संत लाधूनाथ के सबद : Sant Ladhunath Ke Sabad
संत लाधूनाथ आधुनिक काल के संत कवि थे और उनका संबंध राजस्थान के मसूरी क्षेत्र से बताया जाता है। वे दलित समाज से जुड़े थे, लेकिन उनकी रचनाओं का शिल्प संत काव्य की पुरानी परंपरा से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। उनकी कविता में आत्मज्ञान, गुरु-महिमा, राम-नाम और भक्ति के साथ ऊँच-नीच तथा धार्मिक आडंबर से ऊपर उठने की बात मिलती है। मनुष्य को भीतर की सच्चाई खोजने और नाम-स्मरण की ओर ले जाना उनकी वाणी का महत्वपूर्ण पक्ष है।
‘अबधू अखी देश हमारा’, ‘कारीगर धन चेजारा भारी’, ‘भजन में सब कोई को सीर’ और ‘हँसला जुग जीता बड़भागी’ जैसे सबदों में निराकार परम सत्ता, आत्मचिंतन, भक्ति और गुरु-कृपा के विचार सामने आते हैं। उनकी भाषा में राजस्थानी लोकभाषा का रंग है
अबधू जुग से करी उदासी
अबधू जुग से करी उदासी।
अखी देव से डोरी जोड़ी टूटी काल की फाँसी॥
एक दिन पवना ऐसी आसी उड़सी धरण अकासी।
खंड ब्रह्मंड सब उड़ जासी चंदा सूरज बिलासी॥
ब्रह्मा विष्णु शिव अरू शक्ति सब ही काल के दासी।
हर नारायण शेष महेशा काल चकर में आसी॥
रंग रूप काया अरू माया उत्पत रचना नासी।
रहसी एक आत्मा अमर विरला जोगी ध्यासी॥
लाधूनाथ आप से मिलिया नहीं आवे नहीं जासी।
मूल पेड़ सब खोजी जोगी सत की बाणी गासी॥
नारी सब रचना की खाँणी
नारी सब रचना की खाँणी।
देवी-देवता नारी में उपजा नारी में पवना पाँणी॥
ब्रह्मा विष्णु नारी राखी सदा नार के सँगा।
आदि शक्ति शिव की नारी रच्या लिंग अरू भंगा॥
राम कृष्ण संग नारी रमती नाथ मछंदर भोगी।
व गोरखनाथ एकला रहता आदि अखंडी जोगी॥
ध्रुव प्रहलाद रिषेसर मुनि नारी के पेट से जाया।
बरन अकाश चंद्रमा सूरज नारी के भग से आया॥
तीनूँ लोक इक्किसूँ ब्रह्मंड भग में सकल पसारा।
हरनारायण शेष महेशा कोई नहीं निकले बारा॥
इस नारी को त्यागी होसी वो पाखण्डी पूरा।
रूप-रूप घट-घट में नारी किसविध होसी दूरा॥
लाधूनाथ की तीजाँ नारी कबहूँ ना अँग से त्यागी।
अखे मंडल में हँसा पूगा जोगेश्वर बड़ भागी॥
कारीगर धन चेजारा भारी
कारीगर धन चेजारा भारी।
धरा गिगन चंदा सूरज रचिया रचदी रचना सारी॥
लख चौरासी जूणी रच दी देखा न्यारी-न्यारी।
नर-नारी को आप बणावे आप पुरुष नहीं नारी॥
रामचंद्र कई किरोड़ों हो गए किरोड़ों कृष्ण मुरारी।
तेरा भेद वाहीं नहीं पाया तू तो अथग अपारी॥
वेद कतेब पार नहीं पावे कुदरत कला तुमारी॥
काजी पंडित रीता जावे देवी-देवता हारी॥
अनघड़ अलख लख्यो नहीं जावे अमरदेव निराकारी।
लाधूनाथ आत्मा खोजी सत का शब्द पुकारी॥
हँसला कुण माता कुण मासी
हँसला कुण माता कुण मासी।
हरी भजन बिन दुख में जावे अंतकाल पिछतासी॥
तीर्थ व्रत से पाप धुपे नहीं न्हावों गंगा काशी।
वेद पुराण पढ़ो भावे गीता हाथ कछु नहीं आसी॥
काया नगर में अमर आत्मा नहीं ऊपजे नहीं नासी।
भूला जीव पत्थर कूँ पूजे घट की अक्ल गमासी॥
सत्संगत कर गुरु की सेवा निराकार कूँ ध्यासी।
अखी जोत में हँसा मिलिया काल कबहूँ नहीं खासी॥
लाधूनाथ जागता जोगी सत की बाणी गासी।
आवागमन में फेर नहीं आवे एक देव कूँ ध्यासी॥
पिंडतों कैसे राम रिझाया
पिंडतों कैसे राम रिझाया।
वेद कतेब भ्रम की फाँसी पार कोई नहीं पाया॥
तीर्थ व्रतकर पत्थर पूजो फिर गिर शीश निवाया।
जड़ जूँण में जीवडो जासी बहुत घणा दुःख दाया॥
गीता पुराण भागवंत बाँचो रामायण पढ़ गाया।
राम कृष्ण जी परले आया झूठा जुग भरमाया॥
धरा गिगन अरू चंदा सूरज माया खेल रचाया।
हर ओंकार काल के माहीं सबको जमड़ा खाया॥
खंड मंड सब भस्मी होसी ऊपर अग्न जलाया।
तीन लोक अरू चवदे भवन में धधुंकार मिलाया॥
ऊँच नीच में एक अखंडी चराचरी में छाया।
हिंदु मुसला नर अरू नारी पूर्ण ब्रह्म समाया॥
लाधूनाथ आत्मा खोजी एक देव को ध्याया।
निराकार में डोरी साँधी अखी नगर बसाया॥
भजन में सब कोई को सीर
भजन में सब कोई को सीर।
ऊँच नीच हो नर नारी हो पूगे पेले तीर॥
हर की भक्ति करो प्रेम से राजा प्रजा फ़क़ीर।
जिन बिना नर ढौर समाना पंडित कसाई कीर॥
राम नाम से काया माँजो पीवो इमरत नीर।
पाप कल्पना सारी धोवो निर्मल करो शरीर॥
हँसा होय चुगो नित मोती नाम अमोलख हीर।
ध्रु प्रह्लाद कई हँस चुगता चुगता गोरख कबीर॥
लाधूनाथ जागता जोगी दृढ़ बुद्धि मन धीर।
गुरु प्रताप भजन में पूरा पाई अमर जागीर॥
अबधू जग परले में जावे
अबधू जग परले में जावे।
एक देव की भक्ति भूला निर्फल जन्म गमावे॥
गीता वेद भागवंत बाँचे सार तंत नहीं पावे।
तीर्थ व्रत देवरा पूजे जीव जाल उलझावे॥
पिता पुत्र में कोई नहीं संगी आप किए फल पावे।
गुरू सेवा सत संगत छोड़ी पापी पाप कमावे॥
काजी पंडित राजा प्रजा सबको जमड़ा खावे।
तीन लोक में उत्पत्त रचना पृथ्वी में मिल जावे॥
अकाश मंडल में अग्न तपेगी सभी भस्म होय जावे।
धरणा अकाश चंद्रमा सूरज मंडल खेण नहीं पावे॥
लाधूनाथ आत्मा खोजी आप अखंडी ध्यावे।
निराकार में जोती मिलगी सत में बूँद सँमावे॥
हँसला रटो हरि की माला
हँसला रटो हरि की माला।
काल जमाँ का बंधण टूटे कटे जीव का जाला॥
जीभ होट का काम नहीं कुछ नहीं कुँची नहीं ताला।
सत की डोर शब्द का मिणिया फेरे गुरु का बाला॥
निज नाम का धोरा उल्टी अखे नाम असराला।
सुन्न मंडल में भरी भंडारा जोगेश्वर मतवाला॥
