कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

ललितमोहिनी देव के दोहे (अष्टाचार्यों में से अंतिम) Lalitmohini Dev ke Dohe

x

 खुले पानियों में घिरी लड़कियाँ

नर्म लहरों के छींटे उड़ाती हुई


बात-बे-बात हँसती हुई

अपने ख़्वाबों के शहज़ादों का तज़्किरा कर रही थीं


जो ख़ामोश थीं

उन की आँखों में भी मुस्कुराहट की तहरीर थी


उन के होंटों को भी अन-कहे ख़्वाब का ज़ाइक़ा चूमता था!

आने वाले नए मौसमों के सभी पैरहन नीलमीं हो चुके थे!


दूर साहिल पे बैठी हुई एक नन्ही सी बच्ची

हमारी हँसी और मौजों के आहंग से बे-ख़बर


रेत से एक नन्हा घरौंदा बनाने में मसरूफ़ थी

और मैं सोचती थी


ख़ुदा-या! ये हम लड़कियाँ

कच्ची उम्रों से ही ख़्वाब क्यूँ देखना चाहती हैं


ख़्वाब की हुक्मरानी में कितना तसलसुल रहा है!

नज़्म संग्रह से कुछ और नज़्में 

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *