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संत सिंगा के सबद : Sant Singa Ke Sabad

निमाड़ की लोकभाषा में संत-वाणी को स्वर देने वाले संत सिंगा मध्यकालीन निर्गुण संत-काव्य के उल्लेखनीय कवि माने जाते हैं। वे संत मनरंगीर के शिष्य थे और खंडवा क्षेत्र से उनका संबंध रहा। उनकी साधना में आत्मानुभूति, गुरु-मार्ग और हरि-स्मरण का विशेष स्थान दिखाई देता है। बाहरी आडंबर के बजाय वे मनुष्य को अपने भीतर झाँकने और जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझने की सीख देते हैं।

सिंगा की रचनाओं में निमाड़ी लोकभाषा की स्पष्ट छाप है। उनके सबदों में मोह से बचने, कपट छोड़ने, मृत्यु की अनिवार्यता समझने और नाम-स्मरण द्वारा आत्मिक शांति पाने की बातें मिलती हैं। ‘चढ़ी जा सोहंग धारा रे मन’ तथा ‘ऐसा मरण मरो संत भाई’ जैसे सबद उनकी साधना-दृष्टि को सामने रखते हैं। उनकी वाणी के कई रूप लोक में गाए जाते रहे हैं और मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल की संत-लोक साहित्य परंपरा में उनका विशेष महत्व है।

