कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

विनय पत्रिका – विनयावली | तुलसीदास विनय पत्रिका भाग 4

गोस्वामी तुलसीदास जी की विनय पत्रिका का भाग 4 — विनयावली। विनय पत्रिका का सबसे व्यक्तिगत हिस्सा — भक्त अपनी दीनता लिखकर राम के दरबार में पत्री डालता है। पहला पद से लेकर अंतिम पद तक यही स्वर चलता है।

विनयावली(प्रथम पद),

ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।।
मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों।
कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।।
लोक-बेद-बिदित बड़ो न रघुनाथ सों ।
सब दिन सब देस, सबहिकें साथ सों।।
स्वामी सरबग्य सों चलै न चोरी चारकी।
प्रीति पहिचानि यह रीति दरबारकी।।
काय न कलेस-लेस, लेत मान मनकी।
सुमिरे सकुचि रूचि जोगवत जनकी ।
रीझे बस होत, खीजे देत निज धाम रे।
फलत सकल फल कामतरू नाम रे।।
बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखे काम रे।
सोऊ तुलसी निवाज्यो राजराम रे।।
म्ेारो भलो कियो राम आपनी भलाई।
हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक-हित साईं।।
रामसों बडो है कौन, मोसों कौन छोटेा।
राम सेा खरो हैं कौन, मोसो कौन खोटो।।
लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावौं।
एतो बडो अपराध भौ न मन बावौं।।
पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यांे नीचो।
बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो।।

विनयावली (राग भैरव)

(71)
ऐसेहू साहब की सेवा सों होत चोरू रे।
अपनी न बूझ, न कहै को राँडरोरू रे।।
मुनि-मन-अगम, सुगत माइ-बापु सों।
कृपासिंधु, सहज सखा, सनेही आपु सों।।
लोक-बेद-बिदित बड़ो न रघुनाथ सों ।
सब दिन सब देस, सबहिकें साथ सों।।
स्वामी सरबग्य सों चलै न चोरी चारकी।
प्रीति पहिचानि यह रीति दरबारकी।।
काय न कलेस-लेस, लेत मान मनकी।
सुमिरे सकुचि रूचि जोगवत जनकी ।
रीझे बस होत, खीजे देत निज धाम रे।
फलत सकल फल कामतरू नाम रे।।
बेंचे खोटो दाम न मिलै, न राखे काम रे।
सोऊ तुलसी निवाज्यो राजराम रे।।
(72)
म्ेारो भलो कियो राम आपनी भलाई।
हौं तो साईं-द्रोही पै सेवक-हित साईं।।
रामसों बडो है कौन, मोसों कौन छोटेा।
राम सेा खरो हैं कौन, मोसो कौन खोटो।।
लोक कहै रामको गुलाम हौं कहावौं।
एतो बडो अपराध भौ न मन बावौं।।
पाथ माथे चढ़े तृन तुलसी ज्यांे नीचो।
बोरत न बारि ताहि जानि आपु सींचो।।
(जारी)

विनयावली (राग विभास)

(74)
जानकीसकी कृपा जगावती सुजान जीव,
जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे।
करि बिचार, तजि बिकार, भजु उदार रामचंद्र,
भद्रसिंधु दीनबंधु, बेद बदत रे।।
मोहमय कुहू-निशा बिसाल काल बिपुल सोयो,
खोयो से अनूप रूप सुपन जू परे।
अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकाश,
बासना, सराग मोह-द्वेष निबिड़ तम टरे।।
भागे मद-मान चोर जानि जातुधान,
काम-क्रेाध-लोभ-छोभ-निकर अपडरे।
देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप,
ताप त्रिबिधि प्रेम-आप दूर ही करे।।
श्रवन सुनि गँभीर, जागे अति धीर बीर,
बर बिराग-तोष सकल संत आदरे।
तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीव जन बिहालु,
भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे।।

विनयावली(राग ललित )

(76)
खेाटेा खरो रावरो हौं, रावरी सौं, रावरेसों झूठ क्यों कहौंगो,
जानो सब ही के मनकी।
करम-बचन-हिये, कहौं न कपट किये, ऐसी हठ जैसी गाँठि,
पानी परे सनकी।।
दूसरो , भरोसो नहिं बासना उपासनाकी, बासव, बिरंचि,
सुर-नर-मुनिगनकी।।
स्वारथके साथी मेरे, हाथी स्वान लेवा देई, काहू तो न पीर,
रघुबीर!दीन जनकी।।
साँप-सभा साबर लबार भये देव दिब्य, दुसह साँसति कीजै,
आगे ही या तनकी।
साँचे परौं, पाऊँ पान, पंचमें पन प्रमान,तुलसी चातक आस
राम स्यामघन की।।

विनयावली(राग टोड़ी )

