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सियारामशरण गुप्त की कविताएँ भाग 1 : Siyaramsharan Gupt Kavitaen Part 1

सियारामशरण गुप्त राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे, और अपनी अलग पहचान रखते थे। 'मौर्य विजय', 'पाटलिपुत्र' और 'दिवोदास' उनके प्रसिद्ध खंडकाव्य हैं, जिनमें इतिहास को काव्य का विषय बनाया गया। उनकी कविता में करुणा और देश-प्रेम साथ-साथ चलते हैं।

प्यारे बापू / सियाराम शरण गुप्त

हम सब के थे प्यारे बापू
सारे जग से न्यारे बापू
जगमग-जगमग तारे बापू
भारत के उजियारे बापू
लगते तो थे दुबले बापू
थे ताक़त के पुतले बापू
नहीं कभी डरते थे बापू
जो कहते करते थे बापू
सदा सत्य अपनाते बापू
सबको गले लगाते बापू
हम हैं एक सिखाते बापू
सच्ची राह दिखाते बापू
चरखा खादी लाए बापू
हैं आज़ादी लाए बापू
कभी न हिम्मत हारे बापू
आँखों के थे तारे बापू

एक फूल की चाह / सियाराम शरण गुप्त

उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ,
हृदय-चिताएँ धधकाकर,
महा महामारी प्रचण्ड हो
फैल रही थी इधर उधर।
क्षीण-कण्ठ मृतवत्साओं का
करुण-रुदन दुर्दान्त नितान्त,
भरे हुए था निज कृश रव में
हाहाकार अपार अशान्त।
बहुत रोकता था सुखिया को
'न जा खेलने को बाहर',
नहीं खेलना रुकता उसका
नहीं ठहरती वह पल भर।
मेरा हृदय काँप उठता था,
बाहर गई निहार उसे;
यही मानता था कि बचा लूँ
किसी भांति इस बार उसे।
भीतर जो डर रहा छिपाये,
हाय! वही बाहर आया।
एक दिवस सुखिया के तनु को
ताप-तप्त मैंने पाया।
ज्वर से विह्वल हो बोली वह,
क्या जानूँ किस डर से डर -
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर।
बेटी, बतला तो तू मुझको
किसने तुझे बताया यह;
किसके द्वारा, कैसे तूने
भाव अचानक पाया यह?
मैं अछूत हूँ, मुझे कौन हा!
मन्दिर में जाने देगा;
देवी का प्रसाद ही मुझको
कौन यहाँ लाने देगा?
बार बार, फिर फिर, तेरा हठ!
पूरा इसे करूँ कैसे;
किससे कहे कौन बतलावे,
धीरज हाय! धरूँ कैसे?
कोमल कुसुम समान देह हा!
हुई तप्त अंगार-मयी;
प्रति पल बढ़ती ही जाती है
विपुल वेदना, व्यथा नई।
मैंने कई फूल ला लाकर
रक्खे उसकी खटिया पर;
सोचा - शान्त करूँ मैं उसको,
किसी तरह तो बहला कर।
तोड़-मोड़ वे फूल फेंक सब
बोल उठी वह चिल्ला कर -
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर!
क्रमश: कण्ठ क्षीण हो आया,
शिथिल हुए अवयव सारे,
बैठा था नव-नव उपाय की
चिन्ता में मैं मनमारे।
जान सका न प्रभात सजग से
हुई अलस कब दोपहरी,
स्वर्ण-घनों में कब रवि डूबा,
कब आई सन्ध्या गहरी।
सभी ओर दिखलाई दी बस,
अन्धकार की छाया गहरी।
छोटी-सी बच्ची को ग्रसने
कितना बड़ा तिमिर आया!
ऊपर विस्तृत महाकाश में
जलते-से अंगारों से,
झुलसी-सी जाती थी आँखें
जगमग जगते तारों से।
देख रहा था - जो सुस्थिर हो
नहीं बैठती थी क्षण भर,
हाय! बही चुपचाप पड़ी थी
अटल शान्ति-सी धारण कर।
सुनना वही चाहता था मैं
उसे स्वयं ही उकसा कर -
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर!
