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संत सालिगराम के सबद : Sant Saligram Ke Sabad

सालिग्राम (1829–1898) राधास्वामी सत्संग के दूसरे गुरु और संत-कवि थे। उनका संबंध आगरा से था। आध्यात्मिक साधना और सत्संग के अनुभवों को उन्होंने पद, सबद और दोहों के माध्यम से व्यक्त किया। उनकी कविता में गुरु के प्रति समर्पण, प्रेम, विरह, नाम-स्मरण तथा भीतर की साधना का विशेष महत्व दिखाई देता है।

सालिग्राम की रचनाओं में ‘सुरत’ और ‘शब्द’ की साधना बार-बार सामने आती है। वे मनुष्य को बाहरी भटकाव से हटाकर गुरु की शरण, सत्संग और आत्मिक अनुभव की ओर ले जाने की बात कहते हैं। ‘पिया मेरे और मैं पिया की’ जैसे दोहों में ईश्वर के साथ आत्मीय संबंध का भाव मिलता है, जबकि अनेक सबदों में अनहद नाद, गुरु-प्रेम और आध्यात्मिक यात्रा का वर्णन है। उनकी भाषा अपेक्षाकृत सीधी और बोलचाल के निकट है, जिससे कठिन साधना-विषय भी सहज रूप में सामने आते हैं।

