मोहनलाल महतो 'वियोगी' की कविताएँ : Mohanlal Mahto Viyogi Kavitaen
मोहनलाल महतो 'वियोगी' छायावादी कवि थे, जिनकी कविता का मुख्य स्वर विरह और भावुकता है। उनकी रचनाओं में प्रकृति और मन की व्याकुलता एक साथ बहती है — छायावाद की वही पहचान, जो प्रसाद, निराला और पंत की कविता में मिलती है।
चलता नहीं काठ का घोड़ा!
माँ चिंतित होंगी, ले चल घर, देख बचा दिन थोड़ासोने की थी बनी अटारी,
हाय! लगाई थी फुलवारी,
फूल रही थी क्यारी-क्यारी,
फल से लदे वृक्ष थे पर मैंने न एक भी तोड़ा ।
छोड़ दिया सुख-दुख क्षण भर में,
गिरे खिलौने बीच डगर में,
पड़े रहे कुछ सूने घर में,
सखा और संगिनियों से तो अब बरबस मुँह मोड़ा।
बड़ी लगन से मेरे प्रियवर,
शुष्क लकड़ियों को चुन-चुनकर,
रख अपनी छाती पर पत्थर,
एक-एक टुकड़े को बाँधा, जोड़-जोड़ फिर जोड़ा।
है या चिड़िया-रैन-बसेरा,
बना खूब तू वाहन मेरा,
चल दे पथ है अगम, अंधेरा,
आगे की सुधि ले, सपना था, जो कुछ पीछे छोड़ा।
चलता नहीं काठ का घोड़ा!
सूर्योदय
फैल गयी लाली रम्य पूरब क्षितिज परजागे खग नीड़ों में सजग जग हो गया।
गन्धवह आया मन्द-मन्द इठलाता-सा,
मधु-गन्ध लोभी मधुकर पद्म-कोश से
जाग कर बन-कलियों की चले खोज में।
झड़के पराग लघु पंखों से द्विरेफ के
शान्त सरसी स्वच्छ जल पर छा गया।
अन्धकार-गज भागा गहन विपिन में
दिनपति प्रकटा सरोष मृगराज-सा,
केसर-सी किरणें विकीर्ण हुई नभ में।
भाग के मृगांक छिपा अस्ताचल ओट में
भय था कि मृगचिह्न देख कहीं केसरी
टूटे मृत-भाग गयी रजनी किराती सी,
आँचल में भर के नखत-गुंजा भय से।
मोहनलाल महतो 'वियोगी' की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें
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