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विदाई-संभाषण – बालमुकुंद गुप्त हिंदी निबंध | Vidaaee-sanbhaashan

माई लार्ड! अंत को आपके शासन-काल का इस देश में अंत हो गया। अब आप इस देश से अलग होते हैं। इस संसार में सब बातों का अंत है। इससे आपके शासन-काल का भी अंत होता, चाहे आपकी एक बार की कल्पना के अनुसार आप यहाँ के चिरस्थायी वायसराय भी हो जाते। किंतु इतनी जल्दी वह समय पूरा हो जाएगा, ऐसा विचार न आप ही का था, न इस देश के निवासियों का। इससे जान पड़ता है कि आपके और यहाँ के निवासियों के बीच में कोई तीसरी शक्ति और भी है, जिस पर यहाँ वालों का तो क्या, आपका भी क़ाबू नहीं है।



बिछड़न-समय बड़ा करुणोत्पादक होता है। आपको बिछड़ते देखकर आज हृदय में बड़ा दुःख है। माई लार्ड! आपके दूसरी बार इस देश में आने से भारतवासी किसी प्रकार प्रसन्न न थे। वह यही चाहते थे कि आप फिर न आवें। पर आप आए और उस से यहाँ के लोग बहुत ही दुखित हुए। वे दिन-रात यही मनाते थे कि जल्द श्रीमान् यहाँ से पधारें। पर अहो! आज आपके जाने पर हर्ष की जगह विषाद होता है। इसी से जाना कि बिछड़न-समय बड़ा करुणोत्पादक होता है, बड़ा पवित्र, बड़ा निर्मल और कोमल होता है। वैर-भाव छूटकर शांत रस का आविर्भाव उस समय होता है।



माई लार्ड का देश देखने का इस दीन ब्राह्मण को कभी इस जन्म में सौभाग्य नहीं हुआ। इससे नहीं जानता कि वहाँ बिछड़ने के समय लोगों का क्या भाव होता है। पर इस देश के पशु-पक्षियों को भी बिछड़ने के समय उदास देखा है। एक बार शिवशंभू के दो गायें थीं। उनमें एक अधिक बलवाली थी। वह कभी-कभी अपने सींगों की टक्कर से दूसरी कमज़ोर गाय को गिरा देती थी। एक दिन वह टक्कर मारने वाली गाय पुरोहित को दे दी गई। देखा कि दुर्बल गाय उसके चले जाने से प्रसन्न नहीं हुई, वरंच उस दिन वह भूखी खड़ी रही, चारा छुआ तक नहीं। माई लार्ड! जिस देश के पशुओं की बिछड़ते समय यह दशा होती है, वहाँ के मनुष्यों की कैसी दशा हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है।



आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत में उनको जाना पड़ा। इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है, तथापि आपके शासन-काल का नाटक घोर दुखांत है, और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दर्शक तो क्या, स्वयं सूत्रधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझकर खेलना आरंभ किया था, वह दुखांत हो जावेगा। जिसके आदि में सुख था, मध्य में सीमा से बाहर सुख था, उसका अंत ऐसे घोर दुःख के साथ कैसे हुआ? आह! घमंडी खिलाड़ी समझता है कि दूसरों को अपनी लीला दिखाता हूँ। किंतु पर्दे के पीछे एक और ही लीलामय की लीला हो रही है, यह उसे ख़बर नहीं!



इस बार बंबई1 में उतरकर माई लार्ड! आपने जो जो इरादे ज़ाहिर किए थे, ज़रा देखिए तो उनमें से कौन-कौन पूरे हुए। आपने कहा था कि यहाँ से जाते समय भारतवर्ष को ऐसा कर जाऊँगा कि मेरे बाद आने वाले बड़े लाटों को वर्षो तक कुछ करना न पड़ेगा, वह कितने ही वर्षों सुख की नींद सोते रहेंगे। किंतु बात उल्टी हुई। आपको स्वयं इस बार बेचैनी उठानी पड़ी है और इस देश में जैसी अशांति आप फैला चले हैं, उसके मिटाने में आपके पद पर आने वालों को न जाने कब तक नींद और भूख हराम करनी पड़ेगी। इस बार आपने अपना बिस्तर गर्म राख पर रखा है और भारतवासियों को गर्म तवे पर पानी की बूँदों की भाँति नचाया है। आप स्वयं भी ख़ुश न हो सके और यहाँ की प्रजा को सुखी न होने दिया, इसका लोगों के चित्त पर बड़ा ही दुःख है।



विचारिए तो क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे! अलिफ़ लैला के अलहदीन ने चिराग़ रगड़कर और अबुलहसन ने बग़दाद के ख़लीफ़ा की गद्दी पर आँख खोलकर वह शान न देखी, जो दिल्ली-दरबार में आपने देखी। आपकी और आपकी लेडी की कुर्सी सोने की थी और आपके प्रभु महाराज के छोटे भाई और उनकी पत्नी की चाँदी की। आप दाहिने थे, वह बाएँ, आप प्रथम थे वह दूसरे। इस देश के सब रईसों ने आपको सलाम पहले किया और बादशाह के भाई को पीछे। जुलूस में आपका हाथी सबसे आगे और सबसे ऊँचा था; हौदा, चँवर, छत्र आदि सामान सबसे बढ़-चढ़कर थे। सारांश यह कि ईश्वर और महाराज एडवर्ड के बाद इस देश में आप ही का दरजा था। किंतु अब देखते हैं कि जंगी लाट के मुक़ाबले में आपने पटखनी खाई, सिर के बल नीचे आ रहे! आप के स्वदेश में वही ऊँचे माने गए, आपको साफ़ नीचा देखना पड़ा! पद-त्याग की धमकी से भी ऊँचे न हो सके।



आप बहुत धीर-गंभीर प्रसिद्ध थे। उस सारी धीरता-गंभीरता का आपने इस बार कौंसिल में बेक़ानूनी क़ानून पास करते और कनवोकेशन में वक्तृता देते समय दीवाला निकाल दिया। यह दीवाला तो इस देश में हुआ। उधर विलायत में आपके बार-बार इस्तीफ़ा देने की धमकी ने प्रकाश कर दिया कि जड़ हिल गई है। अंत में वहाँ भी आपको दिवालिया होना पड़ा और धीरता-गंभीरता के साथ दृढ़ता को भी तिलांजलि देनी पड़ी। इस देश के हाकिम आपकी ताल पर नाचते थे, राजा-महाराजा डोरी हिलाने से सामने हाथ बाँधे हाज़िर होते थे। आपके एक इशारे में प्रलय होती थी। कितने ही राजों को मट्टी के खिलौने की भाँति आपने तोड़-फोड़ डाला। कितने ही मट्टी-काठ के खिलौने आपकी कृपा के जादू से बड़े-बड़े पदाधिकारी बन गए। आपके एक इशारे में इस देश की शिक्षा पायमाल हो गई, स्वाधीनता उड़ गई। बंग देश के सिर पर आरह रखा गया। आह, इतने बड़े माई लार्ड का यह दरजा हुआ कि एक फ़ौजी अफ़सर उनके इच्छित पद पर नियत न हो सका और उनको उसी ग़ुस्से के मारे इस्तीफ़ा दाख़िल करना पड़ा, वह भी मंज़ूर हो गया। उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा गया, उल्टा उन्हीं के निकल जाने का हुक्म मिला!



जिस प्रकार आपका बहुत ऊँचे चढ़कर गिरना यहाँ के निवासियों को दुखित कर रहा है, गिरकर पड़ा रहना उससे भी अधिक दुखित करता है। आपका पद छूट गया तथापि आपका पीछा नहीं छूटा है। एक अदना क्लर्क जिसे नौकरी छोड़ने के लिए एक महीने का नोटिस मिल गया हो नोटिस की अवधि को बड़ी घृणा से काटता है। आपको इस समय अपने पद पर रहना कहाँ तक पसंद है—यह आप ही जानते होंगे। अपनी दशा पर आपको कैसी घृणा आती है, इस बात के जान लेने का इन देशवासियों को अवसर नहीं मिला, पर पतन के पीछे इतनी उलझन में पड़ते उन्होंने किसी को नहीं देखा।



माई लार्ड, एक बार अपने कामों की ओर ध्यान दीजिए। आप किस काम को आए थे और क्या कर चले। शासक-प्रजा के प्रति कुछ तो कर्तव्य होता है, यह बात आप निश्चय मानते होंगे। सो कृपा करके बतलाइए, क्या कर्तव्य आप इस देश की प्रजा के साथ पालन कर चले! क्या आँख बंद करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है? क्या प्रजा की बात पर कभी कान न देना और उसको दबाकर उसकी मर्ज़ी के विरुद्ध ज़िद्द से सब काम किए चले जाना ही शासन कहलाता है? एक काम हो ऐसा बतलाइए, जिसमें आपने ज़िद्द छोड़कर प्रजा की बात पर ध्यान दिया हो। कैसर2 और ज़ार3 भी घेरने-घोटने से प्रजा की बात सुन लेते हैं पर आप एक मौक़ा तो ऐसा बताइए जिसमें किसी अनुरोध या प्रार्थना सुनने के लिए प्रजा के लोगों को आपने अपने निकट फटकने दिया हो और उनकी बात सुनी हो। नादिरशाह4 ने जब दिल्ली में क़तलेआम किया तो आसिफ़ज़ाह के तलवार गले में डालकर प्रार्थना करने पर उसने क़तलेआम उसी दम रोक दिया। पर आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्रार्थना पर आपने ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। इस समय आपकी शासन-अवधि पूरी हो गई है तथापि बंग-विच्छेद किए बिना घर जाना आपको पसंद नहीं है! नादिर से भी बढ़कर आपकी ज़िद्द है। क्या आप समझते हैं कि आपकी ज़िद्द से प्रजा के जी में दुःख नहीं होता? आप विचारिए तो एक आदमी को आपके कहने पर पद न देने से आप नौकरी छोड़े जाते हैं, इस देश की प्रजा को भी यदि कहीं जाने की जगह होती, तो क्या वह नाराज़ होकर इस देश को छोड़ न जाती?



यहाँ की प्रजा ने आपकी ज़िद्द का फल यहीं देख लिया। उसने देखा लिया कि आपकी जिस ज़िद्द ने इस देश की प्रजा को पीड़ित किया, आपको भी उसने कम पीड़ा न दी, यहाँ तक कि आप स्वयं उसका शिकार हुए। यहाँ की प्रजा वह प्रजा है, जो अपने दुःख और कष्टों की अपेक्षा परिणाम का अधिक ध्यान रखती है। वह जानती है कि संसार में सब चीज़ों का अंत है। दुःख का समय भी एक दिन निकल जावेगा, इसी से सब दुःखों को झेलकर, पराधीनता सहकर भी वह जीती है। माई लार्ड! इस कृतज्ञता की भूमि की महिमा आपने कुछ न समझी और न यहाँ की दीन प्रजा की श्रद्धा-भक्ति अपने साथ ले जा सके, इसका बड़ा दुःख है।



इस देश के शिक्षितों को तो देखने की आपकी आँखों को ताब नहीं। अनपढ़-गूँगी प्रजा का नाम कभी-कभी आपके मुँह से निकल जाया करता है। उसी अनपढ़ प्रजा में नर सुलतान नाम के एक राजकुमार का गीत गाया जाता है। एक बार अपनी विपद के कई साल सुलतान ने नरवरगढ़ नाम के एक स्थान में काटे थे। वहाँ चौकीदारी से लेकर उसे एक ऊँचे पद तक काम करना पड़ा था। जिस दिन घोड़े पर सवार होकर वह उस नगर से विदा हुआ, नगर-द्वार से बाहर आकर उस नगर को जिस रीति से उसने अभिवादन किया था, वह सुनिए। उसने आँखों में आँसू भरकर कहा, प्यारे नरवरगढ़! मेरा प्रणाम ले, आज मैं तुझसे जुदा होता हूँ। तू मेरा अन्नदाता है। अपनी विपद के दिन मैंने तुझमें काटे हैं। तेरे ऋण का बदला मैं ग़रीब सिपाही नहीं दे सकता। भाई नरवरगढ़! यदि मैंने जानबूझकर एक दिन भी अपनी सेवा में चूक की हो, यहाँ की प्रजा की शुभ चिंता न की हो, यहाँ की स्त्रियों को माता और बहन की दृष्टि से न देखा हो तो मेरा प्रणाम न ले, नहीं तो प्रसन्न होकर एक बार मेरा प्रणाम ले और मुझे जाने की आज्ञा दे!'' माई लार्ड! जिस प्रजा में ऐसे राजकुमार का गीत गाया जाता है, उसके देश से क्या आप भी चलते समय कुछ संभाषण करेंगे? क्या आप कह सकेंगे, अभागे भारत! मैंने तुझसे सब प्रकार का लाभ उठाया और तेरी बदौलत वह शान देखी, जो इस जीवन में असंभव है। तूने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा; पर मैंने तेरे बिगाड़ने में कुछ कमी न की। संसार के सबसे पुराने देश! जब तक मेरे हाथ में शक्ति थी, तेरी भलाई की इच्छा मेरे जी में न थी। अब कुछ शक्ति नहीं है, जो तेरे लिए कुछ कर सकूँ। पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे। मेरे बाद आने वाले तेरे गौरव को समझें।'' आप कर सकते हैं और यह देश आपकी पिछली सब बातें भूल सकता है, पर इतनी उदारता माई लार्ड में कहाँ?

विदाई-संभाषण – बालमुकुंद गुप्त हिंदी निबंध | Vidaaee-sanbhaashan

माई लार्ड! अंत को आपके शासन-काल का इस देश में अंत हो गया। अब आप इस देश से अलग होते हैं। इस संसार में सब बातों का अंत है। इससे आपके शासन-काल का भी अंत होता, चाहे आपकी एक बार की कल्पना के अनुसार आप यहाँ के चिरस्थायी वायसराय भी हो जाते। किंतु इतनी जल्दी वह समय पूरा हो जाएगा, ऐसा विचार न आप ही का था, न इस देश के निवासियों का। इससे जान पड़ता है कि आपके और यहाँ के निवासियों के बीच में कोई तीसरी शक्ति और भी है, जिस पर यहाँ वालों का तो क्या, आपका भी क़ाबू नहीं है।



बिछड़न-समय बड़ा करुणोत्पादक होता है। आपको बिछड़ते देखकर आज हृदय में बड़ा दुःख है। माई लार्ड! आपके दूसरी बार इस देश में आने से भारतवासी किसी प्रकार प्रसन्न न थे। वह यही चाहते थे कि आप फिर न आवें। पर आप आए और उस से यहाँ के लोग बहुत ही दुखित हुए। वे दिन-रात यही मनाते थे कि जल्द श्रीमान् यहाँ से पधारें। पर अहो! आज आपके जाने पर हर्ष की जगह विषाद होता है। इसी से जाना कि बिछड़न-समय बड़ा करुणोत्पादक होता है, बड़ा पवित्र, बड़ा निर्मल और कोमल होता है। वैर-भाव छूटकर शांत रस का आविर्भाव उस समय होता है।



माई लार्ड का देश देखने का इस दीन ब्राह्मण को कभी इस जन्म में सौभाग्य नहीं हुआ। इससे नहीं जानता कि वहाँ बिछड़ने के समय लोगों का क्या भाव होता है। पर इस देश के पशु-पक्षियों को भी बिछड़ने के समय उदास देखा है। एक बार शिवशंभू के दो गायें थीं। उनमें एक अधिक बलवाली थी। वह कभी-कभी अपने सींगों की टक्कर से दूसरी कमज़ोर गाय को गिरा देती थी। एक दिन वह टक्कर मारने वाली गाय पुरोहित को दे दी गई। देखा कि दुर्बल गाय उसके चले जाने से प्रसन्न नहीं हुई, वरंच उस दिन वह भूखी खड़ी रही, चारा छुआ तक नहीं। माई लार्ड! जिस देश के पशुओं की बिछड़ते समय यह दशा होती है, वहाँ के मनुष्यों की कैसी दशा हो सकती है, इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं है।



आगे भी इस देश में जो प्रधान शासक आए, अंत में उनको जाना पड़ा। इससे आपका जाना भी परंपरा की चाल से कुछ अलग नहीं है, तथापि आपके शासन-काल का नाटक घोर दुखांत है, और अधिक आश्चर्य की बात यह है कि दर्शक तो क्या, स्वयं सूत्रधार भी नहीं जानता था कि उसने जो खेल सुखांत समझकर खेलना आरंभ किया था, वह दुखांत हो जावेगा। जिसके आदि में सुख था, मध्य में सीमा से बाहर सुख था, उसका अंत ऐसे घोर दुःख के साथ कैसे हुआ? आह! घमंडी खिलाड़ी समझता है कि दूसरों को अपनी लीला दिखाता हूँ। किंतु पर्दे के पीछे एक और ही लीलामय की लीला हो रही है, यह उसे ख़बर नहीं!



इस बार बंबई1 में उतरकर माई लार्ड! आपने जो जो इरादे ज़ाहिर किए थे, ज़रा देखिए तो उनमें से कौन-कौन पूरे हुए। आपने कहा था कि यहाँ से जाते समय भारतवर्ष को ऐसा कर जाऊँगा कि मेरे बाद आने वाले बड़े लाटों को वर्षो तक कुछ करना न पड़ेगा, वह कितने ही वर्षों सुख की नींद सोते रहेंगे। किंतु बात उल्टी हुई। आपको स्वयं इस बार बेचैनी उठानी पड़ी है और इस देश में जैसी अशांति आप फैला चले हैं, उसके मिटाने में आपके पद पर आने वालों को न जाने कब तक नींद और भूख हराम करनी पड़ेगी। इस बार आपने अपना बिस्तर गर्म राख पर रखा है और भारतवासियों को गर्म तवे पर पानी की बूँदों की भाँति नचाया है। आप स्वयं भी ख़ुश न हो सके और यहाँ की प्रजा को सुखी न होने दिया, इसका लोगों के चित्त पर बड़ा ही दुःख है।



