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संत परशुरामदेव के सबद : Sant Parshuramdev Ke Sabad

संत परशुरामदेव निंबार्क संप्रदाय से संबद्ध भक्त-कवि थे और उन्हें प्रसिद्ध संत हरिव्यास देव का शिष्य माना जाता है। उनके काव्य में कृष्ण-भक्ति की परंपरा के साथ साधना और सत्संग का महत्व उभरकर आता है। वे मन की निर्मलता को हरि-स्मरण से जोड़ते हैं और मनुष्य को सत्य तथा सदाचार का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देते हैं।दोहों और सबदों में परशुरामदेव ने अपने विचारों को सरल, प्रवाहपूर्ण भाषा में रखा है। कहीं वे साधु-संगति को जीवन बदलने वाली शक्ति बताते हैं, तो कहीं संसार की अस्थिरता के बीच ईश्वर की शरण लेने का संदेश देते हैं। ‘सखी! हरि परम मंगल गाय’ और ‘मनुवा! मनमोहन गाय रे’ जैसे सबदों में भक्ति के साथ प्रेम और समर्पण की अनुभूति भी दिखाई देती है। उनकी रचनाएँ निंबार्क भक्ति-धारा के सहज और उपदेशात्मक काव्य का परिचय देती हैं।

जब कबहूँ मन हरि भजै

जब कबहूँ मन हरि भजै तबहिं जाइ छूटै।

नातरि जग जंजाल ते कबहूँ न विधूटै॥

काम क्रोध मद लोभ सौं वैरी सिर कूटै।

हरि बिन माया मोह कौ तंतू नहिं टूटै॥

हरष सोक संताप ते निज नेह न खूटै।

हरि निर्मल नीर न ठाहरै मन बारुनि फूटै॥

सोच मोह संसै सदा सर्पिन ज्यों चूटै।

‘परसा' प्रभु बिन जीव कौं दुख सुख मिलि लूटैं॥

जग पंडित भुवपाल छत्रपति

जग पंडित भुवपाल छत्रपति, हरि बिन गये खिसाय रे।

अति दलवंत न बदत और कौं, काल सबन कौं खाय रे॥

पायौ नर औतार बिगारयौ, कहा कियौ यहाँ आय रे।

करि न सक्यौ हरि बनिज अचेतन! चाल्यौ जनम ठगाय रे॥

हरि सेवा सुमिरन बिन जाकौ, तन मन बादि बिलाय रे।

'परसुराम' प्रभु बिन नर निर्फल, बहि गयो बस्तु गमाय रे॥

हरि-हरि सुमिरि न कोई हारयौ

हरि-हरि सुमिरि न कोई हारयौ।

जिन सुमिरयौ तिनहीं गति पाई राखि सरन अपनी निस्तारयौ।

कौरव सभा सकल नृप देखत सती विपति पति नाहिं सँभारयौ॥

हाहाकार सबद सुनि संकट तिहिं औसर प्रभु प्रगट पधारयौ।

हरि सौ समरथ और न कोई महापतित कौ दुख टारयौ॥

दीनानाथ अनाथ निवाजन भगतबछल जु बिरद जिन धारयौ।

'परसुराम' प्रभु मिटै न कबहूँ साखि निगम प्रह्लाद पुकारयौ॥

हरि सौं प्रेम नेम जो रहिहैं

हरि सौं प्रेम नेम जो रहिहैं।

तौ कहा जग उपहास प्रीति ते सरै कहा कोऊ कछु कहिहैं॥

हरि निज रूप अनूप अभैवर, सुबस भयौ ऐसौ सुख जहिहैं।

परम पवित्र पतित पावन जस, सो तजि कौन स्वर्ग चढ़िहैं॥

पतिव्रत गयौ तौ रह्यौ नहीं कछु, या बड़ हानि जानि को सहिहैं।

कौन पतित पति कौ व्रत परिहरि, भ्रमि संसार धार में बहिहैं॥

आन उपासन करि पति परिहरि, धृग सोभा ऐसी जो महि हैं।