अबकी जलम सुधारों गुरुजी

अबकी जलम सुधारों गुरुजी मेरी अबकी जलम सुधारो।

नहीं भूलूं जस तेरो गुरुजी मेरो अबकी जलम सुधारो॥टेक॥

गुरु बिन सहाय करै कौण जिव की तीरथ वरो न हज़ारो।

पति बिन सोभा क्या तिरिया की क्या विधवा को सिनगारो॥

घड़ी दुई घड़ी में करूँहूँ विनती बेगि ते सुणों हो पुकारो।

आप गुरुजी मेरे पर उपकारी अवगुण चित न धरो॥

गुरु बिन ज्ञान ध्यान सब फोकट फोकट नेम हज़ारो।

बैकुँठ से पीछा फिरी आया सुकदेव नारद प्यारो॥

राम मिलण की राह बताओ ना मेटो मन मेरो।

गुरु सिंघा को दरसन दीजो सिर पर पंजो थारो॥

मतै बयजो मोह की धारा रे हंसा

मतै बयजो मोह की धारा रे हंसा।

झूठा है संसारा रे हंसा॥

झूठी गेह देह धन धरणी झूठो सकल पसारा।

झूठी, अरधंगी न तोहैं भरमायो नहीं उतरन दे पारा रे हंसा॥

काम क्रोध कछ मछ बसत है लोभ मगर खावे हाड़ा।

अहंकार की लहर जो आवे मद का उड़त फुवारा रे हंसा॥

दुरमति दोय त भव जल गंदलो कपट भंवर फेरा फेरा।

आसा तरसणा की कांजी बहत है पीवो सोई बीमारा रे हंसा॥

खोजी खेयटिया ये नाव चढ़ै रे सादु ये सब से है न्यारा।

कहे गुरु 'सिंगा' सुणो भई सादु डूब्या मृढ़ गँवारा रे हंसा॥

तज दिये प्राण काया हो

तज दिये प्राण काया हो कैसी रोई।

चलत प्राण काया कैसी रोई छोड़ चला निरमोही॥

मैं जाणू काया सँग चलेगी।

याके कारण काया मल-मल धोई॥

ऊँचे नीचे मंदिर छांडे गाय भैंस घर घोड़ी छोड़ी।

त्रिया तो कुलवंती छोड़ी और तो छोड़ी पुत्रन की जोड़ी॥

मोटी छोटी डांडी मंगाई बिन काठ की घोड़ी।

चार जणा मिल ले जो गए हैं फूक दई रे फागुण जसी होरी॥

भोली तिरिया रोवन लागी बिछुड़ गई मोरी जोड़ी।

कहे जण सिंगा सुणो भाई सादु जिन जोड़ी तिन तोड़ी॥

झूठा जाप जपो मत कोई

झूठा जाप जपो मत कोई पहिचाने गति होई॥टेक॥

भोपा घुमावे भूत मनावे रमन धमन दोई जागे।

भैंरो आवे करे लुटावन पत्थर से पूत मांगे॥

कृष्ण महादेव आप कहावे सोई बसत पराया रे।

जो कोई उनका सुमरन करे सो भी मुक्ति नहिं पावे रे॥

शिव सनकादि आदि ब्रह्मादिक सोई पार नहिं पाया रे।

अपरंपार भरे जग माहीं सतगुरु को बतलाया रे॥

बिन देही का साहब मेरा व्याप रहो घट माहीं रे।

कहे जनि सिंघाजी सुनो भाई साधू सिंघा सहज समाया रे॥

अंत को तरणा नित

अंत को तरणा नित नाम सुमरण करणा॥टेक॥

रंग सरूपी बनी सुंदरी माया देखी मत भूलणा।

ये पवलीयो फिर नहीं आवे तुम लख चौरासी फिरणा॥

घर माल का भरा ख़ज़ाना पल में होत विराणा।

उल्टी पवन चले घट भीतर तुम उनका करो ठीकाणा॥

इतनो जनम गयो बहोतेरो माया माही फंदाना।

हरि को नाम लियो नहीं सरवण तुम बेस धरि-धरि मरणा॥

साधु संत के सरणे रहना उपाय कबहुं न करना।

कहे जन सिंघा सुणो भाई सादु तुम रहो राम के सरणा॥

खेती खेड़ो हरि नाम की

खेती खेड़ो हरि नाम की जामें होवे लाभ॥

पाप का पालवा कटाड़ जो काटी बाहेर राल।

करमन की कासी ये चाड़ जो खेती चोखी हुई जाय॥

मन के पवन दुई बलदिया सुरती रास लगाय।

प्रेम पीराणो कर वरो ग्यानी आर लगाय॥

वो हंग परवर जू पजो सो हंग सरतो लगाय।

मूल मंत्र बीच बौव जो खेती लड़ झुम थाय॥

सत को भालो रोपज्यो धरम पयड़ी लगाय।

म्यान का गोला चलाबजो सुंवा उड़ी-उड़ी जाय॥

दया की दावण राल जो भवरी फेर न होय।

कहे जण ‘सिंगा’ पहेचाण जो आवागमन नहीं होय॥

गुरु के चरण गंगा

गुरु के चरण गंगा।

कोई नहाई लेओ रे लूला अपंगा॥

जोगी हुई न जटा बढ़ाव बन-बन फिरउ नंगा।

माल खाई न देह फुलाव बणी रह्या लाल सुरंगा॥

इत सन्यासी न उत बैरागी तीरथ करी रह्या दंगा।

कहै जण ‘सिंगा’ सुणो भाई सादु अहो नुम फिरी रह्या अपंगा॥

बिन देही का साहब मेरा

बिन देही का साहब मेरा देह धरी संसारा रे॥

ताल पखावद बजे झांझरी ज्ञान कथे बहुतेरा रे।

