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कविता का मूलस्रोत – देवेंद्र सत्यार्थी हिंदी निबंध | Kavitaa Kaa Moolasrot

आदिम युग के लोकगीतों की विवेचना करते हुए काँडवेल ने इस बात पर विशेष ज़ोर दिया था कि उस समय सामाजिक चेतना अपने प्रारंभिक काल में थी, और जिस प्रकार विकासमान समाज ने वातावरण के साथ संघर्ष करने में पृथ्वी पर अपने अस्तित्व के साथ अनुकूलता स्थापित करने के लिए फसल उगाने की कला को जन्म दिया, उसी प्रकार फसल के प्रति उस क़बीले के संबंध को व्यक्त करने के लिए भावात्मक सामाजिक एवं सामूहिक मनोदशा की अभिव्यक्ति करनेवाली कविता को जन्म दिया। निरंतर संघर्ष के पश्चात् प्रकृति के कुछ अंगों पर तो मानव की विजय हो गई और इसके फलस्वरूप प्रकृति के प्रति आदिम युग की कविता में सहानुभूति की रेखाएँ उभरने लगी थीं। परंतु प्रकृति के अंग-अंग अब भी साहचर्य के लिए तैयार न थे और वे अपने प्रकोप से मानव के लिए किए-कराए को असह्य क्षति पहुँचाते थे। अतः यह नितांत आवश्यक था कि प्रकृति पर पूर्ण रूप से विजयी होने के लिए मानव की दृष्टि में सामूहिक जीवन का महत्त्व बढ़ता चला जाए। सामूहिक भावों को जाग्रत करनेवाले लोकगीत न केवल कर्म करने के लिए प्रेरणा देते थे, बल्कि वे श्रम को मधुर बना देते थे। उस युग के लोकगीतों में मानव के सामूहिक भाव अनुराग और साहचर्य, परिश्रम और आनंद-उल्लास, भय, आशंका और आशा-निराशा की कहानी सुरक्षित है। फसलों के साथ-साथ गीत भी तैयार किए जाते थे। विघ्नों की भयंकरता इन गीतों में बार-बार गूँज उठती थी, विघ्नों का सामना करने के लिए सामूहिक प्रेरणा प्रदान करना यही इनका ध्येय था।



शब्द, लय, छंद, विचार वस्तु और भाव का सामाजिक अस्तिस्व एक निर्विवाद सत्य है। फसल के साथ मनुष्य का आर्थिक संबंध ही मुख्य और सचेत था, और जहाँ तक लोकगीत का संबंध था समस्त क़बीले की सामूहिक आवाज़ ही इसकी सत्य समझी जाती थी। फसल के लिए लंबी प्रतीक्षा अनिवार्य थी। उस युग के लोकगीत की पृष्ठभूमि में मानव और प्रकृति के संघर्ष का इतिहास निहित है।



समाज का विकास हुआ। प्रत्येक वर्ण ने अपना-अपना काम सँभाल लिया। कुम्हार को लीजिए। शत-शत शताब्दियों से वह माटी के घड़े तैयार करता आ रहा है। थोड़े-बहुत अंतर के साथ इन घड़ों का रूप उन घड़ों जैसा ही है जो पाँच हज़ार पुराने मोहनजोदड़ो की खुदाई से निकाले हैं। यह देखकर आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा की छाया में पला हुआ व्यक्ति चकित रह जाता है। कसेरे की कला का भी यही हाल है। उड़ीसा के ग्राम-जीवन की एक झाँकी पेश करते हुए काका कालेलकर ने लिखा है—कसेरा कटोरी बनाता है। बाप—दादों से उसने यह हुनर सीखा है। और उसके ग्राहक भी बने हुए हैं, और यह भी वह जानता है कि साल भर में इस हुनर में कितनी आमदनी होगी। उसके प्रतिद्वंद्वी भी उसकी बिरादरी के ही हैं। सबका जीवन ओत-प्रोत-ताने-बाने की तरह एक-दूसरे से गुंथा हुआ है। उसे इस बात का भी विश्वास है कि बाहर से कोई उस पर हमला करनेवाला नहीं है। उसके प्राण मानो ख़तरे में हैं, इसलिए उसे बेतहाशा भागने की ज़रूरत नहीं है। उसका जीवन और परिश्रम उसका उपयोग और उसका आराम सब साल में बंधे हुए चल रहे हैं। अब अपने उस आनंद को कटोरी के ऊपर अंकित किए बिना वह अपने हाथ से उसे अलग कैसे कर सकता है? कटोरी के बन जाने पर सोचा, चलो इसकी कोर के ऊपर थोड़े से बेल-बूटे चितेर दूँ। इस कटोरी में बच्चे थनों से निकला हुआ गरम-गरम दूध पिएँगे। इसलिए चलो, इसके ऊपर अपनी पूँछ ऊँची उठाकर कूदनेवाले बछड़े को ही चितेर दूँ। इसी का नाम कला है और उसके बालक उसके इर्द-गिर्द कूदने लगते हैं।