विचारिए तो क्या शान आपकी इस देश में थी और अब क्या हो गई! कितने ऊँचे होकर आप कितने नीचे गिरे! अलिफ़ लैला के अलहदीन ने चिराग़ रगड़कर और अबुलहसन ने बग़दाद के ख़लीफ़ा की गद्दी पर आँख खोलकर वह शान न देखी, जो दिल्ली-दरबार में आपने देखी। आपकी और आपकी लेडी की कुर्सी सोने की थी और आपके प्रभु महाराज के छोटे भाई और उनकी पत्नी की चाँदी की। आप दाहिने थे, वह बाएँ, आप प्रथम थे वह दूसरे। इस देश के सब रईसों ने आपको सलाम पहले किया और बादशाह के भाई को पीछे। जुलूस में आपका हाथी सबसे आगे और सबसे ऊँचा था; हौदा, चँवर, छत्र आदि सामान सबसे बढ़-चढ़कर थे। सारांश यह कि ईश्वर और महाराज एडवर्ड के बाद इस देश में आप ही का दरजा था। किंतु अब देखते हैं कि जंगी लाट के मुक़ाबले में आपने पटखनी खाई, सिर के बल नीचे आ रहे! आप के स्वदेश में वही ऊँचे माने गए, आपको साफ़ नीचा देखना पड़ा! पद-त्याग की धमकी से भी ऊँचे न हो सके।



आप बहुत धीर-गंभीर प्रसिद्ध थे। उस सारी धीरता-गंभीरता का आपने इस बार कौंसिल में बेक़ानूनी क़ानून पास करते और कनवोकेशन में वक्तृता देते समय दीवाला निकाल दिया। यह दीवाला तो इस देश में हुआ। उधर विलायत में आपके बार-बार इस्तीफ़ा देने की धमकी ने प्रकाश कर दिया कि जड़ हिल गई है। अंत में वहाँ भी आपको दिवालिया होना पड़ा और धीरता-गंभीरता के साथ दृढ़ता को भी तिलांजलि देनी पड़ी। इस देश के हाकिम आपकी ताल पर नाचते थे, राजा-महाराजा डोरी हिलाने से सामने हाथ बाँधे हाज़िर होते थे। आपके एक इशारे में प्रलय होती थी। कितने ही राजों को मट्टी के खिलौने की भाँति आपने तोड़-फोड़ डाला। कितने ही मट्टी-काठ के खिलौने आपकी कृपा के जादू से बड़े-बड़े पदाधिकारी बन गए। आपके एक इशारे में इस देश की शिक्षा पायमाल हो गई, स्वाधीनता उड़ गई। बंग देश के सिर पर आरह रखा गया। आह, इतने बड़े माई लार्ड का यह दरजा हुआ कि एक फ़ौजी अफ़सर उनके इच्छित पद पर नियत न हो सका और उनको उसी ग़ुस्से के मारे इस्तीफ़ा दाख़िल करना पड़ा, वह भी मंज़ूर हो गया। उनका रखाया एक आदमी नौकर न रखा गया, उल्टा उन्हीं के निकल जाने का हुक्म मिला!



जिस प्रकार आपका बहुत ऊँचे चढ़कर गिरना यहाँ के निवासियों को दुखित कर रहा है, गिरकर पड़ा रहना उससे भी अधिक दुखित करता है। आपका पद छूट गया तथापि आपका पीछा नहीं छूटा है। एक अदना क्लर्क जिसे नौकरी छोड़ने के लिए एक महीने का नोटिस मिल गया हो नोटिस की अवधि को बड़ी घृणा से काटता है। आपको इस समय अपने पद पर रहना कहाँ तक पसंद है—यह आप ही जानते होंगे। अपनी दशा पर आपको कैसी घृणा आती है, इस बात के जान लेने का इन देशवासियों को अवसर नहीं मिला, पर पतन के पीछे इतनी उलझन में पड़ते उन्होंने किसी को नहीं देखा।



माई लार्ड, एक बार अपने कामों की ओर ध्यान दीजिए। आप किस काम को आए थे और क्या कर चले। शासक-प्रजा के प्रति कुछ तो कर्तव्य होता है, यह बात आप निश्चय मानते होंगे। सो कृपा करके बतलाइए, क्या कर्तव्य आप इस देश की प्रजा के साथ पालन कर चले! क्या आँख बंद करके मनमाने हुक्म चलाना और किसी की कुछ न सुनने का नाम ही शासन है? क्या प्रजा की बात पर कभी कान न देना और उसको दबाकर उसकी मर्ज़ी के विरुद्ध ज़िद्द से सब काम किए चले जाना ही शासन कहलाता है? एक काम हो ऐसा बतलाइए, जिसमें आपने ज़िद्द छोड़कर प्रजा की बात पर ध्यान दिया हो। कैसर2 और ज़ार3 भी घेरने-घोटने से प्रजा की बात सुन लेते हैं पर आप एक मौक़ा तो ऐसा बताइए जिसमें किसी अनुरोध या प्रार्थना सुनने के लिए प्रजा के लोगों को आपने अपने निकट फटकने दिया हो और उनकी बात सुनी हो। नादिरशाह4 ने जब दिल्ली में क़तलेआम किया तो आसिफ़ज़ाह के तलवार गले में डालकर प्रार्थना करने पर उसने क़तलेआम उसी दम रोक दिया। पर आठ करोड़ प्रजा के गिड़गिड़ाकर विच्छेद न करने की प्रार्थना पर आपने ज़रा भी ध्यान नहीं दिया। इस समय आपकी शासन-अवधि पूरी हो गई है तथापि बंग-विच्छेद किए बिना घर जाना आपको पसंद नहीं है! नादिर से भी बढ़कर आपकी ज़िद्द है। क्या आप समझते हैं कि आपकी ज़िद्द से प्रजा के जी में दुःख नहीं होता? आप विचारिए तो एक आदमी को आपके कहने पर पद न देने से आप नौकरी छोड़े जाते हैं, इस देश की प्रजा को भी यदि कहीं जाने की जगह होती, तो क्या वह नाराज़ होकर इस देश को छोड़ न जाती?



यहाँ की प्रजा ने आपकी ज़िद्द का फल यहीं देख लिया। उसने देखा लिया कि आपकी जिस ज़िद्द ने इस देश की प्रजा को पीड़ित किया, आपको भी उसने कम पीड़ा न दी, यहाँ तक कि आप स्वयं उसका शिकार हुए। यहाँ की प्रजा वह प्रजा है, जो अपने दुःख और कष्टों की अपेक्षा परिणाम का अधिक ध्यान रखती है। वह जानती है कि संसार में सब चीज़ों का अंत है। दुःख का समय भी एक दिन निकल जावेगा, इसी से सब दुःखों को झेलकर, पराधीनता सहकर भी वह जीती है। माई लार्ड! इस कृतज्ञता की भूमि की महिमा आपने कुछ न समझी और न यहाँ की दीन प्रजा की श्रद्धा-भक्ति अपने साथ ले जा सके, इसका बड़ा दुःख है।



इस देश के शिक्षितों को तो देखने की आपकी आँखों को ताब नहीं। अनपढ़-गूँगी प्रजा का नाम कभी-कभी आपके मुँह से निकल जाया करता है। उसी अनपढ़ प्रजा में नर सुलतान नाम के एक राजकुमार का गीत गाया जाता है। एक बार अपनी विपद के कई साल सुलतान ने नरवरगढ़ नाम के एक स्थान में काटे थे। वहाँ चौकीदारी से लेकर उसे एक ऊँचे पद तक काम करना पड़ा था। जिस दिन घोड़े पर सवार होकर वह उस नगर से विदा हुआ, नगर-द्वार से बाहर आकर उस नगर को जिस रीति से उसने अभिवादन किया था, वह सुनिए। उसने आँखों में आँसू भरकर कहा, प्यारे नरवरगढ़! मेरा प्रणाम ले, आज मैं तुझसे जुदा होता हूँ। तू मेरा अन्नदाता है। अपनी विपद के दिन मैंने तुझमें काटे हैं। तेरे ऋण का बदला मैं ग़रीब सिपाही नहीं दे सकता। भाई नरवरगढ़! यदि मैंने जानबूझकर एक दिन भी अपनी सेवा में चूक की हो, यहाँ की प्रजा की शुभ चिंता न की हो, यहाँ की स्त्रियों को माता और बहन की दृष्टि से न देखा हो तो मेरा प्रणाम न ले, नहीं तो प्रसन्न होकर एक बार मेरा प्रणाम ले और मुझे जाने की आज्ञा दे!'' माई लार्ड! जिस प्रजा में ऐसे राजकुमार का गीत गाया जाता है, उसके देश से क्या आप भी चलते समय कुछ संभाषण करेंगे? क्या आप कह सकेंगे, अभागे भारत! मैंने तुझसे सब प्रकार का लाभ उठाया और तेरी बदौलत वह शान देखी, जो इस जीवन में असंभव है। तूने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा; पर मैंने तेरे बिगाड़ने में कुछ कमी न की। संसार के सबसे पुराने देश! जब तक मेरे हाथ में शक्ति थी, तेरी भलाई की इच्छा मेरे जी में न थी। अब कुछ शक्ति नहीं है, जो तेरे लिए कुछ कर सकूँ। पर आशीर्वाद करता हूँ कि तू फिर उठे और अपने प्राचीन गौरव और यश को फिर से लाभ करे। मेरे बाद आने वाले तेरे गौरव को समझें।'' आप कर सकते हैं और यह देश आपकी पिछली सब बातें भूल सकता है, पर इतनी उदारता माई लार्ड में कहाँ?

