सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गुरु तेग़ बहादुर के सबद : Guru Tegh Bahadur Ke Sabad

guru tegh bahadur
Guru Tegh Bahadur



गुरु तेग बहादुर (1621–1675) सिख धर्म के नौवें गुरु और आध्यात्मिक चिंतक थे। उनका जन्म अमृतसर में हुआ था और बचपन का नाम त्याग मल था। उनकी वाणी में वैराग्य, निर्भयता, नाम-स्मरण, संसार की नश्वरता और ईश्वर-भक्ति के भाव प्रमुख हैं। वे ध्यान, साधना और मानव-सेवा के साथ धार्मिक स्वतंत्रता तथा सत्य के लिए अपने जीवन का बलिदान देने के लिए भी स्मरण किए जाते हैं।

गुरु तेग बहादुर की बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। इसमें 15 रागों में रचित पदों के साथ 57 सलोक शामिल हैं; कुल 115 रचनाओं का उल्लेख SGPC के विवरण में मिलता है। उनकी भाषा और काव्य में गहरी आध्यात्मिक अनुभूति के साथ जीवन, मृत्यु, मोह और निर्भयता पर गंभीर चिंतन दिखाई देता है। 

  1. दिल्ली में उनसे इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया  गुरु जी ने अपना धर्म छोड़ने से इनकार किया।

  2. इसके बाद उनका सिर सार्वजनिक रूप से काट दिया गया। उनके तीन प्रमुख साथियों, भाई मती दास, भाई दयाला दास और भाई सती दास, को भी मृत्युदंड दिया गया



सभ कछु जीवत को बिउहार

गुरु तेग़ बहादुर

सभ कछु जीवत को बिउहार।
मात पिता भाई सुत बंधु अरु पुनि गृह की नार॥
तन ते प्रान होत जब निआरे टेरत प्रेत पुकार।
आध घरी कोऊ नहिं राखै घरि ते देत निकारि॥
मृगतृसना जिउ जग रचना यह देखहु रिदे विचारि।
कहु नानक भजु राम नाम नित जाते होत उद्धार॥

काहे रे, बन खोजन जाई

गुरु तेग़ बहादुर

काहे रे, बन खोजन जाई।
सरव निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई॥
पुहप मध्य जिउ बासु बसतु है, मुकुर माहिं जैसे छाई।
तैसे ही हरि बसे निरंतर, घट ही खोजहु भाई॥
बाहरि भीतरि एकै जानहु, इह गुरु गिआनु बताई।
जन नानक बिनु आया चीन्हे, मिटै न भ्रम की काई॥

मन की मन ही माहिं रही

गुरु तेग़ बहादुर

मन की मन ही माहिं रही।
ना हरि भजे न तीरथ सेए चोटी कालि गही॥
दारा मीत पूत रथ संरचि धन पूरन सभु मही।
अउर सगत मिथिआ ए जानउ भजनु राम को सही॥
फिरत-फिरत बहुते जुग हारिओ मानस देह लही।
नानक कहत मिलन की बरीआ सिमरत कहा नहीं॥

साधो, रचना राम बनाई

गुरु तेग़ बहादुर

साधो, रचना राम बनाई।
इकि बिनसै इक असथिरु मानै, अचरज लखिओ न जाई॥
काम क्रोध मोह बसि प्रानी हरि मूरति बिसराई।
झूठा तन साचा करि मानिओ जिउ सुपना रैनाई॥
जो दीसै सो सगल बिनासै, जिउ बादल की छाई।
जन नानक जग जानिओ मिथिआ, रहिओ राम सरनाई॥

कहउँ कहा अपनी अधमाई

गुरु तेग़ बहादुर

कहउँ कहा अपनी अधमाई।
उरझियो कनक कामिनी के रस नहिं कीरति प्रभु गाई॥
जग झूठे कउ साँचु जानि कै तासिउ रुचि उपजाई।
दीनबंधु सिमरिओ नहिं कबहू होत जु संगि सहाई॥
मगन रहिओ माइआ मैं निसिदिन छुटी न मन की काई।
कह नानक अब नाहि अनंत गति बिनु हरि की सरनाई॥

