सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संत गुलाल के सबद : Sant Gulal Ke Sabad

संत गुलाल साहब 18वीं शताब्दी के प्रमुख निर्गुण संत-कवियों में माने जाते हैं। उनका संबंध गाज़ीपुर क्षेत्र से था और वे संत बुल्ला साहब के प्रमुख शिष्य थे। उनकी वाणी में अध्यात्म, प्रेम, गुरु-भक्ति, नाम-स्मरण और आंतरिक साधना के भाव प्रमुखता से मिलते हैं। उनके जीवन के बारे में निश्चित ऐतिहासिक जानकारी बहुत कम उपलब्ध है, इसलिए जन्म-वर्ष आदि के संबंध में स्रोतों में एकरूपता नहीं है। 

ससि औ सूर पवन भरि मेला

संत गुलाल

ससि औ सूर पवन भरि मेला, दृढ़ करि आसन बैठु अकेला।
उलटै नाल गगन घर जावै, बिगसै कँवल चंद दरसावै॥
घंटा रव तहँ बाज निसाना, अनहद धुन सुनियत बिनु काना।
सुत्र असुन्न में डोर बँधाना, उड़े हंस चढ़ि करत पयाना॥
अगम अगोचर अबिगत खेला, प्रान पुरुष तहँ करत है मेला।
मन अरु पवन सहज घर आयो, ऐसो गति संतन मन भायो॥
मेटल सुन्न मिलल परगासा, जन्म-जन्म कै पूजलि आसा।
जन गुलाल सतगुरु बलिहारी, जाति-पाँति अब छुटल हमारी॥

लागो रंग झूठो खेल बनाया

संत गुलाल

लागो रंग झूठो खेल बनाया।
जहँ लगि ताको सबै पसारा, मिथ्या है यह काया॥
मोर तोर छूटत नहिं कबहीं, काम क्रोध अरु माया।
आतम राम नहीं पहिचानत, भोंदू जन्म गँवाया॥
नेम कै आस घरत नर मूढ़हु, चढ़त चरख दिन जाय।
घुमत-घुमत कहिं पार न पावै, का लै आया का लै जाया॥
साध संगति कीन्हे नहिं कबहीं, साहब प्रीति न लाया।
कहैं गुलाल यह अवसर बीते, हाथ कछू नहिं आया॥

सतगुरु संग होरी खेलो

संत गुलाल

सतगुरु संग होरी खेलो अनहद तूर बजाई॥
काया नगर में होरी खेलो प्रेम कै परल धमारो।
पाँच पचीस मिलि चाचरि गावहिं, प्रभुजी की बलिहारी॥
सहज कै फाग पर्यो निस बासर, भरि छूटै पिचुकारी।
नाद बिंदुहिं गाँठि पर्यो जब, परलि परस्पर भारी॥
तारी दै दै भाँवरि नावहिं, एक तैं एक पियारी।
सत्त अधीर उड़ावल कर धरि, काहू कोउ न संभारी॥
अब खेलो मन महा मगन ह्वै, तन लन सर्बस वारी।
कह गुलाल हम प्रभु संग खेलल, पूजलि आस हमारी॥

तुम जात न जान गँवारा हो

संत गुलाल

तुम जात न जान गँवारा हो।
को तुम आहु कहाँ तैं आयो, झूठो करत पसारा हो॥
माटी कै बुंद पिंड कै रचना, ता में प्रान पियारा हो।
लोभ लहरि में मोह को धारा, सिरजनहार बिसारा हो॥
अपने नाह को चीन्हत नाहीं, नेम धरम आचारा हो।
सपनेहुं साहब सुधि नहिं जान्यौ, जम दुत देत पछारा हो॥
उलट्यौ जीव ब्रह्म में मेल्यो, पाँच पचीस धरि मारा हो।
कहैं गुलाल साधु में गनती, मनुवा भइल हमारा हो॥