अधर चढ़ परख शब्द की धार

अधर चढ़ परख शब्द की धार।

गुरु दयाल तोहि मरम लखावें, बचन सुनो उन हिये धर प्यार॥

बिरह अंग लेकर अभ्यासा, खोज करो तुम घट धुन सार।

गुरु स्वरूप को अगुआ करके, धुन सुन चलो कंज के पार॥

सहस कंवल में घंटा बाजे, गगन माहिं सुन धुन ओंकार।

सुन्न शिखर चढ़ं महां सुन्न पर, भंवर गुफा मुरली झनकार॥

सत शब्द का धरकर ध्याना, सत्त लोक धुन बीन सम्हार।

अलख अगम के पार निसाना, राधास्वामी प्यारे का कर दीदार॥

प्रेम बिन चले न घर की चाल

प्रेम बिन चले न घर की चाल।

सतसंग करे समझ तब आवे, गुरु चरनन में प्रीत सम्हाल॥

गुरु भक्ति की रीत सम्हारे, छोड़े जग की चाल औ ढाल।

गुरु स्वरूप का धारे ध्याना, शब्द सुने तज माया ख़याल॥

घट में देखे बिमल प्रकासा, मगन होय सुन शब्द रसाल।

प्रीत प्रतीत बढ़े तब दिन-दिन, पावे राधास्वामी दरस बिसाल॥

झूलत घट में सुरत हिंडोला

झूलत घट में सुरत हिंडोला। बाजत अनहद शब्द अमोला॥

धुन की डोरी लगी अधर में। सुरत निरत रहि झांक अधर में॥

सखी सहेली सब संग आईं। गगन मंडल में उंमग समाई॥

अमीधार बरसत चहुं ओरी। हरष-हरष भीजत स्रुत गोरी॥

हंस-हंसिनी जुड़ मिल आये। राग-रागिनी नइ-नइ गाये॥

देख नवीन बिलास मगन मन। ऊपर चढे सुन अधर शब्द धुन॥

शब्द हिंडोल बना सतपुर में। राधास्वामी झूलत जहाँ अधर में॥

हंसन के जह झुंड सुहाये। अचरज सोभा कही न आये॥

जुड़ मिल दर्शन राधास्वामी करते। प्रीतम प्यारे के चरनन पड़ते॥

प्रेम सहित सब आरत गावे। छिन-छिन राधास्वामी पुर्ष रिझावें॥

रंगीले रंग देओ चुनर हमारी

रंगीले रंग देओ चुनर हमारी।

ऐसा रंग रंगी किरपा कर, जग से हो जाय न्यारी॥

यह मन नित्त उपाय उठावत, याको गढ़ लो सारी।

निर्मल होय प्रेम रंग भींजे, जावे गगन अटारी॥

तुम्हरी दया होय जब भारी, सुरत अगम पद धारी।

राधास्वामी प्यारे मेहर करो अब, जल्दी लेव सुधारी॥

गुरु प्यारे का मारग झीना

गुरु प्यारे का मारग झीना, कोई गुरुमुख जाय।

मन इंद्री को रोक अंदर में, भोग बासना दूर हटाय, मन मान नसाय॥

सतगुरु प्रेम भींज रहे निसदिन, नया-नया भाव औ उमंग जाय, गुरु सेवा लाय।

होय हुशियार चलत गुरु मारग, घट में विमल बिलास दिखाय, गुरु ध्यान धराय॥

तन-मन-धन चरनन पर बारत, मन औ सूरज गगन चढ़ाय, घट शब्द जगाय।

करम काट गुरु बल चली आगे, माया दल भी दूर पराय, दिया काल गिराय॥

ऐसी सुरत गुरु चरन अधीनी, सुर होय सत शब्द समाय, धुन बीन बजाय।

मेहर हुई सुरत अधर सिधारी, राधास्वामी दिया निज घर पहुँचाय, लिया गोद बिठाय॥

सतगुरु पूरे परम उदारा

सतगुरु पूरे परम उदारा। दया दृष्टि से मोहिं निहारा॥

दूर देश से चलकर आया। दरशन कर मन अति हरखाया॥

सुन-सुन बचन प्रीत हिय जागी। चरन सरन में सूरत पागी॥

करम भरम संशय सब भागा। राधास्वामी चरन बढ़ा अनुरागा॥

सुरत शब्द मारग दरसाया। बिरह अंग ले ताहि कमाया॥

कुल कुटुंब का मोह छुड़ाना। सतसंगत में मन ठहराना॥

सुमिरन भजन रसीला लागा। सोता मन धुन सुन कर जागा॥

मेहर हुई स्रुत नभ पर दौड़ी। त्रिकुटी जा गुर चरनन जोड़ी॥

अचरज लीला देखी सुन में। मुरली धुन अब पड़ी श्रवन में॥

पहुँची फिर सतगुरु दरबारा। अलख अगम को जाय निहारा॥

वहाँ से भी फिर अधर सिधारी। मिल गए राधास्वामी पुरुष अपारी॥

वहाँ जाय कर आरत गाई। पूरन दया सामने पाई॥

मन-मन धुन से भक्ति करो री

मन-मन धुन से भक्ति करो री।

कोरी भक्ति काम नहिं आवे, याते हिये में प्रेम भरो री॥

परम पुरुष राधास्वामी चरनन में, औ सतसंग में प्रीत धरो री।

दया करें गुरु भेद बतावें, तब धुन संग सुरत अधर चढ़ो री॥

दीन ग़रीबी धार हिये में, उमंग-उमंग गुरु चरन पड़ो री।

राधास्वामी मेहर करें अब अपनी, भव सागर से सहज तरो री॥

प्रेमी लीजे रे सुध घर की

प्रेमी लीजे रे सुध घर की, गुरुसंग शब्द कमाय॥

शब्द धार धुर घर से आई, वही धार गह अधर चढ़ाय।