हरि बिनु तेरो को न सहाई

गुरु तेग़ बहादुर

हरि बिनु तेरो को न सहाई।
काकी मात पिता सुत बनिता, को काहू को भाई॥
धनु धरनी अरु संपत्ति सगरी जो मानिओ अपनाई।
तन छूटै कछु संग न चालै, कहा ताहि लपटाई॥
दीनदयाल सदा दुखभंजन ता सिउ रुचि न बढ़ाई।
नानक कहत जगत सभ मिथिआ ज्यों सुपना रैनाई॥

रे नर, इह साची जीअ धारि

गुरु तेग़ बहादुर

रे नर, इह साची जीअ धारि।
सगल जगतु है जैसे सुपना बिनसत लगत न बारि॥
बारू भीति बनाई रचि पचि रहत नहीं दिन चारि।
तैसे ही इह सुख माइआ के उरझिओ कहा गंवारि॥
अजहु समझि कछु बिगरिओ नाहिनि भजि ले नामु मुरारि।
कहु नानक इह निज मतु साधन भाखिओ तोहि पुकारि॥

मन रे, साचा गहो बिवारा

गुरु तेग़ बहादुर

मन रे, साचा गहो बिवारा।
राम नाम बिनु मिथिआ मानो सगरो इह संसारा॥
जाको जागी खोजत हारे, पाइओ नहिं तिहि पारा।
सो स्वामी तुम निकटि पछानो, रूप-रेख ते निआरा॥
पावन नाम जगत में हरि को, कबहू नाहिं संभारा।
नानक सरनि परिओ जगबंदन, राखहु बिरद तुम्हारा॥

मन रे, प्रभ की सरनि बिचारो

गुरु तेग़ बहादुर

मन रे, प्रभ की सरनि बिचारो।
जिह सिमरत गनका सी उधरी ताको जसु उर धारो॥
अटल भइऔ धूअ जाकै सिमरति अरु निरभै पदु पाइआ।
दुख हरता इह बिधि को सुआमी तै काहे बिसराइआ॥
जब ही सरनि गही किरपानिधि गज गराह ते छूटा।
महिमा नाम कहा चलउ बरनउ राम कहत बंधन तिह तूटा॥
अजामेलु पापी जगु जाने निमख माहि निसतारा।
नानक कहत चेत चिंतामनि तै भी उतरहि पारा॥

हरि के नाम बिना दुखु पावै

गुरु तेग़ बहादुर

हरि के नाम बिना दुखु पावै।
भगति बिना साहस नहिं चूकै गुरु इह भेद बतावै॥
कहा भइउ तीरअ व्रत कीए, राम सरनि नहिं आवै।
जोग जरय निहफल तिह मानौ जो प्रभ जसु बिसरावै॥
मान मोह दोनों को परहरि, गोविंद के गुन गावै।
कहु नानक इह विधि को प्रानी जीवन-मुकत कहावै॥

प्रीतम जानि लेहु मन माही

गुरु तेग़ बहादुर

प्रीतम जानि लेहु मन माहीं।
अपने सुख सिउ ही जगु फाँधिओ को काहू को नाहीं॥
सुख में आनि बहुतु मिलि बैठत रहत चहूँ दिसि घेरै।
विपति परी सभ ही सँगु छाड़त कोउ न आवत नेरै॥
घर की नारि बहुतु हितु जा सिउ सदा रहत सँग लागी।
जब ही हंस तजी इह काइआ प्रेत-प्रेत करि भागी॥
इह बिधि को बिउहारु बनिओ है जा सिउ नेहु लगाइओ।
अंति बार नानक बिनु हरि जी कोऊ काम न आइओ॥

साधो, इह तनु मिथिआ जानो

गुरु तेग़ बहादुर

साधो, इह तनु मिथिआ जानो।
इआ भीतरि जो राम बसतु है, साचो ताहि पछानो॥
इहु जग है संपति सुपने की, देखि कहा ऐंड़ानो।
संगि तिहारै कछू न चालै, ताहि कहा लपटानो॥
असतुति निंदा दोऊ परिहर हरि-कीरति उर आनो।
जन नानक सभ ही में पूरन एक पुरख भगवानो॥