समाज का विकास होने पर जब कार्य-विभाजन हुआ, प्रत्येक वर्ग ने पृथक्-पृथक् लोकगीतों की रचना आरंभ कर दी। यद्यपि कुछ गीत समूचे ग्राम में सभी वर्गों में लोकप्रिय रहे और उनका प्रचलन किसी एकाकी ग्राम ही में नहीं बल्कि समूचे जनपद में शताब्दियों से चला आता है। खेत में काम करते हुए पंजाबी किसान गा उठता है—



“बल्लीए कणक दीए



तैनू खाणगे नसीबां वाले।“



—“अरी गेहूँ की बालो,



तुझे भाग्यशाली लोग ही खायेंगे।“



यहाँ 'गेहूँ' की बाली के शब्दार्थ से ही गुज़ारा नहीं चलता। प्रतीक रूप से किसान युवक ने किसी युवती की ओर संकेत किया है। जैसे खेत में गेहूँ की बाली पक जाती है ऐसे ही ग्राम की नन्हीं-मुन्नी-सी बालिका युवती बन जाती है, और किसान युवक सोचता है कि वह युवक जो इस युवती के आँचल से बँधेगा अवश्य कोई भाग्यशाली हो होगा। फसल को मांडते समय बैलों के चक्कर को गढ़वाल में 'दाई का फेरा' कहते हैं। गढ़वाली लोकगीत में इसी से ऋतु बदलने की उपमा ली गई है—



“आई गैन ऋतु बौड़ी



दाई जैसी फेरो, झुमैलों



उवा देसी उवा जाला



ऊंदा देसी उंदो, झुमैलो”



—“ऋतु लौटकर आ गई



फसल मांडते समय बैलों के चक्कर के समान। झुमैलो।



ऊपर देश के लोग ऊपर चले जाएँगे,



नीचे देश के लोग नीचे आ जाएँगे। झुमैलो।“



यहाँ बसंत ऋतु की ओर संकेत किया गया है। 'झुमैलो' आनंद-सूचक शब्द है, और प्रत्येक कड़ी के पश्चात् इसे दुहराते हैं। 'झुमैलो' लोकनृत्य का नाम भी है। एक स्थान पर राजस्थानी लोक-मानस ने ग्रीष्म ऋतु का चित्र बड़ी कुशलता से अंकित किया है—



“कह लूवां कित जावस्यो



पावस धर पड़ियांह



हिये नवोरा नार रा



बालम बीछड़ियांह।“



—“कहो, हे लूओ तुम कहाँ जाओगी।



जब धरती पर पावस ऋतु आ जाएगी?



हम उस नवविवाहिता नारी के हिय में जाकर रहेंगी



जिसका बालम बिछड़ गया हो।“



वियोगिनी नववधु के हृदय में सदैव ग्रीष्म ऋतु छाई रहती है, वहाँ सदैव लूएँ चलती हैं जिन्हें पावस ऋतु की फुहार भी शांत नहीं कर सकती। मारवाड़ का रेखाचित्र भी देख लीजिए—



