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हिंदी लोक गीत बन्ना-बन्नी लिरिक्स | Hindi Lok Geet Banna-Banni Lyrics

1. अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पे की कली

अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पे की कली
इनकी मनोहर जोड़ी लागे कितनी भली
अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पे की कली
बहना के घर में ये पहली ख़ुशी है
पहली ख़ुशी बड़ी देर से मिली है
सपना पूरा हुआ, मन की आशा फली
इनकी मनोहर जोड़ी लागे कितनी भली
अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पे की कली
दिन रंग भरे आएँगे, होगी हर रात दिवाली
संग ले के चली अपने घर, अब दिया जलाने वाली
प्यारे भैया ने पाई दुल्हन साँचे में ढली
इनकी मनोहर जोड़ी लागे कितनी भली
अपना बन्ना फूल गुलाबी, बन्नो चम्पे की कली

2. आज अँगन मेरा सूना, बन्नी तो मेरी पाहुनियाँ

आज अँगन मेरा सूना, बन्नी तो मेरी पाहुनियाँ -२
उसकी दादी ने ऐसा पाला कि ऐसा पाला कि नैन बिच पूतरिया
उसके बाबा ने ऐसा निकाला कि ऐसा निकाला कि जल बिन माछरिया

आज अँगन मेरा सूना, बन्नी तो मेरी पाहुनियाँ -२
उसकी ताई ने ऐसा पाला कि ऐसा पाला कि नैन बिच पूतरिया
उसके ताऊ ने ऐसा निकाला कि ऐसा निकाला कि जल बिन माछरिया

आज अँगन मेरा सूना, बन्नी तो मेरी पाहुनियाँ -२
उसकी मम्मी ने ऐसा पाला कि ऐसा पाला कि नैन बिच पूतरिया
उसके पापा ने ऐसा निकाला कि ऐसा निकाला कि जल बिन माछरिया

आज अँगन मेरा सूना, बन्नी तो मेरी पाहुनियाँ -२
उसकी बुआ ने ऐसा पाला कि ऐसा पाला कि नैन बिच पूतरिया
उसके फूफा ने ऐसा निकाला कि ऐसा निकाला कि जल बिन माछरिया

आज अँगन मेरा सूना, बन्नी तो मेरी पाहुनियाँ -२
उसकी चाची ने ऐसा पाला कि ऐसा पाला कि नैन बिच पूतरिया
उसके चाचा ने ऐसा निकाला कि ऐसा निकाला कि जल बिन माछरिया

3. आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के बाबा बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की दादी बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के ताऊ बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की ताई बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के पापा बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की मम्मी बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के फूफा बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की बुआ बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के चाचा बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की चाची बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के जीजा बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की दीदी बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

आलू-मटर वाले ने, गलियों में जा के शोर किया रे
बन्नी के भईया बड़े कमाऊँ, भर भर दोने लाते है
बन्नी की भाभी बड़ी चटोरी, भर भर दोने खाती है
चाटा पत्ता फेंक दिया, गलियों में जा के शोर किया रे

4. आज तेरा श्रृंगार कराऊँ बन्ना रे

आज तेरा श्रृगार कराऊँ बन्ना रे
तोहे बांका-सा दुल्हा बनाऊँ बन्ना रे ।।

उबटन केसर करूँ, गंगाजल नीर भरूं।
तोहे मल मल के आज नहलाऊँ बन्ना रे

बाकी सी पगड़ी बाँधू, हीरे की कलंगी साँजू
तोहे केसरिया जामा पहनाऊ बन्ना रे ।।

नैनो मे कजरा साँजू हाथो मे कँगना बाँधू
तोहे पन्ने का हार पहनाऊ बन्ना रे ।।

जीवन मैं तोपै वारूं झोले भर मोती वारूं ।
तोंहे देख देख नैना रिझाऊ बन्ना रे ।।

आज तेरा श्रृगार कराऊँ बन्ना रे
तोहे बांका-सा दुल्हा बनाऊँ बन्ना रे ।।

5. आज म्हारे बन्ने ने धनुष उठा लिया

आज म्हारे बन्ने ने धनुष उठा लिया
बाबा संग जाईयो रे बन्ना ताऊ संग जाईयों
तोड़ धनुष सिया जानकी न ब्याह लाईयों
आज हमारे बन्ने धनुष उठा लिया

आज म्हारे बन्ने ने धनुष उठा लिया
पापा संग जाईयो रे बन्ना चाचा संग जाईयों
तोड़ धनुष सिया जानकी न ब्याह लाईयों
आज हमारे बन्ने धनुष उठा लिया

आज म्हारे बन्ने ने धनुष उठा लिया
फूफा संग जाईयो रे बन्ना मामा संग जाईयों
तोड़ धनुष सिया जानकी न ब्याह लाईयों
आज हमारे बन्ने धनुष उठा लिया

आज म्हारे बन्ने ने धनुष उठा लिया
भईया संग जाईयो रे बन्ना जीजा संग जाईयों
तोड़ धनुष सिया जानकी न ब्याह लाईयों
आज हमारे बन्ने धनुष उठा लिया

6. एक फुल खिल्या आधी रात

एक फुल खिल्या आधी रात बन्ने पकड़या हाथ
बन्नी तो हमारी है।
छोड़ो-छोड़ो बना जी मेरा हाथ अभी तो कुंवारी हुं
मेरे बाबा जी देंगे कन्यादान वो देंगे महादान
तभी तो तुम्हारी हूं
मेरे ताऊ जी देंगे कन्या दान वो देंगे महादान
तभी तो तुम्हारी हूं
एक फुल खिल्या आधी रात बन्ने ने पकड़या हाथ
बन्नी तो हमारी है।

एक फुल खिल्या आधी रात बन्ने पकड़या हाथ
बन्नी तो हमारी है।
छोड़ो-छोड़ो बना जी मेरा हाथ अभी तो कुंवारी हुं
मेरे पापा जी देंगे कन्यादान वो देंगे महादान
तभी तो तुम्हारी हूं
मेरे चाचा जी देंगे कन्या दान वो देंगे महादान
तभी तो तुम्हारी हूं
एक फुल खिल्या आधी रात बन्ने ने पकड़या हाथ
बन्नी तो हमारी है।

एक फुल खिल्या आधी रात बन्ने पकड़या हाथ
बन्नी तो हमारी है।
छोड़ो-छोड़ो बना जी मेरा हाथ अभी तो कुंवारी हुं
मेरे फूफा जी देंगे कन्यादान वो देंगे महादान
तभी तो तुम्हारी हूं
मेरे मामा जी देंगे कन्या दान वो देंगे महादान
तभी तो तुम्हारी हूं
एक फुल खिल्या आधी रात बन्ने ने पकड़या हाथ
बन्नी तो हमारी है।

7. इचक दाना बिचक दाना

इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना इचक दाना......
छज्जे ऊपर बन्नी बैठी बन्ना है दिवाना इचक...
रोज सवेरे उठकर बन्ना गर्म समोसे लाता है
दादी को दिखला-दिखला कर बन्नी को खिलाता है
दादी के मुंह पानी आये कैसा है जमाना है इचक दाना.....
इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना

इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना इचक दाना......
छज्जे ऊपर बन्नी बैठी बन्ना है दिवाना इचक...
रोज सवेरे उठकर बन्ना गर्म समोसे लाता है
मम्मी को दिखला-दिखला कर बन्नी को खिलाता है
मम्मी के मुंह पानी आये कैसा है जमाना है इचक दाना.....
इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना

इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना इचक दाना......
छज्जे ऊपर बन्नी बैठी बन्ना है दिवाना इचक...
रोज सवेरे उठकर बन्ना गर्म समोसे लाता है
भाभी को दिखला-दिखला कर बन्नी को खिलाता है
भाभी के मुंह पानी आये कैसा है जमाना है इचक दाना.....
इचक दाना बिचक दाना दाने ऊपर दाना

8. इतर में भीग रही

इतर में भीग रही हैं ये सेहरे की लड़ी-२
भरी महफ़िल में बन्ने के बाबा से कह दो
दोनों हाथों से उठा ले ये सेहरे की लड़ी

इतर में भीग रही हैं ये सेहरे की लड़ी-२
भरी महफ़िल में बन्ने के ताऊ से कह दो
दोनों हाथों से उठा ले ये सेहरे की लड़ी

इतर में भीग रही हैं ये सेहरे की लड़ी-२
भरी महफ़िल में बन्ने के पापा से कह दो
दोनों हाथों से उठा ले ये सेहरे की लड़ी

इतर में भीग रही हैं ये सेहरे की लड़ी-२
भरी महफ़िल में बन्ने के चाचा से कह दो
दोनों हाथों से उठा ले ये सेहरे की लड़ी

इतर में भीग रही हैं ये सेहरे की लड़ी-२

9. केसरिया बन्ना बागों में आया रे

केसरिया बन्ना बागों में आया रे, केसरिया बन्ना बागों में आया रे
आवो री सज धज कर आवो री,
सखियन सब आवो री, माला पहनावो री
केसरिया बन्ना बागों में आया रे ।।

ये मेरे हाथ फूलों की डाली, ये मेरे हाथ फूलों की डाली
मैं जो मालन बन कर आई, बागों में ऐसी छाई
केसरिया बन्ना बागों में आया रे

ये मेरे हाथ चौमुखी दियना, ये मेरे हाथ चौमुखी दियना
मैं तो ज्योति बन कर आई, महलों में ऐसी छाई
केसरिया बन्ना बागों में आया रे

ये मेरे हाथ पानों के बीडे, ये मेरे हाथ पानों के बीडे,
मैं जो लाली बन कर आई, रंगों में ऐसी छाई
केसरिया बन्ना बागों में आया रे,
केसरिया बन्ना बागों में आया रे

आवो री सज धज कर आवो री,
सखियन सब आवो री, माला पहनावो री
केसरिया बन्ना बागों में आया रे ।।

10. कच्ची पक्की कलियाँ हिलाया न करो

कच्ची पक्की कलियाँ हिलाया न करो-२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

माथे बन्नी के बेंदी सोहे -२,
अँखियन में झलक दिखाया न करो-२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

कच्ची पक्की कलियाँ हिलाया न करो-२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

कानों बन्नी के कुण्डल सोहे -२
होंठों पे झलक दिखाया न करो-२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

कच्ची पक्की कलियाँ हिलाया न करो-२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

हाथ बन्नी के कंगन सोहे -२
मेंहदी में झलक दिखाया न करो-२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

कच्ची पक्की कलियाँ हिलाया न करो -२
रोज़ रोज़ बन्ना तुम आया न करो...

11. किरण की छन्नी में बन्ने ने रास रचाई

बन्नी मैं तो देखूंगा तू कितनी पढ़ी लिखी आई
बन्ना जी मुझको क्या देखो
थारी दादी से ज्यादा सुन्दर आयी
बन्ना जी मुझको क्या देखो
थारी ताई से ज्यादा पढ़ी लिखी आयी।

किरण की छन्नी में बन्ने ने रास रचाई

बन्नी मैं तो देखूंगा तू कितनी सुन्दर आई
बन्नी मैं तो देखूंगा तू कितनी पढ़ी लिखी आई
बन्ना जी मुझको क्या देखो
थारी मम्मी से ज्यादा सुन्दर आयी
बन्ना जी मुझको क्या देखो
थारी चाची से ज्यादा पढ़ी लिखी आयी।

किरण की छन्नी में बन्ने ने रास रचाई

बन्नी मैं तो देखूंगा तू कितनी सुन्दर आई
बन्नी मैं तो देखूंगा तू कितनी पढ़ी लिखी आई
बन्ना जी मुझको क्या देखो
थारी बुआ से ज्यादा सुन्दर आयी
बन्ना जी मुझको क्या देखो
थारी मौसी से ज्यादा पढ़ी लिखी आयी।

किरण की छन्नी में बन्ने ने रास रचाई

12. कोका कोला मिलेगा दो-दो तोला मिलेगा

कोका कोला मिलेगा दो-दो तोला मिलेगा
बन्ने की बारात में

मैंने कहा था बन्ने तुम बाबा मत लाना
तुम ताऊ मत लाना, हमारी मुलाकात में
तुमने एक ना मानी, तुम बाबा संग आऐ
तुम ताऊ संग आऐ, हमारी मुलाकात में

फेरे तो ना लूंगी तेरे साथ में
मैनें कहा था बन्ने तुम अकेले ही आना
हमारी मुलाकात में

कोका कोला मिलेगा दो-दो तोला मिलेगा
बन्ने की बारात में

मैंने कहा था बन्ने तुम पापा मत लाना
तुम चाचा मत लाना, हमारी मुलाकात में
तुमने एक ना मानी, तुम पापा संग आऐ
तुम चाचा संग आऐ, हमारी मुलाकात में

फेरे तो ना लूंगी तेरे साथ में
मैनें कहा था बन्ने तुम अकेले ही आना
हमारी मुलाकात में


कोका कोला मिलेगा दो-दो तोला मिलेगा
बन्ने की बारात में

मैंने कहा था बन्ने तुम मामा मत लाना
तुम फूफा मत लाना, हमारी मुलाकात में
तुमने एक ना मानी, तुम मामा संग आऐ
तुम फूफा संग आऐ, हमारी मुलाकात में

फेरे तो ना लूंगी तेरे साथ में
मैनें कहा था बन्ने तुम अकेले ही आना
हमारी मुलाकात में

कोका कोला मिलेगा दो-दो तोला मिलेगा
बन्ने की बारात में

मैंने कहा था बन्ने तुम यार मत लाना
तुम दोस्त मत लाना, हमारी मुलाकात में
तुम मेरी ही मानी, तुम अकेले ही आये
हमारी मुलाकात में
फेरे तो मैं लूंगी तेरे साथ में।

कोका कोला मिलेगा दो-दो तोला मिलेगा
बन्ने की बारात में

13. कहो राजा जनक कहो सिया प्यारी

कहो राजा जनक कहो सिया प्यारी-२

किन तेरी गोद भरी मेवा से
किन तेरी रूच-रूच मांग सवांरी
बाबा मेरी गोद भरी मेवा से
दादी रानी रूच-रूच मांग सवांरी

कहो राजा जनक कहो सिया प्यारी-२

किन तेरी गोद भरी मेवा से
किन तेरी रूच-रूच मांग सवांरी
पापा मेरी गोद भरी मेवा से
मम्मी रानी रूच-रूच मांग सवांरी

कहो राजा जनक कहो सिया प्यारी-२

किन तेरी गोद भरी मेवा से
किन तेरी रूच-रूच मांग सवांरी
भईया मेरी गोद भरी मेवा से
भाभी रानी रूच-रूच मांग सवांरी

कहो राजा जनक कहो सिया प्यारी-२

14. चन्दन के चार पावा लगे

चन्दन के चार पावा लगे हैं
रेशम लागी अरदवानि हाँ-२

मैङै में बैइठे बन्ने के बाबा खेल जूआँ खेंलहि हाँ
हँसि हँसि पूछै बन्ने की दादी
का रे पिया तुम जीत्यौ हाँ
धन भले जीत्यौ, दहेज भले जीत्यौ
जीत्यौ दूध कटोरा हाँ, चंदा सूरज जैसी बहु औरु
जीत्यौ अपने चढ़न केरो घोड़ा हाँ

मैङै में बैइठे बन्नी के बाबा खेल जूआँ खेंलहि हाँ
रोए रोए पूछै बन्नी की दादी
का रे पिया तुम हारौ हाँ
धन भले हारौ, दहेज भले हारौ
हारौ दूध कटोरा हाँ, चंदा सूरज जैसी बिटिया औरु
हारौ अपने चढ़न केरो घोड़ा हाँ

चन्दन के चार पावा लगे हैं
रेशम लागी अरदवानि हाँ-२

मैङै में बैइठे बन्ने के पापा खेल जूआँ खेंलहि हाँ
हँसि हँसि पूछै बन्ने की मम्मी
का रे पिया तुम जीत्यौ हाँ
धन भले जीत्यौ, दहेज भले जीत्यौ
जीत्यौ दूध कटोरा हाँ, चंदा सूरज जैसी बहु औरु
जीत्यौ अपने चढ़न केरो घोड़ा हाँ

मैङै में बैइठे बन्नी के पापा खेल जूआँ खेंलहि हाँ
रोए रोए पूछै बन्नी की मम्मी
का रे पिया तुम हारौ हाँ
धन भले हारौ, दहेज भले हारौ
हारौ दूध कटोरा हाँ, चंदा सूरज जैसी बिटिया औरु
हारौ अपने चढ़न केरो घोड़ा हाँ

15. चल बन्नी इस घर से बैठ मोटर में सजन घर जाना है

चल बन्नी इस घर से बैठ मोटर में
सजन घर जाना है -२

कैसे चलूँ सजन के घर ओ कहार -२
दादा जी खड़े आँगन में लाज-शर्म मुझे आती है
ताऊ जी खड़े आँगन में लाज-शर्म मुझे आती है
चल बन्नी इस घर से बैठ मोटर में
सजन घर जाना है-२

कैसे चलूँ सजन के घर ओ कहार -२
पापा जी खड़े आँगन में लाज-शर्म मुझे आती है
चाचा जी खड़े आँगन में लाज-शर्म मुझे आती है
चल बन्नी इस घर से बैठ मोटर में
सजन घर जाना है -२

कैसे चलूँ सजन के घर ओ कहार -२
फूफा जी खड़े आँगन में लाज-शर्म मुझे आती है
मामा जी खड़े आँगन में लाज-शर्म मुझे आती है
चल बन्नी इस घर से बैठ मोटर में
सजन घर जाना है -२

16. चलो जल्दी सजो बन्ना

चलो जल्दी सजो बन्ना ये शुभ घड़ी आज आई है
तेरे बाबा हजारी ने महल सारा सजाया है
तेरी दादी के जीवन में ये शुभ दिन आज आया है

चलो जल्दी सजो बन्ना ये शुभ घड़ी आज आई है
तेरे ताऊ हजारी ने महल सारा सजाया है
तेरी ताई के जीवन में ये शुभ दिन आज आया है

चलो जल्दी सजो बन्ना ये शुभ घड़ी आज आई है
तेरे पापा हजारी ने महल सारा सजाया है
तेरी मम्मी के जीवन में ये शुभ दिन आज आया है

चलो जल्दी सजो बन्ना ये शुभ घड़ी आज आई है
तेरे चाचा हजारी ने महल सारा सजाया है
तेरी चाची के जीवन में ये शुभ दिन आज आया है

17. चिक डाल दो कमरे में

चिक डाल दो कमरे में बन्नी कैरम खेलेगी-२
अगर मैं बाजी जीती तो सुबह का नाश्ता बना देना
अगर मैं बाजी जीता तो तेरी दादी को ले जाऊँगा
उन्हें दादा के संग रक्खूँगा, नहीं फिर आने देने का

चिक डाल दो कमरे में बन्नी कैरम खेलेगी-२
अगर मैं बाजी जीती तो सुबह के कपड़े धो देना
अगर मैं बाजी जीता तो तेरी मम्मी को ले जाऊँगा
उन्हें पापा के संग रक्खूँगा, नहीं फिर आने देने का

चिक डाल दो कमरे में बन्नी कैरम खेलेगी-२
अगर मैं बाजी जीती तो सुबह के बर्तन धो देना
अगर मैं बाजी जीता तो तेरी भाभी को ले जाऊँगा
उन्हें भईया के संग रक्खूँगा, नहीं फिर आने देने का

चिक डाल दो कमरे में बन्नी कैरम खेलेगी-२
अगर मैं बाजी जीती तो रात का बिस्तर लगा देना
अगर मैं बाजी जीता तो तेरी दीदी को ले जाऊँगा
उन्हें जीजा के संग रक्खूँगा, नहीं फिर आने देने का

18. छज्जे ऊपर बन्ना बैठा दिल खोल के

छज्जे ऊपर बन्ना बैठा दिल खोल के
बन्नी को बुलाये टेलीफोन कर के
कमरे में से दादी बोली हंस-हंस के
बन्नी नहीं आये टेलीफोन सुन के
जाओ जी बन्ना तो घोड़ी चंढ के
लाओ जी बन्ना गठ जोड़ा कर के

छज्जे ऊपर बन्ना बैठा दिल खोल के
बन्नी को बुलाये टेलीफोन कर के
कमरे में से मम्मी बोली हंस-हंस के
बन्नी नहीं आये टेलीफोन सुन के
जाओ जी बन्ना तो घोड़ी चंढ के
लाओ जी बन्ना गठ जोड़ा कर के

छज्जे ऊपर बन्ना बैठा दिल खोल के
बन्नी को बुलाये टेलीफोन कर के
कमरे में से भाभी बोली हंस-हंस के
बन्नी नहीं आये टेलीफोन सुन के
जाओ जी बन्ना तो घोड़ी चंढ के
लाओ जी बन्ना गठ जोड़ा कर के

19. छोटी सी बन्नी

छोटी सी बन्नी पारवती शिव पूजा करने जाती है
बाबा के बागों जाती, वो फूल तोड़कर लाती है
फूलों का हार बना करके शिव शंकर को पहनाती है

छोटी सी बन्नी पारवती शिव पूजा करने जाती है
पापा के बागों जाती, वो फूल तोड़कर लाती है
फूलों का हार बना करके शिव शंकर को पहनाती है

छोटी सी बन्नी पारवती शिव पूजा करने जाती है
चाचा के बागों जाती, वो फूल तोड़कर लाती है
फूलों का हार बना करके शिव शंकर को पहनाती है

20. जरा सामने तो आओ बन्ना

जरा सामने तो आओ बन्ना
छुप छुप चलने मे क्या राज है
यूँ छुप न सकोगे मेरे लाडले,
जब द्वारे खड़ी बारात है
षीष बना के सेहरा सोहे
किलंगी चमाचम चमक रही

अपने बाबा के सर का तू ताज है
अपने ताऊ के सर का तू ताज है
अपनी दादी का तू राज दुलार है
अपनी ताई का तू राज दुलार है

यूँ छुप न सकोगे मेरे लाडले
जब की द्वारे खड़ी बारात है

अपने पापा के सर का तू ताज है
अपने चाचा के सर का तू ताज है
अपनी का तू राज दुलार है
अपनी ताई का तू राज दुलार है

जरा सामने तो आओ बन्ना
छुप छुप चलने मे क्या राज है
यूँ छुप न सकोगे मेरे लाडले,
जब द्वारे खड़ी बारात है
षीष बना के सेहरा सोहे
किलंगी चमाचम चमक रही

21. झूठ बोले बन्ना डांटे ऐसे बन्ने से डरियो

झूठ बोले बन्ना डांटे ऐसे बन्ने से डरियो

बन्ना बन्नी को ले जायेगा तुम देखते रहियो
मैं बाबा को ले जाऊंगा तुम देखते रहियो
मैं ताऊ को ले जाऊँगा तुम देखते रहियो
बिना बुलाये आ जाये दादी ऐसी दादी से डरियो
बिना बुलाये आ जाये ताई ऐसी ताई से डरियो
बन्ना बन्नी को ले जायेगा तुम देखते रहियो

झूठ बोले बन्ना.....

झूठ बोले बन्ना डांटे ऐसे बन्ने से डरियो

बन्ना बन्नी को ले जायेगा तुम देखते रहियो
मैं पापा को ले जाऊंगा तुम देखते रहियो
मैं चाचा को ले जाऊँगा तुम देखते रहियो
बिना बुलाये आ जाये मम्मी ऐसी मम्मी से डरियो
बिना बुलाये आ जाये चाची ऐसी चाची से डरियो
बन्ना बन्नी को ले जायेगा तुम देखते रहियो

झूठ बोले बन्ना.....