अमर कोट में झिंडा फरूके किरोड़ जोत उजियाला।
अधर छत्र जोत में जोती मिले समंदर नाला।
लाधूनाथ आप से मिलिया नहीं धोला नहीं काला॥
भजन बिन ऊमर पाई थोड़ी
भजन बिन ऊमर पाई थोड़ी।
दान पुन्न को भूल गयो नर माया बहुत सी जोड़ी॥
पाप कपट के घोड़े चढ़ियो मूर्ख मूँछ मरोड़ी।
घड़ी पलक भर जुग में जीवणों जमड़ा गर्दन तोड़ी॥
भाई कहवे मेरी बाँह टूटगी नारी कहवे मेरी जोड़ी।
मात पिता रोवे चिल्लावे पीट-पीट छाती फोड़ी॥
मतलब के संगी सब जुग में इनसे मुखड़ो मोड़ी।
मोह माया में फँसे प्राणी अंतकाल में छोड़ी॥
कई कंगाल कई मायापति कई-कई लाख किरोड़ी।
लाधूनाथ भजन बिना माया झूठी फूटी कौड़ी॥
हँसला जुग जीता बड़भागी
हँसला जुग जीता बड़भागी।
जरा मरणा का बंधन टूटा सत में बूँद सँमागी॥
दु:ख मिटे सुख संपत्ति पाई काम कल्पना भागी।
तृष्णा ताप तप्त सब बुझगी अलख नाम लिव लागी॥
निर्मल हुवा पाप सब धुपिया अणघड़ मिलिया सागी।
भेद मरम कोई विरला पावे नहीं भेला नहीं त्यागी॥
आरपार में जोगी खेलो नहीं सूता नहीं जागी।
रँग नहीं रूप धूप नहीं छाँया नहीं कोई थाग अथागी॥
लाधूनाथ आपको ध्यावे काल मौत नहीं खागी।
अखी नगर में हँसा पूगा सतगुरु मिलिया पागी॥
अबधू अखी देश हमारा
अबधू अखी देश हमारा।
मेरे देश में ऊपजे नहीं बिणसे किरोड़ जोत उजियारा॥
खंड नहीं ब्रह्मंड अगम नहीं नगमा चाँद सूरज नहीं तारा।
धरा नहीं गिगन पून नहीं पाणी नहीं वहाँ सकल पसारा॥
ब्रह्मा न विष्णु शिव नहीं शक्ति नहीं वहाँ हरकारा।
जात वर्ण कुल काया नाहीं निराकार निरधारा॥
नहीं वहाँ भोम नहीं वहाँ बस्ती नहीं जीता नहीं हारा।
नहीं वहाँ ऊगे नहीं वहाँ आथे नहीं वहाँ रात अँधारा॥
लाधूनाथ अखंडी मिलिया नहीं मरता नहीं मारा।
नहीं वहाँ पिता नहीं वहाँ पुत्र नहीं भेला नहीं न्यारा॥
जोगी राजा तेरी कुदरत न्यारी
जोगी राजा तेरी कुदरत न्यारी।
जन्म मरणा में कबहूँ नहीं आयो काल जम नहीं मारी॥
नहीं तूँ हिंदू नहीं तूँ मुसला नहीं पुरुष नहीं नारी।
नहीं तूँ ओछा नहीं तूँ लंबा नहीं हल्का नहीं भारी॥
नहीं तूँ घटता नहीं तू बढ़ता नहीं जीता नहीं हारी।
नहीं तेरे रूप वर्ण कुल काया अखी अमर निराकारी॥
नहीं तेरे कोट नहीं तेरे क़िला नहीं तेरे अधर अटारी।
नहीं तेरे भोम नहीं तेरे बस्ती नहीं आर नहीं पारी॥
लाधूनाथ तुम्हीं से मिलिया मुख बिना बोल उच्चारी।
नहीं तुम प्रगट नहीं तुम गुप्ति नहीं खिड़की नहीं बारी॥
किसको कहूँ भजन की बाताँ
किसको कहूँ भजन की बाताँ लोग भ्रम में भूलाजी।
सुख सागर हरी नाम छोड़कर दुख समंदर में झूला जी॥
पाँच तत्व अरू तीन गुणा का काया का स्थूला जी।
दशवें गुप्त लगाया ताला नव दरवाज़ा खुला जी॥
झूठा खेल रचे दुनियाँ में जैसे दुली दुला जी।
पल में ऊपजे पल में बिणसे पाणी का बुलबुला जी॥
पापी नुगरा दुःखी जगत में आँधा पँगला लूला जी।
दया धर्म जिसके घट नहीं है उनका सब धन धूला जी॥
काले चक्कर में देवी-देवता काजी-पंडित-मुल्ला जी।
लाधूनाथ आत्मा खोजी सब जुग अमर खुला जी॥
भजन की कहाँ लग करूँ बड़ाई
भजन की कहाँ लग करूँ बड़ाई।
पाप धुपा तन भया पवित्र हँस अमरफल पाई॥
निज नाम की जहाज़ बनाई भवसागर तिरी आई।
हरी भजन का धोरा लागा कमी रही ना काई॥
पापी नुगरा जीव जगत में भजन बिना दु:ख पाई।
दया धर्म सत्संगत भूला जुग-जुग जमड़ा खाई॥
राजा हरिशचन्द राणी तारादे कर दीनी लोग हँसाई।
नीचे कुल में पाणी भरियो अलख डोर लिव लाई॥
अजामेल सा पापी तिरगा गिनका सज्जन कसाई।
करमाँ शिंवरी अधर्मी नारी सेजाँ मुक्ति पाई॥
अड़सठ तीर्थ गंगा जमना घट भीतर में न्हाई।
इमरत हौद भरे गिगना में प्याला भर-भर पाई॥
नानकनाथ मिले जोगेश्वर सूताँ की नींद उड़ाई।
लाधूनाथ जाग अबधूता निराकार को ध्याई॥
मेरा घर क्या बूझो भाई
मेरा घर क्या बूझो भाई।
काल जम्माँ के हाथ नहीं जाऊँ जोती में जोत सँमाई॥
आत्म तंत खोजकर देख सत गुराँ सेन बताई।
पाप कल्पना सारी धुपगी इमरत प्याला पाई॥
बंकनाल में रमणी रमिया ध्रु लग ख़बर मंह गाई।
अखी नाम का धोरा लागा कमी रही नहीं काई॥
अजब नगर की ऐसी महिमा मुख से कही नहीं जाई।
अधर छत्र वहाँ जोगी सूता काल मौत नहीं खाई॥
लाधूनाथ आप से मिलिया देव अखंडी ध्याई।
रँग नहीं रूप नहीं छाँया आवागिवण नहीं आई॥
हँसला दूर देश घर मेरा
हँसला दूर देश घर मेरा।
चंद नहीं सूरज पवन नहीं पाणी नहीं वहाँ रात अँधेरा॥
काजी पंडित वहाँ नहीं पूगे पच-पच मरे घणेरा।
तीन लोक अरू चवदे भवन में काल माया का घेरा॥
खंड नहीं पिंड पुरूष नहीं नारी नहीं मेरा नहीं तेरा।
वहाँ पूगा ऊपजे नहीं बिणसे फेर फिरे नहीं फेरा॥
नहीं वहाँ डिगे नहीं वहाँ डोले अधर अखंडी ठहरा।
अमर जोत में जोती मिलगी मिली संमद में लहराँ॥
लाधूनाथ आत्मा खोजी खोज-खोज कर हेरा॥
अबधू क्या बोलूँ जुग अँधा
अबधू क्या बोलूँ जुग अँधा।
हरि नाम हृदय नहीं जपते लाख उठावे धंधा॥
बेटा पोता जाल भ्रम को नारी भ्रम का फंदा।
बन्धियों जीव मोह की फाँसी पुतला गंदा॥
हस्ती घोड़ा माल खजाना सब झूठा छल छंदा।
काल चक्कर सिर ऊपर घूमे पल में भस्म करंदा॥
दशों अवतार ब्रह्मा अरू विष्णु जम को डाँड भरंदा।
शिव सनकादिक हरनारायण ऊपजे जन्म मरंदा॥
सबके ऊपर अटल अखंडी जोगी ध्यान धरंदा।
लाधूनाथ वहीं जा पूगा पूर्ण काम सरंदा॥
अबधू एक अचंभों भारी
अबधू एक अचंभों भारी।