कथा कीर्तन करे बहुतेरा तो भी साहब नहिं माना रे॥

नागा मुनि और दिगंबर मुक्त राह नहिं जाना रे।

करे तपस्या झूले उरघ मुख सो भी साहब नहिं माना रे॥

देवल देवी पूजे बहुतेरा बैठ गये तुला दाना रे।

लिंग भंग पूजे बहुतेरा सो भी साहब नहिं माना रे॥

मैं तो देखूँ पाखंड सारा मोह पीछे जाना रे।

कहें जन सिंघा सुनो भाई साधो सहजे सहज समाना रे॥

क्यों करतो गुमान मूरख मन धारी

क्यों करतो गुमान मूरख मन धारी उमर चली हैवान॥टेक॥

नहीं कछु लाया नहीं लै जाएगा क्यों करता गुमान।

ये गुमान म सब जग बहियो अब रट गुरु को ज्ञान॥

धन चाहे तो सो धरम करले मुक्ति चाहे तो भजो नाम।

संकट पड़े से प्राण दोहेला अवसर आवसे काम॥

कौड़ी-कौड़ी माया जोड़ी धर्यो रखी एक ठाण।

चलणा कौ बिरिया काम नी आवे यई माया को नाम॥

हाल दीवाणा कोई माल दीवाणा जीवन दीवाणा गुलाम।

कहे सिंघाजी हम नाम दीवाणा पाया गुरु को धाम॥

चढ़ी जा सोहंग धारा रे मन

चढ़ी जा सोहंग धारा रे मन तू क्यों मारा मारा॥

तज दे कपट अटारी महल पे जा बैठे रे गंवारा।

वहाँ का खेल निराला देखो यहाँ का है झूठा पसारा॥

चढ़ी गमन मगन हुई देखो बहती तिरवेणी धारा।

उस धारा में न्हालो धोलो फिरणा नहीं लागे किनारा॥

बीच तिरवेणी सुमरण करले जपले सोहम प्यारा।

वो है सो तू है, तू है सो वो है रख निश्चय निरधारा॥

ये है तंत संत नित प्यारा रख निश्चय ये धारा।

कहे जण ‘सिंगा’ सुणो भाई सादजु हरि भजन का प्यारा॥

गुरु गम को मारग वाको

गुरु गम को मारग वाको॥

खांडा की धार छुरी को पानो, जहाँ असल सुई को नाको।

परधन माल पराई तिरिया, अरे गुरु इधर-उधर मत झांको॥

सोहं सिखर गढ़ चढ़ीजा मनुवा, तू गिरे तो यहाँ को नी वहाँ को

कहे जन सिंघा सुनो भाई साधो, जहाँ भक्ति को नहीं है टाको॥

चढ़ी जाओ हम सीधी धारा

चढ़ी जाओ हम सीधी धारा॥

बंकनाल उलटी कद चाले मेंढक रवि ससिधारा।

सुकमण नार सासरो निरमल वाही में सिरजनहारा॥

दिल दरियाव अमरत मीठा ये सबको लगता प्यारा।

और जल है सब समता का घट-घट का है न्यारा॥

ज्यों मछली जल में पहरे ज्यों पहरे संसारा।

पर ढीमर डाले जल माहीं सिर पर काल का डेरा॥

अलंक निवारा अलंक में पारा याही में सिरजन प्यारा।

कहे जण ‘सिंगा’ सुणो भाई सादु प्राण देह से है न्यारा॥

समझ म्हारा वीर मनवा

समझ म्हारा वीर मनवा समझ म्हारा वीर॥टेक॥

ये भव सागर पार उतरना जाना पहला वीर।

आठ नौ मास गरभ में राखे अटल भजो रघुवीर॥

कलु काल कौ घाटी चढ़ी हुओ है बे पीर।

मन दूत की नाव बनी है लोभ भरया भरती है॥

झूठा पुतला बणया खेवटिया किस विधि उतरेगो पार।

लाल खंभ से खैंच बंधोगे कौन चढ़े तेरी भीड़॥

गंगा यमुना नहातो डोले मलीच जड़यो शरीर।

कह जण सिंघा सुण भाई साधो गुरु चरण के तीर॥

दया धरम क्यों छोड़ो रे धर्मी

दया धरम क्यों छोड़ो रे धर्मी।

दया धरम क्यों छोड़ो हऊँ कऊँ बचन एक थोड़ो रे॥

हरी जन की आतमा कल पावे तुख पड़से बंदी तोड़ो रे।

संत सतावे न तीनई बढ़ावे तुख कुँभी पाप पड़ो रे॥

सोमदेव को बंस लजायो बीरमती को कियो विखोड़ो रे।

कहे जण सिंगा सुणो भाई सादु गिरे सोहंग सिखर से छोड़ो रे॥

ऐसा मरण मरो संत भाई

ऐसा मरण मरो संत भाई भवरी जलम नहीं धरणा रे॥

अगले होयंगे आग का पूला आपण होगा पाणी रे।

जाणे आगु आजाण होणा तत्व लेना छाणी रे॥

नद्दी नाला मेल भयो है जब दरियाव कव्हाणा रे।

गंगा जल की मोटी महिमा देस म देस बिकाणा रे॥

अठारह वरण की गौआ दुहाई एक बरतन मु रखणा रे।

दही मथी न माखन कीना न बरतण को क्या करणा रे॥

साधु संत से अधीन रहणा उपाव कभी न करणा रे।

कहे जण ‘सिंघा’ सुणो भाई साधु, साधु सदा दीवाणा रे॥

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