22. दइया ओ दइया बन्नी के नजर लागी

दइया ओ दइया बन्नी के नजर लागी-2
मैं डिबिया काजल की लेकर भागी

शीश बन्नी के टीका सोहे
कान बन्नी के कुण्डल सोहे
दइया ओ दइया झूमर पे नजर लागी
दइया ओ दइया झुमके पे नजर लागी
मैं डिबिया .......

गले बन्नी के हरवा सोहे
हाथ बन्नी के कंगना सोहे
दइया ओ दइया लटकन पे नजर लागी
दइया ओ दइया चूड़े पे नजर लागी
मैं डिबिया .......

कमर बन्नी के तगड़ी सोहे
पांव बन्नी के पायल सोहे
दइया ओ दइया गुच्छे पे नजर लागी
दइया ओ दइया बिछुवे पे नजर लागी
मैं डिबिया.....

अंग बन्नी के साड़ी सोहे
संग बन्नी के बन्ना सोहे
दइया ओ दइया, चूनर पे नजर लागी
दइया ओ दइया जोड़ी पे नजर लागी
मैं डिबिया.....

दइया ओ दइया बन्नी के नजर लागी-2
मैं डिबिया काजल की लेकर भागी

23. द्वारे पे बाजे शहनाई

द्वारे पे बाजे शहनाई, बन्नी की हो गई बिदाई
द्वारे पे बाबा रोवें, आंगन में दादी
पैरों पड़ा रोवे भाई, बहन मेरी हो गई पराई

द्वारे पे बाजे शहनाई, बन्नी की हो गई बिदाई
द्वारे पे पापा रोवें, आंगन में मम्मी
पैरों पड़ा रोवे भाई, बहन मेरी हो गई पराई

द्वारे पे बाजे शहनाई, बन्नी की हो गई बिदाई
द्वारे पे चाचा रोवें, आंगन में चाची
पैरों पड़ा रोवे भाई, बहन मेरी हो गई पराई

24. दो हँसों की गाड़ी तैयार खड़ी रे

दो हँसों की गाड़ी तैयार खड़ी रे -२
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,
मण्डप के नीचे बाबा खड़े रोवें
दादी रानी से मुखड़ा मोड़ चली रे
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,

दो हँसों की गाड़ी तैयार खड़ी रे -२
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,
मण्डप के नीचे पापा खड़े रोवें
मम्मी रानी से मुखड़ा मोड़ चली रे
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,

दो हँसों की गाड़ी तैयार खड़ी रे -२
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,
मण्डप के नीचे जीजा खड़े रोवें
दीदी रानी से मुखड़ा मोड़ चली रे
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,

दो हँसों की गाड़ी तैयार खड़ी रे -२
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,
मण्डप के नीचे भईया खड़े रोवें
भाभी रानी से मुखड़ा मोड़ चली रे
आज मेरी बन्नी ससुराल चली रे,

25. नखरालो बन्नो जी बन्नी पर जादू करगो

नखरालो बन्ने जी बन्नी पर जादू करगो
मतवालो बन्ने जी बन्नी पर जादू करगो

रंगरंगीलो छैल छबीलो ओ बन्ना है प्यारो
मीठो-मीठो मुलक रहो है यो तो जादूगारो
रसीलो बनडा सा बन्नी के मन बसगो। नखरालो.....
शीश बने के कलंगी सोहे, सेहरा जी की शोभा न्यारी
घोड़ी ऊपर बैठ्यो बन्नो पह्रयो सूट हजारी
हरियालो बन्नो जी, बन्नी के चित्त चढ़गो। नखरालो......
सज कर आया बन्ना जी तो संग में लाय बराती
आगे-आगे नाच रहे हैं बन्ने जी के साथी
कामणगारो बन्नो जी बन्नी पर कामण करगो....

नखरालो बन्ने जी बन्नी पर जादू करगो
मतवालो बन्ने जी बन्नी पर जादू करगो

26. नगर में शोर भारी है

नगर में शोर भारी है न जाने किसकी शादी है-२
बन्ने के बाबा से पूछों नगर में किसकी शादी है
उन्होंने हँस के फरमाया मेरे पोते की शादी है

नगर में शोर भारी है न जाने किसकी शादी है-२
बन्ने के ताऊ से पूछों नगर में किसकी शादी है
उन्होंने हँस के फरमाया मेरे भतीजे की शादी है

नगर में शोर भारी है न जाने किसकी शादी है-२
बन्ने के पापा से पूछों नगर में किसकी शादी है
उन्होंने हँस के फरमाया मेरे बेटे की शादी है

नगर में शोर भारी है न जाने किसकी शादी है-२
बन्ने के मामा से पूछों नगर में किसकी शादी है
उन्होंने हँस के फरमाया मेरे भांजे की शादी है

नगर में शोर भारी है न जाने किसकी शादी है-२
बन्ने के जीजा से पूछों नगर में किसकी शादी है
उन्होंने हँस के फरमाया मेरे साले की शादी है

नगर में शोर भारी है न जाने किसकी शादी है-२
बन्ने के भईया से पूछों नगर में किसकी शादी है
उन्होंने हँस के फरमाया मेरे छोटे की शादी है

27. नीचे पान की दुकान, ऊपर बन्नी का मकान

नीचे पान की दुकान, ऊपर बन्नी का मकान
बोलो बोलो मेरी जान, किराया कितना

मैंने खाना बनाया तुम्हारे लिए -२
सब खा गए मेहमान, जिनकी जान न पहचान
बोलो बोलो मेरी जान, किराया कितना

नीचे पान की दुकान, ऊपर बन्नी का मकान
बोलो बोलो मेरी जान, किराया कितना

मैंने पानी मँगाया तुम्हारे लिए -२
सब पी गए मेहमान, जिनकी जान न पहचान
बोलो बोलो मेरी जान किराया कितना

नीचे पान की दुकान, ऊपर बन्नी का मकान
बोलो बोलो मेरी जान, किराया कितना

मैंने बीड़े लगाए तुम्हारे लिए -२
सब खा गए मेहमान, जिनकी जान न पहचान
बोलो बोलो मेरी जान किराया कितना

नीचे पान की दुकान, ऊपर बन्नी का मकान
बोलो बोलो मेरी जान, किराया कितना

मैंने सेज बिछाया तुम्हारे लिए -२
सब सो गए मेहमान, जिनकी जान न पहचान
बोलो बोलो मेरी जान किराया कितना

नीचे पान की दुकान, ऊपर बन्नी का मकान
बोलो बोलो मेरी जान, किराया कितना

28. प्यारे बन्ने तू शादी रचाना

प्यारे बन्ने तू शादी रचाना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

मैंने सोचा था बन्ना सेहरा लेकर आयगा
लेकिन सेहरा न मिला
प्यारे बन्ने तू हैट लगाना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

प्यारे बन्ने तू शादी रचाना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

मैंने सोचा था बन्ना कँगना लेकर आयगा
लेकिन कँगना न मिला
प्यारे बन्ने तू घड़ियाँ पहनना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

प्यारे बन्ने तू शादी रचाना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

मैंने सोचा था बन्ना जामा लेकर आयगा
लेकिन जामा न मिला
प्यारे बन्ने तू सूट पहनना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

प्यारे बन्ने तू शादी रचाना, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

मैंने सोचा था बन्ना डोला लेकर आयगा
लेकिन डोला न मिला
प्यारे बन्ने तू कार लेके, नहीं शरमाना
तू सारे जहाँन से, शादी होएगी तुम्हारी बड़ी शान से-२

29. बन्ने के नैना जादू के बान

बन्ने के नैना जादू के बान, बन्ने के नैना जादू के बान
मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया, मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया ।।

शीश रेशम की पगिया सोहे, मोरे पन्खा की है सिरमोर
मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया, मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया ।।

कान बन्ने के कुन्डल सोहे, मोतियन की है चमकार
मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया, मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया ।।

श्याम बदन पर पियरो जामा, मुनिमन हरत लुभान
मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया, मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया ।।

संग सोहे राजों की बेटी, रुक्मिनी बाम बखान
मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया, मैं वारी-वारी जाऊँ रसिया ।।

30. बन्नी उड़ी उड़ी डोले, बन्नी फूली फूली डोले

बन्नी उड़ी उड़ी डोले, बन्नी फूली फूली डोले
मेरी दूरों से आएगी बारात, मुझे तो ससुराल जाना
वहाँ बाबा नहीं होगें वहाँ दादी नहीं होगीं
मेरे कैसे कटेगें दिन-रात, मुझे तो ससुराल जाना

बन्नी उड़ी उड़ी डोले, बन्नी फूली फूली डोले
मेरी दूरों से आएगी बारात, मुझे तो ससुराल जाना
वहाँ पापा नहीं होगें वहाँ मम्मी नहीं होगीं
मेरे कैसे कटेगें दिन-रात, मुझे तो ससुराल जाना

बन्नी उड़ी उड़ी डोले, बन्नी फूली फूली डोले
मेरी दूरों से आएगी बारात, मुझे तो ससुराल जाना
वहाँ भईया नहीं होगें वहाँ भाभी नहीं होगीं
मेरे कैसे कटेगें दिन-रात, मुझे तो ससुराल जाना

बन्नी उड़ी उड़ी डोले, बन्नी फूली फूली डोले
मेरी दूरों से आएगी बारात, मुझे तो ससुराल जाना
वहाँ जीजा नहीं होगें वहाँ दीदी नहीं होगीं
मेरे कैसे कटेगें दिन-रात, मुझे तो ससुराल जाना

31. बन्नी तुम तो सजन घर जाओगी

बन्नी तुम तो सजन घर जाओगी, बन्नी तेरी कसम याद आओगी
वहाँ सब ही पराये होगें, बन्नी तेरा न कोई होगा
सब अपनी ही अपनी कहेंगें, बन्नी तेरी न कोई सुनेगा
तब मम्मी की याद तुम्हें आएगी, बन्नी छुप छुप के आँसू बहाओगी

बन्नी तुम तो सजन घर जाओगी, बन्नी तेरी कसम याद आओगी
वहाँ सब ही पराये होगें, बन्नी तेरा न कोई होगा
सब अपनी ही अपनी कहेंगें, बन्नी तेरी न कोई सुनेगा
तब दीदी की याद तुम्हें आएगी, बन्नी छुप छुप के आँसू बहाओगी

बन्नी तुम तो सजन घर जाओगी, बन्नी तेरी कसम याद आओगी
वहाँ सब ही पराये होगें, बन्नी तेरा न कोई होगा
सब अपनी ही अपनी कहेंगें, बन्नी तेरी न कोई सुनेगा
तब भाभी की याद तुम्हें आएगी, बन्नी छुप छुप के आँसू बहाओगी

32. बन्नी मेरी चन्द्रकला सी

बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी के बाबा वर ढूंढें निकले, दादी खड़ी हैं उदासी
न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा

बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी के ताऊ वर ढूंढें निकले, ताई खड़ी हैं उदासी
न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा

बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी के पापा वर ढूंढें निकले, मम्मी खड़ी हैं उदासी
न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा

बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी के फूफा वर ढूंढें निकले, बुआ खड़ी हैं उदासी
न जाने वर कैसा मिलेगा
बन्नी मेरी चन्द्रकला सी, न जाने वर कैसा मिलेगा

33. बन्नी धीरे चलो ससुराल गलियाँ

बन्नी धीरे चलो ससुराल गलियाँ
बन्नी बेंदी सम्हारेगीं वही सखियाँ
जिनके गोरे गोरे गाल, रसीली अंखियाँ
जिनकी नरम कलाई, हरेरी चूड़ियाँ

बन्नी धीरे चलो ससुराल गलियाँ
बन्नी हरवा सम्हारेगीं वही सखियाँ
जिनके गोरे गोरे गाल, रसीली अंखियाँ
जिनकी नरम कलाई, हरेरी चूड़ियाँ

बन्नी धीरे चलो ससुराल गलियाँ
बन्नी कुंडल सम्हारेगीं वही सखियाँ
जिनके गोरे गोरे गाल, रसीली अंखियाँ
जिनकी नरम कलाई, हरेरी चूड़ियाँ

बन्नी धीरे चलो ससुराल गलियाँ
बन्नी चूनर सम्हारेगीं वही सखियाँ
जिनके गोरे गोरे गाल, रसीली अंखियाँ
जिनकी नरम कलाई, हरेरी चूड़ियाँ

34. बन्नी हमें कॉलेज के पास मिलना

बन्नी हमें कॉलेज के पास मिलना -२

मैं तो लाऊंगा बन्नी तुम्हारी बेंदी
बन्नी हमें लड़ियाँ सम्हार मिलना

बन्नी हमें----

मैं तो लाऊंगा बन्नी तुम्हारे झाले
बन्नी हमें लटकन सम्हार मिलना

बन्नी हमें-----

मैं तो लाऊंगा बन्नी तुम्हारे कंगना
बन्नी हमें चुड़ियाँ सम्हार मिलना

बन्नी हमें-----

मैं तो लाऊंगा बन्नी तुम्हारी चुनरी
बन्नी हमें साड़ी सम्हार मिलना

बन्नी हमें-----

मैं तो लाऊंगा बन्नी तुम्हारे बिछुआ
बन्नी हमें पायल सम्हार मिलना

बन्नी हमें------

मैं तो लाऊंगा बन्नी तुम्हारा डोला
बन्नी हमें एक दम तैयार मिलना

बन्नी हमें कॉलेज के पास मिलना -२

35. बन्ने के गोरे-2 गाल, गाल पर घुंघर वाले बाल

बन्ने के गोरे-2 गाल, गाल पर घुंघर वाले बाल
बन्ना तेरा क्या कहना,
बन्ने की महकी-2 चाल-चाल पर वारूं चवनी चार
बन्ना तेरा क्या कहना
बन्ने के पतले-2 होंठ, होठ पर वांरू सो का नोट,
बन्ना तेरा क्या कहना,

बन्ने के दादा खरचे नोट, बन्ने की दादी के उड़ गये होश
बन्ना तेरा क्या कहना

बन्ने के गोरे-2 गाल, गाल पर घुंघर वाले बाल
बन्ना तेरा क्या कहना,
बन्ने की महकी-2 चाल-चाल पर वारूं चवनी चार
बन्ना तेरा क्या कहना
बन्ने के पतले-2 होंठ, होठ पर वांरू सो का नोट,
बन्ना तेरा क्या कहना,

बन्ने के पापा खरचे नोट, बन्ने की मम्मी के उड़ गये होश
बन्ना तेरा क्या कहना

बन्ने के गोरे-2 गाल, गाल पर घुंघर वाले बाल
बन्ना तेरा क्या कहना,
बन्ने की महकी-2 चाल-चाल पर वारूं चवनी चार
बन्ना तेरा क्या कहना
बन्ने के पतले-2 होंठ, होठ पर वांरू सो का नोट,
बन्ना तेरा क्या कहना,

बन्ने के भईया खरचे नोट, बन्ने की भाभी के उड़ गये होश
बन्ना तेरा क्या कहना

बन्ने के गोरे-2 गाल, गाल पर घुंघर वाले बाल
बन्ना तेरा क्या कहना,
बन्ने की महकी-2 चाल-चाल पर वारूं चवनी चार
बन्ना तेरा क्या कहना
बन्ने के पतले-2 होंठ, होठ पर वांरू सो का नोट,
बन्ना तेरा क्या कहना

36. बन्ना जाएगा बन्नी के लिए

बन्ना जाएगा बन्नी के लिए,
अरमानों की दुनिया साथ लिए।

बाबा की खुशी का क्या कहना,
बन्ने पर आज न्योंछावर है।
ताऊ की खुशी का क्या कहना,
बन्ने पर आज न्यौछावर है।
दादी ने आशीर्वाद दिया,
चिरंजीव रहे तेरी जोड़ी।
ताई ने आशीर्वाद दिया,
चिरंजीव रहे तेरी जोड़ी।

बन्ना जायेगा बन्नी के लिए,
अरमानों की दुनिया साथ लिए।

पापा की खुशी का क्या कहना,
बन्ने पर आज न्योंछावर है।
चाचा की खुशी का क्या कहना,
बन्ने पर आज न्यौछावर है।
मम्मी ने आशीर्वाद दिया,
चिरंजीव रहे तेरी जोड़ी।
चाची ने आशीर्वाद दिया,
चिरंजीव रहे तेरी जोड़ी।

बन्ना जायेगा बन्नी के लिए,
अरमानों की दुनिया साथ लिए।

फूफा की खुशी का क्या कहना,
बन्ने पर आज न्योंछावर है।
मामा की खुशी का क्या कहना,
बन्ने पर आज न्यौछावर है।
बुआ ने आशीर्वाद दिया,
चिरंजीव रहे तेरी जोड़ी।
ममी ने आशीर्वाद दिया,
चिरंजीव रहे तेरी जोड़ी।

बन्ना जायेगा बन्नी के लिए,
अरमानों की दुनिया साथ लिए।

37. बन्ना तो मेरा चाँदी का गिलास

बन्ना तो मेरा चाँदी का गिलास, चाँद देख शरमाया,
अपने बाबा जी के बागों में जाना, नोटों से जेब भराना।
लुटाना समधी के द्वार, चाँद देख शरमाया।
बन्ना तो मेरी चाँदी का गिलास, चाँद देख शरमाया।

बन्ना तो मेरा चाँदी का गिलास, चाँद देख शरमाया,
अपने पापा जी के बागों में जाना, नोटों से जेब भराना।
लुटाना समधी के द्वार, चाँद देख शरमाया।
बन्ना तो मेरी चाँदी का गिलास, चाँद देख शरमाया।

बन्ना तो मेरा चाँदी का गिलास, चाँद देख शरमाया,
अपने भईया जी के बागों में जाना, नोटों से जेब भराना।
लुटाना समधी के द्वार, चाँद देख शरमाया।
बन्ना तो मेरी चाँदी का गिलास, चाँद देख शरमाया।

38. बन्नी आजा-आजा मेरे बाज़ार बन्नी

बन्नी आजा-आजा मेरे बाज़ार बन्नी
खाजा-खाजा केले अनार।
केले अनार तुझे खूब खिलाऊंगा
बन्नी करजा-करजा शादी का करार
शादी का करार मेरे हाथ में नहीं
शादी तो मेरे बाबा के हाथ है बन्नी..

बन्नी आजा-आजा मेरे बाज़ार बन्नी
खाजा-खाजा केले अनार।
केले अनार तुझे खूब खिलाऊंगा
बन्नी करजा-करजा शादी का करार
शादी का करार मेरे हाथ में नहीं
शादी तो मेरे पापा के हाथ है बन्नी..

बन्नी आजा-आजा मेरे बाज़ार बन्नी
खाजा-खाजा केले अनार।
केले अनार तुझे खूब खिलाऊंगा
बन्नी करजा-करजा शादी का करार
शादी का करार मेरे हाथ में नहीं
शादी तो मेरे भईया के हाथ है बन्नी..

39. बन्ना जोबनिया जलेबी भरी रस की

बन्ना जोबनिया जलेबी भरी रस की

थारे साथ चलुगी म्हारे जंच गई
बन्ना बाबा जी से कहियों म्हारा मन की
बन्ना ताऊ जी से कहियों म्हारा मन की
थारे साथ चलुंगी म्हारे जंचगी
हाथी लाइयो घोड़ा लाइयो मोटर कार
संग में बाराती लाइयो लाइयो रिस्तेदार
बन्ना थारी और म्हारी जोड़ी जंचगी
थारे साथ चलुंगी म्हारे जंचगी..

बन्ना जोबनिया जलेबी......

बन्ना जोबनिया जलेबी भरी रस की
थारे साथ चलुगी म्हारे जंच गई
बन्ना पापा जी से कहियों म्हारा मन की
बन्ना चाचा जी से कहियों म्हारा मन की
थारे साथ चलुंगी म्हारे जंचगी
हाथी लाइयो घोड़ा लाइयो मोटर कार
संग में बाराती लाइयो लाइयो रिस्तेदार
बन्ना थारी और म्हारी जोड़ी जंचगी
थारे साथ चलुंगी म्हारे जंचगी..

बन्ना जोबनिया जलेबी......

बन्ना जोबनिया जलेबी भरी रस की
थारे साथ चलुगी म्हारे जंच गई
बन्ना मामा जी से कहियों म्हारा मन की
बन्ना फूफा जी से कहियों म्हारा मन की
थारे साथ चलुंगी म्हारे जंचगी
हाथी लाइयो घोड़ा लाइयो मोटर कार
संग में बाराती लाइयो लाइयो रिस्तेदार
बन्ना थारी और म्हारी जोड़ी जंचगी
थारे साथ चलुंगी म्हारे जंचगी..

बन्ना जोबनिया जलेबी......

40. बन्ने की शादी होवेगी, नजारा हम भी देखेंगे

बन्ने की शादी होवेगी, नजारा हम भी देखेंगे-२

बन्ने के सीस का सेहरा, वो लडि़यो से उलझता है,
उलझने वाली लडि़यों का नजारा हम भी देखेंगे। बने.......

बन्ने के अंग की शर्ट वो टाइयो से उलझती है,
उलझने वाली टाइयो का नजारा हम भी देखेंगे। बने.........

बन्ने के गल का डोरा वो टिकड़े से उलझता है,
उलझने वाले टिकड़े का नजारा हम भी देखेंगे। बने........

