कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

रामचरित उपाध्याय की दोहावली : Ramcharit Upadhyay Dohawali

रामचरित उपाध्याय द्विवेदी युग के दोहाकार थे। उनकी 'दोहावली' में भक्ति, नीति और जीवन-दर्शन के दोहे संग्रहीत हैं — सरल भाषा में गहरी बात कहने की परंपरा, जो कबीर और रहीम से चली आ रही थी।

दोहा / भाग 1

शृंगार सुषमा
छत्र लगाये धनरिधर, बिहँसि बजावत वेनु।
बसौ हिये हरि हित-सहित, ग्वाल ग्वालिनि धेनु।।1।।
उर लगियत, परियत पगन, हौं ही करियत कान।
मौन गहौ मानौ कही, मैं न गही पिय मान।।2।।
कीजत इतौ न आतुरी, तजौ चातुरी चाल।
भावत घर रहनो न जौ, क्यौं आवत घर लाल।।3।।
दुरत न करत दुराव कत, अनत बसे जेहि हेत।
नयन नकारे देत हैं, आप नकारे देत।।4।।
केतिकहू सिख दीजियत, मन गहि मान सकैन।
होत पराये आपने, वा नैनन मिलि नैन।।5।।
तजहु सकुच उर निठुर उठु, अजहु तजी नहीं देहु।
नेक नवाजस करहु तौ, एव नवाजस लेतु।।6।।
प्रन न टरै तव, मम टरैं, प्रान-नाथ ये प्रान।
नभ घेरे आवहिं जलद, कीजे जलद पयान।।7।।
अलि मिस बोलि बुलाय कछु, हा साहस इतराय।
इतै चितै चट चोरि चित, लली चली यह जाय।।8।।
करि न दुराव दुरै न किहुँ, देहिं कहे रति रैन।
अलि साने मद बैन ये, ये अलसाने नैन।।9।।
मो तन तकि बतराय कछु, सखि सन सैनन माहिं।
छत से उतरि गई कहूँ, चित ते उतरत नाहिं।।10।।

दोहा / भाग 2

हँसि भौंइन लजि दृगन भनि, अधरन मैं इठलाय।
करिनी सी हिय-कमल दलि, चली नवेली जाय।।11।।
मानिनि भाव न भीतरी, गोइ सकति मुसकान।
बिनु कारन आदर अधिक, अधिक जनावत मान।।12।।
कित चितवत इत नेकु लख, उदित कला ससि दोज।
राजत मिस द्विजरात के, असि कर मनो मनोज।।13।।
पबि लगि मरनो औचके, बरुक लिखे बिधि खोट।
पै न लगै किहुं काहु को, अदब दबी दृग-चोट।।14।।
आवत ही घर भरि उठ्यो, बतरस लग्यौ न घात।
तदापि मिले दोउन खिले, पूछि दृगनि कुसलात।।15।।
घुँघरारी टुटि केस मुख, छहरि छयो छवि देत।
भ्रमत कोकनद भ्रम मनौ, अलि अवली मधु हेत।।16।।
पपिहा बारयौ तोहिं पै, हियो देत गहि नेहु।
हनि पाइन तिहिं ताहु पै, मेघ मोघ अघ लेहु।।17।।
कटि तनु भरे सुजंघ-जुग, सब तन भरे उमंग।
खिलत जवानी पाइ मनु, खिलत रहत से अंग।।18।।
रुकि न सकी आवत बन्यौ, तजि गुरु जन की भीति।
मोहि करी अति बावरी, खरी रावरी प्रीति।।19।।
कढ़ि आये तन सेद कन, पुलकि उठी उहिं काल।
पाती लखि पिय-कर-लिखी, छाती छ्वावत बाल।।20।।