वही धार गुरु चरन कहावे, वामें गहरी प्रीति बसाय॥

गुरु स्वरूप को संग ले अपने, शब्द-शब्द से मिलना जाय।

या विधि चाल चले जो कोई, दिन-दिन चरन प्रेम बढ़ाय॥

घट में लीला लखै नियारी, नित नवीन रस आनंद पाय।

चढ़-चढ़ पहुँचे राधास्वामी धामा, दरस पाय निज भाग सराय॥

आओ गुरु दरबार री

आओ गुरु दरबार री, मेरी प्यारी सुरतिया॥

जगत अगिन में क्यों तू जलती, न्हावो शीतल धार री।

सतसंग करु गुरु का हित चित से, जग भय भाव बिसार री॥

बिरह अनुराग धार हिये अंतर, तन मन चरनन बार री।

नाम दान सतगुरु से लेकर, करनी करो सम्हार री॥

विमल प्रकाश लखो घट अंतर, सुन अनहद झंकार री।

राधास्वामी सरन धार हिये अपने, करले जीव उपकार री॥

अमी की बरखा हुई भारी

अमी की बरखा हुई भारी। भींज रही अतर सुत प्यारी॥

सजी जहँ-तहँ कंवलन क्यारी, शब्द गुल फूली फुलवारी॥

वासना त्यागी संसारी। मगन होय चढ़त अधर प्यारी॥

गगन गुरु दरसन कीना री। हुआ मन चरन अधीना री॥

सुन्न चढ निरखी उजियारी। मिली हंसन संग कर यारी॥

भंवर धन लाग रही तारी। मिला फिर सत्त शब्द सारी॥

दया राधास्वामी को भारी। सिरन दे चरन लगाया री॥

आज घिर आये बादल कारे

आज घिर आये बादल कारे, गरज-गरज घन गगन पुकारे॥

रिमझिम बरसत बूँद अमी की, बिजली चमक घट नैन निहारे।

चहुं दिस बरखा होवत भारी, भीज रही सुरत सुन झनकारे॥

उमंग-उमंग सुरत चढ़त अधर में, निरख रही घट जोत उजारे।

घंटा संख धूम अब डाली, बंकनाल धस हो गई पारे॥

गुरु दरशन कर अति हरखानी, पहुँची जाय सुन्न दस द्वारे।

सत्त पुरुष के चरन परस कर, राधास्वामी अचरज दरस निहारे॥

गुरु प्यारे चरन रचना की जान

गुरु प्यारे चरन रचना की जान।

आदि धार चेतन जो निकसी, उसने रची सब रचना आन॥

वही धार गुरु चरन पिछानो, वही पिंड ब्रह्मांड समान।

उसी धार का सकल पसारा, वोही धुन औ नाम कहान॥

जुगती ले गुरु से सुर्त अपनी, उसी धार को पकड़ चढ़ान।

राधास्वामी मेहर करें जब अपनी, निज स्वरूप बट में दरसान॥

बोल री मेरी प्यारी मुरलिया

बोल री मेरी प्यारी मुरलिया, तरस रही मेरी जान मुरलिया॥

सुन-सुन धुन मन उमंगत घट में, और शिथिल हुए प्रान मुरलिया॥

रस भरे बोल सुने जब तेरे, गया कलेजा छान मुरलिया॥

तन मन की सब सुद्ध बिसारी, धुन में चित्त समान मुरलिया॥

राधास्वामी दया अधर चढ़ आई, सतपद दरस दिखान मुरलिया॥

जगत में खोज किया बहु भांत

जगत में खोज किया बहु भांत। न पाई मैंने घट में शांत॥

गौर कर देखा जग का हाल। फंसे सब करम भरम के जाल॥

फैल रहे जग में मते अनेक। धार रहे थोथे इष्ट की टेक॥

भेद कोई घर का नहिं जाने। भरम बस सीख नहीं माने॥

मान में खप रहे पंडित भेख। कर्म में बंध रहे मुल्ला शेख॥

भाग मेरा जागा अजब निदान। मिला मैं राधास्वामी संगत आन॥

सुनी मैं महिमा अचरज बोल। करी मैं राधास्वामी मत की तोल॥

भरम और संशय उठ भागे। विरह अनुराग हिये जागे॥

पता निज मालिक का पाया। भेद निज घर का दरसाया॥

समझ में आई भक्ति रीत। शब्द की धारी मन परतीत॥

सुरत का पाया अजब लखाव। सिफ़त सुन गुरु की बाढा भाव॥

कहूँ क्या महिमा सतसंग सार। भरम और संशय दीने टार॥

प्रीत नित बढ़ती गुरु चरना। धार लई मन में गुरु सरना॥

समझ मैं मन में अस धारी। संत बिन जाय न कोई पारी॥

बना उन सरन न उतरे पार। शब्द बिन होय न कभी उद्धार॥

सराहूं छिन-छिन भाग अपना। मिला मोहि सुरत शब्द गहना॥

हुआ मेरे हिरदे में उजियार। दया राधास्वामी कीन्ह अपार॥

पकड़ धुन चढ़ता नभ की ओर। जोत लख सुनता अनहद घोर॥

सुन्न धुन सुनकर चढ़ी आगे। गुफा में जहां सोहंग जागे॥

सत्तपुत दरश पुरुष कीन्हा। परे तिस अलख अगमि चीन्हा॥

वहाँ से लखिया राधास्वामी धाम। मिला अब निज घर किया बिस्राम॥

होली खेल न जाने बावरिया

होली खेल न जाने बावरिया, सतगुरु को दोष लगावे॥

जगत लाज मरजाद में अटकी, घूंघट खोल न आवे।