बने के संग की जोड़ी बनड़ी वो जोड़ी से उलझती है,
उलझने वाली जोड़ी का नजारा हम भी देखेंगे।

बन्ने की शादी होवेगी, नजारा हम भी देखेंगे-२

41. बन्नी के दादा जी दे रहे दान के दादी रानी मना करै

बन्नी के दादा जी दे रहे दान के दादी रानी मना करै
बन्नी के ताऊ जी दे रहे दान के ताई रानी मना करै
मत भेजो तिरीया नार के घर के बेटी दो दिन की
मार कांकरी उड़ जाये चिरैया मुंडेरों की
या तो बाधे वंही बध जाये के गैया खुटे की

बन्नी के पापा जी दे रहे दान के मम्मी रानी मना करै
बन्नी के चाचा जी दे रहे दान के चाची रानी मना करै
मत भेजो तिरीया नार के घर के बेटी दो दिन की
मार कांकरी उड़ जाये चिरैया मुंडेरों की
या तो बाधे वंही बध जाये के गैया खुटे की

बन्नी के मामा जी दे रहे दान के मामी रानी मना करै
बन्नी के फूफा जी दे रहे दान के बुआ रानी मना करै
मत भेजो तिरीया नार के घर के बेटी दो दिन की
मार कांकरी उड़ जाये चिरैया मुंडेरों की
या तो बाधे वंही बध जाये के गैया खुटे की

42. बन्ना बुलाए बन्नी नही आए

बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए
आजा प्यारी बन्नी रे, अटरिया सूनी पड़ी
कैसे आऊं बनना ससुर जी खड़े है पायल मेरी बजती है
लम्बा घूँघट डाल के पायल उतार के
चली आओ बन्नी रे अटरिया सूनी पड़ी है

बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए
आजा प्यारी बन्नी रे, अटरिया सूनी पड़ी
कैसे आऊं बनना जेठ जी खड़े है चूड़ी मेरी बजती है
लम्बा घूँघट डाल के चूड़ी उतार के
चली आओ बन्नी रे अटरिया सूनी पड़ी है

बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए
आजा प्यारी बन्नी रे, अटरिया सूनी पड़ी
कैसे आऊं बनना देवर जी खड़े है झूमका मेरा बजता है
लम्बा घूँघट डाल के झूमका उतार के
चली आओ बन्नी रे अटरिया सूनी पड़ी है

बन्ना बुलाए बन्नी नहीं आए
आजा प्यारी बन्नी रे, अटरिया सूनी पड़ी
कैसे आऊं बनना ननदोई जी खड़े है बिछुआ मेरी बजती है
लम्बा घूँघट डाल के बिछुआ उतार के
चली आओ बन्नी रे अटरिया सूनी पड़ी है

43. बन्नो तेरी डोली दरवाजे खड़ी

बन्नो तेरी डोली दरवाजे खड़ी
तेरे बाबा हजारी ने मोल लयी
दादी रानी ने मुतियन की वारी लड़ी

बन्नो तेरी डोली दरवाजे खड़ी
तेरे पापा हजारी ने मोल लयी
मम्मी रानी ने मुतियन की वारी लड़ी

बन्नो तेरी डोली दरवाजे खड़ी
तेरे भईया हजारी ने मोल लयी
भाभी रानी ने मुतियन की वारी लड़ी

44. बन्ना नादान गलियों गलियों में कहता डोले

बन्ना नादान गलियों गलियों में कहता डोले-२

बाबा बराती होगें, ताऊ बराती होगें
पापा बराती होंगे, चाचा बराती होगें
उसी बरात में हैं यार, दूल्हा हमीं बनेगें

बन्ना नादान गलियों गलियों में कहता डोले-२

फूफा बराती होगें, मौसा बराती होगें
मामा बराती होंगे, भईया बराती होगें
उसी बरात में हैं यार, दूल्हा हमीं बनेगें

बन्ना नादान गलियों गलियों में कहता डोले-२

45. बन्ना मेरा फ़ोटो में मचल गया रे

बन्ना मेरा फ़ोटो पर मचल गया रे-२

बाबा जी एक अरज सुन लेना
बन्नी की फ़ोटो मँगवा देना
मैं काली, गोरी देखकर अपना ब्याह रचाऊंगा

बन्ना मेरा फ़ोटो पर मचल गया रे-२

ताऊ जी एक अरज सुन लेना
बन्नी की फ़ोटो मँगवा देना
मैं लम्बी, नाटी देखकर अपना ब्याह रचाऊंगा

बन्ना मेरा फ़ोटो पर मचल गया रे-२

पापा जी एक अरज सुन लेना
बन्नी की फ़ोटो मँगवा देना
मैं पढ़ी-लिखी देखकर अपना ब्याह रचाऊंगा

बन्ना मेरा फ़ोटो पर मचल गया रे-२

46. बन्ना इतने दिन क्वारे क्यों रहे

बन्ना इतने दिन क्वारे क्यों रहे-2
मलिया के गए मलिया न मिला
सेहरा बिन क्वारे हम रहें

बन्ना इतने दिन क्वारे क्यों रहे-२
बजजा के गए बजजा न मिला
जामा बिन क्वारे हम रहें

बन्ना इतने दिन क्वारे क्यों रहे-२
मोची के गए मोची न मिला
जूता बिन क्वारे हम रहें

बन्ना इतने दिन क्वारे क्यों रहे-२
समधी के गए समधी न मिला
बन्नी बिन क्वारे हम रहें

47. बन्नी दूर खेलन मत जइयो

बन्नी दूर खेलन मत जइयो
विदेशी तुझे ले जाएगें-२
मैं तो बैठूँगी बाबा की गोदी
विदेशी मुझे न पाएगें
बन्नी बाबा वचन हार आए
विदेशी तुझे ले जाएगें

बन्नी दूर खेलन मत जइयो
विदेशी तुझे ले जाएगें-२
मैं तो बैठूँगी ताऊ की गोदी
विदेशी मुझे न पाएगें
बन्नी ताऊ वचन हार आए
विदेशी तुझे ले जाएगें

बन्नी दूर खेलन मत जइयो
विदेशी तुझे ले जाएगें-२
मैं तो बैठूँगी पापा की गोदी
विदेशी मुझे न पाएगें
बन्नी पापा वचन हार आए
विदेशी तुझे ले जाएगें

बन्नी दूर खेलन मत जइयो
विदेशी तुझे ले जाएगें-२
मैं तो बैठूँगी चाचा की गोदी
विदेशी मुझे न पाएगें
बन्नी चाचा वचन हार आए
विदेशी तुझे ले जाएगें

48. बन्ना मेरे घर आना जमाई बन के

बन्ना मेरे घर आना जमाई बन के
बन्ना बेंदी गढ़वाना कमाई करके
दोनों हाथों से पहनाना अरमान भर के

बन्ना मेरे घर आना जमाई बन के
बन्ना कँगना गढ़वाना कमाई करके
दोनों हाथों से पहनाना अरमान भर के

बन्ना मेरे घर आना जमाई बन के
बन्ना झूमका गढ़वाना कमाई करके
दोनों हाथों से पहनाना अरमान भर के

बन्ना मेरे घर आना जमाई बन के
बन्ना बिछुआ गढ़वाना कमाई करके
दोनों हाथों से पहनाना अरमान भर के

49. बन्ने राजा बरात ले के आजा

बन्ने राजा, बरात ले के आना, ज़रा न शरमाना
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर
मैंने कहा था बाबा बराती लाना
दादी को ले आए, नचाते हुए लाए, ज़रा न शरमाये
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर

बन्ने राजा, बरात ले के आना, ज़रा न शरमाना
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर
मैंने कहा था पापा बराती लाना
मम्मी को ले आए, नचाते हुए लाए, ज़रा न शरमाये
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर

बन्ने राजा, बरात ले के आना, ज़रा न शरमाना
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर
मैंने कहा था भईया बराती लाना
भाभी को ले आए, नचाते हुए लाए, ज़रा न शरमाये
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर

बन्ने राजा, बरात ले के आना, ज़रा न शरमाना
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर
मैंने कहा था जीजा बराती लाना
दीदी को ले आए, नचाते हुए लाए, ज़रा न शरमाये
तू कानपुर की रोड पर, तूझे बन्नी मिलेगी हर मोड़ पर

इस गीत में कानपुर की जगह आप अपने शहर का नाम लेकर गायें
बन्नी-बन्ने के स्थान पर वर-कन्या का नाम भी लिया जा सकता है

50. बड़ी दूर से आया बन्ना

बड़ी दूर से आया बन्ना, लेकिन बन्नी न बोले -२

बन्नी के बाबा बोले, बन्नी के ताऊ बोले,
बन्नी की बेंदी बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर-------

बन्नी का कजरा बोले, बन्नी का गजरा बोले,
बन्नी की मेंहदी बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर-------

बन्नी के पापा बोले, बन्नी के चाचा बोले,
बन्नी का कंगना बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर-------

बन्नी की चुनरी बोले, बन्नी की मुदरी बोले,
बन्नी का झूमर बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर--------

बन्नी के भईया बोले, बन्नी के जीजा बोले,
बन्नी का हरवा बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर--------

बन्नी की अदाएँ बोले, बन्नी की निगाहें बोले
बन्नी की हँसी बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर--------

बन्नी के मामा बोले,बन्नी के फूफा बोले,
बन्नी की पायल बोले लेकिन बन्नी न बोले.

बड़ी दूर से आया बन्ना लेकिन बन्नी न बोले -२

51. बाग लगाये मधुबन में

बाग लगाये मधुबन में, खिलेंगे फूल मन में,
खुशी का दिन आया है।
बन्नी पूछो बन्ने अपने से, कौन तपस्या तुमने कीनी,
बन्नी तो बड़ी सुन्दर है।
बाबा अपने का हुक्म बजाया, दादी के कहे आज्ञाकारी,
बन्नी तो बड़ी सुन्दर है।
बाग लगाये मधुबन में, खिलेंगे फूल मन में।

बाग लगाये मधुबन में, खिलेंगे फूल मन में,
खुशी का दिन आया है।
बन्नी पूछो बन्ने अपने से, कौन तपस्या तुमने कीनी,
बन्नी तो बड़ी सुन्दर है।
पापा अपने का हुक्म बजाया, मम्मी के कहे आज्ञाकारी,
बन्नी तो बड़ी सुन्दर है।
बाग लगाये मधुबन में, खिलेंगे फूल मन में।

बाग लगाये मधुबन में, खिलेंगे फूल मन में,
खुशी का दिन आया है।
बन्नी पूछो बन्ने अपने से, कौन तपस्या तुमने कीनी,
बन्नी तो बड़ी सुन्दर है।
भईया अपने का हुक्म बजाया, भाभी के कहे आज्ञाकारी,
बनी तो बड़ी सुन्दर है।
बाग लगाये मधुबन में, खिलेंगे फूल मन में।

52. भरी महफिल में बन्ना

भरी महफ़िल में बन्ना बाँध के आया सेहरा-२
बाग में बैठकर बाबा ने गुंथाया सेहरा
दादी रानी ने सर आँखों से लगाया सेहरा

भरी महफ़िल में बन्ना बाँध के आया सेहरा-२
बाग में बैठकर पापा ने गुंथाया सेहरा
मम्मी रानी ने सर आँखों से लगाया सेहरा

भरी महफ़िल में बन्ना बाँध के आया सेहरा-२
बाग में बैठकर भईया ने गुंथाया सेहरा
भाभी रानी ने सर आँखों से लगाया सेहरा

भरी महफ़िल में बन्ना बाँध के आया सेहरा-२
बाग में बैठकर जीजा ने गुंथाया सेहरा
जीजी रानी ने सर आँखों से लगाया सेहरा

53. महलों के बीच बन्नी

महलों के बीच बन्नी ने केश सुखाये-2

बाबा सुघर वार ढूँढों, नवल वार ढूंढो
ताऊ सुघर वार ढूँढों, नवल वार ढूंढो
दादी लेगीं कन्यादान बन्नी ने केश सुखाये
ताई लेगीं कन्यादान बन्नी ने केश सुखाये

महलों के बीच बन्नी ने केश सुखाये-2

पापा सुघर वार ढूँढों, नवल वार ढूंढो
चाचा सुघर वार ढूँढों, नवल वार ढूंढो
मम्मी लेगीं कन्यादान बन्नी ने केश सुखाये
चाची लेगीं कन्यादान बन्नी ने केश सुखाये

महलों के बीच बन्नी ने केश सुखाये-2

54. मानो बन्ना मानो बराबर लडूंगी

मानो बना मानो बराबर लडूंगी
कोर्ट लडूंगी हाई कोर्ट लडूगी
दिल्ली के कोर्ट में जरूर लडूंगी

ससुर जी को भेजो ज़रा बात करूंगी
सासु जी का मन्दिर जाना बन्द करूंगी

मानो बना मानो बराबर लडूंगी
कोर्ट लडूंगी हाई कोर्ट लडूंगी,
दिल्ली की कोर्ट में जरूर लडूंगी

जेठ जी को भेजो जरा बात करूंगी,
जेठानी का झगड़ा करना बन्द करूंगी,

कोर्ट लडूंगी हाई कोर्ट लडूंगी
दिल्ली के कोर्ट में जरूर लडूंगी
मानो बना मानो बराबर लडूंगी

देवर जी को भेजो जरा बात करूंगी,
देवरानी का पीहर जाना बन्द करूंगी

कोर्ट लडूंगी हाई कोर्ट लडूंगी,
दिल्ली के कोर्ट में जरूर लडूंगी
मानो बना मानो बराबर लडूंगी

नन्दोई जी को भेजो जरा बात करूंगी,
ननद जी का चुगली चाला बन्द करूंगी

कोर्ट लडूंगी हाई कोर्ट लडूंगी,
दिल्ली के कोर्ट में जरूर लडूंगी
मानो बना मानो बराबर लडूंगी

55. मेरी बन्नी का रचा है ब्याह सखी री मंगल गाओ

मेरी बन्नी का रचा है ब्याह सखी री मंगल गाओ-२

शीश बन्नी के टीका सोहे
नाक बन्नी के बेसर सोहे
झूमर पै इतर लगाओ सखी री मंगल गाओ

मेरी बन्नी का रचा है ब्याह सखी री मंगल गाओ-२

कान बन्नी के कुण्डल सोहे
हाथ बन्नी के मेंहदी सोहे
कंगन पै इतर लगाओ सखी री मंगल गाओ

मेरी बन्नी का रचा है ब्याह सखी री मंगल गाओ-२

गले बन्नी के हरवा सोहे
पैर बन्नी के पायल सोहे
बिछुवों पै इतर लगाओ सखी री मंगल गाओ

मेरी बन्नी का रचा है ब्याह सखी री मंगल गाओ-२

अंग बन्नी के साड़ी सोहे
संग बन्नी के बन्ना सोहे
जोड़े पै इतर लगाओ सखी री मंगल गाओ

मेरी बन्नी का रचा है ब्याह सखी री मंगल गाओ-२

56. मेरी हरी हरी चुड़ियों से बाहें भरी

मेरी हरी हरी चुड़ियों से बाहें भरी,
दादी देओ ना सुहाग बन्नी कब की खड़ी
ऐ सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी
तेरे माथे में सिन्दुर मांग मोतीयां जड़ी
हे सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी

मेरी हरी हरी चुड़ियों से बाहें भरी,
ताई देओ ना सुहाग बन्नी कब की खड़ी
ऐ सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी
तेरे माथे में सिन्दुर मांग मोतीयां जड़ी
हे सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी

मेरी हरी हरी चुड़ियों से बाहें भरी,
मम्मी देओ ना सुहाग बन्नी कब की खड़ी
ऐ सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी
तेरे माथे में सिन्दुर मांग मोतीयां जड़ी
हे सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी

मेरी हरी हरी चुड़ियों से बाहें भरी,
चाची देओ ना सुहाग बन्नी कब की खड़ी
ऐ सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी
तेरे माथे में सिन्दुर मांग मोतीयां जड़ी
हे सुहाग देगा राम जोड़ी हद की बनी

57. मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने

मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2
मैंने दिल तुझको दिया-2
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने
मेरे बाबा सजे मेरे ताऊ सजे
लड़की वालों के घर पर हमला किया
बागों को लूट लाये बन्नी को ब्याह लाये
तमाश खूब किया
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2

मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2
मैंने दिल तुझको दिया-2
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने
मेरे पापा सजे मेरे चाचा सजे
लड़की वालों के घर पर हमला किया
बागों को लूट लाये बन्नी को ब्याह लाये
तमाश खूब किया
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2

मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2
मैंने दिल तुझको दिया-2
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने
मेरे मामा सजे मेरे फूफा सजे
लड़की वालों के घर पर हमला किया
बागों को लूट लाये बन्नी को ब्याह लाये
तमाश खूब किया
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2

मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2
मैंने दिल तुझको दिया-2
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने
मेरे भईया सजे मेरे जीजा सजे
लड़की वालों के घर पर हमला किया
बागों को लूट लाये बन्नी को ब्याह लाये
तमाश खूब किया
मेरे हरियाले बन्ने मेरे शहजादे बन्ने-2

58. रंगीली घोड़ियाँ झनकारों से सजकर

रंगीली घोडियां झनकारों से सजकर आई
उसके बाबा लाये सजा सजा कर घोड़ी
दादी रानी के प्यारे चढो करो मत देरी
समय आ गया ससुराल घर जाने का

रंगीली घोडियां झनकारों से सजकर आई
उसके ताऊ लाये सजा सजा कर घोड़ी
ताई रानी के प्यारे चढो करो मत देरी
समय आ गया ससुराल घर जाने का

रंगीली घोडियां झनकारों से सजकर आई
उसके पापा लाये सजा सजा कर घोड़ी
मम्मी रानी के प्यारे चढो करो मत देरी
समय आ गया ससुराल घर जाने का

रंगीली घोडियां झनकारों से सजकर आई
उसके चाचा लाये सजा सजा कर घोड़ी
चाची रानी के प्यारे चढो करो मत देरी
समय आ गया ससुराल घर जाने का

59. लाड़ो पूछे दादी से ओ दादी

लाड़ो पूछें दादी से ओ दादी
मैं किस मिस देखन जाऊं, रंगीले आ उतरे बागां मा

हाथ टोकरिया फूलों की
मालन बनकर जा बन्नी, रंगीले आ उतरे बागां मा
काची-काची कलियां तोडूं थी बागां मा
मै उलझ पड़ी घुघंट मा, मुखड़ा देख गये बागां मा
बोल-बतलाये गये बागां मा
हमारी सावै चढ़ी बन्नी के नजर लगायै गये बागां मा
हमारी तेल चढ़ी बन्नी के नजर लगायै गये बागां मा

लाड़ो पूछें ताई से ओ ताई
मैं किस मिस देखन जाऊं, रंगीले आ उतरे पनघट मा

हाथ गठरिया कपड़ों की
धोबन बनकर जा बन्नी, रंगीले आ उतरे पनघट मा
काची काची चुनरिया धोऊँ थी पनघट मा
मै उलझ पड़ी घुघंट मा, मुखड़ा देख गये पनघट मा
बोल-बतलाये गये पनघट मा
हमारी सावै चढ़ी बन्नी के नजर लगायै गये पनघट मा
हमारी तेल चढ़ी बन्नी के नजर लगायै गये पनघट मा

लाड़ो पूछें मम्मी से ओ मम्मी
मैं किस मिस देखन जाऊं, रंगीले आ उतरे नगर मा

हाथ डिलइया बासन की
कहारन बनकर जा बन्नी, रंगीले आ उतरे नगर मा
काचे काचे बर्तन बनाऊँ थी नगर मा
मै उलझ पड़ी घुघंट मा, मुखड़ा देख गये नगर मा
बोल-बतलाये गये नगर मा
हमारी सावै चढ़ी बन्नी के नजर लगायै गये नगर मा
हमारी तेल चढ़ी बन्नी के नजर लगायै गये नगर मा

60. लीपो आँगना, बाँधो बाँधना आज बन्नी की शादी है

लीपो आँगना, बाँधो बाँधना आज बन्नी की शादी है
बन्ने के बाबा ने खत लिख भेजा, कैसी बन्नी ढूँढी है
पढ़ी-लिखी होशियार बहुत है, बोली मधुर रसीली है

लीपो आँगना, बाँधो बाँधना आज बन्नी की शादी है
बन्ने के ताऊ ने खत लिख भेजा, कैसी बन्नी ढूँढी है
पढ़ी-लिखी होशियार बहुत है, बोली मधुर रसीली है

लीपो आँगना, बाँधो बाँधना आज बन्नी की शादी है
बन्ने के पापा ने खत लिख भेजा, कैसी बन्नी ढूँढी है
पढ़ी-लिखी होशियार बहुत है, बोली मधुर रसीली है

लीपो आँगना, बाँधो बाँधना आज बन्नी की शादी है
बन्ने के चाचा ने खत लिख भेजा, कैसी बन्नी ढूँढी है
पढ़ी-लिखी होशियार बहुत है, बोली मधुर रसीली है

61. लैला मिली मजनूँ न मिला

लैला मिली मजनूँ न मिला-२
बड़े जोर की आँधी आई
बन्नी चढ़ गई कोठे पर
नीचे से वो बन्ना बोले
ओय ओय ओय बन्नी उड़ मत जाना आँधी में

लैला मिली मजनूँ न मिला-२
बड़े जोर की बदरी छाई
बन्नी चढ़ गई कोठे पर
नीचे से वो बन्ना बोले
ओय ओय ओय बन्नी सो मत जाना बदरी में

लैला मिली मजनूँ न मिला-२
बड़े जोर से पानी बरसा
बन्नी चढ़ गई कोठे पर
नीचे से वो बन्ना बोले
ओय ओय ओय बन्नी बह मत जाना पानी में

लैला मिली मजनूँ न मिला-२

62. सनन सनन सांय सांय

सनन सनन सांय सांय हो रही थी रेल में-२
पहले डिब्बे में बैठे थे सास और ससुर जी
सीता-राम सीता-राम हो रही थी रेल में

सनन सनन सांय सांय हो रही थी रेल में-२
दूजे डिब्बे में बैठे थे जेठ और जेठानी
घूसा-लात घूसा-लात हो रही थी रेल में

सनन सनन सांय सांय हो रही थी रेल में-२
तीजे डिब्बे में बैठे थे ननद और ननदोई जी
सोजा मुन्ने, सोजा मुन्ने रही थी रेल में

सनन सनन सांय सांय हो रही थी रेल में-२
चौथे डिब्बे में बैठे थे बन्ना और बन्नी
आई लव यू, आई लव यू हो रही थी रेल में

सनन सनन सांय सांय हो रही थी रेल में-२
पाँचवे डिब्बे में बैठे थे देवर और बराती
तांका-झाँकी, तांका-झाँकी हो रही थी रेल में

63. सावन का महीना बन्ने ने कीया शोर

सावन का महीना बन्ने ने कीया शोर
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

दादा बराती आये दादी को संग में लाये
जब से बन्नी आयी दादी का चले ना जोर।
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

सावन का महीना बन्ने ने कीया शोर
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

पापा बराती आये मम्मी को संग में लाये
जब से बन्नी आयी मम्मी का चले ना जोर।
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

सावन का महीना बन्ने ने कीया शोर
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

भईया बराती आये भाभी को संग में लाये
जब से बन्नी आयी भाभी का चले ना जोर।
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

सावन का महीना बन्ने ने कीया शोर
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

जीजा बराती आये जीजी को संग में लाये
जब से बन्नी आयी जीजी का चले ना जोर।
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

सावन का महीना बन्ने ने कीया शोर
जल्दी शादी कर दो मंहगाई का है जोर

64. सुहाग बरसे बन्नी तेरे अँगनवा

सुहाग बरसे बन्नी तेरे अँगनवा- २
दादी के आँगन सुहाग बन्नी मांगे
अमर रहे बन्नी तेरो सिंदुरवा

सुहाग बरसे बन्नी तेरे अँगनवा- २
बुआ के आँगन सुहाग बन्नी मांगे
अमर रहे बन्नी तेरो कंगनवा

सुहाग बरसे बन्नी तेरे अँगनवा- २
भाभी के आँगन सुहाग बन्नी मांगे
अमर रहे बन्नी तेरी चुनरियां

सुहाग बरसे बन्नी तेरे अँगनवा- २
मौसी के आँगन सुहाग बन्नी मांगे
अमर रहे बन्नी तेरो बिछुवा

सुहाग बरसे बन्नी तेरे अँगनवा- २
दीदी के आँगन सुहाग बन्नी मांगे
अमर रहे बन्नी तेरो सजनवा

65. हरियाली बन्नी लाड़ली

हरियाली बन्नी लाड़ली फुलबगिया घूमन गई आज-२
बन्नी के बाबा बन्नी से बोले प्यारी बन्नी घर चलो
दरवाजे पे आ गई बरात फुलबगिया घूमन गई आज

हरियाली बन्नी लाड़ली फुलबगिया घूमन गई आज-२
पापा के बाबा बन्नी से बोले प्यारी बन्नी घर चलो
दरवाजे पे आ गई बरात फुलबगिया घूमन गई आज

हरियाली बन्नी लाड़ली फुलबगिया घूमन गई आज-२
बन्नी के भईया बन्नी से बोले प्यारी बन्नी घर चलो
दरवाजे पे आ गई बरात फुलबगिया घूमन गई आज

एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के गीत NCERT Ke Geet

अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! हरिवंशराय बच्चन

वृक्ष हों भलें खड़े,

हों घने, हों बड़ें,

एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत, माँग मत!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

तू न थकेगा कभी!

तू न थमेगा कभी!

तू न मुड़ेगा कभी!—कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

यह महान दृश्य है—

चल रहा मनुष्य है

अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

स्रोत :

पुस्तक : बच्चन के लोकप्रिय गीत (पृष्ठ 43)
रचनाकार : हरिवंशराय बच्चन
प्रकाशन : हिंद पॉकेट बुक्स
संस्करण : 2004


एक गीत (दिन जल्दी-जल्दी ढलता है हरिवंशराय बच्चन

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

हो जाए न पथ में रात कहीं,

मंज़िल भी तो है दूर नहीं—

यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,

नीड़ों से झाँक रहे होंगे—

यह ध्यान परों में चिड़िया के भरता कितनी चंचलता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?

मैं होऊँ किसके हित चंचल?

यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्लता है!

