मध्व मुनीश्वर के सबद : Madhav Munishwar Ke Sabad
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बंदे मतकर इतना मान
बंदे मतकर इतना मान।
अकल कु पकड़ तूं नक़ल है ख़याली, नक़ली दी सब जान।
क्यों नहीं सुनता क्यों नहीं गुनता, तेरा दिल सैतान।
इस देही में पंछी जीयरा, दो दिन का मेहमान॥
झुठी काया झुठी माया, आख़र मौत निदान।
कहत है माधोनाथ गुसाईं वैरागी मस्तान॥
माशूक तेरा मुखड़ा दिखाव
माशूक तेरा मुखड़ा दिखाव।
कपट का घूँघट खोल सीतावी, इश्क मिठाई चखाव।
आशक तेरा जिवड़ा चातक, कर मेहर बरखाव॥
दिल काग़ज़ पर सूरत तेरी, गुरु के हात लिखाव।
मध्व मुनीश्वर साईं तेरा, असल नाम सिखाव॥
माया का ग़ुलाम
माया का ग़ुलाम न करे साईं कु सलाम।
कामी कपटी चोर तुफ़ानी मुतफन्नी अलाम रे॥
उसकू तंबी पहुँचावेगा हज़रत का ईलाम रे।
कवड़ी उपर जीवड़ा वारे, दुनयाई हराम॥
ऐसा बेईमान इसकू क्यों मिलेगा राम रे।
नाहक सारी उमर गंवाई न लिया हरि का नाम रे॥
जहाँ किया शरीरी का बैकुंठ में इनाम रे।
कहत है माधोराम उसका दोज़ख़ में मुकाम रे॥
रुखा पीपल पात है
रुखा पीपल पात है, जैसा पवन से जात है।
वैसी फ़क़ीर की बात है, रमता भला नवखंड में॥
अक़ल फरणीसात है, ज़िकीर चाहात है।
मिठी शकर सों खात है, खटा-मठा सब फेंक दिया॥
गुरुनाम का अमल पीया, कुफ़र गनीम सब ज़ेर किया।
अवल उसी ने तख़्त किया, भला हुवा अब दिल का।
काया विकट किल्ला बड़ा, जिस पर धनी आप चढ़ा॥
आगे फ़क़ीर बंदा खड़ा, करे हमेशा बंदगी।
किल्ला बिकट फत्ते किया, जिस पर धनी का तख़्त किया।
दिल वजूद कू सिर पाव दिया, मेहरबान हुवा माधोनाथ॥
बंदे भज ग़रीबनवाज़
बंदे भज ग़रीबनवाज़।
मैं तो बंदा ज़िकिर कु अंधा, इस दुनिया में निकाज-निकाज॥
सब माफ़ बंदे कु गुनाह जी, ऐसी तुम्हारी आवाज़-आवाज़।
सच्चा साहेब पालो तू ही, माधो ग़रीब नवाज़-नवाज़॥
बड़ा नाथ माधो अगडधत गुंडा
बड़ा नाथ माधो अगडधत गुंडा।
पिवे घोटकर भांग भरपूर कुंडा॥
झुले हाथ में मस्त लेकर कुतका।
नहीं इस बराबर दुन्या में उचक्का॥
बड़ा नाथ माधो बहमन में दुकसवी।
गले गोधड़ी हाथ में एक तसवी॥
धनी कू करे याद हरदम दीवाना।
शहर में पुकारे बुरा है ज़माना॥
पीरों का मुरीद मुठभर भंग चाबे।
धनी के बयाने हमेशा मस्त गावे॥
आवल झरझरी की नली ओढता है।
कंकर फोड़करती धुआँ छोड़ता है॥
गंगा के किनारे बड़ा यक नकी है।
वहाँ येक खपरेला बंगला किया है॥
तहाँ नाथा माधो हमेशा झूलता है।
फ़क़ीर कु नज़र देखकर फूलता है॥
कुसुंबी चिरा बांधकर फेरबिंगी।
अगलबंद जामानिमा सबज़ रंगी॥
बड़ा नाथ माधो बम्हन ज़ोर मंगी।
धनीकू करे याद भंगी तरंगी॥
जहाँ सुरसती का हुआ संगम।
पुराना पड़ोसी ऊपर धेक जंगम॥
नीचे मठकी जो चौगीर्द जागा।
नज़र देखत ही कुफ़र दूर भागा॥
बड़ा बाज़ीगर, साईं बडा बाज़ीगर
बड़ा बाज़ीगर, साईं बडा बाज़ीगर।
बाज़ीगर की बाज़ी झूटी, अकेला आख़र॥
सबकी नज़र बंद करकर, दिखाबता है पर।
एक पर के पलख म्याने, छतीस कबूतर॥
एक रस्सी का सांप करे, जबू न उसका ज़हर।
लहर चढ़ेने शहर भुलाना, इस चौक में कहर॥
हांडी बाग का गला काटे, मारे पेट में छूरी।
जीवना मरना वैसा झुटा, बात तैसी बुरी॥
बाज़ीगर के हंडीबागकु कहीं नहीं डर।
मध्वनाथ का गुरु ज़बरदस्त है सिर पर॥
यारो समजो रे दो दिन की जिनगी यारो
यारो समजो रे दो दिन की जिनगी यारो॥
नंगे आना नंगे जाना काका बाबा भाई।
काकी अंमा नानी दादी लालुच देति लुगाई॥
कहाँ की संपत ऊँच हवेली कहाँ का खेल कबिला।
कहाँ के नौबद हाथी घोड़ा जहाँ का वहीं तबीला॥
हाथ दियो कुछ करबे दान, पग से कर तीर्थाटन।
संपत नही तो भिच्छा मांगकर ख़ुद खिलावे बह्मन॥
अखंड माधव साधव नहीं भाई सब संतन का लड़का।
हर भजन सो मस्त भया है ख़ूब लगावे कड़का॥
बह्मन पढ़ा है वेद कू
बह्मन पढ़ा है वेद कू, समजा उसी के भेद कू।
पूजे न पयर के देव कू, पंडित ऐसा सब में भला।
अंदर करे दिल पाक रे, सेवा ज़िकिर कू च्याख रे॥
उपर न लगावे ख़ाक रे, जोगी ऐसा सबमें भला।
बांधे गले मो लिंग रे, जोगी ऐसा सब में भला॥
फज़र किताबां खोलता, साची नसीहत बोलता।
अपने अमलबीच डोलता, क़ाज़ी ऐसा सब में भला॥
हुसियार अपने-अपने बक्त रे, चढ़े बेहश्त का तख़्त रे।
खुला है उसका बखत रे, मल्ला ऐसा सब में भला॥
साहेब करता बंदा जुदा, समजा है दिल में वो ख़ुदा।
फ़क़ीर हुवा है आप सुधा, जिंदा ऐसा सब में भला॥
इस बात से माधोनाथ कहे, नहीं साईं का घर दूर है।
नहीं दूर रे भरपूर है, जंगल फिरा तो सब में भला॥
अंधा रे जग अंधा
अंधा रे जग अंधा।
साहेब से अपनी प्रीत छांड़ के, बेइमान हुवा बंदा॥
बेद किताब कुछ नहीं माने, प्यारी का सब धंदा।
कहत है माधोनाथ गुसाईं, निर्मल फ़क़ीर चंदा॥
राखे असल जो ईमान
राखे असल जो ईमान, बड़ा साईं मुसलमान।
नहीं तो अवस बेइमान, दुनिया बीच रोते हैं॥
करै दैबकु जो कैद, बड़ा सोही येक सैद।
नहीं तो सैतान से कैद, चिकड़ लगा धोवते॥
लाश मेरा महबूब, उसका बंदा सोही ख़ूब।
जो नाथमाधो का कुफ, सुनकइ महजुज होते हैं॥
अब कर दिल दीवाने पाक
अब कर दिल दीवाने पाक।
झूठी माया झूठी काया, आख़र सारी ख़ाक।
काहे कू बंदे महल बनाया, ख़र्च हज़ारों लाख॥
हरदम तूंही-तूंही कहना, जंगल से होना च्याख।
कहत है माधोनाथ गुसाईं, अपना पानी राख॥
बंगला ज़ोर बनाया वे
बंगला ज़ोर बनाया वे, धामो नारायण डोले॥
नीचे भट्टी ऊपर पानी वामो लगाये बत्ती।
सात ताल का महल बनाया ख़ूब बसाई बस्ती॥
चार देहे का मठ बनाया पचीस लगाये फत्तर।
पाँच तख़्त पर पाँच बगीचे नहर चलाये अंतर॥
काला पीला सुफ़ेत हरा नहिं कछु ज़रदे रंग का।
अखंड माधव रामभजन से महल बना बिन धोका॥
अब मत सोव दिवाने जाग
अब मत सोव दिवाने जाग।
इस देहिकु देख लागी है काल लहर की आग॥
अपनी कमाई ज़िकिर ख़ज़ाना लेकर भाईभाग।
कहत माधोनाथ गुसाईं, देख हवासिर बाग॥
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