जी शक।
अहै यह काम सूरौं का, लगाये पीर से अब तक॥
शम्सतबरेज़ की सीफ़त, जहाँ में ज़ाहिरा अब तक।
निज़ामुद्दीन सुल्ताना, सभी मेटे दुनी के धक॥
निरख रहे नूर अल्लह का, रहे जीते रहे जब तक।
हुआ हाफ़िज़ दिवाना भी, भये ऐसे नहीं हर यक॥
सुना है इश्क़ मजनूँ का, लगी लैला की रहती झक।
जलाकर खाक तन कीना, हुए वह भी उसी माफ़िक़॥
दूलन जन को दिया मुरशिद, पियाला नाम का थकथक।
वही है शाह जगजीवन, चमकता देखिये लक़ लक़॥
भजहु नाम मोरि लगन सुधारन
दूलनदास
भजहु नाम मोरि लगन सुधारन,पूरन ब्रह्म अखिल जग कारन।
अर्ध नाम की सुरति करत मन,
करुना-कंद गजंद-उबारन॥
लाउ जिकिरि मन फिकिरि फरक करु,
नाम सदा जन संकट टारन।
द्रुपदी लज्या के रखवारे,
जन प्रहलाद कि पैज सँभारन॥
होहु निडर मन सुमिरि नाम अस,
सर्म रु कर्म कुअंक भिजारन।
दूलनदास के साईं जगजीवन,
दिहिन नाम आवागवन निवारन॥
देख आयो मैं तो साईं की सेजरिया
दूलनदास
देख आयो मैं तो साईं की सेजरिया।साईं की सेजरिया सतगुरु की डगरिया॥
सबदहि ताला सबदहि कुंजी, सबद की लगी है जंजिरिया।
सबद ओढ़ना सबद बिछौना, सुबद की चटक चुनरिया॥
सबद सरूपी स्वामी आप बिराजे, सीस चरन में धरिया।
दूलनदास भजु साईं जगजीवन, अगिन से अहँग उजरिया॥
साईं हो ग़रीब निवाज
दूलनदास
साईं हो ग़रीब निवाज।देखि तुम्हें घिन लागत नाहीं, अपने सेवक कै साज।
मोहिं अस निलज न यहि जग कोऊ, तुम ऐसे प्रभु लाज जहाज॥
और कछू हम चाहित नाहिं, तुम्हरे नाम चरन तैं काज।
दूलनदास ग़रीब निवाजहु, साईं जगजीवन महराज॥
जागुं री मोरि सुरत पियारी
दूलनदास
जागूँ री मोरि सुरत पियारी।चरन कमल छवि झलक निहारी॥
बिसरि जाइ दे यह संसारी।
धरहु ध्यान मन ज्ञान विचारी॥
पाँच पचीसो दे झझकारी।
गहहु नाम की डोरि सँभारी॥
साईं जगजीवन अरज हमारी।
दूलनदास को आस तुम्हारी॥
सुनहु दयाल मोहिं अपनावहु
दूलनदास
सुनहु दयाल मोहिं अपनावहु।जन मन लगन सुधारन साईं, मोरि बनै जो तुमहिं बनावहु।
इत-उत चित्त न जाइ हमारा, सूरत चरन कमल लपटाबहु॥
तबहूँ अब मैं दास तुम्हारा, अब जिनि बिसरौं जिनि बिसराबहु।
दुलनदास के साईं जगजीवन, हमहूँ काँ भक्तन माँ लावहु॥
पछितात क्या दिन जात बीते
दूलनदास
पछितात क्या दिन जात बीते, समुझ करु नर चेत रे।अंध तेरे कंध सिर पर, काल डंका देत रे॥
हुसियार ह्वै गुन गाव प्रभु के, ठाढ़ रहु गुरु खेत रे।
ताके रहै छूटै नहीं, जिमि राहु रबि ससि केत रे॥
जम द्वार तर सब पीसिगे, चर अचर निंदक जेत रे।
नहिं पियत अमृत नाम रस, भरि स्वांस सुरत सचेत रे॥
मद मोह महुवा दाख दुख, बिष का पियाला लेत रे।
जग नात गोत बिसारि सब, हर दम गुरु से हेत रे॥
सगलौ सुपन अपना वही, जिस रोज परत संकेत रे।
वह आई सिरजनहार हरि, सतनाम भो जल सेत रे।
जन दुलन सतगुरु चरन बंदत, प्रेम प्रीति समेत रे॥
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