सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

नामदेव जी के सबद : Namdev Ji Ke Sabad

संत नामदेव (1270–1350) महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा के प्रमुख संत-कवि थे और वारकरी संप्रदाय से जुड़े थे। उनके गुरु बिसोवा खेचर माने जाते हैं। मराठी में उन्होंने अनेक अभंगों की रचना की, जबकि हिंदी में भी उनके पद और सबद मिलते हैं। उनकी वाणी में सगुण भक्ति के साथ निर्गुण चिंतन, गुरु-महिमा, नाम-स्मरण और ईश्वर की सर्वव्यापकता के भाव दिखाई देते हैं।

जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि

नामदेव

जउ गुरदेउ त मिलै मुरारि।। जउ गुरदेउ त उतरै पारि।।
जउ गुरदेउ त बैकुंठ तरै।। जउ गुरदेउ त जीवत मरै।।
सति सति सति सति सति गुरदेव।।
झूठु झूठु झूठु झूठु आन सभ सेव।।
जउ गुरदेउ त नामु द्रिड़ावै।। जउ गुरदेउ न दह दिस धावै।।
जउ गुरदेउ पंच ते दूरि।। जउ गुरदेउ न मरिबो झूरि।।
जउ गुरदेउ त अंम्रित बानी।। जउ गुरदेउ त अकथ कहानी।।
जउ गुरदेउ त अंम्रित देह।। जड गुरदेउ नामु जपि लेहि।।
जउ गुरदेउ भवन त्रै सूझै।। जउ गुरदेउ ऊच पद बूझै।।
जउ गुरदेउ त सीसु अकासि।। जउ गुरदेउ सदा साबासि।।
जउ गुरदेउ सदा बैरागी।। जउ गुरदेउ पर निंदा तिआगी।।
जउ गुरदेउ बुरा भला एक।। जउ गुरदेउ लिलाटहि लेख।।
जउ गुरदेउ कंधु नहीं हिरै।। जउ गुरदेउ देहुरा फिरै।।
जउ गुरदेउ त छापरि छाई। जउ गुरदेउ सिहज निकसाई।।
जउ गुरदेउ त अठसठि नाइआ।। जउ गुरदेउ तनि चक्र लगाइआ।।
जउ गुरदेउ त दुआदस सेवा।। जउ गुरदेउ सभै बिखु मेवा।।
जउ गुरदेउ त संसा टूटै।। जउ गुरदेउ त जम ते छूटै।।
जउ गुरदेउ त भउजल तरै।। जउ गुरदेउ त जनमि न मरै।।
जउ गुरदेउ अठदस बिउहार।। जउ गुरदेउ अठारह भार।।
बिनु गुरदेउ अवर नही जाई।। नामदेउ गुर की सरणाई।।

अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ

नामदेव

असुमेध जगने।। तुला पुरख दाने।। प्राग इसनाने।।
तउ न पुजहि हरि कीरति नामा।।
अपुने रामहि भजु रे मन आलसीआ।।
गइआ पिंड भरता। बनारसि असि बसता।।
मुखि बेद चतुर पड़ता।
सगल धरम अछिता।। गुर गिआन इंद्री द्रिड़ता।।
खटु करम सहित रहता।।
सिवा सकति संबादं।। मन छोडि छोडि सगल भेदं।।
सिमरि सिमरि गोबिंदं।। भजु नामा तरसि भव सिंधं।।

भैरऊ भूत सीतला धावै

नामदेव

भैरऊ भूत सीतला धावै।।
खर वाहन ऊहु, छार उड़ावै।।
हऊ तऊ एक रमईआ लेहऊ।।
ग्रानदेव वदलावनि देहऊ।।
सिव सिव करते जो नरु धिआवै।।
बरद चढ़े डमरू डमकावै।।
महामाई की पूजा करै।।
नर सै नारि होइ उतरै।।
तू कहिअत आदि भवानी।।
मुकति की बरीआ कहा छपानी।।
गुरमति राम नाम गहु मीता।।
प्रणवै नामा इऊ कहै गीता।।