बातचीत – बालकृष्ण भट्ट हिंदी निबंध | Baatacheet

इसे तो सभी स्वीकार करेंगे कि अनेक प्रकार की शक्तियों में, जो वरदान की भाँति ईश्वर ने मनुष्यों को दी हैं, वाक्शक्ति भी एक है। यदि मनुष्य की और इंद्रियाँ अपनी-अपनी शक्तियों से अविकल रहती और वाक्शक्ति उसमें न होती तो हम नहीं जानते कि इस गूँगी सृष्टि का क्या हाल होता। सब लोग लुंज-पुंज से हो मानों कोने में बैठा दिए गए होते और जो कुछ सुख-दुःख का अनुभव हम अपनी दूसरी इंद्रियों के द्वारा करते उसे अवाक् होने के कारण आपस में एक दूसरे से कुछ न कह सुन सकते। इस वाक्शक्ति के अनेक फ़ायदों मे ‘स्पीच’ (वक्तृता) और बातचीत दोनों है। किंतु स्पीच से बातचीत का कुछ ढंग ही निराला है। बातचीत में वक्ता को नाज-नखरा ज़ाहिर करने का मौका नहीं दिया जाता कि वह एक बड़े अंदाज़ से गिन-गिनकर पाँव रखता हुआ पुलपिट पर जा खड़ा हो और पुण्यवाचन या नांदीपाठ की भाँति घड़ियों तक साहबान मजलिस, चेयरमैन, लेडीज़ एंड जेंटिलमेन की बहुत सी स्तुति कर कराय तब किसी तरह वक्तृता का प्रारंभ करे। जहाँ कोई मर्म या नोक की चुटीली बात वक्ता महाशय के मुख से निकली कि तालि-ध्वनि से कमरा गूँज उठा। इसलिए वक्ता को ख़ामख़ाह ढूँढ़कर कोई ऐसा मौका अपनी वक्तृता में लाना ही पड़ता है जिसमे करतलध्वनि अवश्य हो।



वहीं हमारी साधारण बातचीत का कुछ ऐसा घरेलू ढंग है कि उसमें न करतलध्वनि का कोई मौका है न लोगों को कहकहे उड़ाने की काई बात उसमें रहती है। हम-तुम दो आदमी प्रेमपूर्वक संलाप कर रहे हैं। कोई चुटीली बात आ गई, हँस पड़े तो मुसकराहट से होंठो का केवल फ़रक उठना ही इस हँसी की अंतिम सीमा है। स्पीच का उद्देश्य अपने सुननेवालों के मन में जोश और उत्साह पैदा कर देना है। घरेलू बातचीत मन रमाने का एक ढंग है। इसमें स्पीच की वह सब संजीदगी बेक़द्र हो धक्के खाती फिरती है।



जहाँ आदमी को अपनी ज़िंदगी मज़ेदार बनाने के लिए खाने, पीने, चलने, फिरने आदि की ज़रूरत है, वहाँ बातचीत की भी हमको अत्यंत आवश्यकता है। जो कुछ मवाद या धुवाँ जमा रहता है वह बातचीत के जरिए भाव बन बाहर निकल पड़ता है। चित्त हलका और स्वच्छ हो, परम आनंद में मग्न हो जाता है। बातचीत का भी एक ख़ास तरह का मज़ा होता है। जिनको बातचीत करने की लत पड़ जाती है, वे इसके पीछे खाना-पीना भी छोड़ देते हैं। अपना बड़ा हर्ज कर देना उन्हें पसंद आता है पर बातचीत का मज़ा नहीं खोया चाहते। राबिंसन क्रूसो का क़िस्सा बहुधा लोगों ने पढ़ा होगा जिसे सोलह वर्ष तक मनुष्य का मुख देखने को भी नहीं मिला। कुत्ता, बिल्ली आदि जानवरो के बीच में रह सोलह वर्ष के उपरांत उसने फ्राइडे के मुख से एक बात सुनी। यद्यपि इसने अपनी जंगली बोली में कहा था पर उस समय राबिंसन को ऐसा आनंद हुआ मानो इसने नए सिरे से फिरके आदमी का चोला पाया। इससे सिद्ध होता है कि मनुष्य की वाक्-शक्ति में कहाँ तक लुभा लेने की ताकत है। जिनसे केवल पत्र-व्यवहार है, कभी एक बार भी साक्षात्कार नहीं हुआ उन्हें अपने प्रेमी से कितनी लालसा बात करने की रहती है। अपना आभ्यंतरिक भाव दूसरे को प्रकट करना और उसका आशय आप ग्रहण कर लेना केवल शब्दों ही के द्वारा हो सकता है। सच है—



तावञ्च शोभते मूर्यो यावकिचिन्न भाषते



बेन जानसन का यह कहना, कि बोलने ही से मनुष्य रूप का साक्षात्कार होता है, बहुत ही उचित बोध होता है। इस बातचीत की सीमा दो से लेकर वहाँ तक रखी जा सकती है जितनों की जमात मीटिंग या सभा न समझ ली जाए। एडिसन का मत है कि असल बातचीत सिर्फ़ दो में हो सकती है. जिसका तात्पर्य यह हुआ कि जब दो आदमी होते हैं तभी अपना दिल एक दूसरे के सामने खोलते हैं। जब तीन हुए तब वह दो की बात कोसों दूर गई। कहा है—



“पटको भिद्यते मंत्र:”



दूसरे यह कि किसी तीसरे आदमी के आ जाते ही या तो वे दोनों हिजाब में आ अपनी बातचीत से निरस्त हो बैठेंगे या उसे निपट मूर्ख और अज्ञानी समझ बनाने लगेंगे। इसी से



द्वाभ्यां तृतीयो न भवामि राजन



लिखा है। जैसे गरम दूध और ठंडे पानी के दो बरतन पास सटा के रखे जाएँ तो एक का असर दूसरे में पहुँचता है अर्थात् दूध ठंडा हो जाता है और पानी गरम, वैसे ही दो आदमी पास बैठे हों तो एक का गुप्त असर दूसरे पर पहुँच जाता है, चाहे एक दूसरे को देखे भी नहीं। तब बोलने की कौन कहे। पर एक का दूसरे पर असर होना शुरू हो जाता है। एक के शरीर की विद्युत दूसरे में प्रवेश करने लगती है। जब पास बैठने का इतना असर होता है तब बातचीत में कितना अधिक असर होगा इसे कौन न स्वीकार करेगा। अस्तु, अब इस बात को तीन आदमियों के समय में देखना चाहिए। मानों एक से त्रिकोण-सा बन जाता है। तीनों का चित्त मानों तीन कोण हैं और तीनों की मनोवृत्ति के प्रसरण की धारा मानों उस त्रिकोण की तीन रेखाएँ हैं। गुपचुप असर तो उन तीनों में परस्पर होता ही है। जो बातचीत तीनों मे की गई वह मानों अँगूठी में नग सी जड़ जाती है, उपरांत जब चार आदमी हुए तब बेतकल्लुफी को बिल्कुल स्थान नहीं रहता। खुल के बातें न होंगी। जो कुछ बातचीत की जाएँगी वह ‘फार्मेलिटी’ गौरव और संजीदगी के लच्छे में सनी हुई। चार से अधिक की बातचीत तो केवल रामरमौवल कहलावेगी। उसे हम संलाप नहीं कह सकते। इस बातचीत के अनेक भेद हैं। दो बुड्ढों की बातचीत प्रायः जमाने की शिकायत पर हुआ करती है। बाबा आदम के समय का ऐसा दास्तान शुरू करते हैं जिसमे चार सच तो दस झूठ। एक बार उनकी बातचीत का घोड़ा छूट जाना चाहिए, पहरों बीत जाने पर भी अंत न होगा। प्रायः अँग्रेज़ी राज्य, प्रदेश और पुराने समय को बुरी से बुरी रीति-नीति का अनुमोदन और इस समय के सब भाँति लायक नौजवानो की निंदा उनकी बातचीत का मुख्य प्रकरण होगा। पढ़े-लिखे हुए तो शेक्सपियर, मिल्टन, मिल और स्पेंसर उनकी जीभ के आगे नाचा करेंगे। अपनी लियाक़त के नशे में चूर-चूर ‘हमचुनी दीगरेनेस्त’। अक्खड़ कुश्तीबाज हुए तो अपनी पहलवानी और अपने अक्खड़पन की चर्चा छेड़ेंगे। आशिकतन हुए तो अपनी-अपनी प्रेमपात्री की प्रशंसा तथा आशिकतन बनने की हिमाकत की डींग मारेंगे। दो ज्ञात-यौवना हम-सहेलियों की बातचीत का कुछ जायका ही निराला है। रस का समुद्र मानों उमड़ा चला आ रहा है। इसका पूरा स्वाद उन्हीं से पूछना चाहिए जिन्हें ऐसों की रससनी बातें सुनने को कभी भाग्य लड़ा है। ऊर्द्धजरती बुढ़ियों की बातचीत का मुख्य प्रकरण, बहू-बेटीवाली हुई तो, अपनी बहुओं या बेटों का गिला-शिकवा होगा या बिरादराने का कोई ऐसा रामरसरा छेड़ बैठेंगी कि बात करते-करते अंत में खोढ़े दाँत निकाल लड़ने लगेंगी। लड़कों की बातचीत, खिलाड़ी हुए तो अपनी-अपनी आवारगी की तारीफ़ करने के बाद कोई ऐसी सलाह गाँठेंगे जिसमें उनको-अपनी शैतानी ज़ाहिर करने का पूरा मौका मिले। स्कूल के लड़कों की बातचीत का उद्देश्य अपने उस्ताद की शिकायत या तारीफ़ या अपने सहपाठियों में किसी के गुण का कथोपकथन होता है। पढ़ने में तेज़ हुआ तो कभी अपने मुकाबले दूसरे को फौकौयत न देगा। सुस्त और बोदा हुआ तो दबी बिल्ली का-सा स्कूल भर को अपना गुरु ही मानेगा।