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

कर चले हम फ़िदा कैफ़ी आज़मी

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दसवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

कर चले हम फ़िदा जानो-तन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

साँस थमती गई, नब्ज़ जमती गई

फिर भी बढ़ते क़दम को न रुकने दिया

कट गए सर हमारे तो कुछ ग़म नहीं

सर हिमालय का हमने न झुकने दिया

मरते-मरते रहा बाँकपन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर

जान देने की रुत रोज़ आती नहीं

हुस्न और इश्क़ दोनों को रुस्वा करे

वो जवानी जो ख़ूँ में नहाती नहीं

आज धरती बनी है दुलहन साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

राह क़ुर्बानियों की न वीरान हो

तुम सजाते ही रहना नए क़ाफ़िले

फ़तह का जश्न इस जश्न के बाद है

ज़िंदगी मौत से मिल रही है गले

बाँध लो अपने सर से कफ़न साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो

खींच दो अपने ख़ूँ से ज़मीं पर लकीर

इस तरफ़ आने पाए न रावन कोई

तोड़ दो हाथ अगर हाथ उठने लगे

छू न पाए सीता का दामन कोई

राम भी तुम, तुम्हीं लक्ष्मण साथियो

अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो।

जाग तुझको दूर जाना महादेवी वर्मा

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा ग्यारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

चिर सजग आँखे उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!

जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरी के ह्रदय में आज चाहे कंप हो ले,

या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;

आज पी आलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,

जागकर विद्युत-शिखाओं में निठुर तूफ़ान बोले!

पर तुझे है नाश-पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!

जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?

पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?

विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,

क्या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!

जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,

दे किसे जीवन सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?

सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?

विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया?

अमरता-सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?

जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,

आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;

हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,

राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!

है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!

जाग तुझको दूर जाना!


मुर्ग़ा बोला कुकड़ू-कूँ |अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा एक के पाठ्यक्रम में शामिल है।

मुर्ग़ा बोला कुकड़ू-कूँ,

चल मेरे भैया रुकता क्यूँ!

कुत्ता भौंके, भौं-भौं-भौं,

अटकी गाड़ी पौं-पौं-पौं।

बकरी आई, बिल्ली आई,

मेंऽ-मेंऽ आई, म्याऊँ-म्याऊँ आई।

धक्की गाड़ी धौं-धौं-धौं,

चल दी गाड़ी पौं-पौं-पौं।

स्रोत :

पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 25)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022

चींटा | अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दूसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

चींटा-चींटा दूध ला,

दूध लाकर दही जमा,

बढ़िया-बढ़िया दही जमा,

खट्टा-मीठा दही जमा।

चींटा-चींटा गन्ना ला,

गन्ना लाकर शक्कर बना,

चींटी भूखी आएगी,

झटपट वो खा जाएगी।

चींटा-चींटा शक्कर ला,

शक्कर लाकर शरबत बना,

चींटी प्यासी आएगी,

झटपट वो पी जाएगी।

चींटा-चींटा घप बना,

चींटी धूप से आएगी,

देख के ख़ुश हो जाएगी,

झट-से-वो रुक जाएगी।

चींटा-चींटा बाज़ार जा,

शक्कर ला, चावल ला,

रोटी ला, पानी ला,

झटपट जा, झटपट आ।

चींटी जब घर आएगी,

देख के ख़ुश हो जाएगी,

तेरे ही गुण गाएगी,

तेरे ही गुण गाएगी।

स्रोत :

पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 20)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022

कार्नेलिया का गीत | जयशंकर प्रसाद

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है। —'चंद्रगुप्त' नाटक से

अरुण यह मधुमय देश हमारा!

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।

सरस तामरस गर्भ विभा पर-नाच रही तरुशिखा मनोहर।

छिटका जीवन हरियाली पर-मंगल कुंकुम सारा!

लघु सुरधुन से पंख पसारे-शीतल मलय समीर सहारे।

उड़ते खग जिस ओर मुँह किए-समझ नीड़ निज प्यारा।

बरसाती आँखों के बादल-बनते जहाँ भरे करुणा जल।

लहरें टकराती अंनत की-पाकर जहाँ किनारा।

हेम कुंभ ले उषा सवेरे-भरती ढुलकाती सुख मेरे।

मदिर ऊँघते रहते जब-जगकर रजनी भर तारा।

टिल्लू जी | नरेश सक्सेना

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दूसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

टिल्लू जी स्कूल गए,

बस्ता घर पर भूल गए।

रस्ते भर थे डरे-डरे,

पहुँच गेट पर अरे-अरे।

छुट्टी का नोटिस चिपका,

देख ख़ुशी से फूल गए।

दोंनो बाँहें माँ के,

डाल गले में झूल गए।

देवसेना का गीत | जयशंकर प्रसाद

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है। —'स्कंदगुप्त' नाटक से

आह! वेदना मिली विदाई!

मैंने भ्रम-वश जीवन संचित,

मधुकरियों की भीख लुटाई।

छलछल थे संध्या के श्रमकण,

आँसू-से गिरते थे प्रतिक्षण।

मेरी यात्रा पर लेती थी—

नीरवता अनंत अँगड़ाई।

श्रमित स्वप्न की मधुमाया में,

गहन-विपिन की तरु-छाया में,

पथिक उनींदी श्रुति में किसने—

यह विहाग की तान उठाई।

लगी सतृष्ण दीठ थी सबकी,

रही बचाए फिरती कबकी।

मेरी आशा आह! बावली,

तूने खो दी सकल कमाई।

चढ़कर मेरे जीवन-रथ पर,

प्रलय चल रहा अपने पथ पर।

मैंने निज दुर्बल पद-बल पर,

उससे हारी-होड़ लगाई।

लौटा लो यह अपनी थाती

मेरी करुणा हा-हा खाती

विश्व! न सँभलेगी यह मुझसे

इससे मन की लाज गँवाई।


उत्साह | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दसवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

बादल, गरजो!—

घेर घेर घोर गगन, धाराधर ओ!

ललित ललित, काले घुँघराले,

बाल कल्पना के-से पाले,

विद्युत-छवि उर में,कवि नवजीवन वाले!

वज्र छिपा, नूतन कविता

फिर भर दो—

बादल गरजो!

विकल विकल उन्मन थे उन्मन

विश्व के निदाघ के सकल जन,

आए अज्ञात दिशा से अनंत के घन!

तृप्त धरा, जल से फिर

शीतल कर दो—

बादल, गरजो!


चंदा मामा दूर के | अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा एक के पाठ्यक्रम में शामिल है।

चंदा मामा दूर के,

पुए पकाएँ बूर के;

आप खाएँ थाली में,

मुन्ने को दें प्याली में।

प्याली गई टूट,

मुन्ना गया रूठ।

लाएँगे नई प्यालियाँ,

बजा-बजा के तालियाँ,

मुन्ने को मनाएँगे,

हम दूध-मलाई खाएँगे।

स्रोत :

पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 7)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022


हिंद देश के निवासी | अज्ञात

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा तीसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

(पढ़ने के लिए)

हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं,

रंग, रूप, वेश, भाषा चाहे अनेक हैं।

बेला, गुलाब, जूही, चंपा, चमेली,

प्यारे-प्यारे फूल गूँथे माला में एक हैं।

कोयल की कूक प्यारी, पपीहे की टेर प्यारी,

गा रही तराना बुलबुल, राग मगर एक हैं।

गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी,

जाके मिलीं सागर में, हुई सब एक हैं।

स्रोत :

पुस्तक : वीणा (पृष्ठ 154)
प्रकाशन : एनसीईआरटी
संस्करण : 2022


आह्वान | अशफाक़उल्ला खाँ


प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

कस ली है कमर अब तो, कुछ करके दिखलाएँगे,

आज़ाद ही हो लेंगे, या सर ही कटा देंगे।

हटने के नहीं पीछे, डर कर कभी जुल्मों से,
तुम हाथ उठाओगे, हम पैर बढ़ा देंगे।

बेशस्त्र नहीं है हम, बल है हमें चरखे का,
चरखे से ज़मीं को हम, ता चर्ख़ गुँजा देंगे।

परवा नहीं कुछ दम की, ग़म की नहीं, मातम
की, है जान हथेली पर, एक दम में गवाँ देंगे।

उफ़ तक भी जुबां से हम हरगिज़ न निकालेंगे,
तलवार उठाओ तुम, हम सर को झुका देंगे।

सीखा है नया हमने लड़ने का यह तरीक़ा,
चलवाओ गन मशीनें, हम सीना अड़ा देंगे।

दिलवाओ हमें फाँसी, ऐलान से कहते हैं,
ख़ूँ से ही शहीदों के, फ़ौज बना देंगे।

मुसाफ़िर जो अंडमान के तूने बनाए ज़ालिम,
आज़ाद ही होने पर, हम उनको बुला लेंगे।

साथी हाथ बढ़ाना | साहिर लुधियानवी


प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा छठी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

साथी हाथ बढ़ाना

एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना।

साथी हाथ बढ़ाना।

हम मेहनतवालों ने जब भी, मिलकर क़दम बढ़ाया

सागर ने रस्ता छोड़ा, परबत ने सीस झुकाया

फ़ौलादी हैं सीने अपने, फ़ौलादी हैं बाँहें

हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें

साथी हाथ बढ़ाना।

मेहनत अपने लेख की रेखा, मेहनत से क्या डरना

कल ग़ैरों की ख़ातिर की, आज अपनी ख़ातिर करना

अपना दुख भी एक है साथी, अपना सुख भी एक

अपनी मंज़िल सच की मंज़िल, अपना रस्ता नेक

साथी हाथ बढ़ाना।

एक से एक मिले तो क़तरा, बन जाता है दरिया

एक से एक मिले तो ज़र्रा, बन जाता है सेहरा

एक से एक मिले तो राई, बन सकती है परबत

एक से एक मिले तो इंसाँ, बस में कर ले क़िस्मत

साथी हाथ बढ़ाना।

हम होंगे कामयाब एक दिन  | गिरिजाकुमार माथुर

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा सातवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

हम होंगे कामयाब एक दिन

हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम होंगे...

होगी शांति चारों ओर,

होगी शांति चारों ओर एक दिन,

हो हो मन में है विश्वास पूरा है विश्वास,

होगी शांति चारों ओर एक दिन।

हम होंगे...

हम चलेंगे साथ-साथ,

डाल हाथों में हाथ,

हम चलेंगे साथ-साथ एक दिन

हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

हम होंगे...

नहीं डर किसी का आज

नहीं भय किसी का आज

नहीं डर की का आज एक दिन।

हो हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास

नहीं डर किसी का आज के दिन

हम होंगे...























एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के नाटक | NCERT ALL Plays Natak in Hindi

चावल की रोटियाँ | पी.औंग खिन 

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा पाँचवी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

पात्र-परिचय

कोको : आठ साल का एक बर्मी लड़का, कुछ मोटा

नीनी : नौ साल का बर्मी लड़का, कोको का दोस्त

तिन सू : आठ साल का बर्मी लड़का, कोको का दोस्त

मिमि : सात साल की बर्मी लड़की, कोको की दोस्त

उ बा तुन : जनता की दुकान का प्रबंधक (इसका अभिनय कोई लंबे कद का लड़का नकली मूँछें और चश्मा लगाकर कर सकता है)


(एक सादा कमरा, दीवारों पर बाँस की चटाइयाँ। एक दीवार के सहारे रखी अलमारी। अलमारी के ऊपर एक रेडियो, चाय की केतली, कुछ कप और ख़ाली गुलाबी फूलदान रखा है। कमरे के बीच फ़र्श पर एक चटाई बिछी है जिसके ऊपर कम ऊँचाई वाली गोल मेज़ रखी है। दो दरवाज़े। एक दरवाज़ा पीछे की ओर खुलता है और दूसरा एक किनारे की ओर। पंछियों के चहचहाने के साथ-साथ पर्दा उठता है। दूर कहीं मुर्ग़ा बाँग देता है। कुत्ता भौंकता है। कहीं प्रार्थना की घंटियाँ बजती हैं। को को आता है, जँभाई लेकर अपने को सीधा करता है।)

कोको—माता-पिता धान लगाने खेतों में चले गए हैं। जब तक माँ खाना बनाने के लिए लौटकर नहीं आती। मुझे घर की देखभाल करनी है। हूँ...ऊँ....ऊँ...देखता हूँ माँ ने नाश्ते में मेरे लिए क्या बनाकर रखा है।

(वह अलमारी की तरफ़ जाता है और उसे खोलकर देखता है। एक तश्तरी निकालकर देखता है कि चावल की चार रोटियाँ हैं। वह होंठों पर जीभ फेरता है और मुस्कुराता है।

कोको—आहा...मज़ा आ गया। चावल की रोटियाँ। मेरी मनपसंद चीज़।

(वह पेट मलता हुआ रोटियों को मेज़ पर रखता है और बैठ जाता है।)

कोको—आज तो डट कर नाश्ता होगा।

(वह एक रोटी उठाकर मुँह में डालने लगता है, तभी कोई दरवाज़े पर दस्तक देता है।)

नीनी—कोको...ए कोको! दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ नीनी।

कोको—ग़ज़ब हो गया। यह तो भुक्खड़ नीनी है। उसकी नज़र में रोटियाँ पड़ीं तो ज़रूर माँगेगा। मैं इन्हें छिपा देता हूँ।

नीनी—दरवाज़ा खोलो कोको, तुम क्या कर रहे हो? इतनी देर लगा दी।

कोको—मैं इन्हें कहाँ छिपाऊँ? कहाँ छिपाऊँ? (रेडियो की तरफ़ देखकर) मैं तश्तरी को रेडियो के पीछे छिपा दूँगा। (ज़ोर से) अभी आता हूँ नीनी...ज़रा रुको।

कोको—आओ, नीनी। अंदर आ जाओ। (नीनी अंदर आता है।)

नीनी—दरवाज़ा खोलने में इतनी देर क्यों लगाई?

कोको—कुछ ख़ास नहीं...मैंने अभी-अभी नाश्ता किया और मुँह धोने लगा था। बोलो, सुबह-सुबह कैसे आना हुआ?

नीनी—क्या? यह मत कहना कि तुम भूल गए थे। परीक्षा के बारे में रेडियो पर ख़ास सूचना आने वाली है।

कोको—लेकिन तुम्हारे घर भी तो रेडियो है।

नीनी—वह ख़राब है। इसीलिए सोचा तुम्हारे रेडियो पर सुनूँगा।

(नीनी गोल मेज़ के पास बैठ जाता है।)

नीनी—रेडियो उठाकर यहीं ले आओ ताकि हम आराम से लेटे-लेटे सुन सकें।


कोको—नीनी हमारे रेडियो में भी कुछ ख़राबी है।

नीनी—आओ, कोशिश करके देखें। मैं उठाकर ले आता हूँ।

(नीनी अलमारी की तरफ़ जाने लगता है।)

कोको—नहीं, नहीं। नीनी, इसे मत छूना। छुओगे तो करंट लगेगा। (नीनी रुक जाता है।)

नीनी—मैंने तो इसे छू ही लिया था। भई, मैं वह ख़बर ज़रूर सुनना चाहता हूँ। तिन सू के घर जाता हूँ। तुम आओगे?

कोको—नहीं। अच्छा फिर मिलेंगे।

(नीनी तेज़ी से बाहर निकल जाता है।)

कोको—(गहरी साँस लेकर) बाल-बाल बचे। अब चलकर नाश्ता किया जाए। मेरे पेट में चूहे दौड़ने लगे हैं।

(कोको तश्तरी उठाकर मेज़ के पास आता है। एक रोटी उठाकर खाने लगता है, तभी दरवाज़े पर दस्तक सुनाई देती है।)

कोको—(तश्तरी नीचे रखकर) जाने अब कौन आ टपका।

मिमि—कोको, दरवाज़ा खोलो। मैं हूँ मिमि।

कोको—बाप रे। यह तो मिमि है। उसे चावल की रोटियाँ मेरी ही तरह बहुत अच्छी लगती हैं और वह हमेशा भूखी होती है। मुझे रोटियाँ छिपा देनी चाहिए। लेकिन कहाँ? वह तो कुछ खाने की चीज़ ढ़ूँढ़ने के लिए सारे कमरे की तलाशी लेगी।

मिमि—(फिर दरवाज़ा खटखटाकर) कोको, दरवाज़ा खोलो न...इतनी देर क्यों लगा रहे हो?

कोको—कहाँ छिपाऊँ? कहाँ छिपाऊँ? (कमरे के चारों तरफ़ देखकर) ठीक, इस फूलदान के अंदर छिपा दूँ।

(कोको फूलदान में तश्तरी रखकर दरवाज़ा खोलता है। मिमि कागज़ में लिपटा बंडल उठाए कमरे में आती है।)

मिमि—दरवाज़ा खोलने में इतनी देर क्यों कर दी?

कोको—मैंने अभी-अभी नाश्ता किया था और मुँह धोने लगा था। आओ बैठो।

(कोको और मिमि मेज़ के इर्द-गिर्द बैठते हैं।)

मिमि—मुझे अभी-अभी तुम्हारे माता-पिता मिले। तुम्हारी माताजी ने कहा कि तुम्हारे लिए चावल की कुछ रोटियाँ रखी हैं। मैंने सोचा...

कोको—चावल की रोटियाँ? हाँ थीं तो। लेकिन मैंने सब खा लीं।

मिमि—एक भी नहीं बची?

कोको—सॉरी मिमि, मैंने सब खा लीं। (हाथ से पेट को मलते हुए) पेट एकदम भर गया है। लगता है आज तो दुपहर का खाना भी नहीं खाया जाएगा।

मिमि—बहुत बुरी बात मेरी माँ ने केले के पापड़ बनाए थे। मैंने सोचा तुम्हारे साथ बाँटकर खाऊँगी। मैं चार पापड़ लाई हूँ। दो तुम्हारे लिए, दो अपने लिए। सोचा था तुम्हारी चावल को रोटियाँ और मोटे पापड़, दोनों का बढ़िया नाशता रहेगा।

(मिमि काग़ज़ का बंडल खोलती है और पापड़ निकालती है। वह उन्हें एक तश्तरी में डालकर मेज़ पर रखती है।)

मिमि—गर्मा-गर्म हैं और स्वादिष्ट भी। तुम्हारी भी क्या बदकिस्मती है कि तुम्हारा पेट बिल्कुल भरा हुआ है और तुम कुछ भी नहीं खा सकते।

कोको—(पापड़ देखकर होंठों पर जीभ फेरकर, स्वगत) मैंने बड़ी ग़लती की जो उसे बताया कि मेरा पेट भरा हुआ है। लेकिन मैं समझता हूँ कि वह चारों पापड़ तो खा नहीं सकती। शायद दो मेरे लिए छोड़ जाए।

मिमि—(एक पापड़ उठाकर) क्या इन्हें निगलने के लिए चाय है?

कोको—हाँ, हाँ, अलमारी पर है। मैं ले आता हूँ।

(कोको चाय की केतली और दो कप उठा लाता है। मिमि एक कप में चाय डालती है।)

मिमि—तुम तो चाय पिओगे नहीं। पेट भरा होगा।

कोको—(स्वगत) मेरा पेट से गुड़गुड़ कर रहा है। भगवान करे मिमि को यह गुड़गुड़ न सुनाई दे।

मिमि— (पापड़ खाते हुए) यह कैसी आवाज़ है?

कोको—आवाज़? कैसी आवाज़?

मिमि—हल्की-सी गड़गड़ाने की आवाज़। यह फिर हुई। सुना तुमने?

कोको—यह...? हमारे घर में चूहा घुस आया है। वही यह आवाज़ करता है।

(दरवाज़े पर दस्तक)

कोको—कौन?

तिन सू—मैं हूँ तिन सू।

(कोको उठने लगता है।)

मिमि—तुम बैठे रहो। आराम करो। तुम्हारा पेट बहुत भरा हुआ है। मैं खोलती है।

(मिमि दरवाज़ा खोलती है। तिन सू गेंदे के फूलों का गुच्छा लिए आता है।)

तिन सू—आहा! मिमि भी यहाँ है।

मिमि—आओ तिन सू।

तिन सू—(मेज़ के पास जाकर) हैलो कोको। क्या बात है? तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है क्या?

कोको—हैलो तिन सू।

(मिमि और तिन सू मेज़ के पास बैठते हैं।)

मिमि—(तिन सू से) वह ठीक हैं। बस, नाश्ते में चावल की रोटियों ज़्यादा खा ली है।

तिन सू—(केले के पापड़ों की तरफ़ देखकर) आहा, केले के पापड़!

मिमि—मैं कोको के लिए भी ले आई थी। लेकिन चूँकि उसका पेट एकदम भरा हुआ है, तुम इन्हें ख़त्म करने में मेरी मदद करो।

तिन सू—नेकी और पूछ-पूछ? तुम्हारी माँ गाँव में सबसे बढ़िया पापड़ बनाती है।

(तिन सू एक पापड़ उठाकर खाने लगता है। मिमि उसके लिए कप में चाय डालती है।)

मिमि—(कप देकर) यह लो चाय के साथ खाओ।

तिन सू—(चाय की चुस्की लेकर होंठों पर जीभ फिराकर) बहुत बढ़िया चाय है। मेरी ख़ुशक़िस्मती जो इस वक़्त यहाँ आ गया। (स्वगत) तुम्हारी ख़ुशक़िस्मती और मेरी बदक़िस्मती।

(मिमि और तिन सू एक-एक पापड़ खा लेते हैं और मिमि दूसरा उठाती है।)

मिमि—यह लो तिन सू। एक और खाओ।

तिन सू—नहीं, मेरे लिए तो एक ही काफ़ी है।

मिमि—आधा तो ले लो। दूसरा आधा में खा लूँगी। एक कोको के लिए रहा। शाम को खा लेगा।

तिन सू—तुम ज़ोर डालती हो तो ले लेता हूँ।

कोको— (स्वगत) चलो, एक तो मेरे लिए छोड़ रहे हैं। मैं भूख से मरा जा रहा हूँ।

तिन सू—यह आवाज़ कैसी है?

मिमि—यहाँ एक बड़ा चूहा घुस आया है। कोको कहता है, वही यह आवाज़ करता है।

तिन सू—ऐसा लगा कि किसी का पेट भूख से गुड़गुड़ा रहा है।

(तिन सू और मिमि पापड़ ख़त्म करते हैं)

मिमि—अच्छा, ये फूल कैसे हैं?

तिन सू—ओह! मैं तो भूल ही गया था। मेरी माँ ने कहा है कि कोको की माँ ने कल दुकान से एक फूलदान ख़रीदा था। उन्होंने ये फूल उस फूलदान में रखने के लिए भेजे हैं। (इधर-उधर देखता है। उसे अलमारी के ऊपर फूलदान दिखाई देता है।) वह रहा फूलदान, अलमारी पर।

मिमि—मुझे दो। मैं इन्हें फूलदान में रख आती हूँ।

(तिन सू उसके हाथ में फूल देता है। वह उठने लगती है।)

कोको—नहीं, नहीं मिमि।

मिमि—तुमने तो मुझे डरा ही दिया। क्या बात है?

कोको—ये फूल....ये फूल। मेरी माँ को इस फूल से एलर्जी है। जब भी वह यह फूल देखती हैं उनके जिस्म में फुँसियाँ निकल आती हैं।

तिन सू—ओह, मुझे इस बात का पता नहीं था। ख़ैर में इन फूलों को वापस ले जाऊँगा।

कोको—(चैन की साँस लेकर, स्वगत) मुझे अपनी रोटियों को बचाने के लिए कितने झूठ बोलने पड़ेंगे।

(दरवाज़े पर दस्तक)

कोको—कौन?

