कवितावली अरण्य काण्ड | तुलसीदास कृत कवितावली भाग 3
तुलसीदास जी की कवितावली का यह भाग 3 है — अरण्य काण्ड। कवितावली में रामकथा कवित्त और सवैया छंदों में लिखी गई है, इसलिए इसकी गति मानस से अलग है: यहाँ भाव कम, चित्र ज़्यादा हैं।
भाग-3 अरण्य काण्ड प्रारंभ
मारीचानुधावन
पंचबटीं बर पर्नकुटी तर बैठे हैं रामु सुभायँ सुहाए।
सोहै प्रिया, प्रिय बंधु लसै ‘तलसी’ सब अंग घने छबि छाए।।
देखि मृगा मृगनैनी कहे प्रिय बेैन, ते प्रीतमके मन भाए।
हेमकुरंगके संग सरासनु सायकु लै रघुनायकु धाए।।
इति अरण्य काण्ड
कवितावली में अरण्य कांड बहुत संक्षिप्त है — कवि ने सीता-हरण तक की बात थोड़े ही छंदों में कह दी है। पूरा प्रसंग विस्तार से पढ़ना हो तो रामचरितमानस का अरण्य कांड देखें।
कवितावली के बाकी भाग भी इसी ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं — तुलसीदास जी की सभी रचनाएँ।
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