तजि पारस पाषान बाँधि उर, बसि घर में घर कौं को दहिहैं॥

हरि सुख सिंधु अपार प्रगट जस, सेइ सुमिरि सुनि करि जस लहिहैं।

‘परसराम’ निर्बाह समझि यह, तजि हरि सिंह स्वान को गहिहैं॥

हरि सुमिरन करिए निसतरिए

हरि सुमिरन करिए निसतरिए।

हरि सुमिरन बिन पार न परिए॥

हरि सुमिरै सोई हरि नाती।

हरि न भजै सोइ आतम घाती॥

हरि सुमिरै हरि कौं हितकारी।

हरि न भजै सोई ब्यभिचारी॥

हरि सुमिरै सेवक सुखनामी।

हरि न भजै सोइ लोन हरामी॥

'परसा' हरि सुमिरै हरि तोषी।

हरि न भजै सोई हरि दोषी॥

हरि सुमिरन बिन तन मन झूँठा

हरि सुमिरन बिन तन मन झूँठा।

जैसे फिरत पसू खर सूकर, उदर भरत इंद्रिन भ्रमि बूठा॥

अकरम कर्म करत दुख देखत, मध्यम जीव जगत का जूठा।

निर्धन भये स्याम धन हार्यौ, माया मोह बिषै मिलि मूठा॥

हरि सुमिरन परमारथ पति चिन, जमपुर जात न फिरत अपूठा।

'परसुराम' तिन सौं का कहिये, जो पार ब्रह्म प्रीतम सौं रूठा॥

हरि परिहरि भरमत मति मेरी

हरि परिहरि भरमत मति मेरी।

कहत पुकारि दुरावत नाहिन, यह तौ प्रगट फिरत नहिं फेरी॥

श्रीगुरु सबद न मानत कबहूँ, उमगि चलत अपनी हरि हेरी।

तजि निज रूप विषय मन उरझत, हित सौं चढ़ि बूड़न की बेरी॥

नाहिन संक करत काहू की, चरत निसंक कूप तैं नेरी।

'परसा' छिटकि परी भव जल में, अब कैसें पैयत सो हेरी॥

मनुवा! मनमोहन गाय रे

मनुवा! मनमोहन गाय रे।

अति आतूर होय के हरि-हरि, सुमिरि-सुमिरि सुख पाय रे॥

हरि सुख सिंधु भजत भजताँ, सुनि सब दुख दोस दुराय रे।

यौ औसर फिरि मिळै न मिलिहै, तौ भजि लीजै हरि राय रे॥

पतित-पतित पावन करि कैं, जमपुर ते लैहिं बुलाय रे।

यह हरि साखि समुझि सुनि चित करि, भज मन बिलँब न लाय रे॥

करि आरति हित सौं हरि सन्मुख, सक्यौ न सीप नवाय रे।

जनमि-जनमि जमद्वार निरादर, बारंबार बिकाय रे॥

अति संकट बूड़त भव जल में, अंत न और सहाय रे।

तोहि और हरि परम हितू बिन, को राखै अपनाय रे॥

सखी! हरि परम मंगल गाय

सखी! हरि परम मंगल गाय।

आज तेरे भवन आये अलख अबिगत राय॥

लोक वेद म्रजाद कुल की कानि बानि बहाय।

परम पद निस्सान निर्भय प्रगट होय बजाय॥

उमगि सन्मुख अंक भरि-भरि भैंटि कंठ लगाय।

बिलसि सुखनिधि नेम धरि सखि प्रेम सौं लौ लाय॥

वारि तन मन प्रान धन कछु राखिये न दुराय।

'परसा' प्रभु को सौंपि सर्वस सरन रहि सुख पाय।

कहा सरयौ नरनाह रूप तैं

कहा सरयौ नरनाह रूप तैं, भूपति भूप कहायौ।

जीवन जनम गयौ दुरि दुख महिं, हरि सुख सिंधु न पायौ॥

बेद पुरान सुन्यौ सब सीखौ, गायौ गाय सुनायौ।

मेटि न सक्यौ कर्म मन तन तैं, हरि निहकर्म न गायौ।

कियौ करायौ सबै गँवायौ, जो हरि मन न बसायौ।

तन के दोष मिटैं क्यों 'परसा', हरि मन माहिं न आयौ॥

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