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गुरु गोविंद सिंह के सबद : Guru Gobind Singh Ke Sabad

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प्रानी! परमपुरुष पग लागो

प्रानी! परमपुरुष पग लागो।

सोवत कहा मोह-निद्रा में, कबहुँ सुचित है जागो॥

औरन कहा उपदेसत है पसु, तोहि प्रबोधन लागो।

संचत कहा परे विसियन कहूँ, कबहुँ विषय रस त्यागो॥

केवल करम भरम से चीन्हु, धरम करम अनुरागो।

संग्रह करो सदा सिमरन को, परम पाप तजि भागो॥

जातें दुःख पाप नहिं भेटै, काल जाल ते त्यागो।

जो सुख चाहो सदा सबन को, तो हरि के रस पागो॥

रे मन! ऐसो करि संन्यास

रे मन! ऐसो करि संन्यास।

बन से सदन सबै करि समझहु, मन ही माहिं उदास॥

जत की जटा जोग को मंजनु, नेम के नखन बढ़ाओ।

ग्यान गुरू, आतम उपदेसहु, नाम-बिभूति लगाओ॥

अल्प अहार सुल्प सी निद्रा, दया छिमा तन प्रीत।

सील सँतोख सदा निरबाहिबो, ह्वैबो त्रिगुन अतीत॥

काम क्रोध हंकार लोभ हठ, मोह न मन सौं ल्यावै।

तब ही आत्म-तत्त कों दरसै, परम पुरुष कहँ पावै॥

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