हरिदास निरंजनी के सबद : Haridas Niranjani Ke Sabad
डीडवाणा से जुड़े हरिदास निरंजनी उत्तर भारत में निरंजनी संप्रदाय की स्थापना से संबंधित संत-कवि थे। उनकी वाणी में साधना के साथ हठयोग और रहस्यवाद का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। वे बाहरी धार्मिक दिखावे की अपेक्षा भीतर की चेतना और आत्मिक अनुशासन को अधिक महत्व देते थे। जीवन के निश्चित कालखंड और व्यक्तिगत विवरणों की प्रमाणिक जानकारी सीमित है, इसलिए उनके साहित्य को ही उनके विचारों को जानने का प्रमुख आधार माना जाता है।
हरिदास निरंजनी के सबद उपलब्ध हैं। ‘राम रस मीठा रे’, ‘गाफिल नींद न करिये रे’ और ‘है बलवंती माया’ जैसे पदों में नाम-स्मरण, माया से सावधानी और जाग्रत जीवन का संदेश मिलता है। उनकी वाणी में हिंदू-मुस्लिम धार्मिक भेद से ऊपर उठकर एक परम सत्ता की बात भी आती है। भाषा लोक के निकट, प्रवाहपूर्ण और साधना के गूढ़ विचारों को सीधे ढंग से रखने वाली है।
संतो! खेती की रुति आई
संतो! खेती की रुति आई।
औसर इसौ बहौड़ि नहिं लाभै, अब जीत्या ज्यां बाही॥
धरती सूडि झाड़ अलसोट्या, विरहा अगनि जलाई।
सुबधि भौमि राम जल बूठा, यूँ बाड़ी बनि आई॥
हाली भला भली सज सगली, एक मतै व्है लागा।
ब्रह्म साखि यूँ नीपति आई, धुर का टोटा भागा॥
अनंत आतमा अवर न जाचै, खलै बहौत सुख पाया।
निज तत तिकौ लाटतां लीयौ, लाटै लोग धपाया॥
इसा भेद कोई बिरला जांणै, जाकूँ काल जाल में नांही।
जन हरीदास हरि साख सकल भरि, बिलसी आनंद मांही॥
पांड़े अपनी अगनि बुझावो
पांड़े अपनी अगनि बुझावो।
हम तो अपणौं राह चलत हैं, तुम काहे दुख पावो॥
था तुम कौंण कहाँ तैं आया, अनंत लोक फिरि भाई।
अब तो तुम बामण होइ बैठा, चौरासी बिसराई॥
गरभवास ऊँधै मुखि रहता, सपत धात रस पीया।
अब तो तुम चौका दै जीमो, वहाँ चौका किस दीया॥
कुल अभिमान आन व्रत पूजा, इहै बिथा होइ लागी।
जे यह जाति भली थी पांड़ै, तौ सुखदेव क्यौं त्यागी॥
रोम बिसारि हारि मत चालौ, आंखि अनूप उघाड़ो।
क्रोध चंडाल सदा संगि खेलै, ता का मूल उपाड़ो॥
पाँच तत का सकल पसारा, प्रांण तहाँ दुख पावै।
जन हरीदास बामण सति सोई, उलटा ब्रह्म समावै॥
है बलवंती माया
है बलवंती माया।
लीया खड़ग सकल सिरि खेलै, पांण मतै कै पाया॥
माया पुरस नारि फुनि माया, माया आंन सगाई।
माया स्वामी माया सेवग, बहौत भांति करि आई॥
जोगी संगि जोगणि होइ चाली, भगतणि भगत मनाया।
सोफी संगि सोफणि व्है चाली, माथे मुकट बणाया॥
सींगी रिख सूखिम व्है सोष्या, नारद रूप फिराया।
संकर का मन मांही पैठी, नाना भांति नचाया॥
अगनि रूप होइ मैं तैं खंडै, परसि-परसि परचावे।
जन हरीदास बिरला जन कोई, उलटि परम पद पावे॥
राम रस मीठा रे
राम रस मीठा रे अब पिया ही सुख होइ।
मीठा ऐसे जांणिये रे, पीवै नारद सेस।
मतिवाला गोरख पीवै, रुचि-रुचि पिवै महेस॥
सींगी रिष वन मैं पीया रे, हरि रस इम्रित धार।
सुखदेव पी निरभै भया, ताकूँ जांणौं सब संसार॥
गोपीचंद निरमल पीवै रे, पीवै हँणवँत वीर।
जोगी पीवै भरथरी, जाका अणभै भया सरीर॥
गाफिल नींद न करिये रे
गाफिल नींद न करिये रे।
जीवण नहीं मरण सिर ऊपरि, ता मरणा सूँ डरिये रे॥
रजनी मोह नींद मरि सूता, परम भेद नहिं पाया रे।
अति अभिमान वदत नहिं काहू, हीरा सा जनम गमाया रे॥
गहि गुर ज्ञान जागि जीव जोगी, झूठै भरम भुलाना रे।
हरि सूँ विमुख नाचि नानाविधि, छाड़ि चले सुलताना रे॥
आयौ थौ तूँ साचे सौदे, काचे लागौ भाई रे।
हटवाड़ा हम बिछुड़त देख्या, जागौ राम दुहाई रे॥
अब तूँ समझि देख निसि बीती, पैंडा करणां लोई रे।
तसकर बहौत दूरि घर तेरा, साथी संगि न कोई रे॥
जन हरिदास राम भजि भाई, देखि-देखि पांव धरणा रे।
हरि दरबारि झूठ नहिं भाकै, तिल-तिल लेखा भरणां रे॥
सोई दिन आवेगा
सोई दिन आवेगा, अपणो राम संभालि वे।
अनेक रावण सेनि जोधा, मांणि मूँकातै गया।
काल झल में सकल आया, तन दावानलि दह्या॥
असुर सुर षसि पहुम ऊपरि, षड़ग कर गहि तोलता।
जुरासिंध बलि कहाँ विक्रम, बोल अंवला बोलता॥
पाँच पांडौ कहाँ कैरूँ, एक गैलै सब बह्या।
सिसपाल सेन्या कहाँ जादू, कहौ जै कोई रह्या॥
हिरणाकुस हिरणांषि मुचकंद, करण महा दानी भया।
कहौ छल बल कहाँ माया, अंति सब पाली गया॥
धर्या धूँवा सकल बिनसै, काल काँटा लागिहै।
अधर बसत अनूप अंतरि, कोइ साध गुरगमि जागिहै॥
पतिसाह भोपति कहाँ सुरपति, जाल सब परि डारिहै।
जन हरीदास ‘सूछिम’ होइ जल ज्यूँ, कोइ चोर हरिजन टारिहै॥
अवधू मैं मेरा मन समझया
अवधू मैं मेरा मन समझाया।
मन जाइ थो पणि जांणि न दीया, फेरि सहज घरि लाया॥
के बपधरि बैकुंठ बिचारै, म्रत लोक का मार्या।
जो बैकुंठ धर्या सो बिनसै, हम कछु अगल बिचार्या॥
नरक सुरग दोऊ हम तोल्या, ग्यांन तराजू मांही।
दोन्यू बिथा बराबरि दीसै, इन में घटै बधै कछु नांही॥
तीरथ व्रत जोग जिग तपस्या, बड़ी बिथा जुग मांही।
जन हरीदास ए मलकरि देख्या, इन कूँ परसै नांही॥
जिवड़ा जाय कहा तूँ रहसी वे
जिवड़ा जाय कहा तूँ रहसी वे।
करणहार करतार न जांणयौ, सलिल मोह संगि बहसी वे॥
काची परख सराफी खोटी, ता तैं परदुख सहसी वे।
राम नाम निज भेद न जाणयों, काल चटा तैं गहसी वे॥
हरि प्रीतम सूँ प्रीति न बांधी, झूठ तहाँ जाइ ठहसी वे।
जब जम आया झूठ बिलाया, रसन तालवै फहसी वे॥
जब इहि जीवड़ै किया पयाणा, बहुड़ि न यहु तन लहसी वे।
जन हरीदास माया अपराधिणि, बहौत भांति करि दहसी वे॥
मन रे तूँ स्याणा नहीं
मन रे तूँ स्याणा नहीं अयाणा रे!