उ बा तुन—मैं हूँ। दुकान का मैनेजर उ बा तुन।

मिमि—(कोको से) तुम मत उठो को को। मैं खोलती हूँ दरवाज़ा।

(ज़ोर से) अभी आई उ वा तुन चाचा।

(उ बा तुन नीला फूलदान लिए आता है)

उ बा तुन—हैलो बच्चो (मेज़ की तरफ़ देखकर) लगता है छोटी-मोटी पार्टी चल रही है।

मिमि—आओ चाचा, आओ।

(उ बा तुन मेज़ के पास बैठ जाता है)

मिमि—चाय लेंगे आप?

उ बा तुन—कोई एतराज़ नहीं। बहुत-बहुत शुक्रिया!

(मिमि अलमारी की तरफ़ जाकर कप ले आती है और चाय डालकर उ बा तुन को देती है।)

उ बा तुन—(कप से चुस्की लेकर) क्या मज़ेदार चाय है। खुश़बूदार ताज़गी लाने वाली।

तिन सू—चाचा, आपने नाशता कर लिया है?

उ बा तुन—अभी किया नहीं। मैं सोच रहा था, किसी चाय की दुकान पर रुककर कर लूँगा ।

मिमि—चाय की दुकान पर जाने की क्या ज़रूरत? आप यह पापड़ ले सकते हैं।

उ बा तुन—लेकिन...मैं तुममें से किसी का हिस्सा नहीं मारना चाहता।

तिन सु—कोई बात नहीं चाचा। हम सबके पेट तो भर गए हैं।

(उँगली से गले को छूता है।)

उ बा तुन—बहुत-बहुत शुक्रिया। अरे, यह आवाज़ कैसी है?

तिन सू—यह चूहे की आवाज़ है। अक्सर यह आवाज़ करता है।

उ बा तुन—मुझे लगा किसी का पेट भूख से कुलबुला रहा है।

(उ बा तुन पापड़ उठाकर खाने लगता है।)

उ बा तुन—कोको, तुम आज बहुत चुप हो। तबियत तो ठीक है?

कोको—कुछ नहीं चाचा। मैं बिल्कुल ठीक है।

मिमि—उसका पेट बहुत भरा हुआ है। नाशता बहुत डटकर किया है।

(उ बा तुन पापड़ ख़त्म करके हाथ से मुँह पोंछता है।)

उ बा तुन—कोको, तुम्हारी माँ हमारी दुकान से एक फूलदान लाई थीं (इधर-उधर देखकर) हाँ, वह रहा।

कोको—क्यों? फूलदान का क्या करना है?

उ बा तुन—तुम्हारी माँ ने नीला फूलदान माँगा था। उस वक़्त मेरे पास वह रंग नहीं था, इसलिए वह गुलाबी ही ले आई। उनके जाने के बाद मुझे एक नीला फूलदान मिल गया। मैं उसे बदलने आया है।

(उ बा तुन अलमारी के पास जाकर गुलाबी फूलदान उठा लेता है और उसकी जगह नीला फूलदान रख देता है।)

उ बा तुन—(कोको से) मुझे यक़ीन है, तुम्हारी माँ नीला फूलदान देखेंगी तो बहुत ख़ुश होंगी। अब मैं चलूँगा। शुक्रिया और गुडबाई।

मिमि-तिन सु—गुडबाई चाचा।

कोको—गुडबाई चाचा। (स्वगत) और गुडबाई मेरी चावल की रोटियो!


आउट

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा दूसरी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

छुट्टी का दिन था। जीत और बबली सुबह से खेल रहे थे। उन्होंने कई सारे खेल खेले।

दोनों ने रस्सी कूदी।

फिर छुपन-छुपाई खेली।

उसके बाद गिल्ली-डंडा खेला।

बबली ने क्रिकेट खेलने के लिए कहा। जीत गेंद फेंकने के लिए तैयार हो गया।

जीत ने गेंद फेंकी। बबली ने ज़ोर से बल्ला घुमाया। गेंद मोहित के आँगन में चली गई।

मोहित के घर ताला लगा हुआ था। जीत और बबली का खेल रुक गया।

बबली बोली कि उसे गेंद बनानी आती है। उसने जीत से कपड़े, काग़ज़ और पन्नी लाने को कहा। वह ख़ुद भी ये सब ढूँढ़ने लगी। दोनों ने ख़ूब सारी कतरने और पन्नियाँ इक‌ट्ठी कर लीं। बबली सुतली का टुकड़ा भी ले आई।

बबली ने उन सबको मिलाकर एक गोल बनाया।

गोले को सुतली से कस दिया। दोनों की पसंद की गेंद बन गई। खेल फिर से शुरू हो गया। इस बार बबली ने गेंद उठाई। जीत ने बल्ला उठाया।

बबली ने गेंद फेंकी। जीत ने ज़ोर से बल्ला घुमाया। गेंद खुलकर हवा में फैल गई।

बबली ने उछलकर एक कपड़ा पकड़ लिया। बबली उछल-उछलकर आउट-आउट चिल्लाने लगी।

वह हाथ में कपड़ा लेकर आउट-आउट कहते हुए दौड़ी।

स्रोत :

  • पुस्तक : सारंगी (पृष्ठ 87)
  • प्रकाशन : एनसीईआरटी
  • संस्करण : 2022

रजनी |मन्नू भंडारी

प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा ग्यारहवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

(मध्यवर्गीय परिवार के फ़्लैट का एक कमरा। एक महिला रसोई में व्यस्त है। घंटी बजती है। बाई दरवाज़ा खोलती है। रजनी का प्रवेश।)

रजनी : लीला बेन कहाँ हो...बाज़ार नहीं चलना क्या?

लीला : (रसोई में से हाथ पोंछती हुई निकलती है) चलना तो था पर इस समय तो अमित आ रहा होगा अपना रिज़ल्ट लेकर। आज उसका रिज़ल्ट निकल रहा है न। (चेहरे पर ख़ुशी का भाव)

रजनी : अरे वाह! तब तो मैं मिठाई खाकर ही जाऊँगी। अमित तो पढ़ने में इतना अच्छा है कि फ़र्स्ट आएगा और नहीं तो सेकंड तो कहीं गया नहीं। तुमको मिठाई भी बढ़िया खिलानी पड़ेगी...सूजी के हलवे से काम नहीं चलने वाला, मैं अभी से बता देती हूँ।

लीला : (हँसकर) नहीं-नहीं, मैं तुम्हें अच्छी मिठाई ही खिलाऊँगी... मैंने पहले से ही मँगवाकर रखी है—केसरिया रसमलाई। अमित को बहुत पसंद है ना।

रजनी : देखा ऽऽ! मुझे अपने घर में ही केसर की सुगंध आ गई थी। बाज़ार का तो मैं बहाना करके चली आई वरना तुम तो मुझे काट ही देतीं। 

लीला : कैसी बात करती हो? मैं एक बार काट भी दूँ, लेकिन अमित! अपने मुँह में डालने से पहले रसमलाई लेकर तुम्हारे फ़्लैट में दौड़ता। मैं कोई भी चीज़ घर में बनाऊँ या बाहर से लाऊँ, अमित जब तक तुम्हारे भोग नहीं लगा लेता, हम लोग खा थोड़े ही सकते हैं। रजनी आँटी तो हीरो हैं उसकी। (दोनों खिलखिलाकर हँसती हैं) 

रजनी : बहुत मेधावी बच्चा है अमित...तुम देखना तो, आगे जाकर क्या बनता है!

लीला : बस, सब तुम्हारा ही आशीर्वाद है।

(फिर घंटी बजती है। लीला एक तरह से दौड़ते हुए दरवाज़ा खोलती है। अमित का प्रवेश। रोज़ की तरह भारी बस्ते की जगह एक हल्का-सा थैला है।)

रजनी : (अमित को बाँहों में भरने के लिए दोनों बाहें फैलाते हुए आगे बढ़ती है।) कांग्रेचुलेशंस अमित। बधाई देने के लिए रजनी आँटी पहले से मौजूद हैं। (अमित का चेहरा उतरा हुआ है, पर दोनों में से अभी तक उसपर किसी का ध्यान नहीं गया। अमित आँसू भरी आँखों से थैले में से रिपोर्ट निकालकर माँ की ओर फेंकते हुए।)

अमित : लो...लो...देखो, क्या हुआ है मेरे रिज़ल्ट का। मैंने कितना कहा था कि मैथ्स में भी मेरी ट्यूशन लगवा दीजिए, वरना मेरा रिज़ल्ट बिगड़ जाएगा। बस वही हुआ। मैथ्स में ही तो पूरे नंबर आ सकते हैं, रिज़ल्ट बन-बिगड़ सकता है। रिपोर्ट रजनी देखने लगती है। (लीला उसे अपनी बाँहों में भरकर)

लीला : पर तू तो सारे सवाल ठीक करके आया था। यहाँ आकर पापा के सामने तूने फिर से किया था अपना सारा पेपर। सब तो ठीक था। तेरे पापा ने नहीं कहा था कि चार-पाँच नंबर भले ही काट ले सफ़ाई-वफ़ाई के पर नाइंटी-फ़ाइव तो तेरे पक्के हैं।

रजनी  : (रिपोर्ट देखते हुए) पर मिले तो कुल बहत्तर ही हैं। (फिर दूसरे विषयों के नंबर भी पढ़ने लगती है इंगलिश 86, हिस्ट्री 80, सिविक्स 88, हिंदी 82, ड्राइंग 90...सबसे कम मैथ्स में ही।)

अमित : (ग़ुस्से और दु:ख से) कम तो होंगे ही। ट्यूशन नहीं लेने से मिलते हैं कहीं अच्छे नंबर? सर तो बार-बार कहते ही थे कि ट्यूशन कर लो, ट्यूशन कर लो वरना फिर बाद में मत रोना। (रो पड़ता है)

लीला : (अपराधी की तरह सफ़ाई देते हुए) तुझे अँग्रेज़ी को लेकर थोड़ी परेशानी थी सो अँग्रेज़ी में करवा दी थी ट्यूशन। अब दो-दो विषयों की ट्यूशन...फिर लंबी-चौड़ी फ़ीस। बेटे...(अपनी आर्थिक मज़बूरी की बात वह शब्दों से नहीं, चेहरे से व्यक्त करती है।) पर यह तो अँधेर ही हुआ कि सारा पेपर ठीक हो, फिर भी नंबर काट लो।

रजनी: (रजनी की भौंहों में एकाएक बल पड़ जाते हैं। वह रोते हुए अमित को खींचकर अपने पास सटा लेती है) रोओ मत। (उसके आँसू पोंछते हुए) अमित रोएगा नहीं...समझे। मैं जो पूछती हूँ उसका जवाब देना। बस। (कुछ देर रुककर) तुझे अच्छी तरह याद है कि तूने पूरा पेपर ठीक किया था? (अमित स्वीकृति में सिर हिलाता है) पापा के पास दुबारा पेपर करने से पहले दोस्तों से या किताबों से उन सवालों के जवाब तो नहीं देख लिए थे?

अमित: नहीं। ज्यों-के-त्यों आकर कर दिए थे। हमको आते थे वो सारे सवाल। 

रजनी : मैथ्स के सर कौन हैं?

अमित: मिस्टर पाठक।

रजनी: कितने लड़के ट्यूशन लेते हैं उनसे?

अमित : बाइस। साल के शुरू में तो आठ लेते थे...फिर पहले टर्मिनल के बाद से पंद्रह हो गए थे। हाफ़-ईयरली के बाद सात लड़कों ने और लेना शुरू कर दिया। मुझसे भी तभी से कह रहे थे।

लीला : हाफ़ ईयरली में तो इसके नाइंटी-सिक्स नंबर आए थे...इसी ने बताया था कि क्लास में सबसे ज़्यादा हैं।

रजनी : उसके बाद भी कहते थे कि ट्यूशन लो? 

अमित : हाँ! कॉपी लौटाते हुए कहा था कि तुमने किया तो अच्छा है पर यह तो हाफ़-ईयरली है...बहुत आसान पेपर होता है इसका तो। अब अगर ईयरली में भी पूरे नंबर लेने है तो तुरंत ट्यूशन लेना शुरू कर दो। वरना रह जाओगे। सात लड़कों ने तो शुरू भी कर दिया था। पर मैंने जब मम्मी-पापा से कहा, हमेशा बस एक ही जवाब (मम्मी की नक़ल उतारते हुए) मैथ्स में तो तू वैसे ही बहुत अच्छा है, क्या करेगा ट्यूशन लेकर? देख लिया अब? सिक्स्थ पोज़ीशन आई है मेरी। जो आज तक कभी नहीं आई थी। (अमित की आँखों से फिर आँसू टपक पड़ते हैं।)

रजनी : (डाँटते हुए) फिर आँसू। जानता नहीं, रोने वाले बच्चे रजनी आँटी को बिलकुल पसंद नहीं। मम्मी ने बिलकुल ठीक ही कहा और ठीक ही किया। जिस विषय में तुम वैसे ही बहुत अच्छे हो, उसमें क्यों लोगे ट्यूशन? ट्यूशन तो कमज़ोर बच्चे लेते हैं।

अमित : आप जानती नहीं आँटी...अच्छे-बुरे की बात नहीं होती। अगर सर कहें और बार-बार कहें तो लेनी ही होती है। वरना तो नंबर कम हो ही जाते हैं।

रजनी : पेपर अच्छा करो तब भी नंबर कम हो जाते हैं? 

अमित : हाँ, कितना ही अच्छा करो फिर भी कम हो जाते हैं...जैसे मेरे हो गए।

रजनी : यानी कि अच्छा पेपर करने पर भी कम आते हैं। सिर्फ़ इसलिए कि ट्यूशन नहीं ली थी! तो यह तो सर की ग़लती नहीं, बदमाशी है और तू मम्मी से लड़ रहा है। सर से जाकर लड़। 

(अमित इस भाव से सिर हिलाता है मानो कितनी बेकार की बात कर रही हैं रजनी आँटी। लीला दो गिलासों में शिकंजी बनाकर लाती है। अमित लेने के लिए हाथ नहीं बढ़ाता तो रजनी घुड़कती है।) 

रजनी : चलो पियो शिकंजी। देखते नहीं, चेहरा कैसे पसीना-पसीना हो रहा है। (दोनों शिकंजी पीने लगते हैं। इस दौरान रजनी कुछ सोच रही है। शिकंजी ख़त्म करके)
कल आप नौ बजे तैयार रहिए अमित साहब...आपके स्कूल चलना है। 

अमित : (अमित एकदम डर जाता है) कल से तो छुट्टी है। पर आप अगर स्कूल जाकर कुछ कहेंगी तो सर मुझसे बहुत ग़ुस्सा हो जाएँगे...वहाँ मत जाइए...प्लीज़ वहाँ बिलकुल मत जाइए।

लीला : हाँ रजनी तुम कुछ करोगी-कहोगी तो अगले साल कहीं और ज़्यादा परेशान न करें इसे। अब जब रहना इसी स्कूल में है तो इन लोगों से झगड़ा।

रजनी : (बात को बीच में ही काटकर ग़ुस्से से) यानी कि वे लोग जो भी ज़ुलुम-ज़्यादती करें, हम लोग चुपचाप बर्दाश्त करते जाएँ? सही बात कहने में डर लग रहा है तुझे, तेरी माँ को! अरे जब बच्चे ने सारा पेपर ठीक किया है तो हम कॉपी देखने की माँग तो कर ही सकते हैं...पता तो लगे कि आख़िर किस बात के नंबर काटे हैं?

अमित : (झुँझलाकर) बता तो दिया आँटी। आप...

रजनी : (ग़ुस्से से) ठीक है तो अब बैठकर रोओ तुम माँ—बेटे दोनों।

(दनदनाती निकल जाती है। दोनों के चेहरे पर एक असहाय-सा भाव।) 

लीला : अब यह रजनी कोई और मुसीबत न खड़ी करे।

दृश्य समाप्त

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(स्कूल के हैडमास्टर का कमरा। बड़ी-सी टेबल। दीवार के सहारे रखी काँच की अलमारी में बच्चों द्वारा जीते हुए कप और शील्ड्स जमे हुए रखे हैं। दीवार पर कुछ नेताओं की तसवीरें, एक बड़ा-सा मैप लटका है। एक स्कूल के हैडमास्टर के कमरे का वातावरण तैयार किया जाए। हैडमास्टर काम में व्यस्त है। चपरासी बड़े अदब से एक चिट लाकर रखता है। हैडमास्टर कुछ क्षण उसे देखता रहता है।)

हैडमास्टर : बुलाओ। (रजनी का प्रवेश नमस्कार करती है।)

हैडमास्टर : बैठिए (कुछ देर रुककर) कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? 

रजनी : मैं सेविंथ क्लास के अमित सक्सेना की मैथ्स की कॉपी देखना चाहती हूँ (हैडमास्टर के चेहरे पर ऐसा भाव जैसे वह कुछ समझा न हो) ईयरली एक्ज़ाम्स की, कल ही जिसका रिज़ल्ट निकला है।

हैडमास्टर : सॉरी मैडम, ईयरली एक्ज़ाम्स की कॉपियों तो हम लोग नहीं दिखाते हैं। 

रजनी : जानती हूँ मैं, लेकिन बात यह है कि अमित ने मैथ्स का पूरा पेपर ठीक किया था लेकिन उसे कुल बहत्तर नंबर ही मिले हैं। कॉपी देखकर सिर्फ़ यह जानना चाहती हूँ कि अमित को अपने बारे में कुछ गलतफ़हमी हो गई थी या (एक-एक शब्द पर ज़ोर देकर) ग़लती एक्ज़ामिनर की है।

हैडमास्टर : (सारी बात को बहुत हलके ढंग से लेते हुए) आप भी कमाल करती हैं, बच्चे ने कहा और आपने मान लिया। अरे हर बच्चा घर जाकर यही कहता है कि उसने पेपर बहुत अच्छा किया है और उसे बहुत अच्छे नंबर मिलेंगे। अगर हम इसी तरह कॉपियाँ दिखाने लग जाएँ तो यहाँ तो पेरेंट्स की भीड़ लगी रहे सारे समय। इसीलिए तो ईयरली एक्ज़ाम्स की कॉपियाँ न दिखाने का नियम बनाया गया है स्कूलों में।

रजनी : (अपने ग़ुस्से पर क़ाबू पाते हुए) देखिए आप चाहें तो अमित का पूरा रिज़ल्ट देख सकते हैं। मैथ्स में हमेशा सेंट-परसेंट नंबर लेता रहा है। इस साल भी उसने पूरा पेपर ठीक किया है। (तैश आ ही जाता है) कॉपी देखकर मैं सिर्फ़ यह जानना चाहती हूँ कि नंबर आख़िर कटे किस बात के हैं?

हैडमास्टर : आप बहस करके बेकार ही अपना और मेरा समय बर्बाद कर रही हैं। मैंने कह दिया न कि इन कॉपियों को दिखाने का नियम नहीं है और मैं नियम नहीं तोड़ूँगा।

रजनी : (व्यंग्य से) नियम! यानी कि आपका स्कूल बहुत नियम से चलता है। 

हैडमास्टर : (ग़ुस्से से) व्हॉट डू यू मीन?

रजनी : आई मीन व्हॉट आई से। नियम का ज़रा भी ख़याल होता तो इस तरह की हरकते नहीं होती स्कूल में। कोई बच्चा बहुत अच्छा है किसी विषय में फिर भी उसे मज़बूर किया जाता है कि वह ट्यूशन ले। यह कौन-सा नियम है आपके स्कूल का?

हैडमास्टर : देखिए यह टीचर्स और स्टूडेंट्स का अपना आपसी मामला है, वो पढ़ने जाते हैं और वो पढ़ाते हैं। इसमें न स्कूल आता है, न स्कूल के नियम! इस बारे में हम क्या कर सकते हैं? 

रजनी : कुछ नहीं कर सकते आप? तो मेहरबानी करके यह कुर्सी छोड़ दीजिए। क्योंकि यहाँ पर कुछ कर सकने वाला आदमी चाहिए। जो ट्यूशन के नाम पर चलने वाली धाँधलियों को रोक सके...मासूम और बेगुनाह बच्चों को ऐसे टीचर्स के शिकंजों से बचा सके जो ट्यूशन न लेने पर बच्चों के नंबर काट लेते हैं...और आप हैं कि कॉपियाँ न दिखाने के नियम से उनके सारे गुनाह ढक देते हैं।

हैडमास्टर : (चीख़कर) विल यू प्लीज़ गेट आउट ऑफ़ दिस रूम। (ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजाने लगता है। दौड़ता हुआ चपरासी आता है) मेमसाहब को बाहर ले जाओ।

रजनी : मुझे बाहर करने की ज़रूरत नहीं। बाहर कीजिए उन सब टीचर्स को जिन्होंने आपकी नाक के नीचे ट्यूशन का यह घिनौना रैकेट चला रखा है। (व्यंग्य से) पर आप तो कुछ कर नहीं सकते, इसलिए अब मुझे ही कुछ करना होगा और मैं करूँगी, देखिएगा आप। (तमतमाती हुई निकल जाती है।) (हैडमास्टर चपरासी पर ही बिगड़ पड़ता है) जाने किस-किस को भेज देते हो भीतर।

चपरासी : मैंने तो आपको स्लिप लाकर दी थी साहब। 

(हैडमास्टर ग़ुस्से में स्लिप की चिंदी-चिंदी करके फेंक देता है, कुछ इस भाव से मानो रजनी की ही चि्ांदियाँ बिखेर रहा हो।) 

दृश्य समाप्त

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(रजनी का फ़्लैट। शाम का समय। घंटी बजती है। रजनी आकर दरवाज़ा खोलती है। पति का प्रवेश। उसके हाथ से ब्रीफ़केस लेती है।)

पति : (जूते खोलते हुए) तुम आज दिन में कहीं बाहर गई थीं क्या?

रजनी : तुम्हें कैसे मालूम?

पति : फ़ोन किया था। एक फ़ाइल रह गई थी, सोचा चपरासी को भेजकर मँगवा लूँ पर कोई घर में हो तब न। (पति के चेहरे पर खीज भरा ग़ुस्सा पुता हुआ है)

रजनी : तुम फ़ाइल भूल गए...और जिसके बारे में मुझे पता भी नहीं। पर फिर भी उसके लिए मुझे घर बैठना चाहिए। यह कौन-सी बात हुई?

पति : (ज़रा शांत होते हुए) अच्छा गई कहाँ थीं?

रजनी : (एक स्कूल का नाम लेती है)

पति : (स्कूल का नाम दुहराता है)...तुम क्या करने गई थीं वहाँ?

रजनी : (गद्गद भाव से) पहले चाय ले आऊँ, फिर बताती हूँ।

(कैमरा रजनी के साथ किचन में। गुनगुनाते हुए रजनी खाने का भी कुछ बना रही है। लगता है जो कुछ करके आई, उससे बहुत प्रसन्न है।)

(दृश्य फिर बाहर के कमरे में। नाश्ते की प्लेट काफ़ी ख़ाली हो चुकी है, जिससे लगे कि रजनी सारी बात बता चुकी है।)

रजनी : बोलती बंद कर दी हैडमास्टर साहब की। जवाब देते नहीं बना तो चिल्लाने लगे। पर मैं क्या छोड़ने वाली हूँ इस बात को?

पति : अच्छा मास्टर लोग ट्यूशन करते हैं या धंधा करते हैं, पर तुम्हें अभी बैठे-बिठाए इससे क्या परेशानी हो गई? तुम्हारा बेटा तो अभी पढ़ने नहीं जा रहा है न?

रजनी : (एकदम भड़क जाती है) यानी कि मेरा बेटा जाए तभी आवाज़ उठानी चाहिए...अमित के लिए नहीं उठानी चाहिए...और जो इतने-इतने बच्चे इसका शिकार हो रहे हैं, उनके लिए नहीं उठानी चाहिए। सब कुछ जानने के बाद भी नहीं उठानी चाहिए?

