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परतह परदेस, परहिक आस / Paratah pardes, parhik aas Vidyapati

परतह परदेस, परहिक आस।
विमुख न करिअ, अबस दिस बास।
एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।
भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि।
पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।
चरन-पखारन, आसन-दान।
मधुरहु वचने करिअ समधान।
ए सखि अनुचित एते दुर जाए।
आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।

यहाँ पढ़ें – विद्यापति का साहित्य / जीवन परिचय एवं अन्य रचनाएं
 

 

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