थोड़ी राति बहौत क्या सोवे, जागि न देखि दिवानां रे॥
माया देखि कहा मन फूल्यो, देही देखि मसतानां रे।
झूठी काया झूठी माया, झूठै हेति बंधाना रे॥
हटवाड़ा आवै ज्यूँ बिछड़ै, समझि देखि गेवानां रे।
आज नहीं तौ काल्हि न रहणां, मरण नदी बहि जाणां रे॥
भौपति बहौत कलै माया में, मीर मुलक सुलतानां रे।
जन हरीदास बिरला जन कोई, उलटी पांख उडाणां रे॥
जीवड़ा जागि न देखे लाई वे
जीवड़ा जागि न देखे लाई वे!
जम जागत है तूँ क्या सोवे, राम सुमरि मेरा भाई वे॥
निसदिन आव घटै तन छीजै, ज्यूँ अँजली का पांणी वे।
तजि अलसाक अलप है जीवण, समझि देष अभिमांनी वे॥
मात पिता सुत वित भी नारी, संगि न चालै कोइ वे।
तासूँ लागि विकट मति बौरा, मनषि जनम निधि खोइ वे॥
वांसै बाहर छिप्या न छूटै, देही जुरा बुढ़ांणी वे।
पंडर केस हाथ नैंणा परि, काल धजा फहराणी वे॥
औघट घटा बिचाले दिरया, तहाँ मेंरा नांव मुरारी वे।
तहाँ लागि तैं पार न किया, परदेसी अहंकारी वे॥
जहाँ उदै न अस्त काल नहिं काया, सोइ परम सनेही तेरा वे।
हरीदास जन टेरि कहत हूँ, तहाँ चलो जीव मेरा वे॥
तब हम हरि गुण गावेंगे
तब हम हरि गुण गावेंगे, गावेंगे गुण गावेंगै।
काम क्रोध सांसा सब जीता, मोह मता सुरझांवेंगै।
पांचो पकड़ि आप बसि लहैंगे, बंकनालि रस पावैंगे॥
दुख-सुख छाड़ि सहज धरि खेले, कुबधि सुबधि सूँ पावैंगे।
ऊजड़ छाड़ि सुलटि मन उलटा, एक दसा कूँ लावैंगे॥
सतगुर सबद चांदिणा मेरे, अगम तहाँ हम जावेंगे।
तेज पुंज परगट परपूरण, सूँनि मंडल में पावैंगें॥
घटि-घटि अघट घटत हरि नांही, सोई रमता राम रमावैंगे।
जन हरिदास दास हरि भजि-भजि, हरि ही मांहि समावैंगे॥
सखी हो! सांवण मास विराजै
सखी हो! सांवण मास विराजै।
अरस परस कौतूहल देख्या, उरध कँवल कै छाजै॥
परमल प्रीति उमँगि जल उलट्या, गगन गरज घण आया।
दांमणि उलटि आम मैं पैठी, नौ घण न्योति बुलाया॥
बादल त्रिविध पवन मुखि पीया, बंकनालि मैं बाई।
निरमल नीर अहो निस बूठा, घटा मेर मैं आई॥
औघट घाट अघट में अटक्या, सुषमनि सहजि समांणी।
ये नवनाथ नींद मरि सूता, नदी निवासै तांणी॥
इंद्र अकास अरथ मैं मीना, परसि परम सुख लीया।
जन हरिदास परस जल पैलो, मीन माछला जीया॥
समझि देखि मन मेरा रे
समझि देखि मन मेरा रे!
