कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

मोहन हम भी तुमसे रूठे! बिन्दु जी भजन

 Mohan Ham Bhi Tumse Roothi! Bindu JiBhajan

मोहन हम भी तुमसे रूठे!
जान गए हम छली प्रपंची हो कपटी और झूठे,
पहले शरण बुलाया हमको दे-देकर लोभ अनूठे,
अब इस बार दरस देने में दिखलाए अँगूठे,
सुनते हैं देते थे सबको तब सुख भर-भर मूठे,
हमने शत-शत ‘बिन्दु’ भए दिए न टुकड़े जूठे॥ 

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *