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शिव सम्पति के दोहे (रीतिकालीन कवि) Shiv Sampati ke Dohe

 धर्म करो मन क्यों परो, कहो कुमति के धंध।

का करिहौ चलिहौ जबै, मूढ़! चारि के कंध॥


विषै भोग की आस में, सब दिन दियो बिताय।

रे मन, करिहै काह अब, पीरी पहुँची आय॥


सुबह साँझ के फेर में, गुजरी उमर तमाम।

द्विविधिा मँह खोये दोऊ, माया मिली न राम॥


लह्यो न सुख जग ब्रह्म को, धर्यो न हिय में ध्यान।

घर को भयो न घाट को, जिमि धोबी को स्वान॥


रे मन, नित रहिहै नहीं, तरुनापन अभिलाख।

चार दिना की चाँदनी, फिर अँधियारा पाख॥


चतुरानन की चूक सब, कहलों कहिये गाय।

सतुआ मिलै न संत को, गनिका लुचुई खाय॥


श्री हठी भक्त कवि की रचनाएँ । Shri Hathi ki Rachnaen Dohe

संत और कवि वृन्द के दोहे दोहावली वृंद Sant Kavi Vrind Ke Dohe Dohawali

ललितकिशोरी के दोहे (कुंदनलाल) Lalitkishori ke Dohe

ललितमोहिनी देव के दोहे (अष्टाचार्यों में से अंतिम) Lalitmohini Dev ke Dohe

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