संत दरिया (मारवाड़ वाले) के सबद : Sant Dariya (Marwar Wale) Ke Sabad
संत दरिया (मारवाड़ वाले) का समय 1676 से 1758 माना जाता है। वे मारवाड़ की निर्गुण संत परंपरा से जुड़े ऐसे कवि थे, जिनकी रचनाओं में साधना के साथ प्रेम और विरह की अनुभूति भी गहराई से व्यक्त हुई है। उनका संबंध पाली और मेड़ता क्षेत्र से रहा। लोक-परंपरा में उन्हें संत दादू दयाल का अवतार भी माना गया है।दरिया साहब की वाणी में राम-नाम, सतगुरु की महिमा, माया से मुक्ति और आत्मिक जागरण जैसे विषय अलग-अलग प्रतीकों के माध्यम से सामने आते हैं। ‘साधो ऐसी खेती करई’, ‘संतो कहा गृहस्त कहा त्यागी’ और ‘चल चल रे हंसा राम सिंध’ जैसे सबद उनके आध्यात्मिक चिंतन की झलक देते हैं। उनकी भाषा सहज और लोक के निकट है, जिससे गूढ़ साधना-विचार भी सामान्य पाठक तक आसानी से पहुँचते हैं।
जो धुनियाँ तौ भी मैं राम तुम्हारा
जो धुनियाँ तौ भी मैं राम तुम्हारा।
अधम कमीन जाति मतिहीना, तुम तो हौ सिरताज हमारा॥
काया का जंत्र सब्द मन मुठिया, सुषमन ताँत चढ़ाई।
गगन मंडल में धुनुआँ बैठा, मेरे सतगुर कला सिखाई॥
पाप पान हर कुबुध काँकड़ा, सहज-सहज झड़ जाई।
घुंडी गाँठ रहन नहिं पावै, इकरंगी होय आई॥
इकरँग हुआ भरा हरि चोला, हरि कहै कहा दिलाऊँ।
मैं नाहीं मेहनत का लोभी, बकूसी मौज भक्ति निज पाऊँ॥
किरपा कर हरि बोले बानो, तुम तौ हौ मम दास।
दरिया कहै मेरे आतम भीतर, मेलौ राम भक्ति बिस्वास॥
दुनियाँ भरम भूल बौराई
दुनियाँ भरम भूल बौराई।
आतम राम सकल घट भीतर, जा की सुद्ध न पाई॥
मथुरा कासी जाय द्वारिका, अरसठ तीरथ न्हावै।
सतगुरु बिन सोधा नहिं कोई, फिर-फिर गोता खावै॥
चेतन मूरत जड़ को सेवै, बड़ा थूल मत गैला।
देह अचार किया कहा होई, भीतर है मन मैला॥
जप तप संजम काया कसनी, सांख जोग ब्रत दाना।
या तें नहीं ब्रह्म से मेला, गुन हर करम बँधाना॥
बकता होय-होय कथा सुनावै, स्रोता सुन घर आवै।
ज्ञान ध्यान की समझ न कोई, कह सुन जनम गँवावै॥
जन दरिया यह बड़ा अचंभा, कहे न समझै कोई।
भेड़ पूंछ गहि सागर लाँघै, निस्चय डूबै सोई॥
संतो कहा गृहस्त कहा त्यागी
संतो कहा गृहस्त कहा त्यागी।
जेहि देखूं तेहि बाहर भीतर, घट-घट माया लागी॥
माटी की भीत पवन का थंबा, गुन औगुन से छाया।
पाँच तत्त आकार मिलाकर, सहजाँ गिरह बनाया॥
मन भयो पिता मनसा भइ माई, दुख-सुख दोनों भाई।
आसा त्रस्ना बहिनें मिलकर, गृह की सौंज बनाई॥
मोह भयो पुरुष कुबुध भइ घरनी, पाँचो लड़का जाया।
प्रकृति अनंत कुटुंबी मिलकर, कलहल बहुत उपाया॥
लड़कों के संग लड़की जाई, ता का नाम अधीरी।
बन में बैठी घर-घर डोलै, स्वारथ संग खपी री॥
पाप-पुन्न दोउ पाड़-पड़ोसी, अनंत वासना नाती।
राग द्वेस का बंधन लागा, गिरह बना उतपाती॥
कोइ गृह माँड गिरह में बैठा, बैरागी बन बासा।
जन दरिया इक राम भजन बिन, घट-घट में घर बासा॥
जीव बटाऊ रे
जीव बटाऊ रे बहता भाई मारग माईं।
आठ पहर का चालना, घड़ी इक ठहरै नाईं॥
गरभ जन्म बालक भयो रे, तरुनाये गर्भान।
बृद्ध मृतक फिर गर्भ बसेरा, यह मारग परमान॥
पाप पुन्न सुख दुख की करनी, बेड़ी थारे लागी पाँय।
पंच ठंगो के बस पड़यो रे, कब घर पहुँचै जाय॥
चौरासी बासो बस्यो रे, अपना कर-कर जान।
निस्चय निस्चल होयगो रे, पद पहुंचै निर्बान॥
राम बिना तो को ठौर नहीं रे, जहँ जावै तहँ काल।
जन दरिया मन उलट जगत सूं, अपना राम सम्हाल॥
जो सुमिरूँ तो पूरन राम
जो सुमिरूँ तो पूरन राम॥
अगस अपार पार नहिं जा को,
है सब संतन का बिसराम॥
कोट बिस्नु जा के अगवानी।
संख चक्र सत सारँग पानी॥
कोट कारकुन बिध कर्मधार।
परजापति मुनि बहु बिस्तार॥
कोट काल संकर कोतवाल।
भैरव दुर्गा धरम बिचार॥
अनंत संत ठाढ़े दरबार।
आठ सिधि नौ निधि द्वारपाल॥
कोट बेढ़ जा को जस गावै।
बिद्या कोट जा को पार न पावै॥
कोट अकास जा के भवन दुवारे।
पवन कोट जा के चँवर ढुरावै॥
कोट तेज जा के तपै रसोय।
बरुन कोट जा के नीर समोय॥
पृथी कोट फुलवारी गंध।
सुरत कोट जा के लाया बंध॥
चंद सूर जा के कोट चिराग।
लछमी कोट जा के राँधैं पाग॥
अनंत संत और खिलवतखाना।
लख चौरासी पलै दिवाना॥
कोट पाप काँपै बल-छीन।
कोट धरम आगे आधीन॥
सागर कोट जो के कलसधार।
छपन कोट जा के पनिहार॥
कोट सँतोष जा के भरा भंडार।
कोट कुबेर जा के मायाधार॥
कोट स्वर्ग जा के सुख रूप।
कोट नर्क जा के अंध कूप॥
कोट करम जा के उत्पतकार।
किला कोट बरतावनहार॥
आदि अंत मद्ध नहिं जा को।
कोई पार न पावै ता को॥
जन दरिया के साहब सोई।
ता पर और न दूजा कोई॥
आदि अनादि मेरा साँई
आदि अनादि मेरा साँई॥
दृष्ट न मुष्ट है अगम अगोचर।
यह सब माया उनहीं माईं॥
जो बन माली सींचै मूल।
सहजै पिवै डाल फल फूल॥
जो नरपति को गिरह बुलावै।
सेना सकल सहज ही आवै॥
जो कोई कर भान प्रकासै।
तौ निस तारा सहजहि नासै॥
गरुड़ पंख जो घर में लावै।
सर्प जाति रहने नहिं पावै॥
दरिया सुमिरै एकहि राम।
एक राम सारै सब काम॥
साधो एक अचंभा दीठा
साधो एक अचंभा दीठा।
कडुवा नीम कहै सब कोई, पीवै जा को मीठा॥
बूंद के माहीं समुँद समाना, राई में परवत डोलै।
चींटी के माहीं हस्ती बैठा, घट में अघटा ओलै॥
कूंडा माहीं सूर समाना, चंद्र उलट गया राहू।
राहु उलट कर तार समाना, भोम में गगन समाऊ॥
त्रिन के भीतर अगिन समानी, राव रंक बस बोले।
उलट कपाल तिल माहिं समाना, नाज तराजू तोलै॥
सतगुर मिलैं तो अर्थ बतावैं, जीव ब्रह्म का मेला।
जन दरिया वा पद कूं परसै, सो है गुर मैं चेला॥
साधो ऐसी खेती करई
साधो ऐसी खेती करई, जासे काल अकाल न मरई॥
रसना का हल बैल मन पवना, बिरह मोम तहँ बाई।
राम नाम का बीजा बोया, मेरे सतगुर कला सिखाई॥
ऊगा बीज भया कुछ मोटा, हिरदा में डहडाया।
