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सेवादास के सबद : Sevadas Ke Sabad

निरंजनी संप्रदाय से जुड़े सेवादास रहस्यवादी संत-कवि थे। उनके जीवनकाल और व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत अधिक प्रमाणिक सामग्री उपलब्ध नहीं है, इसलिए उनका साहित्य ही उनके विचार-जगत को समझने का प्रमुख आधार बनता है। उपलब्ध रचनाओं में गुरु, ज्ञान, साधना और मन की अवस्था से जुड़े प्रश्न प्रमुखता से आते हैं।

 ‘कोई गुर बिन ग्यान न पावै रे’ में वे गुरु को आध्यात्मिक ज्ञान का आधार मानते हैं, जबकि ‘अब मन की दुबध्या भई दूरि’ में साधना से उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन की ओर संकेत मिलता है। उनकी कुंडलियों में माया, सुमिरन, सतगुरु और संसार की मोह-माया जैसे विषयों पर विचार किया गया है। इस तरह सेवादास की वाणी निर्गुण संत परंपरा और निरंजनी साधना-पद्धति से जुड़े आध्यात्मिक चिंतन का परिचय देती है।

कोई गुर बिन ग्यान न पावै रे

कोई गुर बिन ग्यान न पावै रे।

कहा भयो पढ़ि जग परमोधे, फिरि माया सू मन लावै रे॥

च्यारि षष्ट अष्टादस साधे, अरथ बहौत बनावै रे।

लोभ-मोह पांचा बसि प्रगट, कहँ हरि सुख निज न आवै रे॥

गीता अरथ भामोत बखानै, बहुत दुनी भरमावै रे।

मांहि सांच सो दीसें नाहीं, सब झूठ ही झूठ बतावै रे॥

नाभि नासिका बीचि तहाँ सुख, मन कूँ उलटि न ल्यावै रे।

जन 'सेवादास' पढ्या क्या होवै, फिरि बिपति नदी बहि आवै रै॥

अब मन की दुबध्या भई दूरि

अब मन की दुबध्या भई दूरि।

ग्यान भाण अंतरि उजियारा, तब देखे राम सकल भरपूरि॥

ज्यूँ कंचन तै भूषन नहीं न्यारा, कुंभ मृतका भिन नाहीं कोई।

यूँ एकै राम सकल बिस ब्यापक, और न दूजा कहिये कोई॥

ज्यूँ पट तत भेद नहीं भासै, यूँ अभेद अवगति राइ।

जन 'सेवादास' पूरण अबिनासी, सो सब घटि रह्या समाइ॥

साधो सतगुर पूरा पाया

साधो सतगुर पूरा पाया।

मन कूँ फेरि सहज घरि लाया॥

कोई कहै बैकुंठ बसीजै, बैकुंठ रहै कै जासी।

हमकू तौ सतगुर समझाया, सुरति निरंजन बासी॥

तीरथ बरत जोग जिग तपस्या, एकरत रोग बढ़ि जाई।

जन 'सेवादास' सोई समझि सयाणपण, सब तजि हरि गुण गाई॥

ऐक अचंभा ऐसा भया

ऐक अचंभा ऐसा भया, उलटि स्याल सिंघ कू गह्या।

बकरी उलटि चीता कू घेर्या, फिरि मूसै गही मजारी।

सुसै स्वान कू बन में घेर्या, अब भया अचंभा भारी॥

फिरि सिंघ गाइ की रछ्या करही, मींडक साँप वसि कीया।

मकड़ी कू माखी गहि राखी, चिड़ै सिंचाण गहि लीया॥

फिरि मुरगै दौड़ि बिलाई पकड़ी, तीतर सिकरा मार्या।

मृग भील कू चौड़ै रोक्या, दादर सरप सिंघ डार्या॥

राज करै बाँझ कै बेटौ, अरिदल सबै सिंघारै।

जन 'सेवादास' सोई जन सूरा, या पद का अरथ बिचारै॥

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