दोहा / भाग 3

सब विधि जो जैवो तुम्हैं, इतौ कपट केहि काज।
लावत उर हरखत हियैं, लावत उर नहिं लाज।।21।।
अधमीचे दृग पुलकित लजि, ज्यौं ज्यौं चौंकति बाल।
त्यौं त्यौं मलि मसकत रसिक, गालनि लाल गुलाल।।22।।
बिच नासा नग गवन यौं, गुथि नथनी छवि देत।
मनु मथनी मन मथ गही, मन मथिबे के हेत।।23।।
मिलि पिय सौं घूँघट न करु, सहमि न तू गहि मौन।
लगत सलोनो रूप लखि, सौतिन कै दृग लौन।।24।।
रिस साने दृग दुहुँन के, जदपि जुरे सगुमान।
तीख मान तिहिं छन दुर्यो, आई मुख मुसकान।।25।।
दृग दोउन के लड़त लखि, ज्यौं ज्यौं बढ़त चबाव।
त्यौं त्यौं रस सरसंत अधिक, नित नव प्रकटत भाव।।26।।
लखि लखाइ चख चीह्नि मुख, ठिठकी भई न ठाढ़ि।
लजी भजी बरबस यहै, लिये जाति जिय काढ़ि।।27।।
मीत-मिलन की चाह उर, जदपि बढ़त अति आज।
क्योंहूँ चलन न देत यै, अरी होत अरि लाज।।28।।
रंचक नहिं हिचकी हिये, आवत जात निसंक।
लागन चहत न अंक पै, लागन चहत कलंक।।29।।
केतिक हूँ काँटन घिरी, सुन केतकी प्रवीन।
क्यों हूँ तदपि कलीन के, तो रस तजै अलीन।।30।।

दोहा / भाग 4

तिय ते ललित न कलि कछु, तिहूँ लोक में कीन।
याही ते मनु बिधि बली, बलि त्रिवली रचि दीन।।31।।
इतनौ नारी कसि रही, नहिं नेकहूँ डराइ।
भोरी अतिही छीन कटि, मति वहहू कटि जाय।।32।।
पाँखहु मिले न मिलि सकत, अनुचित यह चित दौर।
चक-चकई निसि किन लखे, सपनेहू इक ठौर।।33।।
दिन चारक फेरे फिरौ, मुख चख भौंहन तानि।
भोरी फिरि को हेरि है, कचन, कुचन मुसकानि।।34।।
निति निचय
अंनराय तम दिवस-मनि, बानी प्रति हेरम्ब।
ऋद्धि-सिद्धि के सहित प्रभु, होहु मोर अवलम्ब।।35।।
प्रभुता पाय न मद-सन्यौ, जो बन काम-विकार।
सो नर वर सन्तत सुखी, नारायन अवतार।।36।।
नारी, गुरु, पितु, मातु, सुत, सचिव, महीपति मीत।
बन्धु, विप्रहूँ दण्डिये, धर्म-विमुख यह नीत।।37।।
जब लौं परै न हाथ रिपु, करिये तासु बखान।
मृग-बाँधन हित व्याध ज्यौं, करत प्रपंची गान।।38।।
सुबल सुमन्त्र सुकर्म जहँ, जहँ एका सुविचार।
तहँ सुख सम्पत्ति जय सदा, उन्नति होति अबार।।39।।
तिय बस पण्डित हू परे, कहा सकत करि नाहिं।
प्रान तजे दसरथ तुरत, सुत पठये बन माहिं।।40।।

दोहा / भाग 5

तप बल गरब न कीजिये, बरु करिये तप नाहिं।
गाधि-सुअन लखि मेनका, दौरि गहे गर माहिं।।41।।
धरम-विमुख, खर, स्वान, अहि, कृपन, कुमीतरु राँड़।
दूरहि ते दस बरजियै, उनमत भडुआ, भाँड़।।42।।
दुर्लभ सो नर जगत में, मानव कुल सिंरनेत।
जो बिनु मागे ही रहे, जो बिनु माँगे देत।।43।।
पतिबरता, अरु पुत्रिणी, पाक-प्रवीन पवित्र।
रूपवती पण्डित तिया, दुरलभ ‘राम चरित्र’।।44।।
सुख सपनो, दुख दुुगुन नित, आँतर दिन उपवासु।
भोगत नरक सदेह सो, गेह कुनारी जासु।।45।।
नृप, ज्ञानी, तिय प्रौढ़, रस-काव्य, सिखायो अस्व।
चारहुँ ते जुग चारिहूँ, पैयत सुख सर्वस्व।।46।।
नारी गृह भूखन बसन, नूतन रहे बखान।
दास वैद मन्त्री महिप, तन्दुल पान पुरान।।47।।
मरन-हरन सुनि होय जो, पण्डित हू हिय खेद।
तौ ज्ञानी अरु मूढ़ में, कछुक रह्यौ नहि भेद।।48।।
गुरु अन्त्यज, ब्राह्मण निपढ़, बूढ़ गृही, यति ज्वान।
रसिक-अधन, तपसी धनी, षट दुख हेतु समान।।49।।
नहिं कोऊ ऐसो कहूँ, जाको रिपु जग माहिं।
मीन कहा केहिको दुखद, हने जाहिं जल माहिं।।50।।

