संत शिवदयाल सिंह के सबद : Sant Shivdayal Singh Ke Sabad
घर आग लगावे सखी
घर आग लगावे सखी, सोइ सीतल समुंद समावे।
जड़ चेतन की गाँठ खुलानी, बुंदा सिंध मिलावे॥
सुरत शब्द की क्यारी सींचे, फल और फूल खिलावे।
गगन मंडल का ताला खोले, लाल जवाहिर पावे॥
सुन्न सिखर का मंदिर झांके, अद्भुत रूप दिखावे।
मान सरोवर निरमल धारा, ता बिच पैठ अन्हावे॥
संतन साथ हाथ फल लेवे, धृग-धृग जगत सुनावे।
महासुन्न का नाका तोड़े, भंवर गुफा ढिग जावे॥
सत्तनाम पद परस पुराना, अलख अगम को धावे।
राधास्वामी सतगुरु पावे, तब घर अपने आवे॥
चूनर मेरी मैली भई
चूनर मेरी मैली भई, अब का पै जाऊँ धुलान।
घाट-घाट मैं खोजत हारी, धुबिया मिला न सुजान॥
नइहर रहुँ कस पिया घर जाऊँ बहुत मरे मेरे मान।
नित-नित तरसूँ पल-पल तड़पूँ, कोइ धोवे मेरी चूनर आन॥
काम दुष्ट और मन अपराधी, और लगावें कीचड़ सान।
कासे कहूँ सुने नहिं कोई, सब मिल मरते मेरी हान॥
सखी सहेली सब जुड़ आईं, लगीं भेद बतलान।
राधास्वामी धुबिया भारी, प्रगटे आय जहान॥
प्रेमी सुनो प्रेम की बात
प्रेमी सुनो प्रेम की बात।
सेवा करो प्रेम से गुरु की और दर्शन पर बल-बल जात॥
बचन पियारे गुरु के ऐसे जस माता सुत तोतरि बात।
जस कामी को कामिन प्यारी अस गुरुमुख को गुरु का गात॥
खाते-पीते चलते-फिरते सोवत-जागत बिसरि न जात।
खटकत रहे भाल ज्यों हियरे दर्दी के ज्यों दरद समात॥
ऐसी लगन गुरु संग जाकी वह गुरुमुख परमारथ पात।
जब लग गुरु प्यारे नहिं ऐसे तब लग हिरसी जानो जात॥
मनमुख फिरे किसी का नांही कहो क्योंकर परमारथ पात।
राधास्वामी कहत सुनाई अब सतगुरु का पकड़ो हाथ॥
मुरलिया बाज रही
मुरलिया बाज रही कोइ सुने संत धर ध्यान।
सो मुरली गुरु मोहिं सुवाई लगे प्रेम के बान॥
पिंडा छोड़ अंड तजि भागी सुनी अधर में अपूरब तान।
पाया शब्द मिली हंसन से खैंच चढ़ाई सुरत कमान॥
यह बंसी सतनाम बंस की किया अजर घर अमृत पान।
भंवर गुफा ढिग सोहं बंसी रीझ रही मैं सुन-सुन तान॥
इस मुरली का मर्म पिछानो मिली शब्द की खान।
गई सुरत खोला वह द्वारा पहुँची निज स्थान॥
सत्तपुरुष धुन बीन सुनाई अद्भुत जिनकी शान।
जिन-जिन सुनी आन यह बंसी दूर किया सब मन का मान॥
सुरत सम्हारत निरत निहारत पाय गई अब नाम निशान।
अलख अगम और राधास्वामी खेल रही अब उस मैदान॥
धुन-धुन डालूँ अब मन को
धुन-धुन डालूँ अब मन को। मैं धुनिया सतगुरु चरनन को॥
मन कपास सूरत कर रूई। काम बिनौले डाले खोई॥
हुई साफ़ धुन की सुधि पाई। नाम धुना ले गगन चढ़ाई॥
गाली मनसा गाले कर्मा। चरखा चला कते सब भर्मा॥
सूत सुरत बारीक निकासा। कुकड़ी कर किया शब्द निवासा॥
चित्त अटेरन टेर सुनाई। फेर-फेर कवलन पर लाई॥
कवंल-कवंल लीला कहा गाऊँ। सुन-सुन धुन निज मन समझाऊँ॥
सुरत रंगी करे शब्द बिलासा। तजी बासना बेची आसा॥
निकट पिंड सुन पैठ समाई। सौदा पूरा किया बनाई॥
राधास्वामी हुए दयाला। नफ़ा लिया खोला घट ताला॥
सोता मन कस जागे भाई
सोता मन कस जागे भाई, सो उपाव मैं करूँ बखान।
तीरथ करे ब्रत भी राखे, विद्या पढ़के हुए सुजान॥
जप तप संजम बहुबिधि धारे, मौनी हुए निदान।
अस उपाव हम बहुतक कीन्हें, तो बी यह मन जगा न आन॥
खोजत-खोजत सतगुरु पाये, उन यह जुक्ति कही परमान।
सतसंग करो संत को सेवो, तन मन करो कुरबान॥
सतगुरु शब्द सुनो गगन चढ़, चेत लगाओ अपना ध्यान।
जागत-जागत अब मन जागा, झूठा लगा जहान॥
मन की मदद मिली सूरत को, दोनों अपने महल समान।
बिना शब्द यह मन नहिं जागे, करो चाहे अनेक विधान॥
यही उपाय छाँट कर गाया, और उपाय न कर परमान।
बिरथा बैस बितावें अपनी, लगे न कभी ठिकान॥
संत बिना सब भटके डोलें, बिना संत नहिं शब्द पिछान।
शब्द-शब्द मैं शब्दहि गाऊँ, तू भी सूरत लगा दे तान॥
घर पागे चौरासी छूट, जन्म मरन की होवे हान।
राधास्वामी कहें बुझाई, बिना संत सब भटके खान॥
देव री सखी मोहिं उमंग बधाई
देव री सखी मोहिं उमंग बधाई। अब मेरे आनंद उर न समाई॥
छिन-छिन हरखूँ पल-पल निरखूँ। छवि राधास्वामी मोंसे कही न जाई॥
आरत थाली लीन सजाई। प्रेम सहित रस भर-भर गाई॥
चरन सरन गुरु लाग बढ़ाई। अधिक बिलास रहा मन छाई॥
कहा कहूँ यह घड़ी सुहाई। सुरत हंसनी गई है लुभाई॥
शब्द गुरु धुन गगन सुनाई। अमी धार धुर से चल आई॥
रोम-रोम और अंग-अंग न्हाई। बरन बिनोद कहूँ कस भाई॥
लिख-लिख कर कुछ सैन जनाई। जानेंगे मेरे जो गुरुभाई॥
राधास्वामी कहत बनाई।चार लोक में फिरी है दुहाई॥
सत्तनाम धुन बीन बजाई। काल बली अति मुरछा खाई॥
अलख अगम दोउ मेहर कराई। राधास्वामी-राधास्वामी दरस दिखाई॥
गुरु घाट चलो मन भाई
गुरु घाट चलो मन भाई, सुरत चदरिया लेव धुवाई।
सेवा साबन दर्शन मंजन, प्रेम का नीर भराई।
बचन की रेह भाव की भाठी, बिरह की अगिन जराई॥
भक्ति नदी जहँ निस दिन बहती, मल-मल तामें मैल गंवाई।
उज्जल निर्मल हुई सुरत जब, ओढ़त मन अब अति हरखाई॥
चला गगन पर मिला शब्द संग, चढ़त-चढ़त त्रिकुटी ढिंग आई।
सुश्र शिखर चढ़ हंस रूप धर, महासुन्न छबि औरहि पाई॥
भंवर गुफा पर सोहं-सोहं, सत लोक सत सोहं गाई।
अलख अगम को देखत-देखत, राधास्वामी चरनन जाय समाई॥
गुरु प्यारे का शब्द सुनो
गुरु प्यारे का शब्द सुनो धर प्यार।
जो जुगती गुरु देय बताई, उसका करो अभ्यास सम्हार।
शब्द गाज रहा घट में हर दम, वाहि सुनो हिये परतीत धार॥
इसी शब्द ने रची त्रिलोकी, यही शब्द करे जीव उबार।
याते दृढ़ कर पकड़ो धुन को, और जुगत सब देव बिसार॥
शब्द-शब्द को सुनो घर चढ़, मन माया से गहो किनार।
राधास्वामी सरन धार अब मन में, पहुँचो इक दिन धुर दरबार॥
अतोला तेरी कर न सके कोइ तोल
अतोला तेरी कर न सके कोइ तोल।
जिन पर मेहर मिले सतगुरु से, सतसंग में उन बनिया डौल॥
उमंग सहित लागे अब घट में, सुनत रहे नित अनहद बोल।
सुन-सुन धुन सुत चढ़त अधर में, काल करम का छूटा हौल॥
चढ़-चढ़ पहुँची सत्तलोक में, दूर हुए सब माया खोल।
राधास्वामी दरस मेहर से मिलिया, पाय गई पद अगम अडोल॥
गुरु बिना कभी न उतरे पार
गुरु बिना कभी न उतरे पार। नाम बिन कभी न होय उद्धार॥
संग बिन कभी न पावे सार। प्रेम बिन कभी न पावे यार॥
जुक्ति बिन चढ़े न गगन मंझार। दया बिनु खुले न बज्र किवार॥
सुरत बिन होय न शब्द सम्हार। निरत बिन होय न धुन आधार॥
गुरु से करना पहिले प्यार। नाम रस पीना मन को मार॥
काल घर जान तजा संसार। द्याल घर आई जन्म सुधार॥
संत गति पाई गुरु की लार। शब्द संग मिली मिला पद चार॥
कहा राधास्वामी अगम बिचार। सुने और माने करे निरवार॥
कामना जग की तज मन यार
कामना जग की तज मन यार।
जगत गुनावन बिष कर जानो, ता में बहत सुरत की धार॥
ज़हर हलाहल नितही खावत, अमृत रस नहिं चाखत सार।
गुरु सतसंग कर शब्द भेद ले, सुरत चढ़ाओ धुन की लार॥
गगन जाय गुरु रूप निहारे, सुन्न में निरखे बिमल बहार।
राधास्वामी चरन बसाय हिये में, पहुँची सत्त पुरुष दरबार॥
गुरु प्यारे के चरनों की हो जा धूर
गुरु प्यारे के चरनों की हो जा धूर।
दीन होय गुरु सन्मुख आवो, जग परमारथ जानो कूड़॥
देवी देवा भाव बिसारो, साखा तज अब पकड़ो सूर।
गुरुदयाल तोहि जुगत बतावे, घट में सुनावे अनहद तूर॥
प्रेम सहित जब जुगत कमावे, देखै नभ में अद्भुत नूर।
राधास्वामी चरन सरन गहो दृढ़कर, मेहर करें तुझ पर भरपूर॥
गुरु प्यारे की प्रीत प्यारी हिरदे धार
गुरु प्यारे की प्रीत प्यारी हिरदे धार।
जगत मोह दुखदाई जानो, मन से उसको तू तज डार॥
कुटुंब जगत की प्रीत न साँची, स्वारथ संग सब लगे लबार।
निज घर की सब सुद्ध सम्हालो, शब्द भेद ले गुरु से सार॥
प्रेम सहित उन जुगत कमाओ, घट में सुन अनहद झनकार।
राधास्वामी मेहर से पार लगावें, उनके चरन का कर आधार॥
सुरतिया सोग भरी
सुरतिया सोग भरी, रहे निस दिन चित्त उदास॥
प्रीतम प्यारे का ब्योग सतावे, नहिं भावे कुछ भोग बिलास।
बेकल तड़प उठत मन माहीं, बढ़त अधिक दर्शन की प्यास॥
गुरु प्यारे मेरे बसें अधर में, मैं तो किया मृतलोक निवास।