कर बिना ढोल नगारा बाजे पग बिना नाचे नारी॥
बेटी अपणों पिता जन्मियों जन्मे इकन्न कुवाँरी।
हस्ती कूं कीड़ी परणाई चढ़गी अधर अटारी॥
एक बीज से सब जुग ऊपजे कुण पुरुष कुण नारी।
पाँच तंत को इंड बनायो जामें रचना सारी॥
आँधो पंगलो दोनूँ लड़िया कुण जीता कुण हारी।
आँधो निरखे पँगलों भागे खोली बेगम की बारी॥
इनके ऊपर देव अखंडी अमर आप निराकारी।
मूल नहीं पेड़ फूल फल बोहते कुदरत की गम न्यारी॥
लाधूनाथ आत्मा खोजी सत की सेन हमारी।
खोजी सो इमरत फल पा सी नहीं मीठी नहीं खारी॥
मैं जोगी उण को म्हारी हेली
मैं जोगी उण को म्हारी हेली नहीं पुरूष नहीं नारा।
नहीं भोम नहीं गाँव हे म्हारी हेली नहीं अधर निराकारा॥
कुण जीव कुण पीव हे म्हारी हेली कुण आवे कुण जाय।
कुण माया कुण ब्रह्म हे म्हारी हेली किसको जमड़ा खाय॥
कुण संगी कुण साथ हे म्हारी हेली कुण पिता कुण पूत।
कुण गुरु कुण चेला हे म्हारी हेली कुण देव कुण भूत॥
कुण मरता कुण अमर हे म्हारी हेली जिसका भेद बताय।
आरपार में कुण हे म्हारी हेली सब घट कुण समाय॥
किरोड़ जोत को चानणों म्हारी हेली ऊपर छत्र छाय।
अखे जोगी की सेज में म्हारी हेली पर बिना हँसा जाय॥
लाधूनाथ जोगी जागता म्हारी हेली मुख बिना बाणी गाय।
बिना देह का देव हे म्हारी हेली रूप वर्ण कुल माँय॥
गेबी अजब अचंभा देखा
गेबी अजब अचंभा देखा मुख से कहूँ तो कयो न जाय।
तीन लोक ने कीड़ी गिटगी मुख उदर तो उनके नाँय॥
सूतो बटाउड़ो नींदरा जागे जल बिच अग्नि लागी लाय।
बकरी पकड़ कसाई ने मारे छुन्न-छुन्न करके माँस बिकाय॥
हड्डियाँ जलगी चूल्हों सीजे घर धणी ने खावे धान।
घड़ो बरसे कुवो भरीजे धिन्न जोगाँ रो पूरो ज्ञान॥
जले काँधिया मुड़दो जीवे जमड़े के शिर लागी मार।
शूरवाँ भागे कायर जूझे बिना फौज बावे तरवार॥
मुसलमान घर सूर मारियो हिंदू के घर मारी गाय।
धरमीड़ा नरकां में गिरगा पापी नर बैकुंटाँ जाय॥
लाधूनाथ बोलिया जोगी नानकनाथ जी खोज बताय।
ऊँचा मूल तले को डाला फल लागा पियाँला माँय॥
लाधूनाथ छुडावण चाला गऊ बनी के सिंग ने खाय।
सर्प कूं मूसो खा बैठो हस्ती कूं कीड़ी खा जाय॥
पुरुष ऊपर माचो सूतो ऊभोड़े ने आवे नींद।
माता तो पटराणी बणगी पुत्र जायो सो बणियो बींद॥
पर्वत कूं माखी ले उड़गी तीन लोक से ऊपर जाय।
बिना डंका वहाँ ढोल घूरत है बिना भोमी का नगर बसाय॥
धरती को जल गिगना छायो नदियाँ उल्ट अकाशा आय।
कुवे की जोत अगम जा लागी धिन्न जोगी के आई दाय॥
सातू समंदर सूखा पड़िया सब नदियाँ मछली पी जाय।
लाधूनाथ बोलिया जोगी नानकनाथ जी खोज बताय॥
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