श्री कुंथुनाथ जी चालीसा – सम्पूर्ण पाठ हिंदी में (Lyrics व Video सहित)
श्री कुंथुनाथ जी चालीसा 🎬 वीडियो देखें
श्री कुंथुनाथ जी चालीसा एक अत्यंत पावन एवं भक्तिभाव से परिपूर्ण स्तुति है। श्रद्धालु प्रतिदिन इस चालीसा का पाठ करके मन की शांति, सुख-समृद्धि और सभी कष्टों से मुक्ति की कामना करते हैं। नीचे दी गई सम्पूर्ण चालीसा को ध्यानपूर्वक पढ़ें और साथ ही ऊपर दिए गए बटन पर क्लिक करके इसका भक्ति वीडियो भी देखें।
दया सिन्धु कुन्थु जिनराज, भव सिंधु तिरने को जहाज।
कामदेव चाकरी महाराज, दया करो हम पर भी आज।।
जय श्री कुन्थु नाथ गुणखान, परम यशस्वी महिमावान ।
हस्तिनापुर नगरी के भूपति, शूरसेन कुरुवंशी अधिपति ।।
महारानी थी श्रीमती उनकी, वर्षा होती थी रतनन की ।
प्रतिपदा वैशाख उजियारी, जन्मे तीर्थंकर बलधारी ।।
गहन भक्ति अपने उर धारे, हस्तिनापुर आये सुर सारे ।
इन्द्र प्रभु को गोद में लेकर, गए सुमेरु हर्षित हो कर ।।
न्हवन करे निर्मल जल लेकर, ताण्डव नृत्य करे भक्ति भर ।
कुंथुनाथ नाम शुभ देकर, इन्द्र करें स्तवन मनोहर ।।
दिव्या वस्त्राभूषण पहनाये, वापिस हस्तिनापुर को आए ।
क्रम क्रम से बढे बालेन्दु सम, यौवन शोभा धारें हितकर ।।
धनु पैतालीस उननत प्रभु तन, उत्तम शोभा धारें अनुपम ।
आयु पिचानवे वर्ष हजार, लक्षण अज धारे हितकार ।।
राज्याभिषेक हुआ विधिपूर्वक, शासन करे सुनीति पूर्वक ।
चक्ररतन शुभ प्राप्त हुआ जब, चक्रवर्ती प्रभु कहलाये तब ।।
एक दिन प्रभु गए उपवन में, शांत मुनि एक देखे मग में ।
इंगित किया तभी अंगुली से, देखो मुनि को कहा मंत्री से ।।
मंत्री ने पूछा जब कारण, किया मोक्षहित मुनिपद धारण ।
कारण करे और स्पष्ट, मुनि पद से ही कर्म हो नष्ट ।।
मंत्री का तो हुआ बहाना, किया वस्तुतः निज कल्याणा ।
चित्त विरक्त हुए विषयों से, तत्व चिंतन करते भावों से ।।
निज सूत को सौपा सब राज, गए सहेतुक वन जिनराज ।
पंचमुष्टि केशलोंच कर, धार लिया पद नगन दिगंबर ।।
तीन दिन बाद गए गजपुर को, धर्ममित्र पड्गाए प्रभु को ।
मौन रहे सौलह वर्षो तक, सहे शीत वर्षा और आतप ।।
स्थिर हुए तिलक तरु जल में, मगन हुए निज ध्यान अटल में ।
आतम में बढ़ गई विशुद्धि, केवल ज्ञान की हो गयी सिद्धि ।।
सूर्यप्रभा सम सोहे आप्त, दिग्मंडल शोभा हुई व्याप्त ।
समोशरण रचना सुखकार, ज्ञान तृप्ति बैठे नर नार ।।
विषय भोग महा विषमय हैं, मन को कर देते तन्मय हैं ।
विष से मरते एक जनम में, भोग विषाक्त मरे भव भव में ।।
क्षण भंगुर मानव का जीवन, विद्युतवत विनसे अगले क्षण ।
सांध्य लालिमा के सद्रश्य ही, यौवन हो जाता हैं अद्रश्य ही ।।
जब तक आतम बुद्धि नहीं हो, तब तक दरश विशुद्धि नहीं हो ।
पहले विजित करो पंचेन्द्रिय, आतमबल से बनो जितेन्द्रिय ।।
भव्य भारती प्रभु की सुनकर, श्रावक जन आनन्दित होकर ।
श्रद्धा से व्रत धारण करते, शुभ भावों का अर्जन करते ।।
शुभायु एक मास की रही जब, शैल सम्मेद पे वास किया तब ।
धारा प्रतिमा योग वहां पर, कटा कर्म बंध सब प्रभुवर ।।
मोक्षकल्याणक करते सुरगण, कूट ज्ञानधार करते पूजन ।
चक्री कामदेव तीर्थंकर, कुंथुनाथ थे परम हितकर ।।
चालीसा जो पढ़े भाव से, स्वयं सिद्ध हो निज स्वाभाव से ।
धर्म चक्र के लिए प्रभु ने, चक्र सुदर्शन तज डाला ।।
इसी भावना ने अरुणा को, किया ज्ञान में मतवाला ।।
श्री कुंथुनाथ जी चालीसा पाठ का महत्व
नियमित रूप से इस चालीसा के पाठ से भक्तों के दुःख-दारिद्र दूर होते हैं, मन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इसे श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रतिदिन पढ़ें।
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