किया निदान भरम सब खोया, जहँ प्रेम नीर बरखाया॥
नाभी माहिं भया कुछ दीरघ, पोटा सा दरसाना।
अर्ध कँवल में सिरा निकासा, गगन नाद गरजाना॥
मेरु डंड होय डाँडी निकसी, ता ऊपर परकासा।
बीज बुवा था बिरह भोम में, फल लागा आकासा॥
परथम जहाँ संख धुन उपजी, मन की अति रति जागी।
गाजै गगन सुधा रस बरसै, नौबत बाजन लागी॥
त्रिकुटी चढ़ा अनंत सुख पाया, मन की ऊनत भागी।
ऊँचे ध्यान सत बरतै, जहाँ सुखमना चूने लागी॥
चढ़ आकास सकल जग देखा, जुगती थी सो जानी।
संपत मिली बिपत सब भागी, ब्रह्म जोत दरसानी॥
जम गया दूध ब्रह्म कन निपजा, सुरत अवेरनहारी।
हुई रास तब बरतन लागा, आनंद उपजा भारी॥
निपजा नाज भवन भर राखा, ता मध सुरत समाई।
जन दरिया निर्भय पद परसा, तहँ काल न पहुँचे आई॥
सब जग सोता सुध नहिं पावै
सब जग सोता सुध नहिं पावै।
बोलै सो सोता बरड़ावै॥
संयम मोह भरम की रैन।
अंध धुंध होय सोते ऐन॥
जप जप संजम औ आचार।
यह सब सुपने के ब्यौहार॥
तीर्थ दान जग प्रतिमा सेवा।
यह सब सुपना लेवा देवा॥
कहना सुनना हार औ जीत।
पछा पछी सुपनो बिपरीत॥
चार बरन और आस्रम चार।
सुपना अंतर सब ब्यौहार॥
षट दरसन आदि भेद भाव।
सुपना अंतर सब दरसाव॥
राजा राना तप बलवंता।
सुपना माहीं सब बरतंता॥
पीर औलिया सबै सयान।
ख़्वाब माहिं बरतै बिध नाना॥
क़ाज़ी सैयद औ सुलताना।
ख़्वाब माहिंसब करत पयाना॥
साँख जोग औ नौधा भक्ती।
सुपना में इनकी इक बिरती॥
काया कसनी दया औ धर्म।
सुपने सुर्ग औ बंधन कर्म॥
काम क्रोध हत्या पर नास।
सुपना माहीं नर्क निवास॥
आदि भवानी संकर देवा।
यब सुपना लेवा देवा॥
ब्रह्मा बिस्नू दस औतार।
सुपना अंतर सब व्यौहार॥
उद्भिज सेतज जेरज अंडा।
सुपन रूप बरतै ब्रह्मंडा॥
उपजै बरतै अरु बिनसावै।
सुपने अंतर सब दरसावै॥
त्याग ग्रहन सुपना ब्यौहारा।
जो जागा सो सब से न्यारा॥
जो कोइ साध जागिया चावै।
सो सतगुर के सरनै आवै॥
कृत-कृत विरला जोग सभागी।
गुरमुख चेत सब्द मुख जागी॥
संसय मोह भरम निस नास।
आतम राम सहज परकास॥
राम सँभाल सहज धर ध्यान।
पाछे सहज प्रकासे ज्ञान॥
जन दरियाव सोई बड़ भागी।
जाकी सुरत ब्रह्म संग जागी॥
चल सूवा तेरे आद राज
चल सूवा तेरे आद राज।
पिंजरा में बैठा कौन काज॥
बिल्ली का दुख दहै जोर।
मारे पिंजरा तोर-तोर॥
मरने पहले मरो धीर।
जो पाछे मुक्ता सहज छीर॥
सतगुर सब्द हृदे में धार
सहजाँ सहजाँ करो उचार॥
प्रेम प्रबाह धसै जब आभ।
नाद प्रकासै परम लाभ॥
फिर गिरह बसावो गगन जाय।
जहँ बिल्ली मृत्यु न पहुँचै आय॥
आम फलै जहँ रस अनंत।
जहँ सुख में पावौ परम तंत॥
झिरमिर-झिरमिर बरसै नूर।
बिन कर बाजै ताल तूर॥
जन दरिया आनंद पूर।
जहँ बिरला पहुँचै भाग भूर॥
मुरली कौन बजावै हो
मुरली कौन बजावै हो, गगन मंडल के बीच॥
त्रिकुटी संगम होय कर, गंग जमुन के घाट।
या मुरली के सब्द से, सहज रचा वैराट॥
गंग जमुन बिच मुरली बाजै, उत्तर दिस धुन होय।
उन मुरली की टेरहि सुनि-सुनि, रहीं गोपिका मोहि॥
जहँ अधर डाली हंसा बैठा, चूंगत मुक्ता हीर।
आनँद चकवा केल करत है, मानसरोवर तीर॥
सब्द धुन मिर्दंग बाजै, बारह मास बसंत।
अनहद ध्यान अखंड आतुर, धरत सबही संत॥
कान्ह गोपी नृत्य करते, चरन वपु हि बिना।
नैन बिन दरियाव देखै, अनंद रूप घना॥
चल चल रे हंसा राम सिंध
चल चल रे हंसा राम सिंध।
बागड़ में क्या रह्यो बंध॥
जहँ निर्जल धरती बहुत धूर।
जहँ साकित बस्ती दूर दूर॥
ग्रीषम ऋतु में तपै भोम।
जहँ आतम दुखिया रोम-रोम॥
भूख प्यास दुख सहै आन।
जहँ मुक्ताहल नहिं खान-पान॥
जउवा नारू दुखित रोग।
जहँ मैं तैं बानी हरष सोग॥
माया बागड़ बरनी येह।
अब राम सिंध बरनूं सुन लेह॥
अगम अगोचर कथ्या ना जाय।
अब अनुभव माहीं कहूं सुनाय॥
अगम पंथ है राम नाम।
गिरह बसौ जाय परमधाम॥
मान सरोवर बिमल नीर।
जहँ हंस समागम तीर-तीर॥
जहँ मुक्ताहल बहु खान-पान।
जहँ अवगत तीरथ नित सनान॥
पाप पुन्न की नहीं छोत।
जहँ गुरु सिष मेला सहज होत॥
गुन इंद्री मन रहे थाक।
जहँ पहुंच न सक्के बेद बाक॥
अगम देस जहँ अभयराय।
जन दरिया सुरत अकेली जाय॥
पतिब्रता पति मिली है लाग
पतिब्रता पति मिली है लाग।
जहँ गगन मँडल में परम भाग॥
जहँ जल बिन कँवला बहु अनंत।
जहँ वपु बिन भौंरा गोह करंत॥
अनहद बानी अगम खेल।
जहँ दीपक जरै बिन बाती तेल॥
जहँ अनहद सब्द है करत घोर।
बिन मुख बोलै चात्रिक मोर॥
बिन रसना गुन उदत नार।
पाँव बिन पातर निरतकार॥
जहँ जल बिन सरवर भरा पूर।
जहँ अनंत जोत बिन चंद सूर॥
बारह मास जहँ ऋतु बसंत।
ध्यान धरैं जहँ अनंत संत॥
त्रिकुटी सुखमन चुवत छीर।
बिन बादल बरसै मुक्ति नीर॥
अमृत धारा चलै सीर।
कोइ पीवै बिरला संत धीर॥
ररंकार धुन अरूप एक।
सुरत गही उनही की टेक॥
जन दरिया बैराट चूर।
जहँ बिरला पहुंचै संत सूर॥
बाबल कैसे बिसरा जाई
बाबल कैसे बिसरा जाई।
जदी मैं पति सँग रल खेलूंगी, आपा धरम समाई॥
सतगुर मेरे किरपा कीनी, उत्तम बर परनाई।
अब मेरे साँईं को सरम पड़ैगी, लेगा चरन लगाई॥
थे जानराय मैं बाली भोली, थे निर्मल मैं मैली।
वे बतलाएँ मैं बोल न जानूं, भेद न सकूं सहेली॥
थे ब्रह्म भाव मैं आतम कन्या, समझ न जानूं बानी।
दरिया कहै पति पूरा पाया, यह निस्चय कर जानी॥
साधो हरि पद कठिन कहानी
साधो हरि पद कठिन कहानी।
काजी पंडित मरम न जानै, कोइ-कोइ बिरला जानी॥
अलह को लहना, अगह को गहना,
अजर को जरना, बिन मौत मरना।
अधर को धरना, अलख को लखना,
नैन बिन देखना, बिन पानी घट भरना॥
अमिल सूं मिलना, पाँव बिन चलना।
बिन अगिन तन दहना, बस्तु बिन पावना।
तीरथ बिन न्हावना। पंथ बिन जावना॥
रूप न रेख वेद नहिं सिमृत, नहिं जात बरन कुल काना।
जन दरिया गुरगम तें पाया, निरभय पद निरबाना॥
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