गहरी करिके नीब खुदाई

नामदेव

गहरी करिके नीब खुदाई ऊपरि मंडप छाए।।
मर्कंड ते को अधिकाई जिनि त्रिण धरि भूंड बलाए।
हमरो करता रामु सनेही।।
काहे रे नर गरबु करतहहु बिनसि जाई झूठी देही।।
मेरी मेरी कैरउ करते दरजोधन से भाई।।
बारह जाजन छत्र चलै था देही गिरधन खाई।।
सरब सोइन की लंका होती रावन से अधिकाई।।
कहा भइउ दरि बाँधे हाथी खिनमहि भई पराई।।
दुरवासा सिऊ करत ठगऊरी जादव ए फल पाए।।
क्रिपा करी जन अपने ऊपर नामदेऊ हरिगुन गाए।

माइ न होती बापु न होता

नामदेव

माइ न होती बापु न होता करमु न होती काइआ।।
हम नहीं होते तुम नहीं होते कवनु कहांते आइआ।।
राम कोई न किसही केरा।।
जैसे तरुवर पंखि बसेरा।।
चंदू न होता सूरु न होता पानी पवनु मिलाइया।।
न होता बेदु न होता करमु कहाँ ते आइया।।
खेचर भूचर तुलसीमाला गुर परसादी पाइआ।।
नामा प्रणवै परम ततु है सतिगुर होइ लखाइआ।।

हरि हरि करत मिटे सभि भरमा

नामदेव

हरि हरि करत मिटे सभि भरमा॥
हरि को नाम लेऊ तम धरमा॥
हरि हरि करत जाति कुल हरी॥
सो हरि अंधुले की लाकरी॥
हरए नमस्ते हरए नमह॥
हरि हरि करत नहीं दुख जमह॥
हरि हरनाखस हरे परान॥
अजैमल कीऊ बैकुँठहि थान॥
सूआ पडावत गनिका तरी॥
सो हरि नैनहु की पूतरी॥
हरि हरि करत पूतना तरी॥
बाप घातनी कपटहि भरी॥
सिमरत द्रौपत सुता ऊधरी॥
गऊतम सती सिला निसतरी॥
केसी कंस मथनु जिनि कीआ॥
जीअ दानु काली कऊ दीआ॥
प्रणवै नामा ऐसो हरी॥
जासु जपत भै अपदा टरी॥

नर रामभजन बिन गत न तरन की

नामदेव

नर रामभजन बिन गत न तरन की
कोटि उपाव कर रे।।
होम नेम व्रत तीरथ साधो
क्या हुआ बन खंड वासा रे
चरन कमल उर मा उपजे नहिँ
तो लग झूठी आसा रे।।
नर रामभजन बिन गत न तरन की
कोटि उपाव कर रे।।
नर तनु पायो राम नहिँ गायो
भूल्यो पशू गव्हारा रे
सिर पर काल खड़ा शर साधे
नामदेव कहे पुकारा रे।

घर की नारि तिआगै अंधा

नामदेव

घर की नारि तिआगै अंधा।। पर नारी सिउ घालै धंधा।।
जैसे सिंबलु देखि सूआ बिगसाना।। अंत की बार मूआ लपटाना।।
पापी का घरु अगने माहि।। जलत रहै मिटवै कब नाहि।।
हरि की भगति न देखै जाइ।। मारगु छोडि अमारगि पाइ।।
मूलहु भूला आवै जाइ।। अंम्रितु डारि लादि बिखु खाइ।।
जिउ बेस्वा के परै अखारा।। कापरु पहिरि करहि सींगारा।।
पूरे ताल निहाले सास।। वा के गले जम का है फास।।
जा के मसतकि लिखिओ करमा।। सो भजि परि है गुर की सरना।।
कहत नामदेउ इहु बीचारु।। इन बिधि संतहु उतर पारि।।

अणमड़िआ मंदलु बाजै

नामदेव

अणमड़िआ मंदलु बाजै।। बिनु सावण घनहरु गाजै।।
बादल बिनु बरखा होई।। जउ ततु बिचारै कोई।।
मो कउ मिलिओ रामु सनेही।। जिह मिलिऐ देह सुदेही।।
मिलि पारस कंचनु होइआ।। मुख मनसा रतनु परोइआ।।
निज भाउ भइआ भ्रम भागा।। गुर पूछे मनु पतीआगा।।
जल भीतर कुंभ समानिआ।। सभ रामु एकु करि जानिआ।
गुर चेले है मनु मानिआ।। जन नामै ततु पछानिआ।।