दोहा / भाग 6

धन उनही कौ जानिये, जग कीरत जिन कीन।
न तु समान दोऊ अहैं, धनाधीस, धनहीन।।51।।
गुन-दुरगुन छिपि सकहिं नहिं, करिये कोटि उपाय।
तैल-बिन्दु जलमाहि ज्यौं, तुरत जात उतराय।।52।।
केवल गुनही से न जस, चहिये आग-सहाय।
फूलत-फलत न देखिये, महँगो पान बिकाय।।53।।
भल-अनभल दोउन किये, 5जस बड़ेन के हाथ।
बसन बढ़ाइ चुराइ ज्यौं, सुजसी जग जदुनाथ।।54।।
मानी दीन न ह्वै फिरै, बरुक प्रान दै खोय।
बिना बुझे ही कबहुँ क्यौं, पावक सीतल होय।।55।।
दुःख-सुख, धन जीवन-मरन, पैये बार करोर।
बीत गयौ जो फिर कबौं, समय न मिलत बहोर।।56।।
पण्डित मानी, मूढ़ जह, चुप साधे तहँ चैन।
दादुरगन के बचन सुनि, कढ़त न कोकिल बैन।।57।।
कैसी हूँ आपति परै, मीतहिं तजिय न तात।
ग्रहण-समय मुख राहु के, चन्द संग मृग जात।।58।।
बिनु फूटे निज जाति के, हानि लह्यो कब कोय।
लोहा काट्यो जात तब, लोह-छिनी जब होय।।59।।
तौलौं ही डर विपति सों, जबलों बिपति सुदूर।
नद में डूबै नाव तौ, पैरे परियत पूर।।60।।

दोहा / भाग 7

कवि, कोविद, केहरि, जलद, साँप, साधु ये सात।
जहैं जाहिं इनके लिये, तहैं गेह बनि जात।।61।।
सज्जन निन्दा करत क्यौं, करु न तासु गुन-गान।
कामधेनु को छीर तजि, मूढ़ न करु मद-पान।।62।।
बुधि विवेक को फल यहै, कीजै काज बिचार।
सब पुरुषारथ तें बड़ो, करियै पर-उपकार।।63।।
ज्यौं त्यौं दबि काटिय बिपति, समय पाइ बलधार।
पाँडु तनय केहि बिधि कियौ, कौरव दल संहार।।64।।
दुरदिन बिन पूरो भये को, बरबस सुख लेत।
बन तैं घर सिय आइ कै, चली बहुरि बनहेत।।65।।
समुझि परत नहिं मरम कछु, करम कुफेर सुफेर।
मच्छराज गृह पतिन जुत, बनी दौपदी चेर।।66।।
माटीचाखत सूम लखि, लियौ तनय मुख चूम।
बिहँसि कह्यो मन माँहि निज, सुत मोहूँ तैं सूम।।67।।
बरु सपूत एकै भलो, सौ कपूत भल नाहिं।
कौरव-पाँडव कौ अजौं, जस अपजस जग माहिं।।68।।
धन, धरती, जीवन, जगत, चंचल सभी विचारि।
करु कीरति मन छानि कै, सुजत सकै को टारि।।69।।
उर मैं धरहिं न विज्ञजन, सुनि खल के कटु बैन।
ढरकि जात जल बिन्दु ज्यौं, बारिज पात थिरै न।।70।।

दोहा / भाग 8

थिर चित उद्यम कीजियै, अकुलाये अति हानि।
करै जुगति जौ तौ कबौं, पाथर होवै पानि।।71।।
निज मुज बल जग जीतजो, सोई नृप सिरताज।
लखु बिचारि मृगराज कहँ, कौन देत है राज।।72।।
भक्ति वैराग्य
उन्मादक मद तैं अधिक, लहि विष विषय खुसाल।
दृग रहते हैं आँधरो, धिग धिग जोवन काल।।73।।
जनि भरमैं घर मैं पर्यौ, अपनो भलो विचरि।
सकल जगत-जंजाल तजि, भजु जुग चरन मुरारि।।74।।
पर्व वहै तीरथ वहै, वहै त्रिदेव-निकेत।
ज्यौं त्यौं जहँ मुख तै कढ़ै, राम नाम सुख हेत।।75।।
नहिं आश्रम, नहिं वरन, नहिं जाति अवस्था नाहिं।
सबहिं सुखद सम भाव तैं, राम-नाम जग माँहि।।76।।
धन-धरनी, घरनी, तनय, अबसि छुटेंगे तोर।
यह बिचारि मन मूढ़ क्यौं, भजन न नन्दकिशोर।।77।।
का कासी का द्वारिका, कहा अयोध्या धाम।
तीर्थराज तहँ जानिये, जहाँ राम कौ नाम।।78।।
अपने स्वारथ सब लगे, को बैरी को मीत।
यह बिचारि मन कीजियै, सीता पति सों प्रीत।।79।।
अपनावत अति अधम हूँ, सरनागत हरि हेर।
सुने न सपनेहूँ कहूँ, दियौ काहु प्रभु फेर।।80।।