हे मात:, हे शिवे, अम्बिके,
तप्त ताप यह शान्त करो;
निरपराध छोटी बच्ची यह,
हाय! न मुझसे इसे हरो!
काली कान्ति पड़ गई इसकी,
हँसी न जाने गई कहाँ,
अटक रहे हैं प्राण क्षीण तर
साँसों में ही हाय यहाँ!
अरी निष्ठुरे, बढ़ी हुई ही
है यदि तेरी तृषा नितान्त,
तो कर ले तू उसे इसी क्षण
मेरे इस जीवन से शान्त!
मैं अछूत हूँ तो क्या मेरी
विनती भी है हाय! अपूत,
उससे भी क्या लग जावेगी
तेरे श्री-मन्दिर को छूत?
किसे ज्ञात, मेरी विनती वह
पहुँची अथवा नहीं वहाँ,
उस अपार सागर का दीखा
पार न मुझको कहीं वहाँ।
अरी रात, क्या अक्ष्यता का
पट्टा लेकर आई तू,
आकर अखिल विश्व के ऊपर
प्रलय-घटा सी छाई तू!
पग भर भी न बढ़ी आगे तू
डट कर बैठ गई ऐसी,
क्या न अरुण-आभा जागेगी,
सहसा आज विकृति कैसी!
युग के युग-से बीत गये हैं,
तू ज्यों की त्यों है लेटी,
पड़ी एक करवट कब से तू,
बोल, बोल, कुछ तो बेटी!
वह चुप थी, पर गूँज रही थी
उसकी गिरा गगन-भर भर -
'मुझको देवी के प्रसाद का -
एक फूल तुम दो लाकर!'
"कुछ हो देवी के प्रसाद का
एक फूल तो लाऊँगा;
हो तो प्रात:काल, शीघ्र ही
मन्दिर को मैं जाऊँगा।
तुझ पर देवी की छाया है
और इष्ट है यही तुझे;
देखूँ देवी के मन्दिर में
रोक सकेगा कौन मुझे।"
मेरे इस निश्चल निश्चय ने
झट-से हृदय किया हलका;
ऊपर देखा - अरुण राग से
रंजित भाल नभस्थल का!
झड़-सी गई तारकावलि थी
म्लान और निष्प्रभ होकर;
निकल पड़े थे खग नीड़ों से
मानों सुध-बुध सी खो कर।
रस्सी डोल हाथ में लेकर
निकट कुएँ पर जा जल खींच,
मैंने स्नान किया शीतल हो,
सलिल-सुधा से तनु को सींच।
उज्वल वस्र पहन घर आकर
अशुचि ग्लानि सब धो डाली।
चन्दन-पुष्प-कपूर-धूप से
सजली पूजा की थाली।
सुकिया के सिरहाने जाकर
मैं धीरे से खड़ा हुआ।
आँखें झँपी हुई थीं, मुख भी
मुरझा-सा था पड़ा हुआ।
मैंने चाहा - उसे चूम लें,
किन्तु अशुचिता से डर कर
अपने वस्त्र सँभाल, सिकुड़कर
खड़ा रहा कुछ दूरी पर।
वह कुछ कुछ मुसकाई सहसा,
जाने किन स्वप्नों में लग्न,
उसकी वह मुसकाहट भी हा!
कर न सकी मुझको मुद-मग्न।
अक्षम मुझे समझकर क्या तू
हँसी कर रही है मेरी?
बेटी, जाता हूँ मन्दिर में
आज्ञा यही समझ तेरी।
उसने नहीं कहा कुछ, मैं ही
बोल उठा तब धीरज धर -
तुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल तो दूँ लाकर!
ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर
मन्दिर था विस्तीर्ण विशाल;
स्वर्ण-कलश सरसिज विहसित थे
पाकर समुदित रवि-कर-जाल।
परिक्रमा-सी कर मन्दिर की,
ऊपर से आकर झर झर,
वहाँ एक झरना झरता था
कल-कल मधुर गान कर-कर।
पुष्प-हार-सा जँचता था वह
मन्दिर के श्री चरणों में,
त्रुटि न दिखती थी भीतर भी
पूजा के उपकरणों में।
दीप-दूध से आमोदित था
मन्दिर का आंगन सारा;
गूँज रही थी भीतर-बाहर
मुखरित उत्सव की धारा।
भक्त-वृन्द मृदु-मधुर कण्ठ से
गाते थे सभक्ति मुद-मय -
"पतित-तारिणि पाप-हारिणी,
माता, तेरी जय-जय-जय!"
"पतित-तारिणी, तेरी जय-जय" -
मेरे मुख से भी निकला,
बिना बढ़े ही मैं आगे को
जानें किस बल से ढिकला!