या जग मांहि जागि हम देख्या, सगा न कोई तेरा रे॥
तात मात वनिता सुत बंधु, जतन जीवतां करि ही रे।
मूँवा जालि-वालि धरि आवै, ता मरहट तैं डर ही रे॥
राम बिसारि हारि मति चालौ, कहि समझाऊँ लोई रे।
माया सांचि संगि ले जाता, देख्या सुण्या न कोई रे॥
जामैं मरै मरै पुनि जामैं, मरत लोक में आवै रे।
जन हरिदास देखि मति मंदा, गोबिंद काँई न गावै रे॥
अवधू आसण बैसण झूठा
अवधू आसण वैसण झूठा।
जब लग मन विश्राम न पावै, पख तजि फिरै न पूठा॥
ग्यांन गुफा जांणै नहिं जोगी, अगम अरथ काहा बूझै।
पांच अगनि में पड़ि-पड़ि दाझै, वा सीतल ठौड़ न सूझै॥
विवध विकार बालि अरि ईंधण, धूँई ध्यान न धारै।
ब्रह्म अगनि आकास न भेदै, तौ पारा क्यूँ मारै॥
निगम अगम तहाँ लगै न आसण गरब नाद निति बाजै।
नगरी मांहि भुगति बसि भूपा, जहाँ तहाँ उठि भाजै॥
निद्रा मारै मसत दिवानी
निद्रा मारै मसत दिवानी।
राव रंक उमराव चुणि मार्या, ऐसी है गैवांनी॥
जोगी जती सेवड़ा सोफी, तिनहु तैं रहै न छानी।
आप निरंजन जुग में थापी, काल तणी निसानी॥
जुग सोवै गोरख जन जागै, ऐसा परम विधानी।
जीव जंत सबही बसि कीया, सबहिन कै मन मानी॥
जोग जुगति गति जांणै नाहिं, निद्रा कै बसि हूवा।
जन हरीदास केता नर नारी, माया मांही मूवा॥
सखि हो! गगन गरजि घन आये
सखि हो! गगन गरजि घन आये।
सुँणि सुँणि सबद कँवल निज विगसत, अंतरि अलख लखाये॥
सेज सुहाग भाग बड़ ग्वालणि, व्रह्छोल सुख पाये।
मन मैमंत राम रसि मातौ, घसि सुखसागर न्हाये॥
मोर मगन चात्रिग सुख चितवत, बीज चमकि झड़ लाये।
अनहद सबद गोपि धुनि गरजत, पिव मिलि प्रेम बढ़ाये॥
मथुरा मंडल होत अति आनंद, बेलि बधन वन छाये।
जन हरीदास जल पूरि परमगति, परम जोग पति पाये॥
सजन सनेहरा वे
सजन सनेह रा वे, प्रांण हरि गुण गाइ।
भँवर ज्यौं मन फिरै दह दिसि, काल दह दिसि है सही।
जहाँ लागै तहै काँटा, निज नांव बिणि निरभै नहीं॥
अजहु जिवड़ा कहा सोवै, जुगति जांणि न जागही।
आक जड़ क्या दूध सींचै, अंति आंब न लागही॥
जांणि ऐसे भजो गोबिंद, परसि हरि रस पीजिये।
जन हरिदास हरि गुण गाइ निसदिन प्रांण हरि कूँ दीजिये॥
निद्रा मांही थकी मसोसे
निद्रा मांही थकी मसोसे।
बादि चढ़ी सिरि ऊपरि खेलै, लाधी वरतणि खोसै॥
पहली नैंण वैंण कंठ रोकै, चेतन घणां चुकावे।
पांव पड़ै रीड़ा तैं फीड़ा, कांई कल छिटकावै॥
आंवरि करै अकल की चेडी, आई जै त्यूँ आवै।
ता आगे कोई जोगी जुध करि जागै, उलटी ताली लावै॥
अगम पियाला भरि-भरि पीवै, निरभै नाद बजावै।
जन हरीदास निद्रा अपराधणि, गंग तरंग दिखावै॥
समझि देषि कुछ नांही रे
समझि देखि कुछ नांही रे!