मनु पंछीया मत्त पिंजरे

नामदेव

मनु पंछीया मत्त पड पिंजरे,
संसार माया जालुरे।।
धन जोबन रूप कारण,
न कर गर्व गव्हार रे।।
एक दिन मो तिन बिरिया,
सदा झमकत काल रे।।
कुंभ काच्या निर भरिया,
बीनसत नहि बाररे।।
कहत नामदेव सुन भई साधु,
साधु संगत धरनारे।।

दुध पीवोरे मेरे गोविंदराय

नामदेव

दुध पीवोरे मेरे गोविंदराय।।
काला बछेरा कपीला गाय, दुध दुहावन नामा जाय।।
सुन्ने काटुरा दुधने भरीया, पिवौ नारायण आगे धरीया।।
पखान की मुरत दुध नहीं पीवत, शीर पछार पछार नामा रोवत।।
ऐसा भक्त मैं कबहु न पाया, नामदेव न देव हुसाया।।

लोभ लहरि अति नीझर बाजै

नामदेव

लोभ लहरि अति नीझर बाजै।। काइआ डूबै केसवा।।
संसारु समुंदे तारि गोबिंदे।। तारि लै बाप बीठुला।।
अनिल बेड़ा हउ खेवि न साकउ।। तेरा पारु न पाइआ बीठुला।।
होहु दइआलु सतिगुरु मेलि तू मो कउ।। पारि उतारे केसवा।।
नामा कहै हउ तरि भी न जानउ॥ मो कउ बाह देहि बाह देहि बीठुला।।

मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा

नामदेव

मारवाड़ि जैसे नीरु बालहा बेलि बालहा करहला।।
जिउ कुरंक निसि नादु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ।
तेरा नाम रूड़ो रूप रूड़ो अति रंग रूड़ो मेरो रामईआ।।
जिउ धरणी कउ इंद्रु बालहा कुसम बासु जैसे भवरला।।
जिउ कोकिल कउ अंबु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ।।
चकवी कउ जैसे सूरु बालहा मान सरोवर हंसुला।।
जिउ तरुणी कउ कंतु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ।।
बारिक कउ जैसे खीरु बालहा चात्रिक मुख जैसे जलधरा।।
मछली कउ जैसे नीरु बालहा तिउ मेरै मनि रामईआ।।
साधिक सिध सगल मुनि चाहहि बिरले काहू डीठुला।।
सगल भवण तेरो नाम बालहा तिउ नामे मनि बीठुला।।

पतिनपावन माधऊ बिरदु तेरा

नामदेव

पतिनपावन माधऊ बिरदु तेरा।।
घनि ते वै मुनिजन जिन धिआइउ हरि प्रभु मेरा।।
मेरे माथै लागीलै धूरि गोविंद चरणन की।।
सुर नर मुनि जन तिनहु ते दूरि।।
दीन का दइआलु माधौ गरब परिहारी।।
चरण सरन नामा बलि तिहारी।।

दस बैरागनि मोहि बसि

नामदेव

दस बैरागनि मोहि बसि कीनी पंचहु का मठनावऊ।।
सतरि दोइ भरे अमृतसरी विखुकउ मारि कढ़ावऊ।।
पाछे बहुरि न आवनु पावऊ।।
अंम्रित बाणी घट से उचरऊ आतम कऊ समझावऊ।।
बजर कुठारु मोहि है छीना करि मिनंति लगि पावऊ।।
संतन के हम उलटे सेवक भगतन से डरपावऊ।।
ईह संसार ते तबही छूटऊ जऊ माइआ नह लपटावऊ।।
भाइआ नामु गरभ जोनि का तिह तजि दरसन पावऊ।।
इतुकरि भगति करहि जो जन तिन भउ सगल चुकाइए।
कहत नामदेऊ बाहरि किआ भरमहु इह संजम हरि पाइए।।

जब देखा तव गावा

नामदेव

जब देखा तव गावा, तर जन धीरुज पावा।।
नादि समाइलो रे सतगुर भेटिले देवा।।
जह झिलिमिल कारु दिसंता।।
तह अनहद सबद बजंता।।
जोति जोति समानी, मैं गुर परसादी जानी।।
रतन कमल कोठरी, चमकार बीजुल तही।।
नेरे नाही दूरि, निज आतमै रहिआ भरपूरि।।
जह अनहत सूर ऊजयारा, तह दीपक जलै घीया।।
गुर परसादी जानिआ, जनु नामा सहज समानिआ।।