माता, तू इतनी सुन्दर है,
नहीं जानता था मैं यह;
माँ के पास रोक बच्चों की,
कैसी विधी यह तू ही कह?
आज स्वयं अपने निदेश से
तूने मुझे बुलाया है;
तभी आज पापी अछूत यह
श्री-चरणों तक आया है।
मेरे दीप-फूल लेकर वे
अम्बा को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब
आगे को अंजलि भरके,
भूल गया उसका लेना झट,
परम लाभ-सा पाकर मैं।
सोचा - बेटी को माँ के ये
पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं।
सिंह पौर तक भी आंगन से
नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा यह सुन पड़ा कि - "कैसे
यह अछूत भीतर आया?
पकड़ो, देखो भाग न जावे,
बना धूर्त यह है कैसा;
साफ-स्वच्छ परिधान किए है,
भले मानुषों जैसा!
पापी ने मन्दिर में घुसकर
किया अनर्थ बड़ा भारी;
कुलषित कर दी है मन्दिर की
चिरकालिक शुचिता सारी।"
ए, क्या मेरा कलुष बड़ा है
देवी की गरिमा से भी;
किसी बात में हूँ मैं आगे
माता की महिमा से भी?
माँ के भक्त हुए तुम कैसे,
करके यह विचार खोटा
माँ से सम्मुख ही माँ का तुम
गौरव करते हो छोटा!
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से
मुझे घेर कर पकड़ लिया;
मार-मार कर मुक्के-घूँसे
धम-से नीचे गिरा दिया!
मेरे हाथों से प्रसाद भी
बिखर गया हा! सब का सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक
कैसे पहुँच सके यह अब।
मैंने उनसे कहा - दण्ड दो
मुझे मार कर, ठुकरा कर,
बस, यह एक फूल कोई भी
दो बच्ची को ले जाकर।
न्यायालय ले गए मुझे वे
सात दिवस का दण्ड-विधान
मुझको हुआ; हुआ था मुझसे
देवी का महान अपमान!
मैंने स्वीकृत किया दण्ड वह
शीश झुकाकर चुप ही रह;
उस असीम अभियोग, दोष का
क्या उत्तर देता; क्या कह?
सात रोज ही रहा जेल में
या कि वहाँ सदियाँ बीतीं,
अविस्श्रान्त बरसा करके भी
आँखें तनिक नहीं रीतीं।
कैदी कहते - "अरे मूर्ख, क्यों
ममता थी मन्दिर पर ही?
पास वहाँ मसजिद भी तो थी
दूर न था गिरजाघर भी।"
कैसे उनको समझाता मैं,
वहाँ गया था क्या सुख से;
देवी का प्रसाद चाहा था
बेटी ने अपने मुख से।
दण्ड भोग कर जब मैं छूटा,
पैर न उठते थे घर को
पीछे ठेल रहा था कोई
भय-जर्जर तनु पंजर को।
पहले की-सी लेने मुझको
नहीं दौड़ कर आई वह;
उलझी हुई खेल में ही हा!
अबकी दी न दिखाई वह।
उसे देखने मरघट को ही
गया दौड़ता हुआ वहाँ -
मेरे परिचित बन्धु प्रथम ही
फूँक चुके थे उसे जहाँ।
बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर
छाती धधक उठी मेरी,
हाय! फूल-सी कोमल बच्ची
हुई राख की थी ढेरी!
अन्तिम बार गोद में बेटी,
तुझको ले न सका मैं हाय!
एक फूल माँ का प्रसाद भी
तुझको दे न सका मैं हा!
वह प्रसाद देकर ही तुझको
जेल न जा सकता था क्या?
तनिक ठहर ही सब जन्मों के
दण्ड न पा सकता था क्या?
बेटी की छोटी इच्छा वह
कहीं पूर्ण मैं कर देता
तो क्या अरे दैव, त्रिभुवन का
सभी विभव मैं हर लेता?
यहीं चिता पर धर दूँगा मैं,
- कोई अरे सुनो, वर दो -
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही लाकर दो!
रचनाकाल :

विदा के समय / सियाराम शरण गुप्त

जाता हूँ जाने दो मुझको,
हूँ मैं सरित - प्रवाह;
जाकर फिर फिर आ जाने की
मेरे मन में चाह!
बन्धु बाँध रक्खो मत मुझको,
मैं मलयानिल मुक्त;
जा कर ही फिर लौट सकूंगा
नव-नूतन मधु युक्त।
गृह कपोत हूँ मैं, उड़ने दो
मुझको पंख पसार;
नहीं हर सकेगा अनंत भी
मेरे घर का प्यार।
चिंता की क्या बात सखे, यदि
हूँ मैं पूरा वर्ष;
लौट पडूँगा क्षण में ही मैं
ले नूतन का हर्ष।

स्नेह-रीति / सियाराम शरण गुप्त

"दीप, तू जागृत रहा है रात भर
और मैं बेसुध पड़ा सोता रहा।
हाय, अत्याचार यह निज गात पर,
स्नेह - सह तू प्रज्ज्वलित होता रहा।"
"प्रज्वलित होता रहा, अच्छा हुआ,"
दीप बोला - "जागना मेरा सफल।
अब सुजागृति ने तुझे आ कर छुआ,
पा सकूँगा सुप्ति-सुख मैं भी विमल!"

एक बूँद / सियाराम शरण गुप्त

"मैं हूँ कृपण कहाँ आई तू
ले कर जीवन भर की प्यास?
दे सकता हूँ एक बूँद मैं,
जा तू अन्य धनी के पास।"
"बस बस, एक बूँद ही दे दे!"
कहा तृषार्ता ने खिलकर-
"किसके पास, कहाँ जाऊँ अब
तुझ-से दानी से मिलकर?
सिक्ता की कंटक शैय्या पर
इसी बूँद की आशा में
आतप के पंचाग्नि ताप से
डिगी नहीं हूँ मैं तिल भर।
मेरे पुलक-स्वाति के घन हे।
पूरा कर मेरा अभिलाष;
अधिक नहीं, बस, इस सीपी को
एक बूँद की ही है प्यास।"

जाग्रत / सियाराम शरण गुप्त

देखा, - देख नहीं सकता कुछ,
अन्धकूप का है घेरा।
यहाँ कहाँ आ पड़ा हाय रे!
यह मैं दुर्विधि का प्रेरा?
व्यर्थ हुआ क्या साधन सारा?
सर्प - रज्जु का भी न सहारा,
भगवन, हा! यह कैसी कारा?
ऎं यह क्या! - मैं खड़ा हो गया;
कहाँ गया वह भय मेरा
ओ जागृत वह स्वप्न मात्र था
पथ है खुला पड़ा तेरा!

आह्लाद / सियाराम शरण गुप्त

आज पड़ती है जहाँ मेरी दृष्टि
पाती वहीं नूतन रहस्य सृष्टि
मेरे कान,
सुनते हैं जो कुछ समस्त वह स्वगीय गान।
मेरे प्राण
जो कुछ है चारो ओर, -
जिसका न ओर छोर-
हो गये उसी में हैं विलीयमान।
मेरा आज,
आज चिरकाल में रहा विराज।
मेरे अरे ओ अनंत,
मुझको बता दे, कहाँ अंतर्हित तेरा अंत।

यात्री-1 / सियाराम शरण गुप्त

कैसे पैर बढाऊँ मैं?
इस घन गहन विजन के भीतर
मार्ग कहाँ जो जाऊँ मैं?
कुटिल कँटीले झंखाड़ों में
उत्तरीय उड़कर मेरा
उलझ उलझ जाता है, इसको
कहाँ-कहाँ सुलझाऊँ मैं?
कहीं धसी है धरा गर्त में
कहीं चढी है टीलों पर;
मुक्त विहग-सा उड़ जाऊँ जो
पंख कहाँ से लाऊँ मैं?

यात्री-2 / सियाराम शरण गुप्त

पंख कहाँ से लाऊँ मैं!
अरे, पैर ही क्या कुछ कम हैं!
क्यों न अभी बढ जाऊं मैं?
उत्तरीय का क्या, यह तनु भी
क्षत छिन्न हो जाने दूँ;
इन शत शत काँटों में बिंध कर
लक्क्ष लाभ निज पाऊँ मैं।
गह्वर टीले इधर उधर हैं,
मुझको पथ देने को ही;
अपने इन पदचिन्हों पर ही
नूतन मार्ग बनाऊँ मैं!
कुछ हो, पैर बढाऊँ मैं!

कब / सियाराम शरण गुप्त

प्रियतम कब आवेंगे,--कब?
कुछ भी देर हुई तो मेरे
सुमन सूख जावेंगे सब।
सखि, तब ये तूने किस बल पर
चुन रक्खे प्रसून अंचल भर,
नहीं ठहर सकते जो पल भर?
शीघ्र सूख जाने वाले थे
सुमन सूख जावेंगे जब,
प्रियतम तब आवेंगे,--तब!
प्रियतम कब आवेंगे,--कब?
कुछ भी देर हुई तो मेरे
दीनक सो जावेंगे सब!
सखि, सब सजग स्नेह से खाली,
दीपावलि किसलिए उजाली,
रहे न क्षण भर जिसकी लाली?
सत्वर सो जाने वाले थे
दीपक सो जावेंगे जब,
प्रियतम तब आवेंगे,--तब!

कृतघ्न / सियाराम शरण गुप्त

इन विटपवरों ने हे मरूत् ! मोदकरी,
सुरभि सतत देके की सु-सेवा तुम्हारी!
व्यथित अब इन्हीं के वह्नि से आज देख
ज्वलित कर रहे हो और भी क्यों विशेष।

अनौचित्य / सियाराम शरण गुप्त

यह कृषि कितनों की अन्नदा प्राण-दात्री,
अहह घन! तुम्हारी है रही प्रेम-पात्री।
जलधर, तुमने ही तो इसे था बढाया,
फिर उपल गिरा के क्यों स्वयं ही मिटाया।

असमय / सियाराम शरण गुप्त

ये जीव-जंतुगण पा कर तीव्र क्लेश,
हैं हो चुके अहह नीरद! भस्म-शेष।
दावाग्नि से जल चुका वन प्रांत सारा,
बरसा रहे अब किस लिये वारि-धारा?

निर्विवेक / सियाराम शरण गुप्त

संतुष्ट आक पर नित्य रहो सहर्ष,
हे ग्रीष्म, संतत करो उसका प्रकर्ष।
है कौन हेतु, पर हो कर जो कराल,
हो नष्ट भ्रष्ट करते तुम थे तमाल

सु-अवसर/ सियाराम शरण गुप्त

विगत हे जलजात! निशा हुई,
द्युतिमयी वह पूर्व दिशा हुई।
छिप उलूक गये भय भीति से
अब विकास करो तुम प्रीति से।

संतोष/ सियाराम शरण गुप्त

जिस दिन तुम इस हृदय कुंज पर
अकस्मात छा जाओगे,
करुणा धाराएँ बरसा कर
सब संताप मिटाओगे।
कहीं शुष्कता नहीं रहेगी,
तृष्णानल बुझ जावेगी;
इसको हरा भरा करके तुम
धूल उड़ा कर यह समीर जो
इसे मलिन करता रहता
तुम सर्वत्र इसी के द्वारा
शुभ सौरभ फैलाओगे!
आतप की इस दु:सहता में
है संतोष यही हमको--
पावस में हे घनश्याम! तुम
नवजीवन ले आओगे।
मार्च 1919, सरस्वती में प्रकाशित