पति : ठेका लिया है तुमने सारी दुनिया का?

रजनी : देखो, तुम मुझे फिर ग़ुस्सा दिला रहे हो रवि...ग़लती करने वाला तो है ही गुनहगार, पर उसे बर्दाश्त करने वाला भी कम गुनहगार नहीं होता जैसे लीला बेन और कांति भाई और हज़ारों-हज़ारों माँ-बाप। लेकिन सबसे बड़ा गुनहगार तो वह है जो चारों तरफ़ अन्याय, अत्याचार और तरह-तरह की धाँधलियों को देखकर भी चुप बैठा रहता है, जैसे तुम। (नक़ल उतारते हुए) हमें क्या करना है, हमने कोई ठेका ले रखा है दुनिया का। (ग़ुस्से और हिक़ारत से) माई फ़ुट (उठकर भीतर जाने लगती है। जाते-जाते मुड़कर) तुम जैसे लोगों के कारण ही तो इस देश में कुछ नहीं होता, हो भी नहीं सकता! (भीतर चली जाती है।)

पति: (बेहद हताश भाव से दोनों हाथों से माथा थामकर) चढ़ा दिया सूली पर।

दृश्य समाप्त

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(डायरेक्टर ऑफ़ एजुकेशन के ऑफ़िस का बाहरी कक्ष। कमरे के बाहर उसके नाम और पद की तख़्ती लगी है। साथ ही मिलने का समय भी लिखा है। एक स्टूल पर चपरासी बैठा है। सामने की बेंच पर रजनी और तीन-चार लोग और बैठे हैं—प्रतीक्षारत। रजनी के चेहरे से बेचैनी टपक रही है। बार-बार घड़ी देखती है, मिलने का समय समाप्त होता जा रहा है।)

रजनी : (चपरासी से) कितनी देर और बैठना होगा?

चपरासी : हम क्या बोलेगा...जब साहब घंटी मारेगा...बुलाएगा तभी तो ले जाएगा। बहुत बिज़ी रहता न साहब।

रजनी : (अपने में ही गुनगुनाते हुए) यह तो लोगों से मिलने का समय हैं, न जाने किसमें बिज़ी बनकर बैठ जाते हैं (चपरासी दूसरी तरफ़ देखने लगता है।)

(कैमरा ऑफ़िस के अंदर चला जाता है। साहब मेज़ पर पेपर-वेट घुमा रहा है। फिर घड़ी देखता है, फिर घुमाने लगता है। बाहर एक आदमी आता है। अपने नाम की स्लिप के नीचे पाँच रुपए का एक नोट रखकर देता है और चपरासी का कंधा थपथपाता है। चपरासी हँसकर भीतर जाता है। लौटकर उस आदमी को तुरंत अपने साथ ले जाता है। रजनी के चेहरे पर तनाव, घूरकर चपरासी को देखती है। थोड़ी देर में आदमी बाहर निकलता है। रजनी उठकर दनदनाती हुई भीतर जाने लगती है।)

चपरासी : अरे...अरे...अरे...किधर कू जाता? अभी घंटी बजा क्या? 

रजनी : घंटी तो मिलने का समय ख़त्म होने तक बजेगी भी नहीं। (दरवाज़ा धकेलकर भीतर चली जाती है)

चपरासी : अरे कैसी औरत है...सुनतीच नई। (वहाँ बैठे दो-तीन लोग हँसने लगते हैं।) 

(दृश्य कमरे के भीतर। निदेशक कुर्सी की पीठ से टिककर सिगरेट पी रहा है। रजनी को देखकर आश्चर्य से।)

निदेशक : आपको स्लिप भेजकर भीतर आना चाहिए ना।

रजनी : (मुस्कराकर) स्लिप तो घंटे भर से आपके चपरासी की जेब में पड़ी है। और शायद दो-चार दिन चक्कर लगवाने तक पड़ी ही रहेगी।

निदेशक : क्या कह रही हैं आप?

रजनी : तो क्या यह सीधी-साफ़-सी बात भी मुझे ही समझानी होगी आपको? ख़ैर अभी छोड़िए इस बात को, इस समय मैं आपके पास किसी दूसरे ही काम से आई हूँ।

(निदेशक के चेहरे पर रजनी को लेकर एक आश्चर्य मिश्रित कौतूहल का भाव उभरता है।) कहिए।

निदेशक : कहिए

रजनी : (थोड़ा सोचते हुए) देखिए, मैं स्कूलों, विशेषकर प्राइवेट स्कूलों और बोर्ड के आपसी रिलेशंस के बारे में कुछ जानकारी इकट्ठा कर रही हूँ।

निदेशक : कोई रिसर्च प्रोजेक्ट है क्या? व्हेरी इंटरेस्टिंग सब्जेक्ट। 

रजनी : बस कुछ ऐसा ही समझ लीजिए।

निदेशक : कहिए आप क्या जानना चाहती हैं?

रजनी : जिन प्राइवेट स्कूलों को आप रिकगनाइज़ कर लेते हैं उन्हें बोर्ड शायद 90% ग्रांट देता है।

निदेशक : (ज़रा गर्व से) जी हाँ, देता है। बोर्ड का काम ही यह है कि शिक्षा के प्रचार-प्रसार में जितना भी हो सके सहयोग करे। इट्स अवर ड्यूटी मैडम।

रजनी : जब इतनी बड़ी एड देते हैं तो आपका कोई कंट्रोल भी रहता होगा स्कूलों पर।

निदेशक : ऑफ़कोर्स। बोर्ड के बहुत से ऐसे नियम हैं जो स्कूलों को मानने होते हैं, स्कूल मानते हैं। सिलेबस बोर्ड बनाता है...फ़ाइनल ईयर के एक्ज़ाम्स बोर्ड कंडक्ट करता है।

रजनी : (निदेशक के चेहरे पर नज़रें गड़ाकर) स्कूलों में आजकल प्राइवेट ट्यूशंस का जो सिलसिला चला हुआ है, ट्यूशंस क्या बच्चों को लूटने का जो धंधा चला हुआ है, उसके बारे में आपका बोर्ड क्या करता है?

निदेशक : (बड़े सहज भाव से) इसमें धंधे की क्या बात है? जब किसी का बच्चा कमज़ोर होता है तभी उसके माँ-बाप ट्यूशन लगवाते हैं। अगर लगे कि कोई टीचर लूट रहा है तो उस टीचर से न लें ट्यूशन, किसी और के पास चले जाएँ...यह कोई मज़बूरी तो है नहीं।

रजनी : बच्चा कमज़ोर नहीं, होशियार है...बहुत होशियार...उसके बावजूद उसका टीचर लगातार उसे कोंचता रहता है कि वह ट्यूशन ले...वह ट्यूशन ले वरना पछताएगा। लेकिन बच्चे के माँ बाप को ज़रूरी नहीं लगता और वे नहीं लगवाते। जानते हैं क्या हुआ? मैथ्स का पूरा पेपर ठीक करने के बावजूद उसे कुल 72 नंबर मिलते हैं, जानते हैं क्यों?...क्योंकि उसने टीचर के बार-बार कहने पर भी ट्यूशन नहीं ली। 

निदेशक : वैरी सैड हैडमास्टर को एक्शन लेना चाहिए ऐसे टीचर के ख़िलाफ़। 

रजनी : क्या ख़ूब! आप कहते हैं कि हैडमास्टर को एक्शन लेना चाहिए...हैडमास्टर कहते हैं मैं कुछ नहीं कर सकता, तब करेगा कौन? मैं पूछती हूँ कि ट्यूशन के नाम पर चलने वाले इस घिनौने रैकेट को तोड़ने के लिए दख़लअंदाज़ी नहीं करनी चाहिए आपको, आपके बोर्ड को? (चेहरा तमतमा जाता है)

निदेशक : लेकिन हमारे पास तो आज तक किसी पेरेंट से इस तरह की कोई शिकायत नहीं आई।

रजनी : यानी की शिकायत आने पर ही आप इस बारे में कुछ सोच सकते हैं। वैसे शिक्षा के नाम पर दिन-दहाड़े चलने वाली इस दुकानदारी की आपके (बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से) बोर्ड ऑफ़ एजुकेशन को कोई जानकारी ही नहीं, कोई चिंता ही नहीं?

निदेशक : कैसी बात करती हैं आप? कितने इंपोर्टेट मैटर्स रहते हैं हम लोगों के पास? अभी पिछले छह महीने से तो नई शिक्षा प्रणाली को लेकर ही कितने सेमिनार्स ऑर्गनाइज़ किए हैं हमने?

रजनी : (व्यंग्य से) ओह, इंपोटेंट मैटर्स, नई शिक्षा प्रणाली। अरे पहले इस शिक्षा प्रणाली के छेदों को तो रोकिए वरना बच्चों के भविष्य के साथ-साथ आपकी नई शिक्षा प्रणाली भी छनकर गड्ढे में चली जाएगी।

निदेशक : (थोड़े ग़ुस्से के साथ) आप ही पहली महिला हैं, और हो सकता है कि आख़िरी भी हों, जो इस तरह की शिकायत लेकर आई हैं।

रजनी : ठीक है तो फिर आपके पास शिकायत का ढेर ही लगवाकर रहूँगी।

(झटके से उठकर बाहर चली जाती है, निदेशक देखता रहता है, फिर कंधे उचका देता है।)

(अब मोंटाज में कुछ दृश्य दिखाए जाएँ। रजनी फ़ोन कर रही है। मेज़ पर कुछ पत्र रखे हैं और रजनी एक रजिस्टर में उनके नाम पते उतार रही है। साथ में एक-दो महिलाएँ और भी हैं। फिर एक के बाद एक तीन-चार घरों में माँ-बाप से मिल रही है उन्हें समझा रही है। साथ में लीला बेन और तीन-चार महिलाएँ और भी हैं।)

दृश्य समाप्त

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(किसी अख़बार का दफ़्तर। कमरे में संपादक बैठे हैं, साथ में तीन-चार स्त्रियों के साथ रजनी बैठी है।)

संपादक : आपने तो इसे बाक़ायदा एक आंदोलन का रूप ही दे दिया। बहुत अच्छा किया। इसके बिना यहाँ चीज़ें बदलती भी तो नहीं हैं। शिक्षा के क्षेत्र में फैली इस दुकानदारी को तो बंद होना ही चाहिए।

रजनी : (एकाएक जोश में आकर) आप भी महसूस करते हैं न ऐसा?...तो फिर साथ दीजिए हमारा। अख़बार यदि किसी इश्यू को उठा ले और लगातार उस पर चोट करता रहे तो फिर वह थोड़े से लोगों की बात नहीं रह जाती। सबकी बन जाती है...आँख मूँदकर नहीं रह सकता फिर कोई उससे। आप सोचिए ज़रा अगर इसके ख़िलाफ़ कोई नियम बनता है तो (आवेश के मारे जैसे बोला नहीं जा रहा है।) कितने पेरेंट्स को राहत मिलेगी...कितने बच्चों का भविष्य सुधर जाएगा, उन्हें अपनी मेहनत का फल मिलेगा, माँ-बाप के पैसे का नहीं,...शिक्षा के नाम पर बचपन से ही उनके दिमाग़ में यह तो नहीं भरेगा कि पैसा ही सब कुछ है...वे...वे...

संपादक : (हँसकर) बस-बस मैं समझ गया आपकी सारी तकलीफ़, आपका सारा ग़ुस्सा।

रजनी : तो फिर दीजिए हमारा साथ...उठाइए इस इश्यू को। लगातार लिखिए और धुआँधार लिखिए।

संपादक : इसमें आप अख़बारवालों को अपने साथ ही पाएँगी। अमित के उदाहरण से आपकी सारी बात मैंने नोट कर ली है। एक अच्छा-सा राइट-अप तैयार करके पी.टी.आई. के द्वारा मैं एक साथ फ़्लैश करवाता हूँ।

रजनी : (गद्गद होते हुए) एक काम और कीजिए। 25 तारीख़ को हम लोग पेरेंट्स की एक मीटिंग कर रहे हैं, राइट-अप के साथ इसकी सूचना भी दे दीजिए तो सब लोगों तक ख़बर पहुँच जाएगी। व्यक्तिगत तौर पर तो हम मुश्किल से सौ-सवा सौ लोगों से संपर्क कर पाए हैं...वह भी रात-दिन भाग-दौड़ करके (ज़रा-सा रुककर) अधिक-से-अधिक लोगों के आने के आग्रह के साथ सूचना दीजिए।  

संपादक : दी। (सब लोग हँस पड़ते हैं) 

रजनी : ये हुई न कुछ बात।

दृश्य समाप्त

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(मीटिंग का स्थान। बाहर कपड़े का बैनर लगा हुआ है। बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं और भीतर जा रहे हैं, लोग ख़ुश हैं, लोगों में जोश है। विरोध और विद्रोह का पूरा माहौल बना हुआ है। दृश्य कटकर अंदर जाता है। हॉल भरा हुआ है। एक ओर प्रेसवाले बैठे हैं, इसे बाक़ायदा फ़ोकस करना है। एक महिला माइक पर से उतरकर नीचे आती है। हॉल में तालियों की गड़गड़ाहट। अब मंच पर से उठकर रजनी माइक पर आती है। पहली पंक्ति में रजनी के पति भी बैठे हैं।) 

बहनों और भाइयों,

इतनी बड़ी संख्या में आपकी उपस्थिति और जोश ही बता रहा है कि अब हमारी मंज़िल दूर नहीं है। इन दो महीनों में लोगों से मिलने पर इस समस्या के कई पहलू हमारे सामने आए...कुछ अभी आप लोगों ने भी यहाँ सुने। (कुछ रुककर) यह भी सामने आया कि बहुत से बच्चों के लिए ट्यूशन ज़रूरी भी है। माँएँ इस लायक़ नहीं होतीं कि अपने बच्चों को पढ़ा सकें और पिता (ज़रा रुककर) जैसे वे घर के और किसी काम में ज़रा-सी भी मदद नहीं करते, बच्चों को भी नहीं पढ़ाते। (ठहाका, कैमरा उसके पति पर भी जाए) तब कमज़ोर बच्चों के लिए ट्यूशन ज़रूरी भी हो जाती है। (रुककर) बड़ा अच्छा लगा जब टीचर्स की ओर से भी एक प्रतिनिधि ने आकर बताया कि कई प्राइवेट स्कूलों में तो उन्हें इतनी कम तनख़्वाह मिलती है कि ट्यूशन न करें तो उनका गुज़ारा ही न हो। कई जगह तो ऐसा भी है कि कम तनख़्वाह देकर ज़्यादा पर दस्तख़त करवाए जाते हैं। ऐसे टीचर्स से मेरा अनुरोध है कि वे संगठित होकर एक आंदोलन चलाएँ और इस अन्याय का पर्दाफ़ाश करें (हॉल में बैठा हुआ पति धीरे से फुसफुसाता है, लो, अब एक और आंदोलन का मसाला मिल गया, कैमरा फिर रजनी पर) इसलिए अब हम अपनी समस्या से जुड़ी सारी बातों को नज़र में रखते हुए ही बोर्ड के सामने यह प्रस्ताव रखेंगे कि वह ऐसा नियम बनाए (एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए) कि कोई भी टीचर अपने ही स्कूल के छात्रों का ट्यूशन नहीं करेगा। (रुककर) ऐसी स्थिति में बच्चों के साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करने, उनके नंबर काटने की गंदी हरकतें अपने आप बंद हो जाएँगी। साथ ही यह भी हो कि इस नियम को तोड़ने वाले टीचर्स के ख़िलाफ़ सख़्त-से-सख़्त कार्यवाही की जाएगी...। अब आप लोग अपनी राय दीजिए।

(सारा हॉल, एप्रूव्ड, एप्रूव्ड की आवाज़ों और तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठता है।)

दृश्य समाप्त

नया दृश्य

(रजनी का फ़्लैट। सवेरे का समय। कमरे में पति अख़बार पढ़ रहा है। पहला पृष्ठ पलटते ही रजनी की तस्वीर दिखाई देती है, जल्दी-जल्दी पढ़ता है, फिर एकदम चिल्लाता है।)

पति : अरे रजनी...रजनी, सुनो तो बोर्ड ने तुम लोगों का प्रस्ताव ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया।

रजनी : (भीतर से दौड़ती हुई आती है। अख़बार छीनकर जल्दी-जल्दी पढ़ती है। चेहरे पर संतोष, प्रसन्नता और गर्व का भाव।)

रजनी : तो मान लिया गया हमारा प्रस्ताव...बिलकुल जैसा का तैसा और बन गया यह नियम। (ख़ुशी के मारे अख़बार को ही छाती से चिपका लेती है।) मैं तो कहती हूँ कि अगर डटकर मुक़ाबला किया जाए तो कौन-सा ऐसा अन्याय है, जिसकी धज्जियाँ न बिखेरी जा सकती हैं।

पति : (मुग्ध भाव से उसे देखते हुए) आई एम प्राउड ऑफ़ यू रजनी...रियली, रियली...आई एम वैरी प्राउड ऑफ़ यू।

रजनी: (इतराते हुए) हूँ ऽऽ दो महीने तक लगातार मेरी धज्जियाँ बिखेरने के बाद। (दोनों हँसते हैं।)

(लीला बेन, कांतिभाई और अमित का प्रवेश)

लीला बेन : उस दिन तुम्हारी जो रसमलाई रह गई, वह आज खाओ।

कांतिभाई : और सबके हिस्से की तुम्हीं खाओ।

(अमित दौड़कर अपने हाथ से उसे रसमलाई खिलाने जाता है पर रजनी उसे अमित के मुँह में ही डाल देती है।)

(सब हँसते हैं। हँसी के साथ ही धीरे-धीरे दृश्य समाप्त हो जाता है।)

पापा खो गए |विजय तेंदुलकर



पापा खो गए | हिन्दवी
पापा खो गए
नोट
प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा सातवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

पात्र

बिजली का खंभा      नाचनेवाली

     पेड़                    लड़की

   लैटरबक्स              आदमी

   कौआ

सड़क। रात का समय। समुद्र के सामने फ़ुटपाथ। वहीं पर एक बिजली का खंभा। एक पेड़। एक लैटरबक्स। दूसरी ओर धीमे प्रकाश में एक सिनेमा का पोस्टर। पोस्टर पर नाचने की भंगिमा में एक औरत की आकृति। समुद्र से सनसनाती हवा का बहाव। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने की आवाज़।

खंभा : (जम्हाई रोकते हुए) राम राम राम! रात बहुत हो गई है।

पेड़ : आजकल की रातें कैसी हैं! जल्दी बीतने में ही नहीं आतीं।

खंभा : दिन तो कैसे-न-कैसे हड़बड़ी में बीत जाता है।

पेड़ : लेकिन रात को बड़ी बोरियत होती है।

खंभा : तब भी बरसात की रातों से तो ये रातें कहीं अच्छी हैं, पेड़राजा!

बरसात की रातों में तो रातभर भीगते रहो, बादलों से आनेवाले पानी की मार खाते रहो, तेज़ हवाओं में भी बल्ब को कसकर पकड़े बराबर एक टाँग पर खड़े रहो—बिलकुल अच्छा नहीं लगता। उस वक़्त लगता है, इससे तो अच्छा था...न होता बिजली के खंभे का जन्म! बल्ब फेंक, तब दूर कहीं भाग जाने का जी होता है।

पेड़ : मुझ पर भी एक रात आसमान से गड़गड़ाती बिजली आकर पड़ी थी। अरे, बाप रे! वो बिजली थी या आफ़त! याद आते ही अब भी दिल धक-धक करने लगता है और बिजली जहाँ गिरी थी वहाँ खड्डा कितना गहरा पड़ गया था, खंभे महाराज! अब जब कभी बारिश होती है तो मुझे उस रात की याद हो जाती है। अंग थरथर काँपने लगते हैं।

खंभा : मेरी तबीयत ही लोहे की है जो मैं बीमार नहीं पड़ता, वरना कोई भी इस तरह बारिश, ठंडी, धूप में खड़ा रहे, तो ज़रूर बीमार पड़ जाए। पड़ जाएगा या नहीं? कितने दिन बीत गए, कितनी रातें, लेकिन मैं बराबर इसी तरह खड़ा हूँ। (लंबी ठंडी साँस छोड़कर) छे! चुंगी की यह नौकरी भी कोई नौकरी है!

पेड़ : अपने पत्तों का कोट पहनकर मुझे सर्दी, बारिश या धूप में उतनी तकलीफ़ नहीं होती, तो भी तुमसे बहुत पहले खड़ा हूँ मैं यहाँ। यहीं मेरा जन्म हुआ—इसी जगह। तब सब कुछ कितना अलग था यहाँ। वहाँ के, सब ऊँचे-ऊँचे घर नहीं थे। तब यह सड़क भी नहीं थी। वह सिनेमा का बड़ा सा पोस्टर और उसमें नाचनेवाली औरत भी तब नहीं थी। सिर्फ़ सामने का यह समुद्र था। बहुत अकेलापन महसूस होता था। तुम्हें जब यहाँ लाकर खड़ा किया गया तो सोचा, चलो कोई साथी तो मिला—इतना ही सही। लेकिन वो भी कहाँ? तुम शुरू-शुरू में मुझसे बोलने को ही तैयार नहीं थे। मैंने बहुत बार कोशिश की, पर तुम्हारी अकड़ जहाँ थी वहीं क़ायम! बाद में मैंने भी सोच लिया, इसकी नाक इतनी ऊँची है तो रहने दो। मैंने भी कभी आवाज़ नहीं लगाई, हाँ! अपना भी स्वभाव ज़रा ऐसा ही है।

खंभा : और एक दिन जब आँधी-पानी में मैं बिलकुल तुम्हारे ऊपर ही आ पड़ा?

पेड़ : बाप रे! कैसा था वो आँधी-पानी का तूफ़ान! अबबऽब!

खंभा : तुम खड़े थे, इसीलिए मैं कुछ संभल गया, हाँ। तुमने मुझे ऊपर का ऊपर झेल लिया, वह अच्छा हुआ। चाहे तुम ख़ुद काफ़ी ज़ख़्मी हो गए। बाद में मेरा ग़ुरूर भी झड़ गया और अपनी दोस्ती हो गई।

पेड़ : हूँ! हवा आज भी बहुत है।

दोनों चुप। हवा की आवाज़। कुत्ते का भौंकना। पोस्टर पर बनी नाचनेवाली औरत टेढ़ी हो जाती है। उसके घुँघरू बजते हैं। वह फिर पहले की तरह स्थिर हो जाती है। लैटरबक्स किसी दोहे का एक चरण गुनगुनाता है और रुक जाता है।

कौआ : (पेड़ के पीछे से झाँककर) काँऽव। कौन है जो रात के वक़्त इतनी मीठी आवाज़ें लगाकर मेरी नींद ख़राब करता है? ज़राभर चैन नहीं इन्हें।

लैटरबक्स : हूँ! मीठी आवाज़ में नहीं गाएँ तो क्या इस कौए जैसी कर्कश काँव-काँव करें? कहता है—ज़राभर चैन नहीं। (पेट में हाथ डालकर एक पत्र निकालता है। धीरे से जीभ को लगाकर खोलता है। उसमें से काग़ज़ निकालकर रोशनी में पढ़ने लगता है।) यह किसकी चिट्ठी आकर पड़ी है? हैडमास्टर? ठीक। क्या कहता है? श्रीमान, श्रीयुत् गोविंद राव जी...ऊँ-ऊँ...आपका लड़का परीक्षित पढ़ाई में काफ़ी कमज़ोर है। क्लास में उसका ध्यान पढ़ाई में बिलकुल नहीं रहता। इसकी बजाए उसे क्लास से ग़ायब रहकर बंटे खेलना ज़्यादा अच्छा लगता है। आप एक बार ख़ुद आकर मुझसे मिलिए...मिलिए? परीक्षित के पापा हैडमास्टर से मिल भी लेंगे, तो क्या हो जाएगा? स्कूल में बच्चे पढ़ें नहीं, क्लास से ग़ायब बंटे खेलते रहें, इसका क्या मतलब? फ़ीस के पैसे क्या फोकट में आते हैं? सभी पापा लोग ऑफ़िस में इतना काम करते हैं तब कहीं जाकर मिलते हैं पैसे। उन्हें ये बच्चे फोकट के समझें, आख़िर क्यों? छे! मुझे हैडमास्टर होना चाहिए था। इस परीक्षित के होश तब मैं अच्छी तरह ठिकाने लगाता। (वह पत्र रखकर दूसरा निकालता है।) यह किसका है?

खंभा : क्यों, लाल ताऊ, आज किस-किस के पत्र चोरी-चोरी पढ़ते रहे?

लैटरबक्स : (आश्चर्य से) चोरी-चोरी? चोरी किसलिए? सभी चिट्ठियाँ मेरे ही तो क़ब्ज़े में होती हैं। अच्छी तरह रोज़-रोज़ पढ़ता हूँ।

पेड़ : क़ब्ज़े में होने का मतलब यह तो नहीं, लाल ताऊ, कि लोगों की चिट्ठियाँ फाड़-फाड़कर पढ़ते रहो? पोस्टमास्टर को पता चल गया तो?

लैटरबक्स : चलता है पता तो चल जाने दो। मेरी तरह यहाँ रात-दिन बैठकर दिखाएँ तब पता चले। परसों वह पोस्टमैन मेरे पेट में से चिट्ठियाँ निकाल रहा था और मुझे इतनी लंबी जम्हाई आई कि रोके नहीं रुकी। (जम्हाई लेता है।) वह देखता ही रह गया। चिट्ठियों का बंडल बनाकर जल्दी-जल्दी चलता बना वह। लेकिन यह लैटरबक्स, इसे नहीं बोरियत होती एक जगह बैठे-बैठे? मैं कहता हूँ, चार चिट्ठियाँ मन बहलाने के लिए पढ़ भी लीं तो क्या हो गया?

पेड़ : लेकिन चिट्ठी जिसे लिखी गई हो, लाल ताऊ, उसे ही पढ़नी चाहिए। वह प्राइवेट होती है प्राइवेट।

लैटरबक्स : मैं कहाँ किसी की चिट्ठी पास रख लेता हूँ? जिसकी होती है उसे मिल ही जाती है। किसी की गुप्त बातें मैं कब बाहर निकलने देता हूँ? वह मुझ तक ही रहती हैं। इसीलिए तो मुझे अपना बहुत महत्त्व लगता है।

पेड़ : कोई आ रहा लगता है—

सब चुप हो जाते हैं। पोस्टर पर बनी नाचनेवाली का संतुलन फिर से बिगड़ता है। फिर पहले की तरह स्थिर और स्तब्ध हो जाती है। तेज़ हवा की भनभनाहट। भिखारी जैसा एक आदमी आता है। उसके कंधे पर सोई हुई एक लड़की है।

आदमी : मैं बच्चे उठानेवाला हूँ। दूसरा कोई काम करने की मेरी इच्छा नहीं होती। अभी थोड़ी देर पहले एक घर से यह लड़की उठाई है मैंने। गहरी नींद सो रही थी। अब तक उठी नहीं है। उठेगी भी नहीं, मैंने इसे थोड़ी बेहोशी की दवा जो दी है। अब मुझे लगी है भूख। दिनभर कुछ खाने का वक़्त ही नहीं मिला। पेट में जैसे चूहे दौड़ रहे हों!...देखें कुछ मिल जाए तो! इतनी रात गए यहाँ इस वक़्त अब किसी का आना मुमकिन नहीं।

पेड़ की ओट में लड़की को डाल देता। उस पर अपना कोट फैला देता है और इधर-उधर ज़रा चौकस होकर देखता है। फिर एक-एक क़दम सावधानी से रखता हुआ निकल जाता है।

खंभा : (पेड़ से) श—ऽऽ! पेड़ राजा, दाल में कुछ काला नज़र आता है।

पेड़ : वह ज़रूर बहुत बुरा आदमी है कोई। और यह लड़की तो छोटी सी है।

लैटरबक्स : वह उसे कहीं से उठकर लाया है। मैंने सुना है।

पेड़ : (कौए को जगाते हुए) श् श् श्! एऽए कौए, जाग न? जाग!

कौआ : दिन हो गया?

पेड़ : नहीं, दिन नहीं हुआ, पर एक दुष्ट आदमी एक छोटी सी लड़की को कहीं से उठाकर ले आया। चुप्प! वो आदमी इस वक़्त यहाँ नहीं है। वो लड़की उठ जाएगी तो चिल्लाएगी।

कौआ : (आलस से उठते हुए) आँखों पर एक चुल्लू पानी डालकर अभी आया। (जाता है।)

खंभा : भयंकर, बहुत ही भयंकर!

पेड़ : (झुककर लड़की को देखकर) बच्ची बहुत प्यारी है। कौन जाने किसकी है!

लैटरबक्स : (मुड़कर देखते हुए) नासपीटे1ऐसे शब्दों का प्रयोग असंवैधानिक है। समाज के यथार्थ प्रतिबिंबन के लिए लेखक कई बार ऐसे शब्दों का प्रयोग साहित्य में करते रहे हैं किंतु इसे व्यवहार में नहीं लाया जाना चाहिए। ने सोई हुई को उठा लिया कहीं से। चील जैसे चूहा उठा लेती है, वैसे।

खंभा : मैं भी देखना चाहता हूँ उसे, पर मुझसे झुका ही नहीं जाता। लाल ताऊ, अभी भी सो रही है क्या वो?

लैटरबक्स : हाँ-हाँ...हाँ, खंभे महाराज। 

कौआ : (आकर) कौन उठा लाया? किसे? बोलो अब।

पेड़ : इसे...इस छोटी लड़की को एक दुष्ट आदमी उठा लाया है।

कौआ : (देखकर) अच्छा...यह लड़की! और वह दुष्ट आदमी कहाँ है? इसे उठाकर लानेवाला?

खंभा : वह ज़रा गया है खाने की तलाश में...भूख लगी थी उसे।

लैटरबक्स : थोड़ी ही देर में आ जाएगा नासपीटा! और यह खिलौने-सी बच्ची...(गला रूँध जाता है।) नहीं नहीं, ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कौन जाने क्या होगा इस बच्ची का!

कौआ : हाँ सच! आजकल कुछ दुष्ट लोग बच्चों को उठा ले जाते हैं।

पेड़ : मैं बताऊँ? अपन यह काम नहीं होने देंगे। 

लैटरबक्स : पर मैं कहता हूँ, यह होगा कैसे?

खंभा : होगा कैसे मतलब? उस दुष्ट को मज़े से इस बच्ची को उठा ले जाने दें?

कौआ : वह दुष्ट है कौन? पहले उसे नज़र तो आने दीजिए।

लैटरबक्स : मैंने देखा है नासपीटे को। अच्छी तरह क़रीब से देखा है। बहुत ही दुष्ट लगा मुझे तो। कैसी नज़र थी उसकी! घड़ीभर को तो मुझे लगा, कहीं यह मुझे ही न उठा ले जाए।

कौआ : ताऊ, आपको?

खो खो करके हँसता है। छोटी लड़की अब तक कुछ जाग चुकी है। अधखुली आँखों से सामने देखती है—पेड़, खंभा, लैटरबक्स और कौआ एक दूसरे से बातें कर रहे हैं।

लैटरबक्स : इतना मुँह फाड़कर हँसने की क्या बात है इसमें?

खंभा : उसकी वह गंदी नज़र, यहाँ से मुझे भी ख़ूब अच्छी तरह दिखाई दे रही थी।

पेड़ : छोटे बच्चों को उठाने से ज़्यादा बुरा काम और क्या हो सकती है?

लड़की उठकर बैठ जाती है। स्वप्न देखने जैसी भाव-मुद्रा।

लैटरबक्स : कैसा मन होता है नासपीटों का? उनका वही जानें! उनका वही जानें!

कौआ : ताऊ, एक जगह बैठे रहकर यह कैसे जान सकोगे? उसके लिए तो मेरी तरह रोज़ चारों दिशाओं में गश्त लगानी पड़ेगी, तब जान पाओगे यह सब।

पेड़ : काफ़ी समझदार है तू। लैटरबक्स, बिजली का खंभा, यह पेड़...कौआ...

कौआ सबको इशारा करता है। तभी सब एकदम चुप, स्तब्ध हो जाते हैं। लड़की इन सबके पास जाकर खड़ी हो जाती है। अच्छी तरह सबको देखती है, पर सभी निर्जीव लगते हैं।

लड़की : ये तो ठीक लग रहा हैं। फिर मुझे जो दिखाई दिया वह सपना था...या कुछ और? (फिर ग़ौर से देखती हैं, सभी निःस्तब्ध।) कौन बोल रहा था? कौन गप्पें मार रहा था? (सभी चुप) कौन बातें कर रहा था? मुझे...मुझे डर लग रहा है। मैं कहाँ हूँ? यह...यह सब क्या है? मेरा घर कहाँ है? मेरे पापा कहाँ हैं? मम्मी कहाँ हैं? कहाँ हूँ मैं? मुझे...मुझे बहुत डर लग रहा है...बहुत डर लग रहा है। कैसा अँधेरा है चारों तरफ़! रात है...सपना देख रही थी मैं। पर सब सच है...कोई तो बोलो न...नहीं तो चीख़ूँगी मैं...चीख़ूँगी।

सभी चुप। स्तब्ध। लड़की घबराकर एक कोने में अंग सिकोड़कर बैठ जाती है। फिर अपना सिर घुटनों में डाल लेती है।

लड़की : मुझे डर लग रहा है...मुझे डर लग रहा है...

लैटरबक्स : (पेड़ से) अब मुझसे चुप नहीं रहा जाता...बहुत घबरा गई है। (आगे सरककर) बच्ची घबरा मत...

लड़की : (पहले ऊपर देखती है फिर सामने) कौन?

लैटरबक्स : मैं हूँ, लैटरबक्स।

लड़की : तुम...तुम बोलते हो?

लैटरबक्स : हाँ, मेरे मुँह नहीं है क्या?

लड़की : तुम चलते भी हो?

लैटरबक्स : हाँ, आदमियों को देख-देखकर।

लड़की : सच?

लैटरबक्स : उसमें क्या है? (थोड़ा चलकर दिखाता है) पर तू घबरा मत।

लड़की : (एकदम खिलखिलाकर हँसती है।) मज़्ज़ा!

लैटरबक्स बोलता है...चलता भी है!

लैटरबक्स : (ख़ुश होकर) वैसे मैं थोड़ा सा गा भी लेता हूँ। कुछ भजन वग़ेरह।

लड़की : सच?

लैटरबक्स : (भजन की एक लाइन गाता है।) हूँ!

लड़की : तुम मज़ेदार हो। बहुत-बहुत अच्छे हो।

लैटरबक्स : पर मैं बहुत लाल हूँ। नासपीटों के पास दूसरा रंग ही नहीं था। लाल रंग पोत दिया मुझ पर।

लड़की : लैटरबक्स, तुम सच्ची बहुत अच्छे हो। पर मुझे न, अभी भी बिलकुल सच नहीं लग रहा है। सपना लग रहा है...सपना।

लैटरबक्स : कभी न देखी हो ऐसी चीज़ देख लो यों ही लगता है। तू रहती कहाँ है?

लड़की : मैं अपने घर में रहती हूँ।

लैटरबक्स : बहुत अच्छे! हर किसी को अपने घर ही रहना चाहिए। पर तेरा यह घर है कहाँ?

लड़की :हँ? घर...हमारी गली में है।

लैटरबक्स : हम जैसे अपने घरों में रहते हैं वैसे ही घर भी गली में हो तो अच्छा रहता है। पर यह गली है कहाँ?

लड़की : सड़क पर। आसान तो है मिलनी। हमारी गली एक बड़ी सड़क पर है, हाँ। उस सड़क पर न, आदमी-ही-आदमी आते-जाते रहते हैं।

लैटरबक्स : यह तो अच्छा ही है कि हम घरों में हों, घर गली में, गलियाँ सड़कों पर बहुत से लोग हों। इससे चोरी-वोरी भी कम होती है। पर तुम्हारी सड़क का नाम क्या है?

लड़की : नाम? हमारे घरवाली सड़क।

लैटरबक्स : अरे, वह तो तुम्हारा दिया हुआ नाम है न? जैसे मुझे सबने नाम दिया है लाल ताऊ। पर मेरा असली नाम तो लैटरबक्स है।

लड़की : ये सब कौन? ये सब यानी कौन? यहाँ तो कोई भी नही है।

लैटरबक्स : (हड़बड़ाकर) है। नहीं...नहीं...यहाँ तो कोई नहीं’। मैं वैसे बता रहा था तुझे...कोई मुझे ऐसे कहे तो...

पेड़, खंभा, कौआ—सभी ठंडी लंबी साँस लेते हैं।

लैटरबक्स : तो तेरी उस सड़क का—लोगों का दिया हुआ नाम क्या है?

लड़की : मुझे नहीं पता। सभी उसे सड़क कहते हैं, सच। कोई-कोई रोड भी कहता है, रोड।

लैटरबक्स : (पेट से लिफ़ाफ़े निकालकर दिखाते हुए) यह देख, इस पर जैसे पता लिखा हुआ है, वैसा पता नहीं हैं तेरा?

लड़की : मुझे नहीं पता। सच्ची, मुझे नहीं पता।

खंभा : (बीच में ही) कमाल है!

लड़की आश्चर्य से खंभे की तरफ़ देखती है। वह चुप।

लड़की : कौन बोला यह, कमाल है? अँ...कौन?

लैटरबक्स : खंभा...(जीभ काटकर) नहीं-नहीं, यूँ ही लगा है तुझे। यूँ ही...

लड़की : मुझे सुनाई दिया है वहाँ से...ऊपर से।

पेड़ : हँ! (एकदम मुँह पर टहनी रखता है।)

लड़की : देखो, वहाँ से...वहाँ से आई है आवाज़। ज़रूर आई है। उस पेड़ पर से आई है।

कौआ : मैंने नहीं की। कौन? कौआ?

खंभा : गधा है यह भी।

पेड़ : जब ना बोलना हो तो ज़रूर...

पोस्टर पर बनी नाचनेवाली का संतुलन पुन: बिगड़ता है। वह फिर से अपने पाँव टिकाती है। घुँघरुओं की आवाज़।

लड़की : वो देखो, देखो, कोई नाच रहा है। (सभी एकटक देखते रहते हैं।) क्या है यह? क्या है? कौन बोलता है? कौन नाच रहा है? कौन?

लैटरबक्स : (प्यार से) देख, तू बिलकुल घबरा मत। हमीं बोल रहे हैं, हमीं नाच रहे हैं, चल रहे हैं, गा भी रहे हैं।

लड़की : हमीं मतलब कौन? बताओ न? बताओ जल्दी।

लैटरबक्स : हमीं...यानी कि हमीं...मैं लैटरबक्स, यह पेड़...वह बिजली का खंभा...यह कौआ भी। वह सिनेमा का पोस्टर।

लड़की : क़सम से।

लैटरबक्स : क़सम से। बस इंसानों के सामने हम नहीं करते यह सब। इंसानों को ऐसा दिखाई देता है, भूत करते हैं यह सब तो। घबरा जाते हैं। इसीलिए जब हम अकेले होते हैं तब बोलते, चलते, नाचते...

नाचनेवाली का संतुलन पुन: बिगड़ता है। घुँघरुओं की आवाज़। वह फिर पहले की स्थिति में आती है घुँघरुओं की आवाज़।

लड़की : मज़े हैं। ख़ूब-ख़ूब मज़े हैं! (अपने इर्द-गिर्द सबको देखती है।) लैटरबक्स, अब मुझे यहाँ डर नहीं लगता...ज़रा भी डर नहीं लगता।

खंभा  

पेड़      :  शाब्बाश!

कौआ

लड़की हैरान होती है, फिर ताली बजाकर खिलखिलाकर हँसती है।

लड़की : सब चलकर पहले मेरे पास आओ। (सभी पहले हिचकिचाते हैं।) आओ न पास...। नहीं तो मैं नहीं बोलूँगी, जाओ। (सब बारी-बारी से पास आते हैं।) खंभे...खंभे, नीचे बैठो। (वह अभी भी खड़ा है।) बैठो न! देखो, नहीं तो मैं रोऊँगी।

लैटरबक्स : अरे, मैं बताता हूँ। उससे बिलकुल बैठा नहीं जाता।

लड़की : क्यों?

पेड़ : क्योंकि जब से वह यहाँ खड़ा किया गया तबसे कभी बिलकुल बैठा ही नहीं।

लड़की : (व्याकुल होकर) अय्या रे! मतलब यह बिच्चारा लगातार खड़ा ही रहता है, टीचर से जैसे सज़ा मिली हो? (खंभा स्वीकृतिसूचक गर्दन हिलाता है।) फिर तो चलो, हम सब मिलकर इसे बिठाते है। हँ? चलो...

सब मिलकर बड़े यत्न से खंभे को बैठाते हैं। बैठने में उसे बहुत तकलीफ़ होती है, लेकिन बाद में बैठ जाता है।

लड़की : (ताली बजाती है।) एक लड़का बैठ गया। बैठ गया जी, एक लंबा लड़का बैठ गया!

खंभा : (ज़रा सुख महसूस करते हुए) बहुत अच्छा लग रहा है बैठकर। सच-सच बताऊँ? हम खड़े रहते हैं न, तब बैठने का सपना देखते हैं। सपने में बैठना कितना अच्छा लगता है!

लड़की : मुझे भी वैसा ही लग रहा है। मैं यहाँ कैसे आ गई? मुझे बिलकुल भी पता नहीं।

पेड़ : मैंने देखा था...(जीभ काटता है।) अहँ...मैंने नहीं देखा, मैं यह कह रहा था।

लड़की : यह लड़का जो जी में आए बोल देता है। तुम्हें ज़ीरो नंबर।

पेड़ : (खंभे को आँख मारकर) चलो ठीक। ज़ीरो तो ज़ीरो सही।

लड़की : ए, हम अब खेलें? हँ? (पोस्टर पर बनी नाचनेवाली का संतुलन फिर खोता है। घुँघरुओं की आवाज़।) मज़्ज़ा! एक लड़की बार-बार गिर रही है। गिर रही है। (ज़रा सोचकर) ए, मैं तुम्हें नाच करके दिखाऊँ? हँ? मेरी मम्मी ने सिखाया है मुझे। दिखाऊँ करके?

सभी : हाँ, हाँ, दिखाओ न? वाह!

लड़की नाच करने लगती है।

पेड़ : (खंभे से धीरे से) थोड़ी देर में वह भी आ जाएगा।

खंभा : कौन?

पेड़ : वह...वही...दुष्ट आदमी...वह बच्चे उठानेवाला।

खंभा : सचमुच! (कौए से) उसके आने का वक़्त हो गया।

कौआ : किसके?

खंभा : हूँ...उस बच्चे उठानेवाले का। इसे अभी ले जाएगा वह।

लैटरबक्स : बाप रे! तब फिर?

पेड़ : क्या किया जाए?

खंभा : कुछ तो करना ही पड़ेगा!

पेड़ : लेकिन क्या?

पोस्टर पर बनी नाचनेवाली आती है। लड़की और वह दोनों मिलकर नाचने लगती हैं। सभी दाद देते हैं। नाच ख़ूब रंग में आता है। सभी भाग लेते हैं पर बीच में ही एक दूसरे के कान में कुछ फुसफुसाते हैं पुन: नाचते हैं। दाद देते हैं। तभी वह दुष्ट आदमी आता है। देखते ही सब नि: स्तब्ध। नाचनेवाली पोस्टर के बीच जा खड़ी होती है। सभी अपनी-अपनी जगह पर और वह लड़की घबराकर पेड़ के पीछे दुबक जाती है।

आदमी : (मूँछों पर हाथ फेरकर डकार लेता है।) वाह! पेट भर खा लिया। अब आगे चला जाए। (लड़की जहाँ सो रही थी वहाँ देखता है, सिर्फ़ कोट ही वहाँ दिखाई पड़ता है। उसका चेहरा बदलता है।) कहाँ गई? कहाँ वह छोकरी? मैं छोड़ूँगा नहीं उसे। अभी, पकड़ के लाता हूँ। मुझे चकमा देती है!

ढूँढ़ने लगता है। पेड़, खंभा, लैटरबक्स, पोस्टर इन सबके बीचोंबीच लपक-झपक कर लड़की बचने का प्रयत्न करती है और वह दुष्ट आदमी पीछे-पीछे। होते-होते सभी वस्तुएँ सरकते-सरकते उसके रास्ते में आने लगती हैं। उस छोटी लड़की का संरक्षण करने लगती हैं। धीरे-धीरे-धीरे इस सारे क्रम का वेग बढ़ने लगता है जिसे ढोलक या तबले की ताल भी मिलती है। लड़की किसी भी तरह उस दुष्ट आदमी के हाथ नहीं लगती। तभी एकदम से कौआ चिल्लाता है।

कौआ : भूत!

पीछे-पीछे पेड़, खंभा, लैटरबक्स नाचते हुए चिल्लाने लगते हैं।

पेड़

खंभा      : भूत...भूत!

लैटरबक्स

तीनों और ज़्यादा ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते-चीख़ते हैं। इसी के साथ ‘भूत-भूत’ करता वह दुष्ट आदमी घबराकर भाग निकलता है। सभी पेट पर हाथ रखे जी भरकर हँसते हैं।

खंभा : मज़ा आ गया!

कौआ : ख़ूब भद्द उड़ाई!

पेड़ : क्यों उठाकर लाया था बच्ची को? बड़ा आया बच्चे चुराकर भागनेवाला! अच्छी ख़ातिर की उसकी!

लैटरबक्स : अच्छी नाक कटी दुष्ट की।

खंभा : अरे, पर वो कहाँ है?

कौआ : वो कौन?

पेड़ : कौन?

खंभा : वो...वो छोटी...लड़की अपनी...

लैटरबक्स : अरे-अरे वो...वो कहाँ गई?

पेड़ : कौन?

कौआ : देखूँ...देखते हैं...

इधर-उधर देखते हैं, पर लड़की का कहीं पता नहीं। सभी चिंताग्रस्त।

खंभा : गई कहाँ?

कौआ : यहीं तो थी।

पेड़ : कहीं नहीं मिल रही।

लैटरबक्स : उठाकर तो नहीं ले गया बच्ची क बदमाश?

फिर से ढूँढ़ते हैं। लड़की नहीं मिलती। सभी घबराए हुए हैं। पोस्टर पर बनी नाचनेवाली भी जहाँ की तहाँ उसी भंगिमा में बैठी है।

कौआ : (निराश) नहीं भई, कहीं दिखाई नहीं देती।

पेड़ : मुझे तो लगता है, बहुत करके वही ले गया होगा उसे...

लैटरबक्स : कितनी प्यारी थी रे, कितनी प्यारी!

खंभा : और स्वभाव कितना अच्छा था उसका।

सभी शोकग्रस्त बैठे हैं। तभी नाचनेवाली के पीछे से लड़की धीरे से झाँकती है।

लड़की : (शरारत से) मैं यहाँ हूँ...मुझे पकड़ों!

सभी आनंदित होकर इधर-उधर देखने लगते हैं। उसे पकड़ने दौड़ते हैं। वह पकड़ में नहीं आती। सबको भगाती रहती है। सब थक जाते हैं। आख़िर कौआ उसे पकड़ता है।

कौआ : (धप से) कैसे पकड़ ली!