नाद भ्रमे जैसे मिरगाए

नामदेव

नाद भ्रमे जैसे मिरगाए।।
प्रान तजे वाको धिप्रानु न जाए।
ऐसे रामा ऐसे हेरऊ।।
राम छोड़ि चितु अनत न फेरऊ।।
जिऊ मीना हेरे पसुआरा।।
सोना गडते हिरै सुनारा।।
जिऊ बिखई हेरै पर नारी।।
कउड़ा डाड़त हिरै जुआरी।।
जह जह देखऊ तह तह रामा।।
हरिके चरन नित धिआवै नामा।।

आदि, जुगादि जुगादि जुगो जुगु

नामदेव

आदि, जुगादि जुगादि जुगो जुगु ताका अंत न जानिआ॥
सरब निरंतरि रामु रहिआ रवि ऐसा रूपु बखानिआ॥
गोविंदु गाजै सबदु बाजै, आनदरूपो मेरो रामइआ॥
बावन बीखू बाने बीखे वासु ते सुख लागिला॥
सरबे आदि परमलादि कासट चंदनु भैइला॥
तुमचे पारसु हमचे लोहा संगे कंचनु भैइला॥
तू दइआलु रतनु लालु नामा साचि समाइला॥

साहिबु संकटवै सेवकु भजै

नामदेव

साहिबु संकटवै सेवकु भजै॥ चिरंकाल न जीवै दोऊ कुल लजै॥
तेरी भगति न छोडउ भावै लोगु हसै॥ चरन कमल मेरे हीअरे बसैं॥
जैसे अपने धनहि प्रानी मरनु मांडै॥ तैसे संत जनां राम नाम न छाडैं॥
गंगा गइआ गोदावरी संसार के कामा॥ नाराइणु सुप्रसंन होइ त सेवकु नामा॥

जौ राजु देहि त कवन बडाई

नामदेव

जौ राजु देहि त कवन बडाई।
जौ भीख मंगावहि त किआ घटि जाई।।
तू हरि भजु मन मेरे पदु निरबानु।
बहुरि न होई तेरा आवनजानु।।
सभ तै उपाई भरम भुलाई।
जिस तू देवहि तिसहि बुझाई।।
सतिगुरु मिले त सहसा जाई।
किस हऊ पूजऊ दूजा नदरि न आई।।।
एकै पाथर कीजै भाऊ।
दूजे पाथर धरिए पाऊ।।
जै उहु देऊ त उहु भी देवा।
कहि नामदेऊ हम हरि की सेवा।।

सफल जनमु मो कउ गुर

नामदेव

सफल जनमु मो कउ गुर कीना॥ दुख बिसारि सुख अंतरि लीना॥
गिआन अंजनु मो कउ गुरि दीना॥ राम नाम बिनु जीवनु मन हीना॥
नामदेइ सिमरनु करि जानां॥ जगजीवन सिउ जीउ समानां॥

मन की बिरथा मनु ही जानै

नामदेव

मन की बिरथा मनु ही जानै कै बूझल आगै कहीए।।
अंतरजामी रामु रवांई मै उरु कैसे चहीए।।
बोधिअले गोपाल गुसाई मेरा प्रभु रहिआ सरबे ठायी।।
माने हाठु माने पाटु मानै है पासारी।।
मानै बासै नाना भेदी भरमतु है संसारी।।
गुरूकै सबदि एहु मनुराता दुबिधा सहजि समाणी।।
सभी हुकमु हुकसु है आपै निरमऊ समतु बिचारी।।
जो जन जानि भजहि पुरखोतमु ताची अबिगतु बाणी।।
नामा कहै जगजीवनु पाइआ हिरदै अलख बिडाणी।।

एक अनेक बिआपक पूरक

नामदेव

एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई।।
माइआ चित्र बचित्र बिमोहित बिरला बूझै कोई।।
सभु गोबिन्दु है, सभु गोविंदु है, गोविंदु बिनु नहीं कोई।।
सूतु एकु मणि सतसहस जैसे उतिपोति प्रभु सोई।।
जलतरंग अरु फेन बुदबुदा, जलते भिन न कोई।।
इहु परपंचु पारब्रह्म की लीला बिचरत आन न होई।।
मिथिआ भरमु अरु सुपनु मनोरथ सति पदारथु जानिआ।।
सुक्रित मनसा गुरु उपदेसी, जागत ही मनु मानिया।।
कहत नामदेऊ हरि की रचना देखहु रिदै बौंचारी।।
घटघट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी।।

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...