भाई रे धोखे सब अरुझाना

संत गुलाल

भाई रे धोखे सब अरुझाना।
सब्द सरुप नहीं पहिचाहिं, तीरथ ब्रत लिपटाना॥
कोउ पँच अगिन अधोमुख झूलै, कोऊ तारी लावै।
कोउ जल सैन पवन धुनि लावै, बाँह उठाय सुखावै॥
माला पहिरै तिलक बनावै, काथा गूदर नावै।
मन मुरीद होवै नहिं जब लै, बिरथा भेख बनावै॥
कोऊ जोग जज्ञ तप ठानै, कोऊ गुफा में बासा।
षट दरसन से जाय न पारे, सब को काल गरासा॥
झूँठि आस बिस्वास करत है, सुन्न सदा लिपटाना।
कह गुलाल कोउ कहन न मानै, भरमत फिरत दीवाना॥

प्रभु तुम ऐसे दीन दयाल

संत गुलाल

प्रभु तुम ऐसे दीन दयाल।
हम अस अधम कुटिल चंडाल॥
केतिक अधम कहाँ लगि बरनों करम धरम की जाल।
मोर मोर करत दिन बीतल मारि लेत जम काल॥
अधम होत जो कारज सीझत पगल माय के ख्याल।
सुमति कुमति निसु बासर भोजन सोवत परो बेहाल॥
तुम अस ठाकुर परगट देखत करत सबै प्रतिपाल।
मेरु धरनि जल थल में साहब का जानै वह हाल॥
सुमति सरीरहिं आवत नाहीं ढारत गर में माल।
हिंदू तुरुक मझब में लागो बुद्धि बिखरि गई हाल॥
हम अबला बल कछु नाहीं प्रभु तुम ऐसो लाल।
अब की बार यही बर पावों लिखिये अधम गुलाल॥

अबधू निर्मल ज्ञान बिचारो

संत गुलाल

अबधू निर्मल ज्ञान बिचारो।
ब्रह्म सरूप अखंडित पूरन, चौथे पद सों न्यारो॥
ना वह उपजै ना वह बिनसै, ना भरमै चौरासी।
है सतगुरु सतपुरुष अकेला, अजर अमर अबिनासी॥
ना वाके बाप नहीं वाके माता, वाके मोह न माया।
ना वाके जोग भोग वाके नाहीं, न कहुँ जाय न आया॥
अद्भुत रूप अपार बिराजै, सदा रहे भरपूरा।
कहैं गुलाल सोई जन जानै, जहि मिलै गुरु सूरा॥

जौ पै कोइ प्रेम को गाहक होई

संत गुलाल

जौ पै कोइ प्रेम को गाहक होई।
त्याग करै जो मन कि कामना, सीस दान दै सोई॥
और अमल की दर जो छोड़ै, आपु अपन गति जोई।
हर दम हाज़िर प्रेम पियाला, पुलिक पुलिक रस लेई॥
जीव पीव महँ पीव जीव महँ, बानी बोलत सोई।
सोई सभन महँ हम सबहन महँ, बूझत बिरला कोई॥
वा की गति कहा कोइ जानै, जो जिय साँचा होई।
कह गुलाल वे नाम समाने, मत भूले नर लोई॥

भाई मोहिं यही अचंभो भारी

संत गुलाल

भाई मोहिं यही अचंभो भारी।
तातें कौन पुरुष को नारी॥
मनि परकासित कहिये भुवंगा, सो है कुल अधिकारी।
को पतिबर्ता को अलवंसा, को बिभिचारी बारी॥
कवने नीर कवन जल कहिये, को अमृत को खारी।
को है कूप गंगाजल को है, को है सलिल डबारी॥
को है कीट पतंग कौन है, को नृपति भिखारी।
को ही चिउँटी हस्ति कवन है, को जन्मै को मारी॥
कह गुलाल यह बूझि थको जिव, निरवत को निरवारी।
सतगुरु कृपा संत सरनागति, भवसागर तें उबारीं॥