प्रेम रंग घट भरन न जाने, भरम गुलाल घुलावे॥

डगमग भक्ति चाल अनेड़ी, जग संग झोंके खावे।

निंदा धूल से उड़-उड़ भागे, सतसंग निकट न आवे॥

पांच दृष्ट का रंग ले साथा, नित पिचकार छुड़ावे।

आदर मान भरा भीतर, दीन अंग नहिं लावे॥

बचन सुने पर चित न समावे, छिन-छिन काल भुलावे।

मन माया ने जाल बिछाया, सब जिव नाच नचावे॥

दया करें सतगुरु मन मोड़ें, सो घर की राह पावे।

प्रीत-प्रतीत बढ़ावत दिन-दिन, राधास्वामी चरन समावे॥

मेरी उठी कलेजे पीर घनी

मेरी उठी कलेजे पीर घनी॥

बिन दरसन जियरा नित तरसे, चरन ओर रहे दृष्टि तनी।

नित्त पुकार करूं चरनन में, दरस देव मेरे पूरन धनी॥

घट का पाट खोलिये प्यारे, जल्दी करो हुई देर घनी।

जब लग दरस न पाऊं घट में, तब लग नहिं मेरी बात बनी॥

हरष हुलास न आवे मन में, चिंता में रहे बुद्धि सनी।

अब तो मेहर करो राधास्वामी, चरनन की रहूं सदा रिनी॥

प्रेम भक्ति गुरु धार हिये में

प्रेम भक्ति गुरु धार हिये में, आया सेवक प्यारा हो।

उमंग-उमंग कर तन-मन-धन को, गुरु चरनन पर वारा हो॥

गुरु दरसन कर बिगसत मन में, रूप हिये में धारा हो।

आठ पहर गुरु संग रहावे, जग से रहता न्यारा हो॥

मन माया को आँख दिखावे, गुरुबल सूर करारा हो।

शब्द डोर गह चढ़ता घट में, पहुँचा गगन मंझारा हो॥

आगे चल सुनी सारंग किंगरी, मुरली बीन सितारा हो।

राधास्वामी मेहर से दीन्हा, निज पद अगम अपारा हो॥

सुरतिया लाल हुई

सुरतिया लाल हुई, चढ़ गगन निरख गुरु रूप॥

घंटा संख गरज धुन सुनकर, छोड़ दिया भौकूप।

आसा तृष्णा मंसा जग की, फटक दई ले गुरु का सूप॥

सुन्न और महासुन्न के पारा, निरखा सूरज सेत स्वरूप।

सत्त पुरुष का दर्शन करके, पहुँची राधास्वामी धाम अनूप॥

भोग वासना मन में धरी

भोग वासना मन में धरी, मोसे सतसंग किया न जाय।

मैं चाहूँ छोडूँ भोगन को, देख भोगन अति ललचाय॥

सतसंग बचन सुनूं मैं कैसे, मन रहे अनेक तरंग उठाय।

चित चंचल मेरा चहूँ दिस धावे, सुरत शब्द में नहीं समाय॥

निरभय होय भरमे संसारा, नई कामना नित जगाय।

बिन राधास्वामी अब कोइ नहिं मेरा, जो यह बेड़ा पार लगाय॥

सावन मास मेघ घिर आये

सावन मास मेघ घिर आये। गरज-गरज धुन शब्द सुनाये॥

रिमझिम बरखा होवत भारी। हिय बिच लागी बिरह कटारी॥

प्रीतम छाय रहे परदेसा। बूझत रही नहि मिला संदेसा॥

रैन दिवस रहूं अति घबराती। कसक-कसक मेरी कसके छाती॥

कासे कहूं कोइ दरद न बूझै। बिन पिय दरस नहीं कुछ सूझै॥

चमके बीज तड़प उठे भारी। कस पाऊं पिया प्रान अधारी॥

रोवत बीते दिन और राती। दरद उठत हिये में बहु भांती॥

ढूंढत-ढूंढत बन-बन डोली। तब राधास्वामी की सुन पाई बोली॥

प्रीतम प्यारे का दिया संदेसा। शब्द पकड़ जाओ उस देसा॥

सुरत शब्द मारग दरसाया। मन और सुरत अधर चढ़वाया॥

कर सतसंग खुले हिये नैना। प्रीतम प्यारे के सुने वहीं बैना॥

जब पहिचान मेहर से पाई। प्रीतम आप गुरु बन आई॥

दया करी मोहि अंग लगाया। दुक्ख दरद सब दूर हटाया॥

क्या महिमा राधास्वामी गाऊं। तन मन वारूं बल-बल जाऊं॥

भागे जगे गुरु चरन निहारे। अब कहूँ धन-धऩ राधास्वामी प्यारे॥

सखी री मेरे बिच अचरज होय

सखी री मेरे बिच अचरज होय।

अचरज अचरज अचरज होय॥

सांचा मारग सुरत शुब्द का, सो नहिं माने कोय।

समरथ सतगुरु दीन दयाला, राधास्वामी प्रगटे सोय॥

प्रीत प्रतीत चरन नहिं धारे, भरम रहे सब लोय।

जनम मरन चौरासी फेरा, भुगत रहे सब कोय॥

करम भरम संग हुए बावरे, जनम अकारथ खोय।

राधास्वामी चरन धार हिये अंतर, तब तेरा कारज होय॥

सुरतिया मनन करत

सुरतिया मनन करत, सत गुरु के अचरज बोल॥

जो-जो बचन सुनत सतसंग में सबकी करती तोल।

सार निकार हिये बिच धारा, सुरत शब्द मारग अनमोल॥

चढ़त अधर में निरख अधर में, छांट रही घट धन को रोल।

राधास्वामी जैसी दिखाई लीला, कासे कहूँ मैं उसको खोल॥

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