तूँ नांही नांही सूँ लागा, साच न सूझै मांही रे॥
परम सनेही छाड़ि आंपणौ, विष इम्रित कर खाजै रे।
सूकर स्वांन स्याल कउवा गति, काल सदा सिरि गाजै रे॥
हंस बटाऊ परधरि वासा, अब तूँ समझि सयाणाँ रे।
पांच सात दिन एक आध में, ऊठि अकेला जांणा रे॥
कालकहर की चोट सकल सिरि, कै मार्या कै मारै रे।
जन हरीदास भजि रामसनेही, सरणौं राम उबारे रे॥
करम भरम का किया कलेवा
करम भरम का किया कलेवा, सांसा जल ज्यूँ पीया।
ताती सीली सहज समांणी, हम तौ उलटे पैंडे जीया॥
सूधै राह सकल जुग चालै, पसवां तहां बिलाया।
रसना स्वाद बहत यूँ बूड़ी, वो निरगुण नाह न पाया॥
निरमल कथा परमपद नेड़ा, अधर अमर निज भालै।
सुलटि सुरति अगम रस पीवै, परगट बासा रालै॥
सैलि चढ्या साचै रंगि राता, काचै रंगि मन नांहीं।
हरीदास ऐसा जन कोई, वास करै हरि मांही॥
बाबा इहै ग़रीबी झूठी
बाबा इहै ग़रीबी झूठी।
मन अर पवन दोऊ ये फूटा, मनसा फिरै न पूठी॥
त्रिवधि ताप की कंथा पहरी, मनी टोप सिरि जाकै।
राग दोष की कांना मुद्रा, कहाँ ग़रीबी ताकै॥
पहर्या भेष रेख ज्यूँ की त्यूँ, मोह मढी वसि जीवै।
तन कै भेष रांम नहिं रीझै, विष इम्रत करि पीवै॥
पाँच और परदेसी पहुंता, मिलि खेलै ता मांही।
मन में ज़ोर मुखि गहै ग़रीबी, असलि ग़रीबी नांही॥
जन हरिदास आन तजि अनरथ, मनि राम नाम व्रत धारै।
राग दोष काहू सूँ नांही, या असलि ग़रीबी तारै॥
संतो! मान मरोड्यां मारे रे
संतो! मान मरोड्यां मारे रे।
डिंभक सा डाकणि चूंणिखाया, कोई म्रतक पड्या पुकारे रे॥
साधां कौ भै भारी मानै, हरि सूँ नातौ पालै रे।
आपै चढ्या चढ़ी गटकावै, पावक होइ परजालै रें॥
जन सूँ जेठ बहू कौ नातौ, आडौ पड़दो राखै रे।
दूजा सब देवर करि देख्या, रसनां आगै चाखै रे॥
आंवरि करि सकल जग उपरि, घट-घट मांही जागै रे।
जन हरीदास सिर छाड्यां खेलै, ताकां चरणां लागै रे॥
अवधू ऐसा ग्यांन विचारा
अवधू ऐसा ग्यांन विचारा।
है हरि अकल सकल विस व्यापी, रहै सकल तै न्यारा॥
ल्यौ में अलख अकल अविनासी, सुहति सुखह मति जागी।
गोरख गोपि परसि निधि निरमै, अनहद सींगी बाजी॥
निज पुरि प्रांण बसै निति निहचल, पवन सुरति सति माला।
ब्रह्मछोल में झूलै खेलै, पीवै अगम पियाला॥
निकटि नाथ निज रूप निरंतरि, नांव निरंजन राया।
जन हरीदास निंदौ कौ वंदौ, मन फिरि मन ही समाया॥
तब हरि हम कूँ जांणैंगे
तब हरि हम कूँ जांणैंगे, जांणैंगे हरि जांणैंगे।
मात पिता परिवार सकल तजि, सबसूँ उलटी तांणैंगे।
हरि है साच और सब झूठा, वा हरिसूँ वाणिक बाणैंगे॥