कैसे चढूँ दरस क़स पाऊँ, यहि मेरे मन में सोच और आस॥
बिन दर्शन मोहि कल न पड़त है, रटत रहूँ पिया-पिया हर स्वाँस।
कैसी करूँ कौन जुगत कमाऊँ, किस बिधि लखूँ प्रीतम परकाश॥
कासे पूछूँ राह रकाना, प्रीतम का कोइ मिले निज दास।
मैँ तो अजान भेद नहिं जानूँ, चहत रहूँ पिया चरनन वास॥
प्रीतम आपहि मरम जनावे, घट में दिखावे शब्द उजास।
मेहर करै सुत गगन चढ़ावे, पहुँचूँ शब्द गुरु के पास॥
आगे सत्तलोक जाय परसूँ, सतगुरु चरन निज सुख की रास।
आगे चल पहुँचूँ धुर धामा, खेलूँ नित पिया राधास्वामी पास॥
चलो घर गुरु संग घर मन धीर
चलो घर गुरु संग धर मन धीर।
यह तो देश बिगाना जानो, सुद्ध करो निज घर की बीर॥
सतगुरु घट का भेद लखावें, मिल उन से तू खोज शरीर।
मथ-मथ शब्द लखो परकाशा, छान करो तुम नीर और छीर॥
निरमल होय चढ़े स्रुत ऊँचे, निरखे सत पद गहिर गँभीर।
दया हुई सुत अधर सिधारी, पहुँची राधास्वामी चरनन तीर॥
त्याग दे प्यारी जग ब्योहार
त्याग दे प्यारी जग ब्योहार।
बिरह अवस्था आ कर छाई, अब ग़फ़लत तज हो हुशियार॥
सतसंग कर गुरु बचन सम्हारो, भेद लेव तुम सत करतार।
घर चलने की जुगत कमाओ, गुरु चरनन में लाओ प्यार॥
बिरह अंग ले चालो घट में, मन के निकारो सबहि बिकार।
राधास्वामी दया संग ले अपने, सहजहि उतरो भौ जल पार॥
मगन हुआ मन गुरु भगती धार
मगन हुआ मन गुरु भगती धार।
जगत भोग से कर बैरागा, गुरु परसादी मिला अधार॥
आसा मनसा जग की छोड़ी, गुरु चरनन में लागा प्यार।
गुरु बिस्वास धार अब चित में, करम धरम सब दिये निकार॥
चरन सरन गुरु दई मेहर से, अपना कर लिया मोहि सुधार।
राधास्वामी चरन अब बसे हिये में, नित रहूँ मैं चरन सम्हार॥
घट भीतर तू जाग री
घट भीतर तू जाग री, है सुरत पुरानी।
बिना देश झांकत रही, सब मर्म भुलानी॥
काल दाव मारत रहा, पर तू न चितानी।
अब सतगुरु की मेहर से, मौसम बदलानी॥
नरदेही पाई सहज, सतसंग समानी।
सुरत घाट अब पाइया, धुन शब्द पिछानी॥
यह मारग संतन कहा, पंडित नहिं जानी।
जिन यह मारग पाइया, सो छूटे खानी॥
श्याम कंज के घाट से, सुरत अलगानी।
चौथे पद में जा मिली, जहं अचरज बानी॥
पंचम षष्टम पाय के, राधास्वामी जानी।
भाग सुहागिन पाइया, को करे बखानी॥
गुरु प्यारे की प्यारी कर परतीत
गुरु प्यारे की प्यारी कर परतीत।
भाव सहित सतसंग कर उनका, धार हिये में गहिरी प्रीत॥
सुरत शब्द की जुगत बतावें, और सिखावें भक्ति रीत।
करम भरम से खूँट छुड़ावें, और करे तेरा निरमल चीत॥
जो तू गुरु के बचन सम्हारे, जावे निज घर भौजल जीत।
राधास्वामी चरन पकड़ ले ढूँढ़कर, वोही हैं तेरे सच्चे मीत॥
