संत बीरू साहिब के सबद : Sant Biru Sahib Ke Sabad
संत बीरू साहिब के जीवन के बारे में प्रमाणिक जानकारी बहुत सीमित मिलती है, लेकिन संत परंपरा में उनका संबंध बावरी साहिबा और यारी साहब से स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ है। वे बावरी साहिबा के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं और प्रसिद्ध संत यारी साहब के गुरु माने जाते हैं। उनके जीवनकाल की निश्चित जन्म-मृत्यु तिथियाँ उपलब्ध नहीं हैं।
बीरू साहिब के सबद मिलते हैं। इनमें मन की साधना, सुमिरन, गुरु-शब्द और भीतर अनुभव किए जाने वाले आध्यात्मिक स्वरूपों का उल्लेख मिलता है। ‘त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल’ जैसे सबद में अनहद नाद, त्रिकुटी और आंतरिक साधना से जुड़े योगपरक संकेत दिखाई देते हैं। उनकी रचनाएँ संत काव्य की उस धारा का परिचय देती हैं जिसमें बाहरी आडंबर से अधिक साधक के भीतर होने वाले आध्यात्मिक अनुभवों पर जोर मिलता है।
हंसा! रे बाझल मोर याहि घराँ
हंसा! रे बाझल मोर याहि घराँ, करबो मैं कवनि उपाय।
मोतिया चुगन हंसा आयल हो, सो तो रहल भुलाय॥
झीलर को बगुला भयो है, कर्म कीट धरि खाय।
सतगुरु सत्य दया कियो, भव-बंधन लियो छुड़ाय॥
यह संसार सकल है अंधा, मोह-माया लपटाय।
‘वीरू’ भक्त हंसा भयो, सुख-सागर चल्यो है नहाय॥
त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल
त्रिकुटी के नीर तीर बाँसुरी बजावै लाल,
भाल लाल से सबै सुरंग रूप चातुरी।
यमुना ते और गंग अनहद सुर तान संग,
फेरि देखु जगमग को छोड़ देवै कादरी॥
वायु प्रचंड चंड बंकनाल मेरुदंड,
अनहद को छोड़ि दे आगे चलु बावरी।
ऊँकार धार वास इनहूं का है विनास,
खसम की साथ करु चीन्ह ले तू नाहरी॥
जन बिरु सतगुरु शब्द रकाब धरू,
चल शूर जीत मैदान घर आवरी॥
आली! रूप लागी लौ आछे मने
आली! रूप लागी लौ आछे मने।
हियरा मध्य मोहनि मूरति राखिलो जतने॥
अलखवान पुरी आसन ध्यान माँझ त्रिपुनि कोने।
दरस परस मोहन मूरति देखिलो सपने॥
कोटि ब्रह्मा जाको पार न पावैं सुर नर मुनि को गने।
‘वीरू’ भक्त केरा मन स्थिर नाही मैं पापी भजिबो केमने॥
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