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जगत विदित बैद्यनाथ / Jagat vidit Baidyanath Vidyapati

जगत विदित बैद्यनाथ, सकल गुण आगर हे !
तोहें प्रभु त्रिभुवन नाथ, दया कर सागर हे !

अंग भसम सिर अंग, गले बिच विषधर हे !
लोचन लाल विशाल, भाल बिच शशिधर हे !

जानि शरण दीनबन्धु, शरण धय रहलहूँ हे !
दया करू मम प्रतिपाल, अगम जल पड़लहूँ हे !

यहाँ पढ़ें – विद्यापति का साहित्य / जीवन परिचय एवं अन्य रचनाएं
 

 

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