“बालू बाबा देसड़ो



पाणी ज्यां कूवांह



आधी रात कुहक्कड़ा



ज्यू माणस मवांह।



बालू बाबा देसड़ो



पाणी सन्दी तात



पाणी केरे कारणे



पिव छाड़े आधी रात



बाबा मत देइ मारुवां



वर कु'वारि रहेस



हाथ कचालो सिर घड़ो



सींचती य मरेस



बाबा मत देइ मारुवां



सूधा गोवालांह



कंध कुहाड़ो सिर घड़ो



वासो मंझ थलांह



जिण भु'य पन्नग पीवणा



केर कंटाला रूख



आके फोगे छांहड़ी



हूँछा भांजइ भूख।



—“हे बाबा मैं उस देश को जला दूँ,



जहाँ पानी कुओं में मिलता है।



आधी रात ही से पानी निकालनेवाले लोग यों शोर मचाने लगते हैं



जैसे कोई मनुष्य मर गया हो।



हे बाबा, मैं उस देश को जला दूँ



जहाँ पानी का कष्ट है।



जहाँ पानी निकालने के लिए



प्रियतम आधी रात ही को घर से चल देता है।



हे बाबा, मारवाड़ के निवासी के साथ मेरा विवाह न करना



भले ही मैं कुवारी रह जाऊँ।



हाथ में कटोरा, सिर पर घड़ा,



मैं पानी ढोते-ढोते मर जाऊँगी।



हे बाबा, मारवाड़ के निवासी के साथ मेरा विवाह न करना



मारवाड़ के निवासी सीधे-सादे गाय चरानेवाले लोग हैं।



कन्धे पर कुल्हाड़ी, सिर पर घड़ा,



मरुस्थल के बीच उनका निवास है।



जिस भूमि पर पी जानेवाले साँप होते हैं,



कंटीले करील हो जहाँ के वृक्ष हैं,



आक और फोग के नीचे ही जहाँ छाया मिल सकती है,



घास के बीज खाकर ही भूख मिटानी पड़ती है।“



हो सकता है कि मारवाड़ का यह रेखाचित्र देखकर कुछ लोग नाक-भौं सिकोड़े। किंतु लोकगीत का काम सत्य पर पर्दा डालना नहीं। कुछ आधुनिक वैज्ञानिकों का मत है कि मारवाड़ की मरुभूमि किसी जमाने में बहुत उपजाऊ भूमि रह चुकी है। यह भी सुनने में आया है कि आगामी दस वर्षों के भीतर मारवाड़ की कायापलट होने वाली है। विद्युत्-शक्ति से मारवाड़ के कोने-कोने में जल पहुँचाया जाएगा, और उस समय कोई नवीन गीत नवयुग का स्वागत करेगा।



भारत कृषि प्रधान देश है। अतः यह कुछ उचित ही प्रतीत होता है कि लोकगीतों में राम, लक्ष्मण और सीता तक के दर्शन हमें किसी खेत ही में ही जायं। जैसे एक बुंदेली गीत में—



“राम बबें तो लछमन जोतिओ



सीता माता काढ़े कांद



लछमन दिउरा लौट के हेरिओ



मेरी बारी दो दो कान।“



—“राम बीज बो रहे हैं, लक्ष्मण हल चला रहे हैं



सीता माता निराई कर रही हैं



लक्ष्मण देवर, लौटकर देखो



मेरे खेत में दो-दो अंकुर निकल आए हैं।“



खेत की रखवाली नितांत आवश्यक है। बुंदेली लोकगीत में सीता और लक्ष्मण के प्रश्नोत्तर सुनिए—



“काहे को बाँध लछमन धनइयां



काहे को पांचों बान



मिरगा बारी ऐसे चुनें



जैसे अनाथ को खेत



काहे को निरखो भौजी धनइयां



काहे को पांचई बान



परों मिरगला मारन चलूं



मोए जसरथ की आन।“



—“काहे को धनुष बांधा है, लक्ष्मण!



काहे को पाँचों बाण रख छोड़े हैं?



मृग खेत में ऐसे चरते हैं,



जैसे यह अनाथ का खेत हो।



भावज, काहे को धनुष को निरखती हो?



काहे को पाँच बाणों का दोष निकालती हो,



परसों मैं मृग को मारने चलूँगा



मुझे दशरथ की आन है।“



प्रत्येक जनपद क्या सोचता है और क्या अनुभव करता है, इसकी अभिव्यक्ति आज भी वहाँ के लोकगीतों में मिलती है। कूलई, चंबाला, बांगरू, कुमाउनी और छत्तीसगढ़ी—ऐसी अनेक जनपदीय भाषाएँ हैं जिनमें प्राणवान और जाग्रत लोकवार्ता का अक्षय भण्डार है। लोकवार्ता का अन्वेषण नितांत आवश्यक है। कविता के मूलस्रोत तक पहुँचकर हम आधुनिक कविता के लिए नवीन प्रेरणा प्राप्त कर सकेंगे।



युग बदल रहा है। नया युग नए गीत चाहता है। किंतु नया युग पुरातन लोकगीतों का निरादर नहीं कर सकता—लोकगीत जो कविता के मूलस्रोत हैं।

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