अपूर्ण यांचा / सियाराम शरण गुप्त

शुद्ध शांति-जल बरसाओ तुम
उर-क्षेत्र पर हे प्राणेश!
यही प्रार्थना करते रहना
हुआ हमारा था उद्देश्य।
यह परंतु तुमको क्या भाया,
पावक ही पावक बरसाया;
जीवन-धारण कठिन हो गया
जिसके कारण एक निमेष।
सभी झाड़-झंकाड़ जला के,
स्वाद-रूप में उन्हें बना के,
वह दाहक-पावकस्वामिन अब
स्वयं हो गया है नि:शेष।
अब झट हल का संघर्षण कर
इष्ट बीज बो दो हे विभुवर।
सफल काम करना फिर करके
शांति वारि वर्षा सविशेष।

सुजीवन / सियाराम शरण गुप्त

हे जीवन स्वामी तुम हमको
जल सा उज्ज्वल जीवन दो!
हमें सदा जल के समान ही
स्वच्छ और निर्मल मन दो!
रहें सदा हम क्यों न अतल में,
किंतु दूसरों के हित पल में
आवें अचल फोड़कर थल में;
ऐसा शक्तिपूर्ण तन दो!
स्थान न क्यों नीचे ही पावें,
पर तप में ऊपर चढ जावें,
गिरकर भी क्षिति को सरसावें
ऐसा सत्साहस धन दो!

कामना / सियाराम शरण गुप्त

हाय! तुम्हारे क्रीड़ा-स्थल इस
मानस में हे हृदयाधार,
विपुल वासनाओं के पत्थर
फेंक रहे हम बारंबार।
उलटी हमें हानि ही होती,
यद्यपि इस अपनी कृति से
किंतु इसी में लगे हुए हैं
यथाशक्ति हम सभी प्रकार।
जो जल स्वच्छ और निर्मल था
पंकिल होता जाता है,
घटता ही जाता है प्रति पल
उसका वह गाम्भीर्य अपार।
छिपा हुआ है पद्मासन जो
यहीं तुम्हारे लिये कहीं,
उसके उपर चोट न आवे
यही विनय है करुणागार।

परीक्षा / सियाराम शरण गुप्त

मैं हूँ एक, अनेक शत्रु हैं सम्मुख मेरे
क्रोध, लोभ, मोहादि सदा रहते हैं घेरे।
परमपिता, इस भाँति कहाँ मुझको ला पटका
जहाँ प्रतिक्षण बना पराभव का है खटका।
अथवा निर्बल समझ अनुग्रह है दिखलाया,
करने को बलवृद्धि अखाडे में पहुँचाया
सबल बनूँ मैं घात और प्रतिघात सहन कर,
ऊपर कुछ चढ सकूँ और दुख भार वहन कर।
इस कठिन परीक्षा कार्य में
हो जाऊँ उत्तीर्ण जब
कर देना मानस सद्म में
शांति सुगंधि विकीर्ण तब।

माली के प्रति / सियाराम शरण गुप्त

माली! देखो तो तुमने यह
कैसा वृक्ष लगाया है!
कितना समय हो गया, इसमें
नहीं फूल भी आया है!
निकल गये कितने वसंत हैं,
बरसातें भी बीत गईं;
किंतु प्रफुल्लित इसे किसी नें
अब तक नहीं बनाया है!
साथ छोड़ती जाती है सब
शाखा आदि रुखाई से।
शुष्क हुए पत्तों को इसनें
इधर-उधर छितराया है।
अतुल तुम्हारे इस उपवन की
इससे भी कुछ शोभा है?
क्या निज कौशल दिखलाने को
इसे यहाँ उपजाया है।
अरे, काट ही डालो इसको
अथवा हरा भरा कर दो,
कहें सभी आहा! तुमने वह
कैसा वृक्ष लगाया है!

गूढाशय / सियाराम शरण गुप्त

स्वर्ण सुमन दे कर न मुझे जब
तुमनें उसको फेंक दिया;
हो कर क्रुद्ध हृदय अपना तब
मैंने तुमसे हटा लिया।
सोचा-मैं उपवन में जा कर
सुमन इन्हें दिखलाऊं ला कर।
मैने सारी शक्ति लगा कर
कण्टक वेष्टन पार किया।
स्वर्ण सुमन दे कर न मुझे जब
तुमने उसको फेंक दिया।
उपवन भर के श्रेष्ठ सुमन सब,
जा कर तोड़ लिये सहसा जब।
समझ तुम्हारा गूढाशय तब,
हुआ विशेष कृतज्ञ हिया।
स्वर्ण सुमन देकर न मुझे जब
तुमनें उसको फेंक दिया।

मृत्यु भय / सियाराम शरण गुप्त

यह रात सहसा आ गई,
नभ में अंधेरी छा गई।
सोना पड़ेगा अब हमें
ये कार्य तज कर सब हमें।
हैं कार्य पूर्ण न एक भी,
किस भाँति सो जावें अभी।
क्या नींद अच्छी आयगी,
यह रात यों ही जायगी।
दु:स्वप्न दुख पहुँचायँगे,
क्या शांति झँप कर पायँगे?
हे नाथ, लें न विराम हम,
दिन भर करें बस काम हम।
सन्ध्या समय एसे थकें,
हम नींद गहरी ले सकें,
जिसमें कि हम फिर जब जगें,
सोत्साह कार्यों में लगें।

गृह प्रदीप / सियाराम शरण गुप्त

बुझा गया इस गृह प्रदीप को
हाय! अचानक कौन समीर,
आज हमारी पर्ण कुटी में
अंधकार हो उठा गभीर।
अभी यहाँ तुमको आना है
अब क्या करूँ कहो हे नाथ
स्वागत कैसे करूँ तुम्हारा
आज यहाँ इस तम के साथ?
वैसे ही तो यहाँ तुम्हारे
योग्य नहीं था कोई साज,
अल्प स्नेह से हाय! एक ही
दीप जला रक्खा था आज।
वह भी हा! बुझ गया अचानक;
चिंता है अब यही विशेष,-
बाहर से ही लौट न जाओ
घर में कहीं अंधेरा देख।
पर यह चिंता व्यर्थ, तुम्हे जब
आना है तो आओगे,
मन्द दीप को ही न देख कर
लौट नहीं तुम जाओगे।
पहुँचेगा तब एक चरण ही
द्वारदेहरी तब जब तक,
सौ सौ दीपावलियाँ गृह को
सुप्रभ कर देंगी तब तक!

शरणागत / सियाराम शरण गुप्त

क्षुद्र सी हमारी नाव, चारो ओर है समुद्व
वायु के झकोरे उग्र रुद्र रूप धारे हैं।
शीघ्र निगल जाने को नौका के चारो ओर
सिंधु की तरंगे सौ-सौ जिव्हाएँ पसारे हैं।
हारे सभी भाँति हम, तब तो तुम्हारे बिना
झूठे ज्ञात होते और सबके सहारे हैं।
और क्या कहें अहो! डुबा दो या लगा दो पार
चाहे जो करो शरण्य! शरण तुम्हारे हैं!
सुनसान कानन भयावह है चारो ओर,
दूर दूर साथी सभी हो रहे हमारे हैं।
काँटे बिखरे हैं, कहाँ जावें कहाँ पावें ठौर
छूट रहे पैरों से रुधिर के फुहारे हैं।
आ गया कराल रात्रिकाल, हैं अकेले यहाँ
हिंस्त्र जंतुओं के चिन्ह जा रहे निहारे हैं।
किसको पुकारें यहाँ रो कर अरण्य बीच
चाहे जो करो शरण्य! शरण तुम्हारे हैं!

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