लड़की : पर पहले कैसे घबरा गए थे सब? अहा! मज़्ज़ा! (ताली बजाती है। पोस्टर पर बनी नाचनेवाली भी ताली बजाती है। लड़की थककर बैठ जाती है।) ख़ूब मज़्ज़ा आया। मुझे ज़रा साँस लेने दो अब। ए, पर मैं बहुत घबरा गई थी उस दुष्ट आदमी से। तुम्हीं ने बचा लिया मुझे। अहा मुझे...बहुत नींद आ रही है। थक गई मैं। (लेटती है।) बहुत थक गई। मुझे उठा देना, हाँ...फिर हम मज़ा करेंगे...बहुत थक गई। मुझे उठा देना, हाँ...फिर हम मज़ा करेंगे। (गहरी नींद सो जाती है। सब उसे देखते हुए खड़े हैं—प्यार से।)

कौआ : सो गई बच्ची।

पेड़ : थक गई थी न बहुत? तभी झट से सो गई।

लैटरबक्स लड़की को प्रेम से थपथपाने लगता है। कौआ उसके पैर दबाता है।

खंभा : थोड़ी देर बाद सुबह हो जाएगी।

पेड़ : तब यह कहाँ जाएगी?

लैटरबक्स : उसे अपने घर का पता-ठिकाना ही नहीं मालूम, अपनी गली का नाम तक नहीं बता सकती वह। बेचारी को अपने पापा का नाम भी नहीं मालूम। छोटी है अभी।

खंभा : तो इसका क्या होगा? कहाँ जाएगी यह?

लैटरबक्स : सचमुच रे, कहाँ जाएगी?

कौआ : मैं बताऊँ?

सभी : क्या?

कौआ : हम सबा मिलकर कुछ करें तो इसको पापा से मिलवा सकते हैं।

सभी : (उठकर) कैसे?

कौआ : आसान है। सुबह जब हो जाए पेड़ राजा, तो आप अपनी घनी-घनी छाया इस पर किए रहें, वह आराम से देर तक सोती रहेगी और खंभे महाराज, आप ज़रा टेढ़े होकर खड़े रहिए।

खंभा : इससे क्या होगा?

कौआ : पुलिस को लगेगा, एक्सीडैंट हो गया। वो यहाँ आएगी और हमारी इस छोटी सहेली को देखेगी। वो लगाएगी इसके घर का पता। पुलिस सबके घर का पता मालूम करती है। खोए हुए बच्चों को उनके घर पहुँचाती है।

खंभा : रहूँगा, मैं आड़ा होकर खड़ा रहूँगा। पर मान लो, पुलिस नहीं आई तो?

कौआ : मैं बराबर यहाँ ज़ोर-ज़ोर से काँव-काँव करता रहूँगा। लोगों का ध्यान इधर खीचूँगा। उनकी चीज़ें अपनी चोंच से उठा-उठाकर लता जाऊँगा।

लैटरबक्स : पर तब भी कोई नहीं आया तो?

कौआ : तो आपको एक काम करना होगा, लाल ताऊ।

लैटरबक्स : ज़रूर करूँगा, अपनी अच्छी गुड़िया के लिए तो कुछ भी करूँगा। एक बार घर पहुँचा दिया कि सब ठीक हो गया समझो। क्या करूँ? बता।

कौआ : आपको लिखना-पढ़ना आता है न?

कान में बात करने लगता है। तभी पोस्टर पर बनी नाचनेवाली गिर पड़ती हैं। घुँघरुओं की आवाज़। पुन: जैसे-तैसे वह अपनी पहले जैसी भंगिमा बनाकर खड़ी होती है।

लैटरबक्स : (बीच में ही कौए से) उससे क्या होगा?

कौआ उसके कान में और कुछ कहता है। लैटरबक्स स्वीकृति में गर्दन हिलाता है। अँधेरा। कुछ देर बाद उजाला। सुबह होती है। खंभा अपनी जगह पर टेढ़ा होकर खड़ा है। पेड़ सोई हुई लड़की पर झुककर अपनी छाया किए हुए है। कौए की काँव-काँव ज़ोर-ज़ोर से सुनाई दे रही है और सिनेमा के पोस्टर पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा है—पापा खो गए हैं। पोस्टर पर बनी नाचनेवाली की इससे मेल खानेवाली भंगिमा। लैटरबक्स धीरे से सरकता हुआ प्रेक्षकों की ओर आता है।

लैटरबक्स : श:!श:! लाल ताऊ बोल रहा हूँ। आप में से किसी को अगर हमारी इस प्यारी सी बच्ची के पापा मिल जाएँ तो उन्हें जितनी जल्दी हो सके यहाँ ले आइएगा।

पर्दा गिरता है।                 





थप्प रोटी थप्प दाल | रेखा जैन



प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा चौथी के पाठ्यक्रम में शामिल है।

(पर्दा खुलने पर बच्चे खेलते हुए दिखाई पड़ते हैं। सब बच्चे हल्ला मचाते, हँसते हुए बड़े उत्साह के साथ खेल रहे हैं। अचानक मुन्नी अपने घर से भागी-भागी वहाँ आती है और नीना को पुकारती है। नीना खेल छोड़कर सामने एक किनारे पर आ जाती है। पीछे बच्चों का खेल चलता रहता है।)

मुन्नी - (पुकारकर) ओ नीना, नीना सुन!

नीना - (पास आते हुए) क्यों क्या बात है मुन्नी?

मुन्नी - देख नीना, आज मैंने अम्मा से आटा, घी, दाल, दही, साग, चीनी, मक्खन सब चीज़ें ले ली हैं। चल, रोटी का खेल खेलेंगे। 

नीना - हाँ, ख़ूब मज़ा आएगा। चलो, उन लोगों को भी बुला लें। (ताली बजाकर)

अरे चुन्नू, सुनो, अब इस खेल को खेलते तो बहुत देर हो गई। चलो, अब रोटी का खेल खेलें।

सब - हाँ, हाँ! यह ठीक है।

मुन्नी - अच्छा-अच्छा चलो। देख चुन्नू, तू और टिंकू, बाज़ार से साग-सब्ज़ी लाने का काम करना।

नीना -  नहीं, मुन्नी, इन दोनों से दाल बनवाएँगे। जब इनसे आग तक नहीं जलेगी, तब मज़ा आएगा।

चुनू - तो क्या तू समझती है हम आग नहीं जला सकते? चल रे टिंकू, आज इन्हें दाल बनाकर दिखा ही देंगे। क्यों?

टिंकू - हाँ, हाँ दोस्त। देख लेंगे।

मुन्नी - तो सरला, तू क्या करेगी?

सरला - भई, मैं तो दही का मट्ठा चला दूँगी।

मुन्नी - और तरला, तू।

तरला - मैं? मैं तेरे संग रोटी बनाऊँगी।

नीना - ठीक है, मैं बिल्ली बन जाती हूँ। ख़ूब मज़ा आएगा! तुम्हारी सारी चीज़ें खा जाऊँगी।

(मट्ठा चलाने की हांडी लेकर अभिनय के साथ सरला और तरला रंगमंच पर आती हैं। फिर गगरी उतारने का और रई से मट्ठा चलाने का अभिनय करती हैं। एक बच्चा रोता हुआ माँ के पास आता है। वह उसे मक्खन देने का अभिनय करती है और प्यार से पास में बिठाकर फिर मट्ठा चलाने लगती है। मुन्नी दौड़कर आती है। मट्ठा देखने का अभिनय करती है।)

मुन्नी - वाह, ख़ूब चलाया मट्ठा, 

        देखूँ यह मीठा या खट्टा।

सरला - क्या देखोगी!

इस मट्ठे का बढ़िया स्वाद, 

खाकर सब करते हैं याद।

(चुन्नू, टिंकू कंधे पर बोझ रखे हुए आते हैं।)

तरला - यह लो, चुन्नू-टिंकू आए, देखें क्या तरकारी लाए।

चुनू - (बोझ उतारते हुए) ओहो, पीठ रही हैं दुख।

टिंकू - मुझको लगी करारी भूख।

मुन्नी - (मुँह मटकाते हुए) बच्चूजी, भूख लगने से क्या होगा? अब पहले तुम आग जलाओ, और हांडी में दाल पकाओ।

चुनू - अरे हाँ। 

       चल जल्दी से दाल पकाएँ।

       बड़ियों का भी स्वाद चखाएँ।

(दोनों आग जलाने, फूँक मारने और धुएँ की वजह से आए आँसू पोंछने का अभिनय करते हैं। फिर दाल और बड़ी पकाते हैं। कलछी से दाल चलाकर चखते हैं कि उँगली जल जाती है। उँगली जलने के अभिनय के साथ-साथ मुन्नी पास आकर इन्हें देखती है।)

मुन्नी - टिंकू ने पकाई बड़ियाँ, 

        चुन्नू ने पकाई दाल, 

        टिंकू की बड़ियाँ जल गईं, 

        चुन्नू का बुरा हाल।

(तरला तथा अन्य सहेलियाँ एक ओर से आती हैं। हाथ कमर पर इस प्रकार रखा है जैसे हाथ में डलिया हो। आकर बैठ जाती हैं। फिर गाकर रोटी पकाने का अभिनय करती हैं।)

लड़कियाँ - थप्प रोटी थप्प दाल, 

              खाने वाले हो तैयार।

(ये पंक्तियाँ दो बार गाई जाने के बाद चुन्नू और टिंकू के दोस्त एक पंक्ति में एक के पीछे एक क़दम बढ़ाते हुए बड़ी शान के साथ आकर एक ओर बैठ जाते हैं। फिर लड़कियों की ओर हाथ फैलाकर माँगते हुए गाकर दो बार कहते हैं।)

चुन्नू - लाओ रोटी लाओ दाल, 

       लाओ ख़ूब उड़ाएँ माल।

(मुन्नी और तरला की सहेलियाँ रोटी की डलिया उठाने का अभिनय करती हुई एक पंक्ति में लड़कों के पास आकर उन्हें रोटी देने के अंदाज़ में दो बार गाकर कहती हैं।)

मुन्नी आदि - ले लो रोटी ले लो दाल,

               चखकर हमें बताओ हाल।

चुन्नू आदि - (चिढ़ाकर) खट्टा (पर जैसे ही मुन्नी ग़ुस्से से उनकी ओर देखती है तो कहते हैं) नहीं, नहीं मीठा। खट्टा नहीं, नहीं, मीठा।

(खाने का अभिनय करते हुए) खट्टा, मीठा, खट्टा मीठा, खट्टा, मीठा, खट्टा, मीठा। (कुछ रुककर)

सब बच्चे - आधी खाएँ आधी रखें, 

              अब सो जाएँ, उठकर चखें।

(सब बच्चे सो जाते हैं। अचानक बिल्ली की म्याऊँ सुनाई पड़ती है। बिल्ली का प्रवेश। वह चारों ओर देखती है तो होंठों पर जीभ को फेरकर बड़ी ख़ुश होकर कहती है।)

बिल्ली - ओहो! मक्खन कितना सारा,

           झट से चटकर करूँ किनारा।

(आगे बढ़कर ऊपर उछलती है, छींके पर से कुछ चीज़ लेने का अभिनय करती है।)

है छींके पर यह क्या रखा,

आन रही क्या, अगर न चखा।

(हाथ बढ़ाकर रोटी निकालते हुए)

रोटी कैसी गर्म-गर्म है, 

घी से चुपड़ी नर्म-नर्म है। (खाते हुए)

मक्खन रोटी चावल दाल, 

जी भर खाया कित्ता माल।

और देखो वह— 

मुन्नी, चुन्नू, टिंकू सारे, 

ख़र्राटे भर रहे बेचारे। 

अब चुपके से सरपट जाऊँ। 

आलसियों को सबक सिखाऊँ। 

म्याऊँ, म्याऊँ, म्याऊँ, म्याऊँ।

(बिल्ली जाती है। अंगड़ाई लेकर सरला उठती है और मक्खन के बर्तन को ख़ाली देखकर आश्चर्य से चिल्लाती हुई कहती है।)

सरला - ओ रे चुन्नू, टिंकू भाई,

          कहाँ है मक्खन और मलाई?

मुन्नी - (चौंककर उठते हुए)

अरे ज़रा छींके तक जाना,

और रोटी का पता लगाना। हाय रे!

ना रोटी, ना दूध मलाई, 

लगता है बिल्ली ने खाई।

एक बच्चा - बिल्ली आई आधी रात,

              खा गई रोटी, खा गई भात।

दूसरा बच्चा - क्या कहा

                बिल्ली आई आधी रात,

                खा गई रोटी, खा गई भात?

टिंकू - चलो बिल्ली की ढूँढ़ मचाएँ 

         फिर चोरी का मज़ा चखाएँ।

सब बच्चे - ठीक-ठीक।

(बच्चे मिलकर बिल्ली को ढूँढ़ने जाते हैं। कुछ बच्चे अंदर जाते हैं, बाहर आते हैं। कुछ रंगमंच पर सामने की ओर देखते हैं, कभी बैठकर नीचे झुककर देखते हैं। और नहीं मिलने प्रकट करते जाते हैं। तभी तरला-सरला चीख़कर कहती हैं।)

तरला-सरला - यह लो

                  मिल गई बिल्ली,

                  मिल गया चोर।

(बिल्ली घबराई हुई सी रंगमंच पर आ जाती है। सब उसे पकड़ते हैं।)

सब - करो पिटाई इसकी ज़ोर।     

(हँसकर मारने का अभिनय करते हुए) 

बोल, अब खाएगी मेरी रोटी

अब खाएगी मेरी दाल?

बिल्ली - हाँ खाऊँगी सौ-सौ बार

          जो सोओगे टाँग पसार।

(यह कहकर बिल्ली भागने का प्रयत्न करती है। पर सब बच्चे उसे घेर लेते हैं। तीन-चार बार ऐसा करने के बाद बिल्ली घेरा छोड़कर भाग जाती है, और सारे बच्चे ‘पकड़ो पकड़ो’ का शोर मचाते हुए उसके पीछे-पीछे भागते हैं।)

(पर्दा गिरता है।)

नाटक में नाटक | मंगल सकसेना


प्रस्तुत पाठ एनसीईआरटी की कक्षा आठवीं के पाठ्यक्रम में शामिल है।

राकेश का मन तो कह रहा था कि बिना पूरी तैयारी के नाटक नहीं खेलना चाहिए और जब नाटक में अभिनय करने वाले कलाकार भी नए हों, मंच पर आकर डर जाते हों, घबरा जाते हों और कुछ-कुछ बुद्धू भी हों, तब तो अधूरी तैयारी से खेलना ही नहीं चाहिए। उसके साथी मोहन, सोहन और श्याम ऐसे ही थे। राकेश को उनके अभिनय पर बिलकुल भी विश्वास नहीं था। वह स्वयं अभिनय इसलिए नहीं कर रहा था कि फ़ुटबॉल खेलते हुए वह अचानक गिर पड़ा था और उसके हाथ में चोट लग गई थी और हाथ को एक पट्टी में लपेटकर गर्दन के सहारे लटकाए रखना पड़ता था।

नाटक खेलना बहुत आवश्यक था। मुहल्ले की इज़्ज़त का सवाल था। मुहल्ले के बच्चों ने मिल-जुलकर फ़ालतू पड़े एक छोटे से सार्वजनिक मैदान में दूब व फूल-पौधे लगाए थे। वहीं एक मंच भी बना लिया था। राकेश की योग्यता पर सबको बहुत विश्वास भी था।

समय था केवल एक सप्ताह का। सात दिन ऐसे निकल गए कि पता भी नहीं लगा। मोहन, सोहन और श्याम यूँ तो अच्छी तरह अभिनय करने लगे थे, पर राकेश को उनके बुद्धूपन से डर था। हर एक अपने को दूसरे से अधिक समझदार मानता था। इसलिए यह भूल जाता था कि वह कहाँ क्या कर रहा है बस कहने से मतलब! दूसरे चाहे उनकी मूर्खतापूर्ण बातों पर हँस रहे हों, मगर वे पागलों की तरह आपस में ही उलझने लगते थे।

राकेश ने पूर्वाभ्यास के सात दिनों में उन्हें बहुत अच्छी तरह समझाया था। निर्देशन उसने इतना अच्छा दिया था कि छोटी-से-छोटी और साधारण-से-साधारण बात भी समझ में आ जाए।

ख़ैर प्रदर्शन का दिन और समय भी आ गया। राकेश साज-सज्जा कक्ष में खड़ा सबको ख़ास-ख़ास हिदायतें फिर से दे रहा था।

मोहन बोला, मेरा तो दिल बहुत ज़ोरों से धड़क रहा है।

मेरा भी, सोहन ने सीने पर हाथ रखकर कहा।

तुम लोग पानी पियो और मन को साहसी बनाओ। राकेश ने फिर हिम्मत बढ़ाई।

जैसे-तैसे अभी तक तो ठीक-ठाक हो गया। अभिनेता मंच पर आ गए। पर्दा उठा।

मोहन बना था चित्रकार। और सोहन बना था उर्दू का शायर। नाटक में दोनों दोस्त होते हैं। चित्रकार कहता है उसकी कला महान, शायर कहता है उसकी कला महान! श्याम बनता है संगीतकार! वह उनसे मुलाक़ात करने उनके उस स्थान पर आता है, जहाँ वे यह बहस कर रहे हैं। बजाय इसके कि वह नए-नए मित्रों से मधुर बातें करे, बड़े-छोटे के इस विवाद में उलझ जाता है। वह कहता है संगीतकार की कला महान!

अभी तक अभिनय अच्छी तरह चल रहा था। सबको अपना-अपना पार्ट याद आ रहा था। सब ठीक-ठीक अभिनय करते चले जा रहे थे। अचानक श्याम पार्ट भूल गया!

पर्दे की आड़ में राकेश स्वयं पूरा नाटक लिए खड़ा था। वह हर एक संवाद का पहला शब्द बोल रहा था, ताकि कलाकारों को संवाद याद आते रहें

मगर श्याम घबरा गया। वह सहसा चुप हो गया। उसके चुप होने से चित्रकार और शायर महोदय भी चुप हो गए। होना यह चाहिए था कि दोनों कोई बात मन की ही बनाकर बात आगे बढ़ा देते। पर वे घबराकर राकेश की तरफ़ देखने लगे। संगीतकार महोदय भी पलटकर राकेश की ओर देखने लगे।

राकेश बार-बार संगीतकार जी का संवाद बोल रहा था मगर आवाज़ तेज़ होकर 'माइक' से सबको न सुनाई दे जाए, इसलिए धीरे-धीरे फुसफुसाकर बोल रहा था, संगीतकार जी को वह हल्की आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी।

तभी शायर साहब संगीतकार के कंधे पर हाथ मारकर बोले उधर जाकर सुन ले न। संगीतकार अपना वायलिन पकड़े-पकड़े राकेश की ओर खिसक आए!

दर्शक ठठाकर हँस पड़े। संगीतकार जी और घबरा गए। जो कुछ सुनाई पड़ा उसे ही बिना समझे-बूझे झट से बोलने लगे।

संवाद था—'जब संगीत की स्वर लहरी गूँजती है, तो पशु-पक्षी तक मुग्ध हो जाते हैं, शायर साहब! आप क्या समझते हैं संगीत को?

मगर संगीतकार साहब बोल गए यों—जब संगीत की स्वर लहरी गूँजती है तो पशु-पक्षी तक मुँह की खा जाते हैं, गाजर साहब! आप क्या समझते हैं हमें?

शायर साहब तपाक से बोले, तुम्हारा सर! गाजर साहब हूँ मैं?

दर्शक फिर उठाकर हँस पड़े।

चित्रकार महोदय ने मंच पर सूझ और अक़्लमंदी दिखाने की कोशिश की—इनका मतलब है आपकी शायरी गाजर-मूली है और आप गाजर साहब हैं। सो इनकी कला महान है। मगर मेरी कला इनसे भी महान है।

राकेश दाँत पीस रहा था। उसकी सारी मेहनत पर पानी पड़ गया था। पर इस तरह बात सँभलते देखकर कुछ शांत हुआ।

इस बार शायर साहब बुद्धूपना दिखा बैठे। ग़ुस्सा होकर बोले, तूने भी ग़लत बोल दिया। मुझे गाजर साहब कहने की बात थी क्या? और मेरी शायरी गाजर-मूली है, तो तेरी चित्रकला झाड़ू फेरना है, पोतना है, झख मारना है।

चित्रकार महोदय ने हाथ उठाकर कहा, देख, मुँह सँभालकर बोल!

दर्शक फिर बड़े ज़ोर से हँस पड़े।

राकेश घबरा रहा था। ग़ुस्सा भी आ रहा था उसे और रोना भी। सारी इज़्ज़त मिट्टी में मिल गई।

पर अब क्या हो? वह बार-बार दोनों हथेलियों को मसल रहा था और कोई तरकीब सोच रहा था।

इधर मंच पर तीनों में ज़ोरों से तू-तू मैं-मैं हो रही थी। चित्रकार महोदय हाथ में कूची पकड़े, आँखें नचा-नचाकर, मटक-मटककर बोल रहे थे—

अरे चमगादड़ तुझे क्या ख़ाक शायरी करना आता है! ज़बरदस्ती ही तुझे यह पार्ट दे दिया। तूने सारा गड़बड़ कर दिया।

मुझे चमगादड़ कहता है? अरे आलूबुखारे, शायरी तो मेरी बातों से टपकती है। तूने कभी 'टूथ-ब्रुश' के अलावा कोई ब्रुश उठाया भी है? यहाँ चित्रकार बना दिया तो सचमुच ही अपने को चित्रकार समझ बैठा।

दर्शक हँसी से लोटपोट हुए जा रहे थे। संगीतकार महोदय कभी उन दोनों लड़ते कलाकरों की ओर हाथ नचाते, कभी दर्शकों की ओर।

तभी तेज़ी से राकेश मंच पर पहुँच गया। सब चुप हो गए, सकपका गए। राकेश पहुँचते ही एक कुर्सी पर बैठते हुए बोला आज मुझे अस्पताल में हाथ पर पट्टी बँधवाने में देर हो गई, तो तुमने इस तरह 'रिहर्सल' की है! ज़ोर-ज़ोर से लड़ने लगे। अभिनय का दिन बिलकुल पास आ गया है और हमारी तैयारी का यह हाल है।

चित्रकार महोदय ने इस समय अक़्लमंदी दिखाई बोले, हम क्या करें, डायरेक्टर साहब? पहले इसी ने ग़लती की।

राकेश बात काटकर बोला, अरे तो मैंने कह नहीं दिया था कि रिहर्सल में भी यह मानकर चलो कि दर्शक सामने ही बैठे हैं। अगर ग़लती हो गई थी, तो वहीं से दुबारा रिहर्सल शुरू कर देते। यह क्या कि लड़ने लगे। सब गड़बड़ करते हो।

बात राकेश ने बहुत सँभाल ली थी। पर्दे की आड़ में खड़े अन्य साथी मन-ही-मन राकेश की तुरतबुद्धि की प्रशंसा कर रहे थे। दर्शक सब शांत थे, भौंचक्के थे। वे सोच रहे थे यह क्या हो गया! वे तो समझ रहे थे कि नाटक बिगड़ गया, मगर यहाँ तो नाटक में ही नाटक था। उसकी रिहर्सल ही नाटक था। मानो इस नाटक में नाटक की तैयारी की कठिनाइयों और कमज़ोरियों को ही दिखाया गया था!

राकेश कह रहा था, देखिए, हमारे नाटक का नाम है बड़ा कलाकार और बड़ा कलाकार वह है, जो दूसरे की त्रुटियों को नहीं अपनी त्रुटियों को देखे और सुधारे। आइए, अब हम फिर से 'रिहर्सल' शुरू करते हैं।

तभी राकेश के इशारे पर पर्दा गिर गया। दर्शक नाटक की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए अपने घर चले गए।











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