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वेणी के सबद : Veni Ke Sabad

संत वेणी मध्यकालीन संत-काव्य के उन कवियों में हैं जिनके जीवन से अधिक उनकी उपलब्ध वाणी महत्वपूर्ण है। उनके जन्मस्थान और निश्चित काल के बारे में विद्वानों में एकमत नहीं है, हालांकि उन्हें गुरु नानक के आसपास के समय का संत माना जाता है। गुरु ग्रंथ साहिब में उनके तीन पद सुरक्षित हैं, जिनसे उनके आध्यात्मिक चिंतन का परिचय मिलता है।

वेणी के पदों में साधना, गुरु-ज्ञान, आत्मचिंतन और ईश्वर-स्मरण के साथ योगपरक शब्दावली का भी प्रयोग हुआ है। इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना जैसे संकेतों के माध्यम से उन्होंने बाहरी तीर्थ के बजाय मनुष्य के भीतर स्थित आध्यात्मिक अनुभव की ओर ध्यान दिलाया। उनके काव्य में अनहद नाद और अंतर्मुखी साधना की चर्चा भी मिलती है। भाषा और विचार दोनों स्तरों पर संत वेणी की रचनाएँ मध्यकालीन संत परंपरा और नाथ-योग की धारणाओं के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी दिखाई देती हैं।

तनि चंदनु मसतकि पाती

तनि चंदनु मसतकि पाती, रिद अंतरि करतल काती।

ठग दिसटि वगा लिव लागा, देषि वैसिनो प्रान मुष भागा॥

कलि भगवत बंद चिरामं, क्रूर दिसटि रता निसि बादं॥

नित प्रति इसनानु सरीरं, दुइ धोती करम मुषि पीरं।

रिदै छुरी संधिआनी, पर दरबु हिरन की बानी॥

सिल पूजसि चक्र गणेसं, निसि जागसि भगति प्रवेसं।

पग नाचसि चितु अकरमं, ए लंपट नाच अधरमं॥

म्रिग आसण तुलसी माला, कर ऊजल तिलकु कपाला।

रिदे कूड़ु कंठि रुद्राषं, रे लंपट क्रिसनु अभाषं॥

जिनि आतम ततु न चीन्हिआ, सभ फोकट धरम अबीनिया।

कहु वेणी गुरमुषि धिआवै, बिनु सतिगुर बाट व पावै॥

इड़ा पिंगुला अउर सुषुमना

इड़ा पिंगुला अउर सुषुमना, बसहिं इक ठाईं।

वेणी संगमु तंह पिरागु, मनु भजनु करे तिथाई॥

संतहु तहाँ निरंजनु रामु है, गुरगमि चीन्है बिरला कोइ।

तहा निरंजनु रमईआ होइ॥

देवसथानै किआ नीसाणी, तहँ बाजे सबद अनाहद वाणी।

तहँ चंदु न सूरज पउण न पाणी, साषी जागी गुरमुषि जाणी॥

उपजै गिआनु दुरमति छीजै, अंम्रित रस गगनंतरि भीजै।

एसु कला जो जाणै भेउ, भेटै तासु परम गुरदेउ॥

दसम दुआरा अगम अपारा, परम पुरष की घाटी।

ऊपरि हाट-हाट परि आला, आले भीतरि थाती॥

जागतु रहै सु कबहू न सोवै, तीन तिलोक समाधि पलोवै।

बीज मंत्र लै हिरदे रहै, मनूआ उलटि सुन महि गहै॥

जागतु रहै सु अलीआ भाषै, पाँचउ इंद्री वसि करि राषै।

गुर की साषी राषै चीति, मनु तनु अरपे क्रिसन परीति॥

कर पलव साषा बीचारे, अपना जनमु न जूऐ हारे।

असुर नदी का बंधै मूलु, पछिम फेरि चडावे सूरु।

अजरु जरे सु निझरु झरै, जगंनाथ सिउ गोसटि करै॥

चउ मुष दीवा जोति दुआर, पलू अनंत मूलु विचकार।

सरब कला ले आये रहै, मनु माणकु रतना महि गुहै॥

मसतकि पदमु दुआलै मणी, माहि निरंजनु त्रिभवण धणी।

पंच सबद निरमाइल बाजै, ढुलके चंवर संष घन गाजे।

दलि मलि दैतहु गुरमुषि गिआनु, बेणी जाचै तेरा नामु॥

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