पहाड़ा

संत गुलाल

एका एक अमल जो पावे, साँचा सतगुरु भावे।
प्रेम पदारथ हिय में राखे, सुमिरत ही सुख पावे॥
दुआ दोष जो दुरमति छोड़े, तिरगुन ताप बहावे।
सुरति निरति लै आसन माँड़े, सकल संतोष जो आवे॥
तिया तिरुकुटी दो मन राखे, झिलिमिलि जोति जगावे।
उनमुनि लागो बंद सहज धुनि, चंद मंडल घर छावे॥
चौथे पद पर पग जो नावे, अनुमी डंक बजावे।
गगन मंडल में बाज़ी माँडो, बंक नाल चलि जावे॥
पंचएँ परम तत्त जो जानो, सुनि भगवत मन लावे।
पाँच पचीस सोनि बसि करि के, सेत छत्र सिर छावे॥
छटएँ छिमा सील जो उपजे, सत्त संतोस चढ़ावे।
नौ दर छोड़ि दसौ दिखि धावे, सहज समाधि जो पावे॥
सतएँ सदा सरल मन राखे, शब्द कै भेष बनावे।
कोटि चंद न्योछावरि वारे, स्रानिक जोति जगावे॥
अठएँ अगम जोति जो बारे, दरस परस चित लावे।
सोहं सब्द सुरत निस बासर, अनतहिं कसहुँ न जावे॥
नौवें नाम निरंजन नौका, कनहरि गुनहिं चलावे।
साँचै गहे झूँठ नहिं आवे, भवसागर तरि जावे॥
दसएँ द्वार कि ताली खोलै, अविगति गतिहिं समावे।
सकल कामना मन हूँ पूरन, मन कै मौज मिलावे॥
एकादस नाम जो पूरन पावे, अगम निगम नहिं भाव।
कह गुलाल तब सतगुरु चीन्हे, घरहीं में घर छावे॥

आयो बसंत मन चकिस मोर

संत गुलाल

आयो बसंत मन चकिस मोर। ठौर-ठौर अति उठै झकोर॥
नाम कली जब लग्यो गात। झर्यो करम तब गिर्यो पात॥
गुरु कै बचन जब फूल्यो फूल। फूल्यो फूल भँवर रस मूल॥
आदि अंत मध एक सूर। दसौ दिस में बजत तूर॥
यह बसंत जो जाने कोय। आवा गवन कबहिं न होय॥
संत सभा महँ बैठु जाय। सहज सुरति धरि काल खाय॥
कह गुलाल मन भयो थीर। सोई फ़ाज़िल है फ़क़ीर॥

आनंद बसंत मन करु धमारि

संत गुलाल

आनंद बसंत मन करु धमारि। मगन भई तहँ पाँच नारि।
सब्द सोहावन ऋतु बसंत। हरि को नाम लिये खेलत संत॥
अष्ट जाम तहँ उठै गुंजार। रुनझुन बाजै भव के पार।
आवै न जाये है रहत थीर। खेलत कोऊ प्रभु फ़क़ीर॥
लोक वेद कै छुटलि आस। साध संगति महँ लियो बास।
कह गुलाल यह जाने कोय। आवा गवन न कबहिं होय॥

आनंद बरखत बुंद सोहावन

संत गुलाल

आनंद बरखत बुंद सोहावन।
उमंगि उमंगि सतगुरु बर राजित समय सोहावन भावन॥
चहूं ओर घन घोरि घटा आयो सुन्न भवन मन भावन।
तिलक तत्त बेंदी पर झलकत जगमग जोति जगावन॥
गुरु के चरन मन मगन भयो जब बिमल बिमल गुन गावन।
कहैं गुलाल प्रभु कृपा जाहि पर हर दम भादों सावन॥

मन राजा खेले होरी

संत गुलाल

मन राजा खेले होरी, अनुभव सत्त अखाड़े।
अनहद घंटा बाजु रैन-दिन, तै में सुरति परो री।
पाँच सखी मिलि चांचरि गावहिं, सुरति सों निरति भरो री॥
काया नगर में होरी खेलो, रबि ससि दोऊ बटोरी।
सुखमन भरि पिचुकारी छूटत, निरझर अगम झरो री॥
जाग्यो फाग परम पद लाग्यो, सतगुरु बचन फरो री।
कह गुलाल हम होरी खेलल, प्रभु सौं दै गँठजोरी॥

गगना गरजि-गरजि मन भावन

संत गुलाल

गगना गरजि-गरजि मन भावन।
धारि सखी चहुँ दिस है गरजत, पछएँ बरसत सावन॥
छिमा सील संतोष सागर भरी, धनि सतगुरु जिन अलच बनावन।
कह गुलाल बरषा भयो पूरन, मारो धर मन रावन॥

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...