भूलिओ मनु माया उरझाइओ

गुरु तेग़ बहादुर

भूलिओ मनु माया उरझाइओ।
जो-जो करम किइउ लालच लगि तिह-तिह आपु बँधाइओ॥
समझ न परी बिखै रस राचिओ जसु हरि को बिसराइओ।
संगि स्वामी सो जानिओ नाहिन बन खोजन को धाइओ॥
रतनु रामु घट ही के भीतर, ताको गिआन न पाइओ।
जन नानक भगवत भजन बिनु बिरथा जनम गवाइओ॥

इह जगि मीतु न देखिओ कोई

गुरु तेग़ बहादुर

इह जगि मीतु न देखिओ कोई।
सगल जगतु अपनै सुख लागिओ दुख में संगि न होई॥
दारा मीत पूत संबंधी सगरे धन सिव लागे।
जब ही निरधन देखिओ नरकउ संगु छाड़ि सभ भागे॥
कहउँ कहा इआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ।
दीनानाथ सगल भै भंजन जसु ताको बिसराइओ॥
सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधो बहुतु जतनु मैं कीनउ।
नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ।

जगत में झूठी देखी प्रीति

गुरु तेग़ बहादुर

जगत में झूठी देखी प्रीति।
अपने ही सुख सिउ सभ लागे, किआ दारा किआ मीत॥
मेरौ मेरौ सभै कहत हैं हित सिउ बांधिओ चीत।
अंतकाल संगी नहिं कोऊ, इह अचरज है रीत॥
मन मूरख अजहू नहिं समझत, सिखदै हारिओ नीत।
नानक भउजल-पारि परै, जो गावै प्रभु के गीत॥

हरि को नामु सुखदाई

गुरु तेग़ बहादुर

हरि को नामु सुखदाई।
जाको सिमरि अजामिल उधरिओ गनका हू गति पाई॥
पंचाली को राजसभा में रामनाम सुधि आई।
ताको दूखु हरिओ करुनामय अपनी पैज बढ़ाई॥
जिह नर जसु गाइओ किरपानिधि ताको भइओ सहाई।
कहु नानक मैं इही भरोसै गही आन सरनाई॥

माई, मनु मेरो बसि नाहिं

गुरु तेग़ बहादुर

माई, मनु मेरो बसि नाहिं।
निसबासुर बिखिअन कउ धावत किहि बिधि रोकउ ताहि॥
बेद पुरान सिमृति के मति सुनि निमख न हीए बसावै॥
परधन परदारा सिउ रचिओ विरथा जनमु सिरावै॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो सूझत नह कछु गिआना॥
घट ही भीतरि बसत निरंजनु ताको मरमु न जाना॥
जब ही सरनि साध की आइओ दुरमति सगल बिनासी॥
तब नानक चेतिओ चिंतामनि काटी जम की फांसी॥

हरि जू राषि लेहु पति मेरी

गुरु तेग़ बहादुर

हरि जू राषि लेहु पति मेरी।
जम को त्रास भइउ उर अंतरि, सरन गही किरिपानिधि तेरी॥
महा पतित मुगध लोभी फुनि, करत पाप अब हारा।
भै भरवे को विसरत नाहनि, तिह चिंता तनु जारा॥
किये उपाव मुकति के कारनि, दहदिसि कउ उठि धाइआ।
घट ही भीतरि बसै निरंजनु, ताको मरमु न पाइआ॥
नाहिन गुनु नाहिन कछु जपु-तपु, कउनु करमु अब कीजै।
नानक हारि परिउ सरनागति, अभै दानु प्रभ दीजै॥

काहे रे बन खोजन जाई

गुरु तेग़ बहादुर

काहे रे बन खोजन जाई।
सरब-निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई॥
पुहुप मध्य जिउ बासु बसतु है, मुकुर माहि जैसे छाई।
तैसे ही हरि बसे निरंतर, घट ही खोजहु भाई॥
बाहरि भीतरि एकै जानहु, इह गुरु गिआनु बताई।
जन नानक बिनु आपा चीन्हें, मिटै न भ्रम की काई॥

नर अचेत, पाप ते डरु रे

गुरु तेग़ बहादुर

नर अचेत, पाप ते डरु रे।
दीनदयाल सगल भै भंजन, सरनि ताहि तुम परु रे॥
बेद पुरान जासु गुन गावत ताको नाम हिए में धरु रे।
पावन नाम जगति में हरि को, सिमरि-सिमरि कसमल सब हरु रे॥
मानसु-देह बहुरि नहिं पावै, कछू उपाव मुक्ति को करु रे।
नानक कहत गाइ करुनामय, भवसागर के पारि उतरु रे॥