आंन दसा सूँ जब मन थाक्या, करम भरम संगि नारंणैंगे।
राम रसाइण का मतिवाला, आदू प्रीति पिछांणैंगे॥
सौकणि उलटि सखी जब हुँहिगी, उलटी नदी चलाएँगे।
पारा बांधि प्रेम रस पीया, राम-रोम रुचि माणैंगे॥
जन हरिदास सौ सा सब मांगा, राम रसाइण पीवैंगे।
आन सकल सुख विष भरि देख्या, हरि सम्रथ भजि जीवैंगे॥
पांडे! कैसा भजन तुम्हारा
पांडे! कैसा भजन तुम्हारा।
मन कूँ पकड़ि सहजि धरि खेलौ, माया खड़ग दुधारा॥
मैं सति पूछौं तुम्ह सति कहियो, राखौ कहाँ दुराया।
मन है एक कहां लावोगे, एक ब्रह्म दूजी माया॥
कंचन छाड़ि काच सूँ खेलौ, तब लग काची सारी।
माया गहो ब्रह्म व्है बैठा, इहै अचंभा भारी॥
अरथ करै अनरथ उरि अंतरि, परम भेद नहिं पाया।
जन हरीदास ऐसा अपराधी, स्वामी पणैं सताया॥
राम असाँड़ा सांई हो
राम असाँड़ा सांई हो!
राखौ वोट चोट क्यौं लागै, समझि पड़ै कुछ नांही हो॥
पाँच पचीस सदा संगि खेल, आंवर करै अघाई हो।
तुम्ह अटकौ तौ बहौड़िन व्यापी, हम बल कछु न बसाई हो॥
तारण तिरण परम सुखदाता, यहु दुख कासूँ कहिवे हो।
करम विषाक विघन होई लागा, तुम्ह राषौ तौ रहिये हो॥
समद अथाह अगह करण में, गौड़ि करै नित गाजै हो।
ता में मछ काल सा खेलै, मांझि दुरै सो खाजै हो॥
ऐ अघरूप अनंत मोही जारै, अंध कूप में घेरा हो।
जन हरीदास कूँ आस न दूजी, राम भरोसा तेरा हो॥
राम रस ऐसा रे
राम रस ऐसा रे, अमली बिणि पिया न जाइ।
सोफी को पीवै नहीं रे, कुपछि पड्या सब कोइ।
आरति सूँ अमली पीवै, पी मतिवाला होइ॥
सोफी सब उलटा पड्या रे, अमली रह्या लुभाइ।
भँवर गुफा का घाट में, उनमन सूँ मन लाई॥
अमली सब संसार है रे, रह्या विषै मन लाइ।
जन हरीदास हरि रस पिया, दूजा कछु न सोहाइ॥
राम नहीं बीसरूँ हो
राम नहीं बीसरूँ हो, मेरे गुरगमि दियो चताई।
ज्यूँ नटणीं निरमै थकी हो, बरतैं लागी जाइ।
इतवत चित डालै नहीं, चित बरतैं रह्यो समाइ॥
मरजीवौ समदां धसै हो, तन-मन सुरति मसाइ।
बीचि कहूँ अटकै नहीं, निज सीष संभालै जाइ॥
गुरज नाल गोला बहै हो, धणंक बाण सर पूरे।
स्यांम काज सनमुख लड़ै, उलटि न खेलै सूरि॥
ज्यूँ चात्रिग धण कूँ रटै हो, पिव-पिव करत बिहाइ।
यूँ जन हरीदास हरि नांव में, सन सहजैं रह्यो समाइ॥
एक हरि एक हरि
एक हरि एक हरि, एक हरि साचा।
अलख भजि अलख भजि, सुफल करि वाचा॥
अविनासी पूरणब्रह्म, तहाँ मन दीजै।
राम भजि राम भजि, परम गति लीजै॥
गाइ गोपाल सति, सुमरि मन रामा।
काल लागै नहीं, सरै सब कांमा॥
एक सूँ एक होइ, निरभै मतै रहिये।