सुरत पनिहारी सतगुरु प्यारी
सुरत पनिहारी सतगुरु प्यारी चली गगन के कूप॥
प्रेम डोर ले पनघट आई भरी गगरिया ख़ूब॥
शब्द पिछान अमीरस पागी देखा अद्भुत रूप॥
नगर अजायब मिला डगर में जहाँ छाँह नहिं धूप॥
पहुँची जाय अगम पुर नामी दरस किया राधास्वामी भूप॥
उमंग मन गुरु चरनन में लाग
उमंग मन गुरु चरनन में लाग।
भोग रोग तज चेत जगत से, सतसंग में अब जाग॥
सुरत समेट लगो घट धुन में, सुन ले अनहद राग।
प्रीत प्रतीत घरो गुरु चरनन, सेवा करत बढ़ाओ भाग॥
सुरत चढ़ाय चलो गगनापुर, धोवो कल मल दाग़।
वहाँ से आगे चलो उमंग से, राधास्वामी चरनन पाग॥
सुरत लाई आरत सरधा धार
सुरत लाई आरत सरधा धार।
उमंग-उमंग गुरु चरनन लागी, सत संगियन में बाढ़ा प्यार॥
आरत सामाँ सजे बनाई, अनेक पदारथ घरे सम्हार।
प्रेमी जन मिल आरत गावे, घंटा संख धूम अति डार॥
गगन मंडल में बजी बधाई, हुए प्रसन्न अब गुरु दयार।
राधास्वामी दया बिचारी, दिया मोहिं निज चरन अधार॥
सुरत लगी गुरु चरनन चित जोड़
सुरत लगी गुरु चरनन चित जोड़।
बचन सुनत जागा अनुरागा, मन को लीन्हा जग से मोड़॥
दर्शन कर हिये बढ़त उमंगा, रूप सुहावन हुआ चित चोर।
गुरु चरनन में बासा चाहत, जग जीवन से नाता तोड़॥
गुरु सेवा लागी अति प्यारी, प्रेम रंग भीजत सरबोर।
राधास्वामी दया काज हुआ पूरा, काल करम सिर दीन्हा फोड़॥
गूजरी चली भरन गगरी
गूजरी चली भरन गगरी श्याम ने रोकी पनघटवा।
सखियन साथ उमंग से जाती खोज लगाती धुन घटवा॥
अब क्या करूँ ज़ोर नहिं चाले कैसे खोलूँ घट पटवा।
मारग रोक भुलावत सबको कला दिखावत ज्यों नटवा॥
धूमधाम कर फिर बगदावत ठहरत देत न काहु तटवा।
ऐसा छलिया कान्ह न माने छोड़त नाहीं निज हटवा॥
गुरु बिन कौन बतावे याते खोल सुनावे धुन छँटवा।
राधास्वामी खेली लीला दूर हटाया अब झटवा॥
गुरु प्यारे का ले तू नाम सम्हार
गुरु प्यारे का ले तू नाम सम्हार।
राधास्वामी धाम का बाँध निशाना।
राधास्वामी नाम सुमिर हर बार॥
यही नाम निज नाम पिछानो।
और नाम सब तज दो झाड़॥
इसी नाम का लेकर भेदा।
सुन-सुन धुन घट में चढ़ यार॥
प्रीत प्रतीत धार अब मन में।
राधास्वामी नाम का कर आधार॥
राधास्वामी दया संग ले अपने।
सहज चलो भौसागर पार॥
भाव घर गुरु सन्मुख आई
भाव घर गुरु सन्मुख आई।
सुरत पियारी बँध रही तन में, बचन सुनत हिये उमगाई॥
जगत भाव और तन-मन प्रीती, तोड़-फोड़ गुरु सर नाई।
दर्शन पाय हरष रही मन में, गुरु छवि निरखत बल जाई॥
उमगा प्रेम हिये में भारी, गुरु चरनन रही लिपटाई।
मेहर करी गुरु लिया अपनाई, राधास्वामी गुन निस दिन गाई॥
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