कविता, कहानी, ग़ज़ल - शायरी, गीत -लोकगीत, दोहे, भजन, हास्य - व्यंग्य, भजन आरती चालीसा प्रार्थना और एवं अन्य रचनाएं साहित्य के भंडार से

न पूछ मंज़र-ए-शाम-ओ-सहर / 'अमीर' क़ज़लबाश

न पूछ मंज़र-ए-शाम-ओ-सहर पे क्या गुज़री
निगाह जब भी हक़ीक़त से आश्ना गुज़री

हमारे वास्ते वीरानी-ए-नज़र हर सू
हमीं ने दश्त सजाए हमीं पे क्या गुज़री

न जाने कैसी हक़ीक़त का आईना हूँ मैं
नज़र नज़र मेरे नज़दीक से ख़फ़ा गुज़री

ये ज़र्द हो गए कैसे हरे भरे अशजार
जो लोग साए में बैठे थे उन पे क्या गुज़री

ग़ुरूब होती रहीं उस की नेकियाँ दिन में
हर एक रात गुनाहों की बे-सज़ा गुज़री

जला रहा था सर-ए-शाम मशअलें कोई
तमाम रात उलझती हुई हवा गुज़री

ने देख पाओगे बे-मंज़री उजालों की
ये रात ढलने लगी तो कोई सदा गुज़री

श्रेणी: ग़ज़ल

नज़र में हर दुश्वारी रख / 'अमीर' क़ज़लबाश

नज़र में हर दुश्वारी रख
ख़्वाबों में बेदारी रख

दुनिया से झुक कर मत मिल
रिश्तों में हम-वारी रख

सोच समझ कर बातें कर
लफ़्ज़ों में तह-दारी रख

फ़ुटपाथों पर चैन से सो
घर में शब-बेदारी रख

तू भी सब जैसा बन जा
बीच में दुनिया-दारी रख

एक ख़बर है तेरे लिए
दिल पर पत्थर भारी रख

ख़ाली हाथ निकल घर से
ज़ाद-ए-सफ़र हुश्यारी रख

शेर सुना और भूखा मर
इस ख़िदमत को जारी रख

श्रेणी: ग़ज़ल

उन की बे-रुख़ी में भी इल्तिफ़ात / 'अमीर' क़ज़लबाश

उन की बे-रुख़ी में भी इल्तिफ़ात शामिल है
आज कल मेरी हालत देखने के क़ाबिल है

क़त्ल हो तो मेरा सा मौत हो तो मेरी सी
मेरे सोग-वारों में आज मेरा क़ातिल है

हर क़दम पे ना-कामी हर क़दम पे महरूमी
ग़ालिबन कोई दुश्मन दोस्तो में शामिल है

मुज़्तरिब हैं मौज़ूँ क्यूँ उठ रहे हैं तूफ़ाँ क्यूँ
क्या किसी सफ़ीने को आरज़ू-ए-साहिल है

सिर्फ़ राह-ज़न ही से क्यूँ ‘अमीर’ शिकवा हो
मंज़िलों की राहों में राह-बर भी हाइल है

श्रेणी: ग़ज़ल

यकुम जनवरी है नया साल है / 'अमीर' क़ज़लबाश

यकुम जनवरी है नया साल है
दिसंबर में पूछूँगा क्या हाल है

बचाए ख़ुदा शर की ज़द से उसे
बे-चारा बहुत नेक-आमाल है

बताने लगा रात बूढ़ा फ़क़ीर
ये दुनिया हमेशा से कंगाल है

है दरिया में कच्चा घड़ा सोहनी
किनारे पे गुमसुम महिवाल है

मैं रहता हूँ हर शाम शिकवा-ब-लब
मेरे पास दीवान-ए-'इक़बाल' है

श्रेणी: ग़ज़ल

बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का / 'अर्श' सिद्दीक़ी

बंद आँखों से न हुस्न-ए-शब का अंदाज़ा लगा
 महमिल-ए-दिल से निकल सर को हवा ताज़ा लगा

 देख रह जाए न तू ख़्वाहिश के गुम्बद में असीर
 घर बनाता है तो सब से पहले दरवाज़ा लगा

 हाँ समंदर में उतर लेकिन उभरने की भी सोच
 डूबने से पहले गहराई का अंदाज़ा लगा

 हर तरफ़ से आएगा तेरी सदाओं का जवाब
 चुप के चंगुल से निकल और एक आवाज़ा लगा

 सर उठा कर चलने की अब याद भी बाक़ी नहीं
 मेरे झुकने से मेरी ज़िल्लत का अंदाज़ा लगा

 लफ़्ज़ मानी से गुरेज़ाँ हैं तो उन में रंग भर
 चेहरा है बे-नूर तो उस पर कोई ग़ाज़ा लगा

 आज फिर वो आते आते रह गया और आज फिर
 सर-ब-सर बिखरा हुआ हस्ती का शीराज़ा लगा

 रहम खा कर 'अर्श' उस ने इस तरफ़ देखा मगर
 ये भी दिल दे बैठने का मुझ को ख़मियाज़ा लगा

श्रेणी: ग़ज़ल

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ / 'अमानत' लखनवी

उलझा दिल-ए-सितम-ज़दा ज़ुल्फ़-ए-बुताँ से आज
नाज़िल हुई बला मेरे सर पर कहाँ से आज

तड़पूँगा हिज्र-ए-यार में है रात चौधवीं
तन चाँदनी में होगा मुक़ाबिल कताँ से आज

दो-चार रश्क-ए-माह भी हम-राह चाहिएँ
वादा है चाँदनी में किसी मेहर-बाँ से आज

हंगाम-ए-वस्ल रद्द-ओ-बदल मुझ से है अबस
निकलेगा कुछ न काम नहीं और हाँ से आज

क़ार-ए-बदन में रूह पुकारी ये वक़्त-ए-नज़ा
मुद्दत के बाद उठते हैं हम इस मकाँ से आज

खींची है चर्ख़ ने भी किसी माँग की शबीह
साबित हुई ये बात मुझे कहकशाँ से आज

अँधेर था निगाह-ए-'अमानत' में शाम सहर
तुम चाँद की तरह निकल आए कहाँ से आज

श्रेणी: ग़ज़ल

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