भन हरीदास गुर ग्यांन गहि, अगहि यूँ गहिये॥
दस अवतार दसूँ ए देसी
दस अवतार दसूँ ए देसी, अवरां अवर चढ़ावै।
सो बाजीगर भलाक नांही, एक कूँ करै गमावै॥
परम पुरम का पार न पावै, आसा सूँ लूधा।
सूधी रहा सहज ही छाड्या, ऊजड़ पड्या अलूधा॥
निराकार निरभै रे संतो, जो आकार सजावै।
हीड़ागर हीड़ा कूँ दौड़े, सो भी धणीं कहावै॥
तरंग सिंध सो भी हरि नाहीं, निहचै जाइ बिलावै।
जन हरीदास अविनासी भजतां, भव जल निकटि न आवै॥
राम भजन हिरदै नहीं हेत
राम भजन हिरदै नहीं हेत।
जहाँ-तहाँ अपणां मन देत॥
मोह दोह माया मदमाता।
देखो जीव ज़हर फल खाता॥
हारि जीति का पासा हाथ।
नरकि चलै दुरमति ले साथ॥
जब लगि जीव पाँच का चेरा।
तब लग काल न छाड़ै केरा॥
जन हरीदास नर नींद न जागै।
साच कह्या काँटा सा लागै॥
संतो! राम रजा मैं रहिए
संतो! राम रजा मैं रहिए।
मन दे प्रांण सीस दे सदगति, राम-राम यूँ कहिए॥
ग्रिह परिवार मोह तजि मैं तैं, मन की गति मन जांणै।
तजि अभिमांन भजौ अविनासी, अंतरि अलख पिछाणै॥
सब संसार कहै कछु नांही, सांई कै मनि भावै।
पूरण ब्रह्म परम सुखदाता, अपणै मारगि लावै॥
हरि तैं विमुख लोग सब मानें, सदगति सुणयां न कोई।
नींदै लोग राम वित्त चित्त में, ता समि और न कोई॥
जन हरीदास रांम कै सरणै, रहै राम ही गावै।
भौ सागर तिरै निरंजन परसै, निज बिसरांम समांवै॥
मन रे! सो साचा जूवारी
मन रे! सो साचा जूवारी।
जूवै खेलि परमनिधि परसै, बहौड़िन रोषै सारी॥
पहली खेलि बहुत दिन हार्या, सतगुर समझि न आई।
अब वो डाव चरणतलि चूर्या, उलटी सार चलाई॥
तीन पांच नव डाव न खेलै, चलि दसवैं घरि आई।
अब याह सारि पड़ै नहिं काची, ठौड़ अमौलिक पाई॥
दुख-सुख डाव चाल चौरासी, त्रिविध ताप तजि पासा।
सारी प्रांण प्रेम घरि सौंपी, अरथि अलूधी आसा॥
चित चौपड़ि चेतन घरि चौथे, दोऊ मेल्हि जुग हूवा।
खेलै सदा सुरति कै नाकै, फूटि न चाले जूवा॥
उनमनि रहै निरंतरि निसदिन, निज तरवर की छाया।
जन हरीदास सतगुर कै सरणौं, करमन व्यापै माया॥
हिंदू तुरक के एक खुदाई
हिंदू तुरक के एक खुदाई, राम रहीम दोइ नहिं भाई।
इहां बामण उहां मुल्ला बकरै, वेद कतेब बथै बिसरांम।
रांम संभालि दूर करि मैं तैं, आखिर एक अलह सूँ काम॥
काजी बंदे ज़ोर न करणां, साचा सबद सुणों सति कानि।
करद सँवाहि गला क्यूँ काटौ, कुछ तौ डर साहिब का मांनि॥
ए सब जीव उपाया साहिब, ताकूँ मारि पड़ो क्यूँ दूरि।
जन हरीदास यहु अरथ बिचारै, तासूँ खालिक सदा हजूरि॥
0 comments:
एक टिप्पणी भेजें