दोहा / भाग 9

चकई चाहति रविहिं ज्यौं, चन्दहिं चहत चकोर।
त्यौं चाहैगो मन कबै, तू नित नन्द किशोर।।81।।
करै कोटि कोऊ जतन, नसै न करम अनन्त।
राम कृपा सोऊ सुलभ, समुझाहिं यह मत संत।।82।।
विनय, सुसंगति, सुमति हिय, दया जाति ये चारि।
मिलहिं न कछु संदेह तिहिं, आपुहि आइ मुरारि।।83।।
संछेपहि सुनि लेत यह, निगमागम को उक्त।
जाको कुछ इच्छा नहीं, सोजन जीवन मुक्त।।84।।
दीन राज मो सम न कोउ, तों सौं दीन-निवाज।
जुरी जोड़ भल आइकै, को जीतै रघुराज।।85।।
जोग-जुगति नहिं चाहिये, नहिं जत-तप-ब्रत-नेम।
सबै सिद्ध ह्वै जाहिं जो, हिये राम पद प्रेम।।86।।
बुधि नहिं, बल नहिं, विभव नहिं, बुझौं न ब्रह्म-विलास।
पतित-नृपति हौं मोहि है, राम रावरी आस।।87।।
प्रेमांजलि दै नाथ मैं, माँगत बार करोरि।
क्यौं हूँ ढुरकि परो रहौं, राम रावरी पौरि।।88।।
तू मति मारै काँह कौ, तोहिं सके को मारि।
सुधि राखत हिय माहिं नित, निज जग जानि मुरारि।।89।।
बल विद्या वैभव वरन, इन तैं चलै न काम।
परखि यहै दृढ़ करि लियौ, प्रेम-पियासे राम।।90।।

दोहा / भाग 10

स्वारथ लगि सब कहँ सबै, परसंसहिं अनुरागि।
तियमुख चूमत चंद कहि, मरे देत मुख आगि।।91।।
सपनेहु चहिय न मुक्ति पद, नहिं सुर जुवति विलास।
है केवल मेरे हियैं, राम नाम जल प्यास।।92।।
कौतुक, बस तिसु, काम बस, युवा, लोभ-बल बृद्ध।
प्रेम बिवस रघुनंस मनि, साखी सबरी गिद्ध।।93।।
प्रात भयौ, सन्ध्या भई, बीती निस फिर प्रात।
यतिबिधि छीजत आयु है, काहुन जान्यौ जात।।94।।
गुरु कीन्हें को फल कहा, जो न न मिट्यो संदेह।
छतरी धारै सीस क्यौं, जी जल भीजे देह।।95।।
निरधन, दीन, मलीन, अति, गर्व सहित धनवन्त।
सदा सुखी बिचरहिं महीं, लहि सन्तोषहिं सन्त।।96।।
राम मातु, पितु राम, गुरु राम, धरा धन धाम।
जोग छेम ममराम हैं, नहिं दूजे ते काम।।97।।
सब साधन तजि राम जपु, प्रीति-प्रतीति समेत।
मन अनमन क्यौं होत तैं, सुखद सिखावन देत।।98।।
ब्रज की रज पै लोटिकै, तरनि तनूजा तीर।
कब देवन ललचाइ है, मेरौ अधम सरीर।।99।।
बर-दायक बर दीजियै, अभय कीजियै राम।
अपनौ गेह बनाइयै, प्रभु मेरे हिय धाम।।100।।

रामचरित उपाध्याय की सभी रचनाएँ एक जगह पढ़ें

0 comments:

एक टिप्पणी भेजें

Popular Posts

Categories

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *