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उठो हे सखिया! खोलो खोलो अँखिया / रघुनन्दन 'राही'

 

उठो हे सखिया! खोलो खोलो अँखिया, कहाँ छै रतिया ना।
हाय राम! उगलै भोरकवा बिछावो आसनिया,
करो भजनिया ना॥
काया नगरिया में सुखमन दुअरिया, खोलो केवरिया ना।
हाय राम! पिया मिलन के शुभ छै घड़िया,
जोड़ो नजरिया ना॥
हृदय-महल में पलंग बिछाओ, सुरति सजनिया ना।
हाय राम! चकमक-चकमक मोतिया चमकै,
बाजै पैजनिया ना॥
पाँच रतनवाँ धरु अँगनवाँ, कहै सजनवाँ ना।
हाय राम! पिया महल में मिरदंग बाजै,
शुभ दरसनवाँ ना॥
शब्द के डोलिया चढ़िके सखिया, जा ससुररिया ना।
हाय राम! जन ‘रघुनन्दन’ के यही अरजिया,
सीतल छतिया ना॥ 

सद्गुरु मेँहीँ बाबा के महिमा / रघुनन्दन 'राही'

सुनो हे बहिना भोरे उठियो / रघुनन्दन 'राही'

मानो मानो संत कहनवाँ / रघुनन्दन 'राही'

अपनी शरण में लगाइ ला हो सद्गुरु / रघुनन्दन 'राही'

चलो हे बहिना सत्संगति में / रघुनन्दन 'राही'

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