अलावा इसके बातचीत की और बहुत सी किस्में हैं। राजकाज की बात, व्यापार-संबंधी बातचीत, दो मित्रों में प्रेमालाप इत्यादि। हमारे देश में नीच जाति के लोगों में बतकही होती है। लड़की लड़केवाले की ओर से एक-एक आदमी बिचवई होकर दोनों के विवाह-संबंध की कुछ बातचीत करते हैं। उस दिन से बिरादरीवालों को ज़ाहिर कर दिया जाता है कि अमुक की लड़की का अमुक के लड़के के साथ विवाह पक्का हो गया और यह रस्म बड़े उत्सव के साथ की जाती है। एक चंडूखाने की बातचीत होती है, इत्यादि सब बात करने के अनेक प्रकार और ढंग है।



यूरोप के लोगों में बात करने का हुनर है। ‘आर्ट आफ कनवरसेशन’ यहाँ तक बढ़ा है कि स्पीच और लेख दोनों इसे नहीं पाते। इसकी पूर्ण शोभा काव्य-कला-प्रवीण विद्वन्मंडली में है। ऐसे-ऐसे चतुराई के प्रसंग छेड़े जाते हैं कि जिन्हें सुन कान को अत्यंत सुख मिलता है। सुहृद-गोष्ठी इसी का नाम है। सुहृद-गोष्ठी की बातचीत की यह तारीफ़ है कि बात करनेवालों की लियाक़त अथवा पांडित्य का अभिमान या कपट कहीं एक बात में न प्रकट हो, वरन् जितने क्रम रसाभास पैदा करनेवाले सभी को बरतते हुए चतुर सयाने अपनी बातचीत को अक्रम रखते हैं वह हमारे आधुनिक शुष्क पंडितों की बातचीत में जिसे शास्त्रार्थ कहते हैं, कभी आवेगा ही नहीं। मुर्ग और बटेर की लड़ाइयों की झपटा-झपटी के समान जिनकी नीरस काँव-काँव में सरस संलाप की तो चर्चा ही चलाना व्यर्थ है, वरन कपट और एक दूसरे को अपने पांडित्य के प्रकाश से बाद में परास्त करने का संघर्ष आदि रसाभास की सामग्री वहाँ बहुतायत के साथ आपको मिलेगी। घंटे भर तक काँव-काँव करते रहेंगे तो कुछ न होगा। बड़ी-बड़ी कंपनी और कारखानें आदि बड़े से बड़े काम इसी तरह पहले दो-चार दिली दोस्तों की बातचीत ही से शुरू किए गए। उपरांत बढ़ते-बढ़ते यहाँ तक बढ़े कि हज़ारों मनुष्यों को उससे जीविका और लाखों की साल में आमदनी उसमें है। पचीस वर्ष के ऊपरवालों की बातचीत अवश्य ही कुछ न कुछ सारगर्भित होगी, अनुभव और दूरंदेशी से ख़ाली न होगी और पचास से नीचे की बातचीत में यद्यपि अनुभव, दूरदर्शिता ओर गौरव नहीं पाया जाता पर इसमें एक प्रकार का ऐसा दिल बहलाव और ताजगी रहती है जिसकी मिठास उससे दसगुना अधिक चढ़ी-बढ़ी है। यहाँ तक हमने बाहरी बातचीत का हाल लिखा जिसमें दूसरे फ़रीक़ के होने की बहुत आवश्यकता है, बिना किसी दूसरे मनुष्य के हुए जो किसी तरह संभव नहीं है और जो दो ही तरह पर हो सकती है या तो कोई हमारे यहाँ कृपा करे या हमीं जाकर दूसरे को सरफ़राज करे। पर यह सब तो दुनियादारी है जिसमें कभी-कभी रसाभास होते देर नहीं लगती, क्योंकि जो महाशय अपने यहाँ पधारें उनकी पूरी दिलजोई न हो सकी तो शिष्टाचार में त्रुटि हुई। अगर हमीं उनके यहाँ गए तो पहले तो बिना बुलाए जाना ही अनादर का मूल है और जाने पर अपने मन माफ़िफ़ बर्ताव न किया गया तो मानों एक-दूसरे प्रकार का नया धाव हुआ। इसलिए सबसे उत्तम प्रकार बातचीत करने का हम यही समझते हैं कि हम वह शक्ति अपने में पैदा कर सकें कि अपने आप बात कर लिया करें। हमारी भीतरी मनोवृत्ति जो प्रतिक्षण नए-नए रंग दिखाया करती है और जो वह प्रपंचात्मक संसार का एक बड़ा भारी आइना है, जिसमें जैसी चाहो वैसी सूरत देख लेना कुछ दुर्घट बात नहीं है और जो एक ऐसा चमनिस्तान है जिसमें हर क़िस्म के बेलबूटे खिले हुए हैं। इस चमनिस्तान की सैर में क्या कम दिलबहलाव है? मित्रों का प्रेमालाप कभी इसकी सोलहवीं कला तक भी नहीं पहुँच सका। इसी सैर का नाम ध्यान या मनोयोग या चित्त को एकाग्र करना है जिसका साधन एक-दो दिन का काम नहीं, सालहासाल के अभ्यास के उपरांत यदि हम थोड़ा भी अपनी मनोवृत्ति स्थिर कर अजान हो अपने मन के साथ बातचीत कर सकें तो मानों अतिभाग्य। एक वाक्शक्ति मात्र के दमन से न जानिए कितने प्रकार का दमन हो गया। हमारी जिह्वा जो कतरनी के समान सदा स्वच्छंद चला करती है, उसे यदि हमने दबाकर काबू में कर लिया तो क्रोधादिक बड़े-बड़े अजेय शत्रुओं को बिना प्रयास जीत अपने वश कर डाला। इसलिए आवाक् रहकर अपने आप बातचीत करने का यह साधन यावत साधनों का मूल है, शांति का परमपूज्य मंदिर है, परमार्थ का एकमात्र सोपान है।

विद्या के दो क्षेत्र – बालकृष्ण भट्ट हिंदी निबंध | Vidyaa Ke Do Kshetr

साहित्य और विज्ञान दोनों मानो विद्या के दो नेत्र हैं। जो साहित्य में प्रवीण है और विज्ञान नहीं जानता अथवा विज्ञान में पूर्ण पंडित है और साहित्य नहीं जानता, वह मानो एक आँख का काना है और जो दोनों में से एक भी नहीं जानता, वह अंधा है। विद्या 'विद्' धातु से बना है, जिसका अर्थ ज्ञान है और नेत्र 'नी' धातु से है, जिसके मानी ले जाने वाले के हैं। साहित्य और विज्ञान ये दोनों मनुष्य को ज्ञान की ओर ले जाने वाले हैं। ज्ञान से मतलब यहाँ घट-पट आदि लौकिक पदार्थों को जान लेने से नहीं है—वरन् इस स्थावर, जंगम जगत् का आदि कारण क्या और कौन है तथा अखंड ऐश्वर्यवान् उस सच्चिदानंद सर्वगत सर्वतः परिपूर्ण का इस अनेक खंड में विभक्त दुःखौघ व्याप्त, अचिर, स्थाई, मरु-मरीचिका सद्दश मिथ्या जगत् से क्या और कैसा संबंध है—इसका जानना ज्ञान कहा जाएगा। साहित्य की हमारे यहाँ कभी कमी नहीं रही। संस्कृत का साहित्य सदा से सर्वांग पूर्ण था। कहीं पर किसी अंश में किसी तरह की कमी इसमें नहीं पाई गई। आदि में वेद का साहित्य सर्वांग पूर्ण था। भाषा का गौरव जिन-जिन बातों में गिना जाता है, वे सब उसमें पाई जाती हैं। उसी वेद की इबारत का अनुकरण करते हुए ऋषियों ने सूत्रों की कल्पना की। छहों दर्शन, व्याकरण, कल्प, निरुक्त तथा और और विषय सूत्र के आकार में पाए जाते हैं जिनमें साहित्य के सिवाय अनेक वैज्ञानिक विषयों का भी सूत्रपात किया गया है। प्रत्येक विषय पर ऋषियों के सूत्र पाए जाते हैं। जिस पर ऋषियों का सूत्र नहीं है उसका प्रमाण नहीं लिया जाता। मुहूर्त्त ग्रंथों पर ऋषियों का ग्रंथ नहीं है। इससे मालूम होता है कि अपनी दूकानदारी क़ायम रखने को ब्राह्मणों ने मुहूर्त्तों की कल्पना कर ली है। नहीं तो क्या कारण कि कामशास्त्र ऐसे असत् शास्त्र पर तो वात्सायन का सूत्र हो पर मुहूर्त्तों के संबंध में आर्ष प्रमाण कुछ भी न हो। इससे सिद्ध होता है कि मुहूर्त्तों की कल्पना हाल की है और निरी दूकानदारी है। जब हिंदुस्थान ग़ुलामी की आदतों में पड़ गया और निहायत गिर गया, मूर्ख प्रजा को मुट्ठी में करने के लिए ब्राह्मणों ने तिथि, वार, नक्षत्र, योग करण के द्वारा पंचांग क़ायम कर मुहर्त्तों की कल्पना की। बिना ब्राह्मण के काम न चले इसलिए क़दम-क़दम पर साइत और मुहर्त्त लोग विचरवाने लगे। यहाँ तक कि एक पाँव रख दूसरा पाँव बिना साइत मुहर्त्त के न रखेंगे, जो इस बात का मानो सबूत है कि हम लोगों में कहाँ तक मानसिक बल का अभाव है।



उपरांत उन्हीं सूत्रों की वृत्ति और भाष्य बने, जिससे उन सूत्रों के अर्थ और तात्पर्य विशद किए गए। कुमारिल, वाचस्पति, सायन, माधव आदि बड़े-बड़े दार्शनिक पंडित हुए। उस समय वेद की भाषा से अलग एक नई तरह की भाषा का प्रादुर्भाव हुआ। वेद तथा ऋषियों के बनाए ग्रंथ, जिन्हें हम आर्ष कहेंगे, यद्यपि यवनों के उपद्रव के समय बहुत से उनमें लुप्त हो गए, फिर भी उनमें के बचे बचाए मुद्रांकित करा चिरस्थाई कर दिए गए हैं। इससे निश्चय होता है कि संस्कृत-साहित्य इतना अगाध है कि उसका थहाना अथवा इस साहित्य-महोदधि के पार जाने के लिए सौ वर्ष की ज़िंदगी भी काफ़ी नहीं है। योगी या कोई देवी शक्ति संपन्न की तो बात ही निराली है। साधारण मनुष्य का काम नहीं है कि उसके समस्त साहित्य को पीकर बैठ रहे। जिस समय कुमारिल आदि दार्शनिक हुए; लगभग उसी समय के आगे या पीछे प्रत्येक विषय के प्रतिभाशाली अनेक विद्वान् हुए। कैयट, वामन, जयादित्य आदि कई प्रसिद्ध वैयाकरण; आर्यभट्ट, वाराह-मिहिर आदि गणितज्ञ; कालिदास, भवभूति, श्रीहर्ष, वाण, मयूर, माघ, भारवि, दंडी आदि कवि; अपने-अपने विषय में अद्भुत प्रतिभावान हुए। कविता के संबंध में जगन्नाथ पंडितराज के उपरांत फिर कोई ऐसा कवि नहीं हुआ जो विशिष्ट कवियों की श्रेणी में गिना जाए। न दीक्षित और नागेश से अधिक कोई वैयाकरण हुआ जो आज पुराने पंडितों की बराबरी का कहा जा सके। ऐसे ही गदाधर और जगदीश भट्टाचार्य के समकक्ष का कोई नैयायिक उनके उपरांत नहीं हुआ। आधुनिक ग्रंथकार और पंडितों ने आर्ष प्रणाली को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। इनके लेख का मुख्य उद्देश्य केवल वितंडावाद और खंडन-भंडन मात्र रह गया। सहज से सहज शब्दों में पदार्थ का निर्णय और तत्व का अवबोध जैसा उन ऋषियों की चातुरी का लक्ष्य था सो न रहा। इसी से इस समय के अधिकांश पंडित जन्म भर पढ़-पढ़कर पचते हैं, पर न तो सांसारिक व्यवहार में वे चतुर होते हैं और न उन्हें वास्तविक तत्त्व ज्ञान ही होता है। यह बात शंकराचार्य के जन्म के उपरांत हमारे संस्कृत साहित्य में उपज खड़ी हुई। ऋषियों के लेख में वाद-विवाद से कोई सरोकार न रख, केवल तत्त्व क्या है, इसी पर उनका लक्ष्य था। यदि उसी क्रम का अनुसरण हम बराबर किए जाते तो हमारी जाति में वैसी कमज़ोरी न आती जैसी तत्त्वावबोध से बहिर्मुख होने के कारण हम में आ घुसी है। इधर मुसलमानों के आक्रमण आरंभ हुए, उधर हमारे पंडित खंडन-मंडन में लग आपस की फूट और ईर्ष्या, द्रोह तथा दलादली को बढ़ाते ही गए। इससे आधुनिक पंडितों के लेखों में मुल्की जोश का कहीं छुवाव तक नहीं हुआ। बहुत दिनों तक तो पंडितों की यह चेष्टा रही कि कैसे बौद्ध और जैनियों को परास्त और उनका नाश कर वैदिक धर्म को फिर से देश में स्थापित करें। वाचस्पति आदि ग्रंथकार तथा खंडनखाद्य आदि ग्रंथों का यही क्रम रहा। इसमें संदेह नहीं, इस समय संस्कृत की उन्नति बहुत हुई। इस नई प्रणाली के बहुत अच्छे कुसुमांजलि आदि ग्रंथ बने, जिनको लगाने या विचारने में दिमाग़ चक्कर में आ जाता है, पर उन पुस्तकों की पंक्ति हल नहीं होती। ऋषियों के ग्रंथ की पंक्ति तथा शब्द बड़े सहज हैं; पर अर्थ की गंभीरता उनमें इतनी भरी हुई है कि विद्या-रसिक को उनके हल होने पर बहुमूल्य रत्न हाथ लग जाता है और लड़का पैदा होने की ख़ुशी भी उस विनोद की ख़ुशी के मुक़ाबिले तुच्छ मालूम देती है। इसी से हम कई बार लिख चुके हैं कि आर्य जाति के विजित हो जाने पर हम नेता हैं, हम स्वच्छंद हैं—यह भाव हम लोगों में से उठ गया।



संस्कृत कहाँ तक साहित्य से भरी पूरी है—सो हम दिखा चुके। साथ ही विज्ञान की भी झलक जहाँ-तहाँ आप ग्रंथों में अच्छी तरह पाई जाती है। रहे नवाविष्कृत बहुत से नए-नए विज्ञान, जिनमें भाप और बिजली की करामातों का भरपूर निदर्शन पाया जाता है। जिन पर ख़्याल करने से बहुत दूरदर्शी विद्वानों की भी बुद्धि चकरा उठती है, उनकी कमी अवश्य संस्कृत में माननी पड़ेगी। हमारे पूर्वज सर्वथा विज्ञान के ज्ञान से विमुख थे, यह तो कभी न कहा जाएगा क्योंकि जहाँ-तहाँ विमान आदि शब्दों के प्रयोग से स्पष्ट प्रतीत होता है कि ऐसी कोई वस्तु अवश्य रही होगी; किंतु उनके बनाने की क्या रीति थी इसका विशेष वर्णन कहीं पर कुछ नहीं है। शतन्नी, अग्नि-अस्त्र, वायु-अस्त्र आदि अस्त्रों का प्रयोग पुराणों में पाया जाता है। वाल्मीकि ने जृम्भकास्त्र और व्यास ने ब्रह्मास्त्र को लिखा है। निश्चय ये दोनों कोई ऐसे शस्त्र थे जिन्हें वही चला सकता था जो उतना विज्ञान जानता हो। वाल्मीकि ने मेघनाद और व्यास ने शाल्व को इस विद्या में बड़ा प्रवीण लिखा है और जृम्भकास्त्र की भी बड़ी महिमा गाई है। निश्चय यह कोई ऐसा शस्त्र रहा जिसके चलाने पर हवा से उसका स्पर्श होने से उसमें कोई ऐसी बात पैदा हो जाती थी जिससे शत्रु के दलवाले मुग्ध और बेहोश हो जाते थे। इससे प्रकट है कि इस समय के रसायनिक विज्ञान से भी वे अनभिज्ञ न थे। जब हमारे पहिले के ब्राह्मण ज्ञान से सुसंपन्न थे तब ज्ञान के इन दो नेत्रों में एक में वंचित रहे हों, ऐसा संभव नहीं। विज्ञान की इतनी उन्नति चाहे तब न रही हो पर संपूर्णतया अभाव था, सो भी कभी न माना जाएगा। विज्ञान के किस विभाग में हमारे पुराने आर्य हेठे रहे हैं तथा इनके वंशधर अब के लोग दिमाग़ी क़बूत में किसी जाति से कम हैं—यह बहुत अच्छी तरह परख लिया गया है और कई बार कसौटी से तय हो चुका है कि यह इनके परिष्कृत मस्तिष्क ही का सब है कि हिंदुस्तानी नौजवान तालीम के, हर एक हिस्से में इतनी कड़ाई होने पर भी फबकते आते हैं।

चंद्रोदय – बालकृष्ण भट्ट हिंदी निबंध | Chandroday

अँधेरा पाख बीता, उजेला पाख आया। पश्चिम की ओर सूर्य डूबा और वक्राकार हँसिया की तरह उसी दिशा में चद्रमा दिखलाई पड़ा। मानो कर्कशा के समान पश्चिम दिशा सूर्य के प्रचंड ताप से दुखी हो क्रोध में आ इसी हँसिया को लेकर दौड़ रही है और सूर्य भयभीत हो पाताल में छिपने के लिए जा रहा है। अब तो पश्चिम ओर आकाश सर्वत्र रक्तमय हो गया। क्या सचमुच ही इस कर्कशा ने सूर्य का काम तमाम किया जिससे रक्त यह निकला, अथवा सूर्य भी क्रूर हुआ जिससे उनका चेहरा तमतमा गया और उसी की यह रक्त आभा है? इस्लाम धर्म के माननेवाले नए चंद्र की बहुत बड़ी इज़्ज़त करते हैं; सो क्यों? मालूम होता है इसीलिए कि दिन-दिन क्षीण होकर नाश को प्राप्त होता हुआ चंद्रमा मानों सबक देता है कि रमज़ान में अपने शरीर को इतना सुखाओ कि वह नष्ट हो जाए, तब देखो कि उत्तरोत्तर कैसी वृद्धि होती है। अथवा यह कालरूपी श्रोत्रीय ब्राहाण के नित्य जपने का ओंकार महामंत्र है; या अंधकार महाराज के हटाने का अंकुश है; या विरहिणियों के प्राण कतरने की कैंची है; अथवा शृंगार रस से पूर्ण पिटारे के खोलने की कुंजी है; या तारामौक्तिकों से गुंथे हार के बीच का यह सुमेर है, अथवा जंगम जगत् मात्र को डसने वाले अनंगभुजंग के फन पर का चमकता हुआ मणि है; या निशा-नायिका के चेहरे की मुस्कराहट है या सँध्यानारी की कामकेलि के समय में उसकी छाती पर लगा हुआ नखक्षत है; अथवा जगज्जेता कामदेव का धब्बा है, या तारामोतियों की दो सीपियों में से एक सीपी है।



इसी प्रकार दूज से बढ़ते-बढ़ते यह चंद्र पूर्णता को पहुँचा। यह पूनों का पूरा चाँद किसके मन को न भाता होगा? यह गोल-गोल प्रकाश का पिंड देख भाँति-भाँति की कल्पनाएँ मन में उदय होती हैं कि क्या यह निशाअभिसारिका के मुख देखने की आरसी है, या उसके कान का कुंडल अथवा फूल है; या रजनीरमणी के लिलार पर बुक्के का सफ़ेद तिलक है; अथवा स्वच्छ नीले आक़ाश में यह चंद्र मानो त्रिनेत्र शिव की जटा में चमकता हुआ कुंद के सफ़ेद फूलों का गुच्छा है। कामवल्लभा रति की अटा में कूजता हुआ यह कबूतर है, अथवा आकाशरूपी बाज़ार में तारारूपी मोतियों का बेचनेवाला सौदागर है। कूई की कलियों को विकसित करते, मृगनयनियों के मान को समूल उन्मूलित करते, छिटकी हुई चाँदनी से सब दिशाओं को धवलित करते, अंधकार को निगलते चंद्रमा सीढ़ी दर सीढ़ी शिखर के समान आकाशरूपी विशाल पर्वत के मध्य भाग में चढ़ा चला आ रहा है। क्षपा-तम-कांड का हटाने-वाला यह चंद्रमा ऐसा मालूम होता है मानो आक़ाश महासरोवर में श्वेत कमल खिल रहा है जिसमें बीच-बीच जो कलंक की कालिमा है सो मानों भौंरे गूंज रहे हैं। अथवा सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी के स्नान करने की यह बावड़ी है, या कामदेव की कामिनी रति का यह चूना पोता धवल गृह आक़ाशगंगा के तट पर विहार करनेवाला हंस है जो सोती हुई कूइयों को जगाने को दूत बनकर आया है; या देवनदी आक़ाशगंगा का पुंडरीक है, या चाँदनी का अमृतकुंड है; अथवा आक़ाश में जो तारे देख पड़ते हैं वे सब गौए हैं उनके झुंड में यह सफ़ेद बैल है; या यह हीरे से जड़ा हुआ पूर्वदिगगना का कर्णफूल है; या कामदेव के बाणों को चोखा करने के लिए शान धरने का सफ़ेद गोल पत्थर है या संध्यानायिका के खेलने का गेंद है। इसके उदय से पहले सूर्यास्त की किरणों से सब ओर जो ललाई छा गई है सो मानो फागुन में इस रसियाचंद्र ने दिगगनाओं के साथ फाग खेलने में अबीर उड़ाई है, वही सब ओर आकाश में छाई हुई है। निशायोगिनी ने तार-प्रसून-समूह से कामदेव की पूजा कर यावत् कामो जनों को अपने वश में करने के लिए छिटकी हुई चाँदनी के बहाने वशीकरण बुक्का उड़ाया है; अथवा स्वच्छ नीले जल से भरे आकाशहौदा में कालमहागणक ने रात के नापने को एक घटीयंत्र छोड़ रखा है; अथवा जगद्विजयी राजा कामदेव का यह श्वेत छत्र है; विवोयीमात्र को कामाग्नि में झुलसाने को यह दिनमणि है, कंदर्पसीमंतिनी रति देवी की छप्पेदार कर्धनी का टिकड़ा है; या उसी में जड़ा चमकता हुआ सफ़ेद हीरा है; या सब कारीगरों के सरताज आतशबाज की बनाई हुई चरखियों का यह एक नमूना है; अथवा महापथगामी समयराज के रथ के सूर्य और चंद्रमारूपी दो पहियों में से यह एक पहिया है जो चलते-चलते घिस गया है। इसी से बीच में कलाई देख पड़ती है; अथवा लोगों की आँखों और मन को तरावट और शीतलता पहुँचानेवाला यह बड़ा भारी बर्फ़ का कुंड है, इसी से वेदों ने परमेश्वर के विराटवैभव के वर्णन में चँद्रमा को मन और नेत्र माना है; या कालखिलाड़ी के खेलने का सफ़ेद गेंद है, समुद्र के नीले पानी में गिरने से सूखने पर भी जिसमें कहीं-कहीं नीलिमा बाकी रह गई है; या तारेरूपी मोतीचर के दानों का यह बड़ा भारी पनसेरा लड्डू है; अथवा लोगों के शुभाशुभ काम का लेखा लिखने के लिए यह विल्लोर की गोल दवात है; या खड़िया मिट्टी का बडा भारी ढोंका है; या काल खिलाड़ी की जेबी घड़ी का डायल है; या रजत का कुंड है; या प्रक़ाश के नीले गुंबज में संगमरमर का गोल शिखर है। शिशिर और हेमंत में हिम से जो इसकी द्युति दब जाती है सो मानो यह तपस्या कर रहा है जिसका फल यह चित्रा के संयोग से शोभित हो चैत्र की पूनों के दिन पावेगा, जब इसकी द्युति फिर दामिनी सी दमकेगी। इसी से कविकुलगुरु कालिदास ने कहा है :



हिमनिर्मुक्तयोर्योगे चित्राचंद्रमसोरिव।

कालचक्र का चक्कर – बालकृष्ण भट्ट हिंदी निबंध | Kaalachakr Kaa Chakkar

सच है—'अपना सोचा होत नहिं, प्रभु चेता तत्काल'—



'अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यममन्दिरम्।



शेषा जीवितूमिच्छन्ति किमश्चर्यमतः परम्॥'



बराबर देख रहे हैं, आज यह गए, कल उनकी बारी आई, परसों उन्हें चिता पर सुला आये। पर जो बचे हुए है, उन्होंने यही मन में ठान रखा है कि हम अजर-अमर और अविनाशी है, सदा स्थायी रहेंगे। यह तो कभी उनको कलुषित चित्त में धंसता ही नहीं कि एक दिन आवेगा कि हम शव-रूप में ऐसी ही चिता पर सोलाए जाएँगे। न जानिए; हज़ार, लाख या करोड़ वर्ष की नेह गाड़े हुए निश्चिंत बैठे हैं। निस्संदेह इससे बढ़कर अचरज की बात और क्या होगी? हमारे मन में आता है कि ऐसों ही के लिए कई वर्ष से प्लेग मनुष्य के जीवन को पानी का बुल्ला सा करता, मानो चितावनी दे रहा है। पर काहे को कोई चेते और क्यों चेते? किसी बात की कमी नहीं, रुपयों से खचाखच खज़ाना भरा है। 24 घंटे के दिन-रात में 36 भाँति की उमंग और होंसिले मन में उठते रहे हैं। सच है—



'दिनमपि रजनी सायं प्रात: शिशिर वसन्ती पुनरायातः।



कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुंचत्याशावायुः।’



चार भाइयों के बीच में एक लड़का है। बाप, माँ, चाचा, ताऊ, बाबा, नाना, बड़े लोग सब दिन-रात मुँह जोहते रहते हैं और अपने प्रिय पुत्र की सोहावनी सूरत पर बार-बार पानी पी रहे हैं। अँगुलियाँ दिन गिनते बीतता है कि कब वह समय आवे कि हम अपने ललन का ब्याह करें। बहू घर में आवै, चंद्रसेनी हार मुँह दिखाई में भेंटकर उसका चाँद सा मुखड़ा देख अपना जी जुड़ावें। हमारे सब मनोरथ सफल हों, बड़ी से बड़ी महफ़िल साज सात भाँति की मिठाई परसे, चार भाई-बिरादरी का जूठन पड़े, हमारा घर पवित्र हो। वर्षों के पहिले से नगर की प्रसिद्ध वार-वनिताओं को बयाना दे दिया गया, ब्याह की तैयारियाँ हो रही थी कि अचानक ललन को ज्वर आया, दवा-दारू, झार-फूँक, टोना-टनमन में सैकड़ों रुपयों को फूँक डाला। ज़रा भी फ़ुर्सत न हुई, गिलटी प्रगट हो आई, दो ही तीन दिन में ललनजी जहाँ के थे, वहीं चल बसे।