(78)
देव-
दीनको दयालु, दानि दूसरो न कोऊ।
जाहि दीनता कहैां हौं देखौं दीन सोऊ।।
सुर, नर, मुनि, असुर, नाग, साहिब तौ घनेरे।
पै तौ लौं जौ लौं रावरे न नेकु नयन फेरे।।
त्रिभुवन, तिहुँ काल बिदित, बेद बदति चारी।
आदि-अंत-मध्य राम! सहबी तिहारी।।
तोहि माँगि माँगनो न माँगनो कहायो।
सुनि सुभाव-सील-सुजसु जाचन जन आयो।।
पाहन-पसु बिटप- बिहँग अपने करि लीन्हे।
महाराज दसरथके! श्रंक राय कीन्हें।।
तू गरीबको निवाज, हौं गरीब तेरो।
बारक कहिये कृपालु! त्ुलसिदास मेरो।।

विनयावली(राग जैतश्री)

(83)
कछु ह्वै न आई गयो जनम जाय।
अति दुरलभ तनु पाइ कपट तजि भजे राम मन बचन-काय।।
लरिकाईं बीती अचेत चित, चंचलता चौगुने चाय।
जोबन-जुर जुबती कुपथ्य करि, भयो त्रिदोष भरि मदन-बाय।।
मध्य बसस धन हेेतु गँवाई, कृषी बनिज नाना उपाय।
राम-बिमुख सुख लह्यो न सपनेहुँ, निसिबासर तयौ तिहूँ ताय।।
सेये नहिं सीतापति-सेवक, साधु सुमति भलि भगति भाय।
सुने न पुलकि तनु, कहे न मुदित मन किये जे चरित रघुबंसराय।।
अब सोचत मनि बिनु भुअंग ज्यों, बिकल अंग दले जरा धाय।
सिर धुनि-धुनि पछितात मींजि कर कोउ न मीत हित दुसह दाय।।
जिन्ह लगि निज परलोक बिगार्यो, ते लजात होत ठाढ़े ठाँय।
तुलसी अजहुँ सुमिरि रघुनाथहिं, तर्यौ गयँद जाके एक नाँय।।

विनयावली(राग धनाश्री)

(85)
मन! माधवको नेकु निहारहि।
सुनु सठ, सदा रंकके धन ज्यों, छिन-छिन प्रभुहिं सँभारहि।।
सोभा-सील-ग्यान-गुन-मंदिर, सुंदर परम उदारहि।
रंजन संत, अखिल अघ-गंजन , भंजन बिषय-बिकारहि।।
जो बिनु जोग-जग्य-ब्रत-संयम गयेा चहै भव-पारहि।
तौ जानि तुलसिदास निसि-बासर हरि-पद-कमल बिसारहि।।
(86)
इहै कहृयो सुत! ब्ेाद चहूूँ ।
श्रीरघुवीर-चरन-चिंतन तजि नाहिन ठौर कहूँ।।
जाके चरन बिरंचि सेइ सिधि पाई संकरहूँ।
सुक-सनकादि मुकुत बिचरत तुउ भजन करत अजहूँ।।
जद्यपि परम चपल श्री संतत, थिर न रहति कतहूँ।
हरि -पद-पंकज पाइ अचल भइ, करम-बचन-मनहूँ।।
करूनासिंधु, भगत-चिंतामनि, सोभा संवतहूँ।।
और सकल सुर, असुर-ईस सब खाये उरग छहूँ।।
सुरूचि कह्यो सेाइ सत्य तात अति परूष बचन जबहूँ।।
तुलसिदास रघुनाथ-बिमुख नहिं मिटइ बिपति कबहूँ।।

विनयावली(अंतिम पद)

278
पनव-सुवन! रिपु-दवन! भरतलाल! लखन! दीनकी।
निज निज अवसर सुधि किये, बलि जाउँ, दास-आस पूजि है खासखीनकी।1।
राज-द्वार भली सब कहै साधु-समीचीनकी।
सुकृत-सुजस, साहिब-कृपा, स्वारथ-परमारथ, गति भये गति-बिहीनकी।2।
समय सँभारि सुधारिबी तुुलसी मलीनकी।
प्रीति-रीति समुझाइबी रतपाल कृपालुहि परमिति पराधीनकी।3।
279
मारूति-मन, रूचि भरतकी लखि लषन कही है।
कलिकालहु नाथ! नम सों परतीत प्रीति एक किंकरकी निबही है।1।
सकल सभा सुति लै उठी, जानी रीति रही है।
कृपा गरीब निवाजकी, देखत गरीबको साहब बाँह गही है।2।
बिहंसि राम कह्यो ‘सत्य है, सुधि मैं हूँ लही है’।
मुदित माथ नावत, बनी तुलसी अनाथकी, परी रधुनाथ/(रघुनाथ हाथ) सही है।3।

विनय पत्रिका के बाकी भाग और तुलसीदास जी की अन्य रचनाएँ यहाँ देखें — तुलसीदास जी रचना संग्रह।

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *