गुरु राम दास का परिचय
गुरु राम दास (1534–1581) सिख धर्म के चौथे गुरु थे। उनका जन्म लाहौर के चूना मंडी क्षेत्र में हुआ था और बचपन का नाम जेठा था। वे भक्ति, सेवा, विनम्रता और गुरु-परंपरा के प्रमुख प्रवक्ता माने जाते हैं। उनके समय में अमृतसर के विकास को विशेष गति मिली और उन्होंने वहाँ धार्मिक तथा सामाजिक जीवन के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।
गुरु राम दास की बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। उनकी रचनाओं में गुरु-भक्ति, ईश्वर-प्रेम, नाम-स्मरण, गृहस्थ जीवन और आध्यात्मिक अनुशासन के भाव प्रमुख हैं। लावाँ उनकी सबसे प्रसिद्ध रचनाओं में हैं, जिनका सिख विवाह संस्कार में विशेष महत्व है। उनके पदों और शबदों में सरल भाषा के माध्यम से गहरे आध्यात्मिक विचार व्यक्त हुए हैं।
अब हम चली ठाकुर पहि हारि
गुरु रामदास
अब हम चली ठाकुर पहि हारि।जब हम सरणि प्रभु की आई राखु प्रभु भावै मारि॥
लोकन की चतुराई उपमा ते बैसंतरि जारि।
कोई भला कहउ भावै बुरा कहउ हम तनु दीओ है ढारि॥
जो आवत सरणि ठाकुर प्रभु तुमरी तिसु राखहु किरपा धारि।
जन नानक सरणि तुमारी हरि जीउ राखहु लाज मुरारि॥
निरगुण कथा कथा है हरि की
गुरु रामदास
निरगुण कथा कथा है हरि की॥भजु मिलि साधू संगति जन की।
तरु भउजलु अकथ सुनहरि की॥
गोविंद सतसंगति मेंलाई।
हरि रसु रसना राम गुन गाइ॥
जो जन ध्यावहिं हरि हरिनामा।
तिन दासनिदास करहु हम रामा॥
जन की सेवा उत्तम कामा॥
जो हरि की हरि कथा सुणावै।
सो जनु हमरै मनि चिति भावै॥
जन पग रेणु बड़भागी पावै॥
संत जना सिउ प्रीति बनि आई।
जिन कउ लिखतु लिखिआ धुरि पाई॥
ते जन नानक नामि समाई॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई
गुरु रामदास
तूं करता सचिआरु मैडा सांई।जो तउ भावै सोई थीसी जो तू देहि सोई हउ पाई॥
सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ।
जिसने कृपा करहि तिन नामरतनु पाइआ॥
गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ।
तुधु आपि बिछोड़िया आपि मिलाइआ॥
तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि।
तुझ बिनु दूजा कोई नाहि॥
जींअ जंत सभि तेरा खेलु।
विजोगि मिलि बिछुड़िआ संजोगी मेलु॥
जिसनो तू जाणइहि सोइ जनु जाणै।
हरिगुण सदही आखि बखाणै॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ।
सहजे ही हरिनामि समाइआ॥
तू आपे करता तेरा कीआ सभु होई।
तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ॥
तू करि-करि वेखहि जाणहि सोइ।
जन नानक गुरमुखि परगटु होइ॥
कामि करोधि नगरु बहु भरिआ
गुरु रामदास
कामि करोधि नगरु बहु भरिआ मिलि साधू खंडल खंडा हे॥पूरबि लिखत लिखे गुरु पाइआ मनिहारि लिव मंडल मंडा हे॥
करि साधू अंजुली पुनु वड्डा हे। करि डंडउत पुनु वड्डा हे॥
साकत हरिरस सादु न जाणिआ तिन अंतरि हउमै कंडा हे॥
जिउ-जिउ चलहि चुभै दुखु पावहि जमकालु सहहि सिरि डंडा हे॥
हरिजन हरि-हरि नामि समाणे दुखु जनम मरण भव खंडा हे॥
अबिनासी पुरखु पाइआ परमेसरु बहु सोभा खंडा ब्रहमंडा हे॥
हम ग़रीब मसकीन प्रम तेरे हरि राखु-राखु बड वड्डा हे॥
जन नानक नामु अधारु टेक है हरिनामे ही सुखु मंडा हे॥
सो पुरुष निरंजनु
गुरु रामदास
सो पुरुष निरंजनु हरि पुरुखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा।समि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सच्चे सिरजणहारा॥
सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दतारा।
हरि धिआवहु संतहु जी सभि दुःख विसारणहारा॥
हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा।
तू घट-घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा॥
इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा।
तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु-बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि बखाणा।
जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन कुरबाणा॥
हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु दी से जन जुग महिं सुखवासी।
से मुकतु से मुकतु भये जिन हरि धिआइआ जी तिन तूटी जम की फासी॥
जिन निरभउ हरि निरभउ धिआइआ जी तिन का भउ सभु गवासी।
जिन सेविआ जिन सेविआ मेरा हरि जी ते हरि-हरि रूपि समासी॥
से धन्नु से धन्नु जिन हरि धिआइआ जी जनु नानकु तिन बलि जासी।
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बेअंत बेअंता॥
तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता।
तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता॥
तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिमृति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता।
से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भवाहि मेरे हरि भगवंता॥
तूं आदि पुरखु अपरंपारु करता जी तुधु जे वडु अवरु न कोई।
तूं जुगु-जुगु एको सदा-सदा तूं एको जी तूं आपे करहि सु होई॥
तुधु आपे सृसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई।
जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई॥
सभि घट तेरे तू सभना माहि
गुरु रामदास
सभि घट तेरे तू सभना माहि। तुझ ते बाहरि कोई नाहि॥हरि सुखदाता मेरे मन जापु। हउ तुधु सालाही तू मेरा हरि प्रभु बापु॥
जहँ-जहँ देखा तहँ-तहँ हरि प्रभु सोइ। सभि तेरे वसि दूजा अवरु न कोइ॥
जिस कउ तुम हरि राखिआ भावै। तिस कै नेड़ै कोइ न जावै॥
तू जलि थलि महिअलि सभतै भरपूरि। जन नानक हरि जपि हाज़रा हज़ूर॥
ते साधू हरि मेलहु सुआमी
गुरु रामदास
ते साधू हरि मेलहु सुआमी, जिन जपिआ गति होइ हमारी।तिनका दरसु देखि मन बिगसै खिनु-खिनु तिनकउ हउ बलिहारी॥
हरि हिरदै जपि नामु मुरारी।
कृपा-कृपा करि जगतपति सुआमी हम दासनिदास कीजै पनिहारी॥
तिन मति ऊतम तिन पति ऊतम जिन हिरदै बसिआ बनवारी।
तिन की सेवा लाइ हरि सुआमी, तिन सिमरत गति होइ हमारी॥
जिन ऐसा सतिगुरु साधु न पाइआ ते हरि दरगह काढ़े भारी।
ते नर निंदक सोभ न पावहि तिन नककाटे सिरजनहारी॥
हरि आपि बुलावै आपे बोलै हरि आपि निरंजनु निरंकारु निराहारी।
हरि जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलसी जन नानक किआ एहिजंत विचारी॥
पंडित सासतर सिमृति पढ़िआ
गुरु रामदास
पंडित सासतर सिमृति पढ़िआ॥जोगी गोरखु-गोरखु करिआ। मैं मूरख हरि-हरि जपु पढ़िआ॥
ना जाना किआ गति राम हमारी। हरि भजु मन तेरे तरु भउजल तू तारी॥
सनिआसी बभूत लाइ सवारी। परत्रिय त्यागु करी ब्रह्मचारी॥
मैं मूरख हरि आस तुमारी॥
खत्री करम करे सुरतणु पावै। सूदु बैसु परकिरति कमावै॥
मैं मूरख हरिनामु छड़ावै॥
सभ तेरी सृसटि तूं आपि रहिआ समाई। गुरमुखि नानक दे बड़िआई॥
मैं अँधुले हरि टेक टिकाई॥
हरि राम-राम मेरे बाबोला
गुरु रामदास
हरि राम-राम मेरे बाबोला पिर मिलि धन वेल वधंदी।हरि जुगह जुगो जुग जुगह जुगो सद पीड़ी गुरु चलंदी॥
जुगि-जुगि पीड़ी चलै सतिगुर की जिनी गुरमुखि नाम धिआइआ।
हरि पुरखु न कबही बिनसै जावै नित देवै चड़ै सवाइआ॥
नानक संत-संत हरि एको जपि हरि-हरि नामु सोहंदी।
हरि राम-राम मेरे बाबुला पिर मिलि धन वेल वधंदी॥
हीरा लालु अमोलकु है
गुरु रामदास
हीरा लालु अमोलकु है भारी बिनु गाहक मीका काखा।रतनु गाहकु गुरु साधू देखिओ तब रतनु बिकानो लाखा॥
मेरै मनि गुपत हीरू हरि राखा।
दीन दइआलि मिलाइओ गुरु साधु गुरि मिलिऐ हीरु पराखा॥
मनमुख कोठी अगिआनु अँधेरा तिन घरि रतनु न लाखा।
ते ऊझड़ि भरमि मुए गावारी माइआ भुअंग बिखु चाखा॥
हरि-हरि साध मेलहु जन नीके हरि साधू सरणि हम राखा।
हरि अंगीकारु करहु प्रभ सुआमी हम परे भागि तुम पाखा॥
जिहवा किआ गुण आखि बखाणह तुम बड़ अगम बड़ पुरखा।
जन नानक हरि किरपा धारी पाखाणु डुबत हरि राखा॥
हरि के जन सतिगुर बिनउ
गुरु रामदास
हरि के जन सतिगुर बिनउ करउ गुर पासि।हम कीरे किरम सतिगुर सरणाई करि दइआ नामु परगासि॥
मेरे मति गुरदेव मोकउ राम नामु परगासि।
गुरमति नामु मेरा प्रानसखाई हरि कीरति हमरी रहरासि॥
हरिजन के वड भाग वडेरे जिन हरि-हरि सरधा हरि पिआस।
हरि-हरि नामु मिलै त्रिपतासहि मिलि संगति गुण परगासि॥
जिन हरि-हरि हरिरसु नामु न पाइआ ते भागहीण जम पासि।
जो सतिगुर सरणि संगति नही आए ध्रिगु जीवे ध्रिगु जीवासि॥
जिन हरिजन सतिगुर संगति पाई तिन धुरि मसतकि लिखिआ लिखासि।
धनु-धनु सतसंगति जितु हरिरसु पाइआ मिलि जन नानक नामु परगासि॥
हरिप्रभु मेरे बाबुला
गुरु रामदास
हरिप्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मैं दाजो।हरि कपड़ो हरि सोभा देवहु सबरै मेरा काजो॥
हरि-हरि भगती काजु सुहेला गुरि सतिगुरि दानु दिवाइआ।
खंडि वरभंडि हरि सोभा होई इहु दानु न रलै रलाइआ॥
होरि मनमुख दाजुजि रखि दिखालहि सु कूड़ अहंकारु कचु पाजो।
हरि प्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मैं दाजो॥
मुंध इआणी पईअड़ै किउकरि
गुरु रामदास
मुंध इआणी पईअड़ै किउकरि हरि दरसनु पिखै।हरि-हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कंम सिखै॥
साहुरड़ै कंम सिखै गुरमुखि हरि-हरि सदा धिआए।
सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए॥
लेखा धरमराइ की बाकी जपि हरि-हरि नामु किरखै।
मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै॥
हरि दूजड़ी लावँ सतिगुरु
गुरु रामदास
हरि दूजड़ी लावँ सतिगुरु पुरखु मिलाइआ बलि राम जी।निरभउ भै मनु होइ हउमै मैलु गवाइआ बलि राम जी॥
निरमलु भउ पाइआ हरि गुण गाइआ हरि वेखै रामु हदूरे।
हरि आतम रामु पसारिआ सुआमी सरब रहिआ भरपूरे॥
अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको मिलि हरिजन मंगल गाए।
जन नानक दूजी लावँ चलाई अनहद सबद बजाए॥
मेरो सुंदरु कहहु मिलै कितु गली
गुरु रामदास
मेरो सुंदरु कहहु मिलै कितु गली।हरि के संत बतावहु मारगु लागि चली॥
प्रिअ के वचन सुखाने हिअरै इह चाल बनी है भली।
लटुरी मधुरी ठाकुर भाई उह सुंदरि हरि ढुलि मिली॥
एको प्रिउ सखीआ सभ प्रिअ को जी भावै पिर सा भली।
नानकु ग़रीबु किआ करै बिचारा हरि भावै तितु राहि चली॥
हरि सति सते मेरे बाबुला
गुरु रामदास
हरि सति सते मेरे बाबुला हरिजन मिलि जंञ सोहंदी।पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी॥
साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पवेकड़ै नामु समालिआ।
सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ॥
हरि संतजना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी।
हरि सति सति मेरे बाबोला हरिजन मिलि जंञ सोहंदी॥
वीआहु होआ मेरे बाबुला
गुरु रामदास
वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ।अगिआनु अंधरा कट्टिआ गुर गिआनु प्रचंडु बताइआ॥
बलिआ गुरगिआनु अँधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा।
हउमै रोग गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा॥
अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ॥
वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ॥
बोलि हरि नामु सफल सो घरी
गुरु रामदास
बोलि हरि नामु सफल सो घरी। गुर उपदेसि सभि दुख परहरी॥मेरे मन हरि भजु नामु नरहरी।
करि किरपा मेलहु गुरु पूरा। सतसंगति संगि सिंधु भव तरी॥
जगजीवनु धिआइ मनि हरि सिमरी। कोट कुटंतर तेरे पाप परहरी॥
सतसंगति साध धूरि मुखि परी। इसनानु कीओ अठसठि सुरसरी॥
हम मूरख कउ हरि किरपा करी। जनु नानकु तारिओ तारण हरी॥
हरि पहिलड़ी लावँ परविरती
गुरु रामदास
हरि पहिलड़ी लावँ परविरती करम दृड़ाइआ वलि रामजी।वाणी ब्रह्मा वेदु धरमु दृड़हु पाप तजाइआ बलि रामजी॥
धरमु दृड़हु हरि नामु धिआवहु सिमृति नामु दृड़ाइआ।
सतिगुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ॥
सहज अनंदु होआ बडभागी मनि हरि-हरि मीठा लाइआ।
जनु कहै नानक लावँ पहिली आरंभु काजु रचाइआ॥
हरि तीजड़ी लावँ मनि चाउ
गुरु रामदास
हरि तीजड़ी लावँ मनि चाउ भइआ बैरागीआ बलि रामजी।संतजना हरि भेलु हरि पाइआ वड़भागीआ बलि रामजी॥
निरमलु हरि पाइआ हरिगुण गाइआ मुखि बोली हरि वाणी।
संतजना बड़भागी पाइआ हरि कथीऐ अकथ कहाणी॥
हिरदै हरि-हरि-हरि धुनि उपजी जपीऐ मसतक भागु जी।
जनु नानकु बोले तीजी लावैं हरि उपजै मनि वैरागु जी॥

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