बड़ी से बड़ी डिगरी हासिल किए हुए हैं। छात्र मंडली में जिनकी कुशाग्र बुद्धि की शाहरत है। बड़ी-बड़ी उमंग मन में भरी हुई हैं कि कंपटीशन में हम विलाइतवालों को अपने नीचे करेंगे; मातृभूमि के लिए हम ऐसी कोई बात कर गुज़रें, जिसमें भारत के सत्पुत्र कहलावें। आहार-विहार की गड़बड़ी से एक दिन दो-चार दस्त और कै हुई; दोस्तों ने समझा अजीर्ण है, दौड़-धूप करने लगे, इधर इनका हाल बिगड़ता ही गया, 12 घंटे के भीतर ही समाप्त हो गए। यह किसी ने न समझा कि अंत तक देव ने एक बड़ा भारी कॉलेज खोल रखा है, सर्चविद्या पारंगत इनको वहाँ का प्रोफ़ेसर किया चाहते हैं। यह न्याय है या अन्याय, इसका विचार कभी मन में न आया; अधम से अधम काम करने में कभी हिचक न हुई; कई लाख और करोड़ की माया जोड़ने में बराबर महा अर्थ पिशाच रहे आये; फिर भी दिन-रात सोचा करते हैं, 50 हज़ार फलाने आसामी के बाक़ी हैं, एक लाख अमुक सेठ के नीचे दबा है और वह टाट पलटने पर है; 25 हज़ार ब्याज का चिथरूमल गोधनदास से अब तक न वसूल हुआ।



ऐसी ही ऐसी चिंता में व्यग्र एक रात को नींद न आई, अधिक शीत के कारण फ़ाज़िल आ टूटा, ज़बान बंद हो गई। मुँह टेढा पड़ गया, सुबह होते-होते चल बसे। साथ अपने एक पाई भी न ले गए। एक-एक पैसे के लिए जेर-बार हैं; रोज़ का भोजन बड़ी कठिनाई से चलता है। दैव संयोग से एक ऐसा भाग्यवान कुल-उजागर जन्मा कि उसने कुल की प्रतिष्ठा चौगुनी कर दी; मिट्टी छूते सोना होने लगा; बरसाती नदी की बाढ़ के समान धन-संपत्ति सब ओर से आ इकट्ठा होने लगी; दौलत की बाढ़ के साथ होंसिले और उमंग भी बढ़ने लगे; संगीन पक्का मकान छोड़ दिया गया; जड़ाऊ ठोस गहने पिटने लगे; ज़मींदारी की भी ख़रीद होने लगी; बात-बात में नफ़ासत और वज़ेदारी को तराश-खराश पल्ले दर्जे तक पहुँची। अकस्मात् वह पुरुष-रत्न जिसकी बदौलत यह सब कुछ था, चल बसा। सूर्यास्त होने पर अंधकार सा छा गया! जिनके मिज़ाज कुतुबमीनार की ऊँचाई तक चढ़ गए थे, अब कौड़ी के तीन-तीन हो गए। इस तरह इस कालचक्र की अद्भुत महिमा झूरी भर भरी ढरकावे की भाँत कुछ समझ में नहीं आती।



अब दूसरी ओर देखिए, कुछ अकिल नहीं काम करती, क्यों इस कालचक्र का चक्कर ऐसा टेढ़ा-मेढ़ा है? युग-व्यवस्था के संबंध में पुराणवालों की पुरानी अकिल चाहे जो मान बैठी हो, हमें तो कुछ ऐसा ही जँचता है कि यह युग-व्यवस्था भी इसी कालचक्र की विकराल गति है। जहाँ और जब इस चक्र का चक्कर अपने अनुकूल है, तहाँ और तब सतयुग है, उसका प्रतिकूल होना ही कलियुग है। भारत पर वह चक्कर नितांत प्रतिकूल है, इसलिए यहाँ घोर कलियुग बरत रहा है। विलायत पर अनुकूल है, वहाँ शुद्ध सतयुग राज करता है; वहाँ वालों में जो बुराइयाँ हैं, वे भी भलाई में शामिल कर ली गई हैं। उसी कालचक्र को प्रतिकूलता से हमारे में बची-खुची जो दो-एक भलाई थी, वह भी बुराई समझ ली गई। कालचक्र की अनुकूलता तथा प्रतिकूलता का इससे बढ़कर दूसरा उदाहरण और क्या होगा कि आदि में जो यहाँ सौदागरी करने के बहाने आये, वे अब समस्त भारत के काश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रखंड एकचक्र पृथ्वी के राज्य के अधिकारी हो गए। वही यहाँ वाले जिनको अनादि काल से यहाँ की भूमि से मातृवात्सल्य रहा और जिनकी नस-नस में यहाँ की जलवायु का असर चुभा हुआ है, वे कालचक्र की प्रतिकूलता से निकाल बाहर कर दिये गए; बैठे-बैठे ललचाते और मुँह ताकते रह जाते हैं। जो कुछ सार पदार्थ और रस है, उसका आनंद एक तीसरा भोग रहा है। ये खूदड़ और उच्छिष्ट ही से अपना पेट पाल लेने को परम सौभाग्य मान रहे थे, सो उसमें भी उस चक्र की वक्र कुटिल गति ने ऐसा खलल डाल रक्खा है कि चिरकाल से दुर्भिक्ष और अवर्षण इन्हें निश्चिंत नहीं रहने देता। इस समय कई और उपद्रवों से कुछ स्वास्थ्य था, तो प्लेग अपनी बहादुरी प्रगट कर रहा है। इससे किसी तरह गल छुटैगा, तो कोई दूसरी बला आ घेरैगी।



बड़े-बड़े दार्शनिक, वैज्ञानिक, योगी तथा भविष्य के जानने वाले किसी ने इसका भेद न पाया कि क्यों ऐसा होता है। कोई कहता हैं, यह ईश्वर की इच्छा है। दूसरे मानते हैं, नहीं-नहीं, पूर्व-संचित का यह परिणाम है: 'जो जस कोन सो तस फल चाखा'; और लोग सिद्ध करते हैं, यह सितारों की गर्दिश है। संशोधक और रिफ़ार्मर जुदा ही बान भर रहे हैं कि अपने यहाँ प्रचलित कुरीतों को उठाय समाज का संशोधन क्यों न कर डालें, जिसमें हमारे में कौमियत और एकता आवे, मुल्की जोश पैदा हो, कालचक्र की जो वक्र गति है; ऋजु गति हो जाए। कोई कहता है, यह बाल-विधवाओं की आह है; दूसरे कहते हैं, यह बाल विवाह का सब दोष है इत्यादि-इत्यादि। हमारे धूर्त-शिरोमणि इसी पर ज़ोर दे रहे हैं कि ब्राह्मणों का मान और हिंदू-धर्म पर विश्वास उठता जाता है, उसी का यह सर्व फल है; कोई-कोई दबी ज़बान हिम्मत बाँध कह डालते हैं, यह सब राजा के पाप या पुण्य का परिणाम है। जो हो, वास्तव में यह क्या गोरखधंधा है, कुछ नहीं खुलता।



सच पूछो तो आदमी की शैतानी अकिल एक हारी है, तो इसी बात में कि वह कुछ हल नहीं कर सकती कि आज क्या है, कल क्या होगा और इसी को इस संसार इंजिन का बड़ा इंजीनियर अपने हाथ में रखे हुए है। यह इस कालचक्र के चक्कर ही का प्रभाव है कि रोम, इंद्रप्रस्थ, अयोध्या, पाटलिपुत्र, कन्नौज आदि बड़ी-बड़ी राजधानियाँ जो किसी समय आदमियों का जंगल थीं, जिनकी लंबाई-चौड़ाई योजन और कोसों के हिसाब से थी और जहाँ की मनुष्य-संख्या 40 लाख, 20 लाख, 10 लाख की गिनती की थी, वह इस समय बहुधा तो उजाड़ घुग्घुओं के घोंसलों के लिए उपयुक्त है, कोई-कोई नाम मात्र को अब तक विद्यमान है। लंदन, पेरिस, कलकत्ता, बॉम्बे, जो एक समय बहुधा तो उजाड़ जंगल तथा जलमग्न अनूप थे, वहाँ अब आकाश से बात करते हुए गगन-संपृक्त प्रासाद, स्वर्णमंडित मंदिर खड़े हुए हैं; जहाँ चंचला लक्ष्मी अपनी चंचलता से मुँह मोड़ चिरस्थायिनी हो समुद्र की तरंग-सी हिलकोरें मार रही है, इत्यादि। इस कालचक्र की महिमा का पार कौन पा सकता है, तब हमारी क्षुद्र लेखनी किस बूते पर इस चक्कर में पड़ने का अधिक साहस करे? पढ़ने-वालों के चित्त-विनोदार्थ इतना ही सही।

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