साधो कउन जुगति अब कीजै

गुरु तेग़ बहादुर

साधो कउन जुगति अब कीजै।
जाते दुरमति सकल बिनासै, रामभगति मनु भीजै॥
मनु माइआ में उरझि रहिओ है, बूझै नहिं कछु गिआना।
कउन नामु जग जाके सिमरै पावै पद निरबाना॥
भए दइआल कृपाल संतजन तब इह बात बताई।
सरब धरम मानो तिह कीये जिह प्रभ-कीरति गाई॥
रामनाम नर निसिबासुर में निमख एक उर धारै।
जम को त्रासु मिटै नानक तिह, अपुनो जनम संवारै॥

प्रानी कउनु उपाउ करै

गुरु तेग़ बहादुर

प्रानी कउनु उपाउ करै।
जाते भगति राम की पावै जम को त्रासु हरै॥
कउनु करम बिदिआ कहु कैसी धरमु कउनु फुनि करई॥
कउनु नामु गुर जाकै सिमरै भवसागर कउ तरई॥
कल में एकु नामु किरपानिधि जाहि जपै मति पावै॥
अउर धरम ताकै समि नाहिन इह बिधि बेदु बतावै॥
सुखु-दुखु रहत सदा निरलेपी जाको कहत गुसाई।
सो तुमही महि बसै निरंतरि नानक दरपनि निआई॥

जो नरु दुख में दुखु नहिं मानै

गुरु तेग़ बहादुर

जो नरु दुख में दुखु नहिं मानै।
सुख सनेहु अरु भय नहिं जाकै कंचन माटी जानै॥
नहिं निंदिया नहिं उमतति जाकै लोभु मोहु अभिमाना।
इरख सोग ते रहै निआरउ नाहिं मान अपमाना॥
आसा मनसा सगल तिआगै जगते रहै निरासा।
कामु क्रोध जिह परसैं नाहिन तिह घट ब्रहनु निवासा॥
गुर किरपा जिह नर कउ कीनी तिह इह जुगति पछानी।
नानक लीन भइओ गोविंद मिउ जिउ पानी सँगि पानी॥

अब मैं कउनु उपाउ करउँ

गुरु तेग़ बहादुर

अब मैं कउनु उपाउ करउँ।
जिह विधि मन को संसा चूकै, भउ निधि पार परउँ॥
जनमु पाइ कछु भलो न कीनो, ताते अधिक डरउँ।
मन बच क्रम हरि गुन नहिं गाए, यह जिअ सोच धरउँ॥
गुर मति सुनि कछु गिआनु न उपजिउ, पसु जिउँ सोच भरउँ।
कहु नानक प्रभु बिरदु पछानउँ, तत्र हउँ पतित तरउँ॥

जामें भजनु राम को नाहीं

गुरु तेग़ बहादुर

जामें भजनु राम को नाहीं।
तिह नर जनम अकारथ खोइउ इह राखहु मन माहीं॥
तीरथ करै बिरत पुनि राखै, नहिं मनुवा बसि जाको।
निहफल धरम ताहि तुम मानो सांचु कहत मैं याको॥
जैसे पाहन जल महि राखिउ भेदै नहिं तिहि पानी।
तैसे ही तुम ताहि पछानो भगतिहीन जो प्रानी॥
कलि में मुकति नाम ते पावत गुर इह भेद बतावै।
कहु नानक सोई नरु गरुआ जो प्रभ के गुन गावै॥

माई मैं धनु पाइओ हरि नामु

गुरु तेग़ बहादुर

माई मैं धनु पाइओ हरि नामु।
मनु मेरो धावनते छूटिओ, करि बैठो बिसरामु॥
माइआ ममता तन ते भागी, उपजिउ निरमल गिआनु।
लोभ मोह एह परसि न साकै, गही भगति भगवान॥
जनम-जनम का संसा चूका, रतनु नामु जब पाइआ।
त्रिसना सकल बिनासी मन ते, निजसुख माहिं समाइआ॥
जाकउ होत दइआलु किरपानिधि, सो गोबिंद गुन गावै।
कहु नानक इह विधि की संपै, कोऊ गुरमुखि पावै॥

प्रानी कउ हरिजसु मनि नहिं आवै

गुरु तेग़ बहादुर

प्रानी कउ हरिजसु मनि नहिं आवै।
अहनिसि मगनु रहै माइआ में कहु कैसे गुन गावै॥
पूत मीत माइआ ममता सिउ इहु विधि आपु बँधावै।
मृगतृसना जिउ झूठो इह जगु देखि ताहि उठि धावै॥
भुगति मुकति को कारनु स्वामी मूढ़ ताहि बिसरावै।
जन नानक कोटिन में कोऊ भजनु राम को पावै॥

रे मन, राम सिउ करि प्रीति

गुरु तेग़ बहादुर

रे मन, राम सिउ करि प्रीति।
स्रवन गोविंद गुनु सुनउ अरु गाउ रसना गीति॥
करि साध संगति सिमरु माधो होहि पतित पुनीति।
कालु-बिआलु जिउ परिओ डोलै मुखु पसारे मीति॥
आजु कालि पुनि तोहि ग्रसि है समझि राखउ चीति।
कहै नानकु रामु भजिलै जातु अउसरु बीति॥

राम सिमर राम सिमर

गुरु तेग़ बहादुर

राम सिमर राम सिमर इहै तेरौ काज है।
माइआ को संगु तिआगि, प्रभजु की सरनि लागि,
जगत सुख मानु मिथिआ, झूठो सब साजु है॥
सुपने जिउ धनु पिछानु, काहे पर करत मानु,
बारू की भीत जैसे बसुधा को राजु है।
नानक जन कहत बात बिनसि जैहै तेरो गात,
छिनु-छिनु करि गइओ कालु तैसे जातु आतु है॥

साधो, मन का मान तिआगो

गुरु तेग़ बहादुर

साधो, मन का मान तिआगो।
काम क्रोध संगति दुरजन की, ताते अहनिसि भागो॥
सुखु दुखु दोनों सम करि जानै, औरु मानु अपमाना।
हरख-सोग ते रहै अतीता, तिनि जगि तत्तु पछाना।
असतुति निंदा दोऊ त्यागै, खोजै पदु निरवाना।
जन नानक इहु खेलु कठन है, किनहू गुरमुखि जाना॥

टिप्पणियाँ

Popular

Rajasthani Lokgeet Lyrics in Hindi राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स

 घूमर गीत राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने काजळ टिकी लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने रमता ने लाडूङो लादयो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने परदेशियाँ मत दीजो रे माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ म्हाने राठोडा रे घर भल दीजो ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हाने राठोडा री बोली प्यारी लागे ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवा म्हें जास्यां ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ... इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा राजस्थानी लोकगीत लिरिक्स हिंदी  इण लहेरिये रा नौ सौ रुपया रोकड़ा सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बाईसा रा बीरा लहेरियो सा म्हाने ल्याईदो ल्याईदो ल्याईदो ढोलालहेरियो सा म्हाने ल्याईदो नी बादिला ढोला लहेरियो सा म्हारा सुसराजी तो दिल्ली रा राजवी सा म्हारा सासूजी ...

कुमार विश्वास की कविताएँ | Kumar Vishwas Kavita – कोई दीवाना कहता है

कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिअखुआ (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाईयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा लाला गंगा सहाय स्कूल, पिलखुआ में प्राप्त की। उनके पिता डा चन्द्रपाल शर्मा आर एस एस डिग्री कालेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कालेज से बारहवीं में उनके उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डा कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढाई में नहीं रमा, और उन्होंने बीच में ही वह पढाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्प्श्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएचडी प्राप्त किया। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया। पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'इक पगली लड़की के बिन' (1996) और 'कोई दीवाना कहता है' (2007 और 2010 दो...

देशभक्ति कविताओं का कोश – भाग 3 | Deshbhakti Kavita Sangrah 3

 उठो धरा के अमर सपूतों -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी/देशभक्ति की कविता उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नव स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नई प्रात है नई बात है नया किरन है, ज्योति नई। नई उमंगें, नई तरंगें नई आस है, साँस नई। युग-युग के मुरझे सुमनों में नई-नई मुस्कान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।1।। डाल-डाल पर बैठ विहग कुछ नए स्वरों में गाते हैं। गुन-गुन, गुन-गुन करते भौंरें मस्त उधर मँडराते हैं। नवयुग की नूतन वीणा में नया राग, नव गान भरो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।2।। कली-कली खिल रही इधर वह फूल-फूल मुस्काया है। धरती माँ की आज हो रही नई सुनहरी काया है। नूतन मंगलमय ध्वनियों से गुँजित जग-उद्यान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।3।। सरस्वती का पावन मंदिर शुभ संपत्ति तुम्हारी है। तुममें से हर बालक इसका रक्षक और पुजारी है। शत-शत दीपक जला ज्ञान के नवयुग का आह्वान करो। उठो, धरा के अमर सपूतों। पुन: नया निर्माण करो।।4।। -द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी ऐ मेरे वतन के लोगों- प्रदीप/देशभक्ति कविता ऐ मेरे वतन के लोगो...

देशभक्ति कविताओं का कोश - भाग 2 | Deshbhakti Kavita Sangrah 2

 आज जीत की रात- गिरिजाकुमार माथुर/देशभक्ति कविता आज जीत की रात पहरुए! सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना २ प्रथम चरण है नये स्वर्ग का है मंज़िल का छोर इस जन-मंथन से उठ आई पहली रत्न-हिलोर अभी शेष है पूरी होना जीवन-मुक्ता-डोर क्यों कि नहीं मिट पाई दुख की विगत साँवली कोर ले युग की पतवार बने अंबुधि समान रहना। ३ विषम शृंखलाएँ टूटी हैं खुली समस्त दिशाएँ आज प्रभंजन बनकर चलतीं युग-बंदिनी हवाएँ प्रश्नचिह्न बन खड़ी हो गयीं यह सिमटी सीमाएँ आज पुराने सिंहासन की टूट रही प्रतिमाएँ उठता है तूफान, इंदु! तुम दीप्तिमान रहना। ४ ऊंची हुई मशाल हमारी आगे कठिन डगर है शत्रु हट गया, लेकिन उसकी छायाओं का डर है शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है किन्तु आ रहा नई ज़िन्दगी यह विश्वास अमर है जन-गंगा में ज्वार, लहर तुम प्रवहमान रहना पहरुए! सावधान रहना।। गिरिजाकुमार माथुर   चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण,- सुमित्रानंदन पंत/देशभक्ति कविता १५ अगस्त १९४७ चिर प्रणम्य यह पुण्य अह्न जय गाओ सुरगण, आज अवतरित हुई चेतना भू पर नूतन! नवभारत, फिर चीर युगों का तिमिर आवरण, तरुण अरुण-सा उदित हुआ परि...

बुन्देली गारी गीत लोकगीत लिरिक्स Bundeli Gali Geet Lokgeet Lyrics

 खोय देत हो जीवन बिना काम के भजन करो कछु राम के / बुन्देली लोकगीत  खोय देत हो जीवन बिना काम के, भजन करो कछु राम के। जी बिन देह जरा न रुकती, चाहो अन्त समय में मुक्ती ऐसी करो जतन से जुक्ती, ध्यान करियों सबेरे न तो शाम के। भजन... लख चौरासी भटकत आये, मानुष देह कठिन से पाये, फिर भी माने न समुझायें, गलती चक्कर में फंसे बिना राम के। भजन... ईश्वर मालिक से मुंह फेरे, दिल से नाम कभऊं न टेरे, वन के नारि कुटुम्ब के चेरे, कोरी ममता में फंसे इते आन के। भजन... छोड़ो मात पिता और भ्राता, जो हैं तीन लोक के दाता, करियो उन ईश्वर से नाता, क्षमा करिहें अपराध अपना जान के। भजन... गगा को मान बड़ा भारी / बुन्देली लोकगीत  गंगा को मान बड़ा भारी, चलो बहनों मुक्ती सुधारी। तारन के लाने सहज में न आई, तप करके भागीरथ निकारी। चलो दीदी.... गंगा की धार शम्भू रोकी जटन में भोला शिवत्रिपुरारी। चलो दीदी.... तीरथ व्रत ऐसे चारों तरफ हैं गंगा की महिमा है न्यारी। चलो दीदी.... जावे के लाने कछु अड़चन नैयां दिन भर चले मोटर गाड़ी। चलो दीदी.... गंगा जी जावें परम गति पावें मन में विश्वास करो भारी। चलो दीदी.... ग...